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Showing posts from August, 2025

पात, सारे... झरेंगे ही, एक दिन..,

मित्रों, देखा है सच! इन आंखों से, इसलिए ही लिख रहा हूं, एक समय आता है जब सेवा करने वाले अंत घड़ी में वृद्ध के प्रति ऊब जाते हैं, उतावले भी और काम धंधों के नुकसान फायदे की बात करते हैं इसी पर चार लाइने आपके लिए...। पात, सारे...  झरेंगे ही,  एक दिन..,  सब.. जानते हैं बस, जब तलक हैं शाख पर.. ताजे, हरे, खुशतर रहें,  मुस्कुराएं.., हंसे..  थोड़ा..., ध्यान.. रखें, बुजुर्गों... का इससे ज्यादा  और क्या  हमे..  चाहिए अब!   उम्र.. के, इस फेज में। पलक.. भर की बात है,  थोड़ा.. रुको!  गिरने... तो दो, इन पत्तियों को, सूख कर!  लाचार हैं, ये!  देख.. तो,  नाम..भर!  को  टंगी हैं, इन.. डालियों  पर,  लुंज.. हैं,  बेकार.. हैं,  बस स्नेह है, थोड़ा.. कहीं  चिपकी.. हुई हैं, सच कहूं तो,  प्रिये ये!  अस्तित्व से ...,  निज.. लड़ रही हैं। एक झोंका..., हवा.. का  बहने.. तो दो। चू पड़ेंगी, लटकी हुई, ये पत्तियां,  फिर... चले.. जाना,  कौन.. रोकेगा तुम्हे!  बोल सकती.. देहरी,...

मां का वह झीना सा आंचल...

मित्रों, मां का आंचल निश्चित ही एक अनुपमेय सुरक्षा, सुख, निश्चिंतता का स्थान, वरदान, आपद मुक्ति और क्या कहूं। इसी पर चार लाइने आपके लिए.. इन..  मिट्टियों.. की,  सोंधी*.. महक को क्या कहूं!   प्रिय!  मलिन... होतीं, ही... नहीं हैं,  स्मृति... से। खींच लेतीं हैं मुझे..ये अपने भीतर,  धुंधलते आंचल में, मां के। आज भी,  ये... बालपन में  बचपने..में, घेरकर! मुझे रोकती हैं,  कह रहीं हैं प्रेम से, आ चलें... पीछे!  प्रिये..!  फिर, उन्हीं हम! मस्तियों में।  माई*.. का  आंचल*..! याद है, वो... गंध.. उसकी याद है,  पंजी*.. की साड़ी,  किनारी*..  कोर.. जिसकी चमचमाती,  छपेली*..,  वह.. पहनती तीज या त्यौहार में.., छुपाती, मुझे उसी.. में,  किस.. प्यार से... सुखबेलि*.. मेरी! मां थी वो.!  मुझे याद है, झीना* वो आंचल, सुखद आंचल, मुक्ति था संसार से। छुप,  लुकाना*,  दौड़ कर!  प्रिय, सच...!  उसी. में, दूर होना भयों.. से,  हर आपदा से कष्ट.. से,  हर  दुखों.. से, मार्ग.. था,...

कौन यह कल्लोल करती बीच चौराहे खड़ी है!

मित्रों, तेज छीनी की, सतत.. तीखी चोट को जब कोई पत्थर सब्र से सहता है, तो वह चोट उसे अप्रतिम सौंदर्य पहना सदा के लिए आदरनीय और अमर बना देती है। जीवन भी ऐसे ही है। इसी पर आज कुछ लाइने आपके लिए। उभरता है,  चित्र... एक्!  मन.. में... मेरे,  झांकता है,   आंगना...  वह, स्मृति... के चुपके..!  चुपके..!  प्रिय, अलग...,  हट.. के। भाव: कुछ दृश्य विस्मयकारी, हट कर होते हैं, मानस में, समय बे-समय स्वतः प्रगट होते हैं।  पास.. आया..,  याद.. आया, चित्र...वह!  ना, ना..., अरे! ना मूरत.. थी, वह..,  बोलती..,  संवाद.. करती,  बुद्धि... संग,  अठखेल.. करती, संवेदना.., संवेग.. लेती,  अपनेपने... में। भाव: कुछ स्कल्पचर या आकृतियां गजब होती हैं। पत्थर या संगमरमर, तेज छीनी की चोट, सब्र से सहता है, वह चोट उसे अप्रतिम सौंदर्य पहना, सदा के लिए आदर का पात्र बना देती है। और वह मूक ही, संवेदनाओ को अपने में जोड़ लेता है। झकझोरती... पौरुष... को वह!  प्रेम का निनाद,  करती... काल को,  ले हाथ में,  वह खेलती.. निश्चिंत... प्...

