कैसे खिल उठती.. थीं! चंद... ओस की बूंदे!
कैसे खिल उठती..
थीं! चंद...
ओस की बूंदों की चाहत में
वो सुरमई से स्याह
होती,
प्यालों में,
धीमे धीमे ढलती
हल्के से गाढ़े रंगों में बदलती...
उम्मीदों की
शाम....।
कोई..!
साफ.., झक..
धुला.. धुला.. सा,
फूलों, जैसा... हंसता
आता... था, तब..
मुस्कुराता..
पूछ लेता... था, नजरों.. नजरों..
में मेरा हाल..।
जरूर..
अच्छा, रहा होगा..
आज का दिन!
इतनी जल्दी लौट आए हो,
तुम...
शायद यही सोचता
वो...
अपने गर्म हाथों में,
मेरा... मजबूत.. हाथ,
थामता..
और मैं...
मैं.. जैसे, मुलायम नर्म
ऊन के गोलों में लिपट जाऊं,
खुद को भूल..
किसी की, दिनभर.. की
चाहतों... से बुनी
चादर में
लिपटता.. समा जाता था!
तब...
कैसा... लगता था
गर्म प्यालियों की वो आपस में
टकराती आवाज, के साथ
आती
चाय की भीनी भीनी खुशबू
हल्की, भाप सी उठती महक में
मेरा मन बांधती वो..
ऊपर से चाय में तेज अदरक का
अमरखा स्वाद!
कैसे थे! वे.... दिन!
आज!
वही.. शाम तो है,
मैं.. हूँ, वो.. भी है, साथ.. साथ..
पर कैसे बदल जाता है
पीछे का ये पर्दा...
नेपथ्य कैसे बदल लेता है, खुद को
और हम... मजबूर!
बदल जाता है, पूरा ही परिदृश्य!
डर...!
हां एक डरावना डर!
ले... के, आती.. है,
अब..., ये.. शाम...
हर दिन...
जैसे.. जैसे.. बढ़ती है,
विश्वास की डोर, कमजोर पड़ती है
जैसे कोई दबे पांव आ रहा हो
मेरी तरफ...
सच! ऐसा ही लगता है..
दबोचती है, ये शाम!
अब...
अपने काले.. पंजों के आगोश में
ले लेती है,
तकलीफ का आगाज!
पिछली रातों का, गहरा छाया..
बन
उभरता है,
स्मृति ढक लेता है,
मुझे और उसे कसता है
शनैह शनै.. ह, अदृश्य क्रूर बाहों में
ले लेता है।
क्या!आज भी वैसे ही,
दर्द.. बढ़ता.... जाएगा?
जैसे जैसे गहराएगी ये रात!
और ढलेगी, आगे... बढ़ेगी,
महा..रात्रि होते.. होते..
लंबी... खिंचती,
रोज सी यह ही कालरात्रि...
बन जाएगी...।
दर्द को कैसे, समेटूंगा...
कितना सहूंगा!
केवल हम दोनों ही होंगे,
उसे सहने में साथ!
चुपचाप,
एक दूसरे को देखते
आंखों में
कनखियो से, सोच में हंसते...
और पानी भर भर
थोड़ी, थोड़ी देर... में
गीले आंसुओं को निचोड़ते..।
आखिर बीत ही जाएगी।
किसको बुलाऊंगा, सारा जगत सोता है
जब ये खेल मेरे साथ होता है,
जब ये खेल मेरे साथ होता है।
जय प्रकाश मिश्र
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