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Showing posts from September, 2026

बाज़ार

बाज़ार क्या.. है? महासागर!  कितना  बड़ा!  आप्शन,  स्टॉक्स का लहरता यह  उर्मियां ले  नित  दरों का..। लहरियां उत्ताल होतीं  सर्प सी  फन  काढ़तीं  और  आगे, और आगे दौड़तीं  ये तरंगों सी.. आगे बढ़ती.. हर  एक क्षण में। विलय होतीं  दूसरे सूचना संजाल की  सुन आहटों को फेन फेनिल सी ये होतीं  समा जातीं,  उदर  मे। चुप!  घड़ी भर में उछलतीं   मन भावना को  शांत करतीं,  दुखी,  खुश हर साल  करतीं  कंदीलों के रंग से..  बाजार क्या है?  कभी बैठ जातीं  जमीं पर  बूढ़े हुए,  किसी बैल सी सालों न  उठतीं  निफ्टी सरीखीं,  लौट आतीं और पीछे,  झूमती दो साल से बोल न! बाजार क्या है? उछलती  उम्मीद  की मछली हो  कोई!  खुशियों भरी..  छटकती नाचती  प्रिय  एक दिन  इन्वेस्ट पर निज नाज़ करती  ख़ामोश! चुप हो तड़पती  दिन दूसरे  पश्चाताप करती,  इंट्री  पे;  अपनी.. बाजार क्या है?  अहा यह, वह...

कौन.. है, बैठा हुआ इन अंधेरों में।

मित्रों, कठिन को आसान करना भी मेरा काम है इसी क्रम में आप अपने को जाने इसी पर ये लाइने और इनका भावार्थ भी लिखा है, आप प्रसन्न हो यही उनसे याचना है। दीपक बना..  यह  कौन.. है,  बैठा हुआ  इन अंधेरों में,  स्वप्रकाशित! इतने गहरे गह्वरों में,  अकेले,  जन्म से ले  आज  इस  अठवें दशक में। चुप  मौन वैसे साक्षी..  इतनी बड़ी  इस अवधि का चिद्रूप कैसा,  एक सा,  न  कभी उद्विग्न होता न कभी उद्विग्न करता। नृत्य करता विश्व यह  घेरे इसे कितने.. दिनों से, विश्राम करता  रात्रि हर थक हार कर, और यह,  मेरे दिल के जैसा,  साथ देता,  बता देता  सुबह को, प्रिय स्वप्न हर नींद में भी सबसे गहरी  जागता है, कभी न विश्राम करता स्वाद उसका बता देता, कौन है यह..! पांच धागों में बंधा रखा है कैसे पारदर्शी स्फटिक!  दिखता नहीं  इन नेत्र से, मन, बुद्धि, चाहत और मानस चाकरों से घूमते  हर समय,  हर ओर इसके..। ज्ञानेन्द्रियों,  कर्मेन्द्रियों की सेज पर  आराम से लेटा हुआ,  अविचलित,...