उछलती, आनंद-मग्ना नग्न-वदना वसनहीना हाल में,

मित्रों, विश्व में मात्र दो ही चीजें हैं, एक परमाणुओं से बना भौतिक यथार्थ और दूसरा इन सबमें व्याप्त अदृश्य चेतना या आत्मा। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद के लिए प्रेषित हैं। बात.. है यह, शुरू की.  विश्व, जब.. यह, बन.. रहा था, उस समय, इस.. विश्व में एक.. चेतनामय, आत्मा.. थी। वह आत्मा.. थी!  निष्कलुश.. शुद्ध.. थी, परिशुद्ध.. थी।  अति निर्मला.. थी,  प्रकृति उसकी विरस थी, चैतन्य... थी।  आनंद में वह मगन थी, हवाओ में मधुरता  बन..!  हर जगह, हर स्थिति में धरा पर, निर्झरा... वह, एक सी ही, बह रही,  वह बह रही, सर्वत्र... थी। बात उसकी, क्या करूं!  हर.. जगह थी, प्रचुरता.. में,  भौतिक नहीं थी,  निरवयव... थी। आह!  कितनी शांत थी, मृदुल थी चेतना बन, जागृति संग  जगत में इस,  आदि से ले... उस समय तक, रह रही थी। पृथक.. थी,  वह गुणों से, व्यवहार से सजग थी, अभौतिक  अस्तित्व उसका, अस्तित्व देती, सभी को अलग, वह....  बस... जगत में, साक्षी... बन खड़ी थी। वह आत्मा थी, परम थी!  संसार का इस मर्म थी। समय था वह...  प्रात.. का, इ...

प्रिय! पीड़ा कुछ ऐसी ही होती!

मित्रों! व्याधिग्रस्त स्वांस रोगियों के दर्द और पीड़ा की हृदय  विदारक अनुभूति, मुझे यहां आई.सी.यू. वार्ड में हुई है। उसे ही लिपिबद्ध कर आपको भेज रहा हूँ।  प्रिय!  बहता... है,  कुछ...  यहां.. हवा... में, धीमे.. धीमे,  नश्तर.. जैसे!  चुभता.. है, यह...!  कसक... लिए, टूटे कांटों .. सा,  करक.. लिए,  जियतार...,  हिया हिल जाये जैसे !  कैसा?   तुमको  बतलाऊं..!   काट रहा हो, हृदय.. कोई!   लेजर..,  नजरों...से अपने जैसे। आर्त... हुआ,  बेबस! हो हो कर,  मुझे देखता!  दीन.. पड़ा,  वह!  बिस्तर अपने,  पकड़  हाथ से  कस कर,  कैसे!  आहें भरता!  हाल यही....,  आई.सी.यू... का। पग दो:  दर्द.. भी  क्या चीज.. है, सिसकारता है, सीटियों.. सा, सिसकता.. है, दूसरे पल। आह! में  यह, सिसकारियां.. भर गूंजता.. है, पवन संग... निकलता.. है, सुन रहा हूँ, दर्द को बहता.. हुआ मैं हवाओं पर। उर्मियों की  तरंगों पर,  सर्प हो, कोई लहर लेता,  आगे प...

