आंख खोलें, देखें तो, जग को
मित्रों, हम पुराने और नौकरी करने वाले लोग आज तक अपने बचत को उपयुक्त निवेश नहीं करना सीखे हैं। इसी पर आज की लाइने आपके लिए। आजकल, हे मित्र! मेरे... जिस,... तरह.. गिर.. उठ.. रहा, बाजार यह! क्षण अनुक्षण हिल डुल.. रहा, लपलपाता.. हर.. एक घंटे! देख कर हैरान हूँ! कुछ न करूं, बैठा रहूं, चुप शांत! मैं, तो..भी अरे..! इस.. नवल युग में, रुपया भर... थैलियों में, तब भी मैं.., सच कह रहा हूँ, बिना लूटे, बस यूं ही बर्बाद.. हूं! जाने.. न कब! गिर.. जाय डॉलर... स्वर्ण... रखा संदूकों में, बुल.. बने, सांड बन बाजार घूमे... निरंकुश हो, सब ध्वस्त कर दे सींग से, सब पलट दे। पैंजनी..., जो.. बज रही है, पांव... में नीचे यहां, पैर... में रुनझुनी स्वर दे रही, चांदी की मितवा, सिर पे चढ़ ले....। ख्वाब बन कर, नाच कर दे.. कौन कह सकता है, इनपे.... आजकल, हे मित्र! मेरे...। जिस तरह.. गिर.. रहा, और उठ.. रहा, बाजार यह है, हिलडुल.. रहा हर.. एक...