पात, सारे... झरेंगे ही, एक दिन..,
मित्रों, देखा है सच! इन आंखों से, इसलिए ही लिख रहा हूं, एक समय आता है जब सेवा करने वाले अंत घड़ी में वृद्ध के प्रति ऊब जाते हैं, उतावले भी और काम धंधों के नुकसान फायदे की बात करते हैं इसी पर चार लाइने आपके लिए...। पात, सारे... झरेंगे ही, एक दिन.., सब.. जानते हैं बस, जब तलक हैं शाख पर.. ताजे, हरे, खुशतर रहें, मुस्कुराएं.., हंसे.. थोड़ा..., ध्यान.. रखें, बुजुर्गों... का इससे ज्यादा और क्या हमे.. चाहिए अब! उम्र.. के, इस फेज में। पलक.. भर की बात है, थोड़ा.. रुको! गिरने... तो दो, इन पत्तियों को, सूख कर! लाचार हैं, ये! देख.. तो, नाम..भर! को टंगी हैं, इन.. डालियों पर, लुंज.. हैं, बेकार.. हैं, बस स्नेह है, थोड़ा.. कहीं चिपकी.. हुई हैं, सच कहूं तो, प्रिये ये! अस्तित्व से ..., निज.. लड़ रही हैं। एक झोंका..., हवा.. का बहने.. तो दो। चू पड़ेंगी, लटकी हुई, ये पत्तियां, फिर... चले.. जाना, कौन.. रोकेगा तुम्हे! बोल सकती.. देहरी,...