निगाहे छुअन ही, कुछ थी ऐसी,

बना दिया, तुमको सुंदर!    निगाहे छुअन ही, थी.. ऐसी, रंग.. होठों में, उतर!  आये..  थी..., फूलों की रंगत!  ऐसी। पर होते भी, पक्षी... न उड़ा, थी, दिदार की, लगन.. ऐसी, कहने... को तो, मदीना.. है,  जालिम..!  देख न! आ यहां...भी, वो..  मांगता हैं, दुनियावी, किस्मत अपनी। हां!   ये वही दुनियां है, देख! इसे... अच्छे से, अच्छे अच्छों ने यहां, केवल  मान की   खातिर!   वक़्त, बेवक्त है अस्मत बेची।   ये उपवन सिहर उठता है,  रंगो आब बिखर जाती है, जवां फूल मचल उठते हैं डाली भी लचक जाती है। जब तू मस्त!  आफताब सी मदराती है न जाने कहां,  खरगोश सी छिप  जाती है ये, दुनियां..!   जब तूं प्यार.. से, होठों.. में,  दब के, मुस्कुराती... है। मुझे, यादें.. पुरानी आतीं हैं। लबे.. बरसात, जब, जब  तूं..., कुछ.. गाती.. है, अपनी..  गढ़त.. से,  स्नेहिल.. प्यार... में, ये बारिश.... कैसी!  मेरे अंदर  रसाती, सी... बरस जाती है। वरना  लाइनों में क्या है?  शब्द दो रंगे भी नहीं हैं,...

पढ़ा.. था, कभी.. 'बुद्ध' को....

श्री गणेश चतुर्थी की सभी मित्रों को बधाई!   पढ़ा.. था, कभी.. 'बुद्ध' को 'संसार.. दुःख है',  पर.. देखता.. हूँ!  खिलता.. हुआ, यह सुंदर.. सरोरूह., इंदीवरम...  अनुपम..म!  गुलाबी..!  यह,  दीखता.. है! हर सुबह!  उगते.. हुए, उस अरुण.. के संग किलोल.. कर कर!  बिकसता.. है,  खोलता.. 'उर... ग्रंथि'  निज..  आनंद भर भर, सहज.. अंदर.. रसाता... है, लुटाता.. है,  पराग.. कण। सब  भूल कर,  बेसुध हुआ, प्रिय!  मगन होकर...खेलता है..., उष्णता.. ले, ऊर्जा.. ले,  जवां.. होते, चढ़ रहे  मार्तंड की यह,  देख न!  चिक्कन, मुलायम, सहज कोमल!  स्निग्ध कैसा, मोहता मुझे..  दूर से, आबद्ध करता,  खींचता.. है,  पास..  अपने, लावण्य से, रूप से!   प्रिय!  रंग.. ले, ले, मनोहर!  भेजकर,  सौरभ निमंत्रण!  मौन ही यह, मुस्कुराकर बांधता है, रज्जुओं से स्नेह की, प्यार में मुझे पाशता * है।  हिल.. रहा है,  पवन  के संग..  मुझको लगा,  स्वीकृति.. यह दे... रहा मुझे...

मत पूछ मुझसे, दर्द... क्या है? आई सी यू पार्ट-4

मत पूछ! मुझसे, दर्द... क्या है?  पास.. से देखा है मैने!   नग्न ही  इस दर्द को,  बहते.. हुए.. आदमी की नसों.. में, धमनियों.. में, छटपटाते...,  जीव को इस, रात... भर,  उमड़ते..!  इस, दर्द.. को, प्रिय!  उछलते..,  मछलियों का नृत्य करते। और, तुमसे क्या कहूं!  कराह...! है, ये...  दर्द! उठती....,  धंस.. रही, अंदर कहीं.. इन हड्डियों में,  टीस... देती, बिकल करती मृत्यु का अनुरोध करती,  निःसरित,  स्फुरित.. प्रिय!  सच..! दुखी मन से। प्रार्थना का मूल, प्रिय..! यह!   दर्द... है, यह, उलाहना.. है प्रभू से,  तन... छोड़ दें। वह क्या करे, जो कष्ट में है!  हर एक पल, भारी.. बहुत है, दुनियां कहां.. और वह कहां, प्रिय!  सच अलग हैं, दोनों जहां से!  दर्द का साम्राज्य, सच प्रिय!   बड़ा..... है संसार के इन सुख दुखों से। कांपता है! दर्द से जब बिलखता है,  आदमी यह.. रोग से,  या व्याधि से रोम.. मेरा, झुलसता है,  ताप... से,  प्रिय..!  डूब.. जाता हूँ कहीं  मै..., प्र...

सांस क्या है? आसाँ नहीं है, जानना! आई सी यू-3

सांस..  क्या... है?  आसाँ... नहीं है,  जानना...,  इसे.., समझना.. प्रिय!  क्रिया.. है,  यह मानता.. हूँ,  पर.. मात्र उनके ही लिए, जो... जानते, ही... हैं नहीं,  की..  लंग्स* क्या है!  कहां.. है!   बस नाम को हैं, पास.. उनके..। कभी...  पूछना...?   जा.. देखना!  कभी... मिल के,  कहना..., बताना... क्षणों.. में,  बस.. क्षणों भर के, ही.. लिए जब.. दम घुटे!  और...  रास्ता.. ही हो, नहीं..  बच निकलने का, मित्र.. उससे!  जानता है, सांस का, प्रिय! सच वही... जिसकी रुकी हो  मात्र क्षण भर के लिए ही यह.. कभी। इस जिंदगी में। और तुमसे क्या कहूँ!  जिंदगी....,  ये.. सांस.. है सांस.. ही है, जिंदगी। और, यह.. भी  सत्य है!  मैं मानता हूं शाम.. होती सुखद है सबके लिए..। मैं..  जानता.. हूँ,  राजधानी.. प्रेम की,  प्रिय!  सजती... यहीं.. से,  मानता हूं!  पर क्या.. कहूँ, मैं.. क्या करूं!  यह सत्य है,  यह शाम... डर है,  मित्र, प्रिय.. कुछ... ...
पकड़े हुए, वह हाथ..  अपने हाथ से, जिम्मेदारी भरे उस.. भाव से, जल्दी चले वह बालिका पुत्री उसी की अलस-लसती  देखती चहुंओर थोड़ा अचकची सी हाथों में अपने, रास्ता दूर का देखते, दिखाते हुए, देखा! मैने.. और निगाह कैसी कातर!  सपने दूर के  झिलमिलाते झलकते, उनमें झर झर उड़ते हुए, पल पल खिलते हुए,  संजीदगी की हद तक सकुचाती,  शेरनी हो, बीच बिलावों के उनमें दृष्टि  घर बना कर फंस गए हम अब उसी में कैद हैं राजी खुशी इस जीत को मैं क्या कहूं  बंद हूं खुद, दीवार में  और  तमन्ना तेरी मेरी हे विराट सुन तो चीजें इकठ्ठा हमने की है इसी घर के नाम पर, सुरक्षा में उन्हीं की शेष अब यह जिंदगी है।। घर बना कर फंस गए हम। आदमी थे मुक्त सारे  किन बंधनों में बंध गए, घर बना कर फंस गए। वह जीतता था, बढ़ रहा था छोड़ता था क्या करे किसमें रखे, कितना रखे पर जीतना और आगे बढ़ना शगल था हर रोज का लड़ रहा था, इकट्ठा वह कर रहा था शेष बाकी जिंदगी के ही लिए सभी कुछ वैसा ही था एक नाम था,  वह आया इधर था, लोग जिएं जिंदगी की याद उसको ही करें। बढ़ता गया, एक दिन वह थक गया पीछे मुड़ा ...

टूटती एक सांस अंटकी.. आई सी यू पार्ट- 2.

आई सी यू रेस्पिरेटरी में मुझे भी इधर रुकना पड़ा है, कई दिनों से, वहीं से ये लाइने आप के लिए लिख रहा हूं आप पढ़ें और आनंद लें, कि कैसे अस्थमिक मरीजों की सांस मैने ऊपर नीचे होते यहां देखा। और डाक्टरों को देखा है सेवा करते। टूटती... सी सांस उसकी,  ऊपर.. उठी थी, शेष कितनी  बची थी!  मैं सोचता, जब तक अभी..!  उसके, पहले.. छातियों में घरघराती.. आवाज करती निरा... ही, नीचे.. गिरी थी। पेंडुलम... हो!  दोलता... इस.. पार से, उस.. पार कोई पहुंच कर.... अधिकतम....पर, कोलैप्स.. होकर, धम्म से  नीचे... गिरी थी, सांस.. थी, वो... खरखराहट रेडियो से और.. बदतर...   क्या कहूं..! तरंगों  की... विक्षुब्ध हो, सांस के उन हवाओं की विक्षोभ ले, ले,  उठ.. रही थी! गिर.. रही थी!  हिचकोले... खाती,  गांव के, रस्तों पे.. चलती,  लारी.. कोई, हो... कुछ.., इस तरह.. से,  फ्लेक्चुएशन उच्चावचन, वह कर रही थी। कैसे कहूँ!  शुतुरमुर्गी चाल सी बस एक क्षण में, उखड़ती,  बहुत ऊपर जा रही लटकती थी, दूसरे.. में,  उतने.. ही नीचे!   कूप की गहराइयों से,...

छू गई थी, छन्न.. से वो.., एक क्षण को!

सोचता हूँ, रोज.. मैं... रोज़* को इस, छोड़कर... क्यों.. लिखूं!   इस...,  दर्द... को!  टीसता.. है,   पेनफुल..  अच्छा नहीं है, जानता हूँ!   मानता हूँ!  पर, क्या... करूं!   कर... लिया,   सब..,   मित्र.. मेरे!  साथ ही..., यह... छोड़ता,  एक क्षण को, तनिक भर भी... रात दिन...,  बिल्कुल.. नहीं है। सगा.. सा,  ये.. हो गया.. है,  जुड़ गया है, जिंदगी में..  समस कर.. प्रिय...!  विंध् भिन.. गया है,  अंतरों... में!  प्रिय.... मेरे यह!  रेशमी...  रेशे से, पतला..,  उड़ता... हुआ..!   आवाज.. बन कर, पर* लगा कर!  निकलता यह!  मुंह.. से मेरे, आह!  बनकर... पुकार बन!  यह..  पुकारता है, आज भी...,  मां.. बाप.. को,  सच..!   चीखता... है,  आर्त.. होकर!  किस.. लिए जानता.. है, प्रिये.. यह...,  वो... यहां,  अब.. नहीं हैं, इस धरा पर..। पर क्या कहूं!  सोचता.. हूँ,  क्या मूर्ख हूँ मैं / चालाक हूँ,...

दुनियां लुटी है आज उसकी , आई सी यू पार्ट- 1

सुना था, देखा नहीं था निकलता है, खून भी  लाल.. ही, रक्तिम  प्रिये!   नाक से.. भी, बिखर.. कर!  बिस्तरों पर.. फैल जाता  चेहरे के नीचे.. अनकहे.. यह..  लाल!  रक्तिम!   गुलाब की उन पंखुड़ी सा  पास उनके, जो पाल कर.. बैठे रहे  ट्यूबर.. कुलॉसिस गलतियों से छुपाकर। पर..  एक दिन,  पर्दा उठाकर बीच सबके, खिल.. उठा है पुष्प यह.. और, क्या.. कहूं!  कोई.. नहीं है, साथ.. अब, सब... दूर हैं, छूत है  बीमारी ही यह,  इसलिए, मजबूर... हैं क्या करें, यह.. जिंदगी, प्यारी बहुत है सबकी, निजी.. है!  इसलिए वह  अकेले ही पड़ा है, सो रहा है मेरे पीछे। जिन्दगी जश्न में डूबी हुई है थोड़ी और पीछे उठाकर जब देखता हूँ कालपट  इस व्यक्ति का चकित हूँ,  यह चहेता है मां का अपने। यह चहेता है मां का अपने। सिसकते मुझे दीखते हैं बच्चे इसके,  रो रही है दूर से आवाज कोई..  दुनियां लुटी है आज उसकी। जय प्रकाश मिश्र
कौन..  हैं.. हम..!  हम.., पूछते हैं मित्र! तुमसे,  बताओ..? कुछ, अलग.. हट के। विचार.. हैं,  यथार्थ... हैं, या और कुछ हैं.. विश्व में इस, जन्म से  ले मृत्यु के इस  बीच  में। तत्व  तो बस  दो... ही, हैं  इस..., विश्व.. में पहला 'अभौतिक' आत्मता..,  विचार.. में, समझ में, इन... प्राणियों के दूसरी परमाणुता..,  यथार्थ में  हर जगह फैली.. हुई,  हर रूप.. में एक.. सी  इस प्रकृति.. में, प्राणियों.. के रूप में। इंद्रियों में,  बदलते हर एक कण में,  हर एक क्षण में। विचार क्या है?  समझ क्या है?  पूछता हूँ, बताओ इन गूढ़ को?  सरलता में, सहज.. हो,  बिस्तार से..। तो लो सुनो, विचार ही तो "योग" है जोड़ है,'ज्वाइंट'  अनोखा  बस ये समझ लो, जो जोड़ता है, परमाणु को इस आत्म से। भौतिक-अभौतिक जोड़ का  जो तंतु है,  विचार है वह.. देख कर इस सृष्टि को,  जगत को जो... उपजता है तेरे भीतर  सहज... रे!  विचार है वो...। योग का साधन है ये,  संसार में.  बंधन है ये,  ये.., आवरण ह...
मैं...,   हट.. गया हूं,  मोर्चे.. से, और,  खाली...  मोर्चे.. हैं! ऐसा..  नहीं.. है,  लोग.. हैं, तैनात..  इनपर,  मुझसे.. बेहतर! मुझसे बेहतर!  देखता हूं, हर तरफ मोर्चों में जान है  वीरान थे जो मोर्चे,  आज उनमें प्राण है रात... आधी, जा.. चुकी है शांति.. गहरी, छा.. चुकी है लोग हैं आगोश में रात्रि के उस भोज में,  निश्चेष्ठ हैं सब जीव जब,  नींद के तालाब में कुछ बीर हैं  जो जागते.., नींद को धिक्कारते चुप चुप खड़े हैं,  धीर हैं, ये.. बीर हैं, कार्य.. पूजा मानते. ये.. कार्य पूजा मानते! 

एक पक्षी.. उड़... रहा.. आकाश.. में,

एक पक्षी..  उड़... रहा.. आकाश.. में,  बहुत.. ऊंचे.., पर, कहां.. था, विचारों.. में,  भूमि.. पर, वह?  आकाश में या और आगे?  बताना, स्थान.. क्या है?   आधार क्या है, पंख.. का उन, उड़.. रहे जो, उतने.. ऊंचे!  उड़.. सकेगा  कितना आगे, और आगे.. फिर भी कब तक,  कहां तक!  लौटना होगा उसे  यथार्थ की इस खुरदरी मनुभूमि ऊपर। इस लिए  यथार्थ ही वह सत्य है जो, जोहता है बाट सबकी,  सदा... नीचे, बाहें पसारे! मित्र कबसे!  'विचार... केवल  कल्पना  है' यथार्थ... की.. आधी अधूरी ही नहीं,  बस अंश में, बहुत थोड़ी, जहां तक.. प्रकाश था, पहुंच थी,  इन इंद्रियों... की। पर..  सत्य.. वह!  इस यथार्थ... का प्रिय उससे आगे.., उससे... आगे। और.. कुछ है। इस लिए मत पूछ मुझसे कौन..  हैं.. हम..!  हम.., कह रहे हैं मित्र! तुमसे,  हम... मतलबी,  इस प्रकृति में,  इसकी प्रकृति से दूर हैं। जी रहे हम, विभ्रमों में, सत्य से अति दूर हैं। जय प्रकाश मिश्र

राधा मन, हेरि.. परी रे!

राधे... मन, हेरि... परी,  हरि... दीखत कहूं, नाहिं  बांसुरि धुनि तो सुनि परै  राधे! मन, चंचल.. बहुत चित.. में, धरा.. न जाय, बाज़ै… झाल मृदंग जब..  तब.. लै…, मन.. हर्षाय..।   दिव्य!  बाद, बाजन.. लगे हरषि.. पड़ी, चहुं.. ओर..  मधु-अमृत, जन सब.. पिये..  चित.. लइ.. गए, चितचोर..। देह.. दशा, विस्मृत… भई  ताली… पीटत, लोग!  आंख खुली की, खुली.. हैं फिरि… आए, प्रभु… लोक।  कृष्ण… वहीं, बैठे.. रहे,  तन मन की.. सुधि खोय घड़ी कहै.. घड़ियाल सो,  केहि विधि.. मिलना होय। राधा.. हेरति, श्याम.. को  इत.. उत.. सारी ओर.. देर…भई, दीखे.. नहीं,  कहां गये.. चित-चोर...। चैन नहीं, राधा परै   देर भई.. अति.. आज श्याम कहूं नहि दीखते काजल.. मुख बहि.. जात। प्रेम विकल जब हुई गईं  श्याम..., मिलाए राह.. रमण-रेति पर, कस खड़ी  आंसू नैनन..  बहि जाय। दूरिहि.. देखि,  मगन.. भईँ,  माधव मन मठुरांय ,  मूर्ति… होइ कोई पाथरी.. राधा खड़ी वही थाँव।  प्रेम, डोरि.. माधव बंधे, मणिधर…मणि की थांव  बंचक..। धावति.. नदी...
दूर थी मंजिल हमेशा  जानता हूं,  कठिन.. थी, दूर.. थी विश्वास से यह मानता हूं!  आज भी है, उस समय, सच!  और भी थी आज है ऐसा, अरे यह सच नहीं है!  खुद लड़ा हूँ, जंग.. यह इसलिए तो कह रहा हूँ,  बेसब्र.. हम हैं, व्यवस्था.. से  जाने... न, कबसे..,  व्यवस्था.. यह, कुछ भी कर.. दे सीमाएं हमारी हमी तक हैं संतुष्टि अपनी हमीं तक है। क्या करें...  जिस समय तक व्यवस्था यह मेरी मंजिल  मुझको न दे, दे। कुछ.. तो होगा. खड़े हैं ऊपर.. वहां उन्हें देखता हूं उलट ही सब सोचते हैं,  गलत है क्या?  मेरी समझ से..बेकार की बातें है सब..  मुट्ठियों में, भाग्य किसके बंद है, वह कह रहे हैं  मुट्ठियों में भाग्य उसका बंद है.. यह सोचना, सच गलत है मिट्टियों में पला था वह अनुभवों में कढ़ा वह निर्भीक है, स्पष्ट है, हर सोच से यही तो गहना सदा पहना है वह..। जो दीखता है, चमकता.. खींचता.. हर एक का मन। बस, इसी का अंतर है सब। आवाज यह,  एक भी.. अनिश्चयों, विभ्रमों, सांसारिक युद्ध सी परिस्थिति के दृष्टिगत,   चलते हुए, खींचते  इस जिंदगी  को, कंधों ...

क्या.. कहूं! प्रिय!

अस्तित्व विहीनता पर कुछ लाइने आपके आनंद हेतु प्रेषित है। आप पढ़ कर आनन्द लें। खड़ा हूँ  मैं.. जानता हूं,  देखता.. तुम्हें, ललचता.. हूँ क्या.. कहूं! प्रिय!  तुम.. वही, मैं.. वही,  परिसर.. वही  क्या बदलता है, क्षणों.. में मैं..,   अब.. वह.. नहीं!   मन.. मेरा, रूप.. तेरा,  मधुरता..  लावण्य.. प्रिय!  सब कुछ, वही.. है। संगम हि, था क्या?  उस.. समय!  किसी  धार.. का,  प्रवाह.. का..  कहां.., लुट गया!  चंचला,  पता ना चला !  खड़ा हूँ!  मैं जानता हूँ देखता.. तुम्हें, बढ़.. चला हूँ..। दूसरी किसी राह पर.. पर...! सत्य  क्या... है?  पूछता हूँ! रूप.. यह?   तेरा... छीजता, जो क्षण अनुक्षण खिलती कली सा, लरज़ता कुम्हल पाता,  मुरझ के यह पास आता टपक जाता, पुष्प सा जो कल खिला था डाल पर,  मुझे खींचता  बाध्य.. करता, देखने को  कसमसाता.., सौंदर्य के संभार से, दूध से प्रिय दही बनता खटास लेता,  गंध से दुर्गंध में यह कदम रखता रूप क्या.. है?  कुछ नहीं, अस्तित्व इसका,...

प्रिय...! पलछिन! पलछिन! छीज रहा हूँ,

लगता... था!   उद्देश्य.. नहीं, अब..  जीवन.. का,  कुछ...!  झूले... में,  मैं...  झूल.. रहा हूं.... कालावधि.. के,  निरुद्देश्य..  प्रिय...!   हर पल.. हर दिन..। पलछिन! पलछिन!  छीज रहा हूँ, भीतर.. अपने..., गंगा... में  बहती... पाती, सा.. सफर.. बचा जो,  सागर... तक  का...,  उसे.. उठाए  माथे... अपने, घूम.. रहा हूं, इस जीवन.. में, हर पल.. हर दिन..। आज हुआ, एहसास.. अलग.. कुछ!  जीवन.. व्यर्थ.. नहीं होता है,  धरती पर इस..!  जोड़ जोड़ना, काम.. बचा है!  गांठ... बांधना, काम बचा... है!  अलग.. हुए,  इस पीढ़ी.. के  दंपतियों के संबंधों की... नौका में, जुड़.. खुद!  आ.., चल!   तेरे पास, मैं.. बैठूं!  और, देर थोड़ी... सी, सुन.. लूं!  एक.. कहानी मनमानी.. की, नेक्स्ट..  युगल की!  देखूं..., क्या कर सकता हूँ!  ग़म.. में, इनके.. गम.. बन  खुद मैं..  क्या..!  इन सबको..  शेष जिंदगी, चिपका संग में जोड़..., गांठ... कर सकता.. हूँ। प्रेम,...

सोचता हूं वक़्त को इस बांध दूं!

सोचता हूं!   वक़्त.. को इस, बांध... दूं!   शब्द में बुन.. बुन.., इन्हें चुन चुन.. के, रख.. दूं!  गुप चुप यूं ही,  समय की दीवार में,   अंदर कहीं, अक्षुण्ण... रख दूं!  हर विकृति से बचा कर इनको छुपा दूं,  सहेज.., रख.. दूं, कोई.. पा सके महक.. इनकी, ऐसे.. यूं ही काल की करवट के बाद हर विप्लवों की आंधियों से दूर रख दूं। महक.. इनकी बिखेर दूं!  काल के, कपाल पे.. इस काल.. के परछाइयों की  अमिट रेखा,  शाश्वती... ही, मैं... बना दूं। जब.. पढ़ें, कोई..  सत्य.. को वह, देख.. ले, सदियों के बाद, युगांतर में इस... समय.. के, चाओस.. को, आदमी के ह्रास.. को,  मानवों.. के नाश.. को। चरम.. इस विकास की  इन.. सीढ़ियों पे पहुंच कर कैसे... हुआ था,  क्योंकर.. हुआ था, वह, पढ़..पढ़ा कर, समझ ले। वह.. जान पाए, सदियों पहले, आराम से... इस.. धरा पर, मानव.. थे कुछ!  मस्तिष्क.. के प्राणी थे, वे... पर, निशाचर.. थे, आदतों.. से, आपसी व्यवहार.. में। इस बार के, काल.. के, कपाल.. पे विनाश.. के कारण... थे, वे..। कैसे थे वे, क्या सोचते थे?  स्...

कैसे खिल उठती.. थीं! चंद... ओस की बूंदे!

कैसे खिल उठती..  थीं! चंद...  ओस की बूंदों की चाहत में  वो  सुरमई से  स्याह  होती,  प्यालों में,  धीमे धीमे ढलती  हल्के से  गाढ़े रंगों में बदलती...  उम्मीदों की  शाम....। कोई..!  साफ..,  झक..  धुला.. धुला.. सा, फूलों, जैसा... हंसता  आता... था, तब.. मुस्कुराता..  पूछ लेता... था,  नजरों.. नजरों..   में मेरा हाल..। जरूर.. अच्छा, रहा होगा.. आज का दिन!  इतनी जल्दी लौट आए हो,  तुम... शायद यही सोचता वो... अपने गर्म हाथों में,  मेरा...  मजबूत.. हाथ,  थामता..  और मैं... मैं..  जैसे,  मुलायम नर्म  ऊन के  गोलों में  लिपट जाऊं,  खुद को भूल.. किसी की, दिनभर.. की  चाहतों... से बुनी  चादर में  लिपटता.. समा जाता था!  तब... कैसा... लगता था गर्म प्यालियों की वो आपस में टकराती आवाज, के साथ आती चाय की भीनी भीनी खुशबू  हल्की, भाप सी उठती महक में  मेरा मन बांधती वो.. ऊपर से चाय में तेज अदरक का  अमरखा स्वाद!  कै...