बाज़ार

बाज़ार क्या.. है?
महासागर! कितना बड़ा! 
आप्शन, स्टॉक्स का
लहरता यह 
उर्मियां ले नित दरों का..।

लहरियां उत्ताल होतीं 
सर्प सी फन 
काढ़तीं 
और आगे, और आगे
दौड़तीं 
ये तरंगों सी..
आगे बढ़ती.. हर एक क्षण में।

विलय होतीं 
दूसरे
सूचना संजाल की 
सुन आहटों को
फेन फेनिल सी ये होतीं 
समा जातीं, 
उदर 
मे।

चुप! 
घड़ी भर में उछलतीं 
मन भावना को शांत करतीं, 
दुखी, खुश हर साल करतीं 
कंदीलों के रंग से.. बाजार क्या है? 

कभी बैठ जातीं 
जमीं पर 
बूढ़े हुए, किसी बैल सी
सालों न उठतीं 
निफ्टी सरीखीं, लौट आतीं
और पीछे, 
झूमती दो साल से
बोल न! बाजार क्या है?

उछलती उम्मीद की
मछली हो 
कोई! 
खुशियों भरी.. 
छटकती नाचती प्रिय 
एक दिन 
इन्वेस्ट पर निज नाज़ करती 
ख़ामोश! चुप हो
तड़पती दिन दूसरे 
पश्चाताप करती, 
इंट्री पे; अपनी.. बाजार क्या है? 

अहा यह, वह महासागर..!
तरंगित.. 
लहरों भरा, 
लय विलय होता
दरों संग, चढ़ता उतरता 
कुछ भावना, 
कुछ बुद्धि.. का
नैतिक, अनैतिक लोगों का
कुछ वास्तविक, कुछ बनाया
कुछ भोले भाले, 
कुछ कुटिल
ग्राहकों का मेल सा, 
बोल न बाज़ार क्या है? 

हर दिन.. 
नया! 
यह रूप लेता, 
नौ बजे से और पहले
सांस भरता उठती दरों संग
टूटता.. 
छोड़ता.. है प्राण अपने 
घुटनों के बल यह बैठ जाता हांफता.. 
बोल न बाजार है क्या?

उठापटक! का 
खेल यह
संवेदना की, सूचना की
आहटों पर खेलता
कटिंग एज की
धार पर बहता हुआ
क्षण क्षण सजग, 
हर पल 
सुपल
किन किनारों पर हैं खड़े हम
भाग्य का भी खेल है क्या..
बोल न बाजार है क्या? 

एक धोखा
हरे 
रंग का, 
सामने नव गुना होता,
हरी होती लाल होती कैंडिलो का 
चार्ट सा 
लाल होते.. खून बहता
पैसा घटता, मूल से 
भी और कम
अंदर कहीं,
से 
दुखी करता शांत हो वो
आहे भरता, सोचता 
उन निर्णयों को क्यों लिया?
बाजार है क्या? 

लहरियों को पहनता
पृष्ठ ऊपर खींचता
सागर है गहरा 
अरे 
कितना,
मोती भरे हैं अहा इसमें
जानते सब
जो डूबते हैं बहुत गहरे
पा भी जाते, कोई बिरले
ध्यान ले जो पैठते
शेष सारे डूब जाते हैं तलों में
फिर नहीं वे तैरते..
बाजार है क्या?

किसी को सिर पर चढ़ाता 
कूदता कभी साथ 
उसके
दूसरे को पटक देता 
धरा से भी और 
नीचे..
पाताल के उन अंधेरों में 
महाभारत विजेता उन युधिष्ठिर सा।
बोल न बाजार है क्या ?

जिन्दा हमेशा 
एक सा, ताजा हरा, 
खिलती हुई किसी कली सा
प्यारा ये लगता,
खींचता दिल मेरा, उम्मीद है क्या?
करोड़ों का, नित्य यह

आदमी का बनाया
आदमी को 
फंसाने 
का
जादुई कोई जाल है क्या? 
बोल न बाजार है क्या? 

जय प्रकाश मिश्र

मित्र जय प्रकाश जी, इस बार आपने आत्मा के महासागर से शेयर बाजार के महासागर में छलांग लगाई है। और देखिए कितना सच पकड़ा है।

आपका प्रश्न बार-बार लौटता है - बोल न, बाजार क्या है? यही इस कविता की जान है। आप उत्तर नहीं देते, आप अनुभव कराते हैं।

व्याख्यात्मक निचोड़

आपने बाजार को एक जीवित महासागर कहा है। यह कोई चार्ट नहीं, कोई स्क्रीन नहीं - यह सांस लेता है।

1. लहरों का सागर:
ऑप्शन, स्टॉक - ये सब लहरें हैं। आपने उन्हें सर्प के फन जैसा कहा, जो हर क्षण आगे दौड़ता है। बाजार कभी स्थिर नहीं, वह हर पल रूप बदलता है। सुबह 9 बजे से पहले वह सांस भरता है, दिन भर उठता-गिरता है, और अंत में घुटनों के बल हांफता हुआ बैठ जाता है। कितना सजीव चित्रण है।

2. भावनाओं का खेल:
आपने सबसे गहरी बात पकड़ी - बाजार दरों से नहीं, भावनाओं से चलता है। आशा की मछली उछलती है, एक दिन निवेश पर नाज़ करती है, दूसरे दिन तड़पती है। हरी कैंडल खुशी देती है, लाल कैंडल में खून बहता सा लगता है। यह पैसों का नहीं, मन का गणित है।

आपने लिखा - कुछ भावना, कुछ बुद्धि का, नैतिक-अनैतिक लोगों का, कुछ वास्तविक, कुछ बनाया - यही तो बाजार है। इसमें भोले भी हैं, कुटिल भी।

3. जाल और मोती दोनों:
अंत में आप दो विरोधी सत्य एक साथ रख देते हैं। एक ओर यह आदमी का बनाया जादुई जाल है, जो फंसाता है। युधिष्ठिर जैसे ज्ञानी को भी पाताल में पटक देता है।

दूसरी ओर, इसी सागर में मोती भी हैं। पर वे किनारे पर तैरने वालों को नहीं मिलते। जो डूबते हैं बहुत गहरे, ध्यान से जो पैठते - वही बिरले पाते हैं। बाकी सब तल में डूब जाते हैं।

यही आपकी पूरी निवेश-दृष्टि का सार है। बाजार जुआ नहीं है, पर बिना ध्यान के उतरने वालों के लिए जुआ बन जाता है।

मित्रों के लिए मोती

आपकी ही लहरों से कुछ मोती चुनकर मित्रों के लिए रखता हूँ:

1. बाजार को देखो, बाजार में बहो मत: लहरें आएंगी-जाएंगी। जो किनारे पर खड़ा होकर लहर गिनता है, वह भीगता नहीं। निवेशक बने, तमाशबीन नहीं।

2. हरा-लाल रंग मन का है, धन का नहीं: एक दिन की कैंडल पर खुशी या दुख मनाना बचपना है। बाजार रोज नया रूप लेता है, पर आपका धैर्य पुराना होना चाहिए।

3. गहरे पैठने वाले ही मोती पाते हैं: सूचना की आहट पर उछलने वाले फेन की तरह मिट जाते हैं। जो कंपनी को, व्यवसाय को गहराई से समझकर धैर्य से बैठता है - बूढ़े बैल सा नहीं, ध्यानी गोताखोर सा - वही मोती पाता है।

4. यह भाग्य का नहीं, सजगता का खेल है: आपने सही पूछा - *कटिंग एज की धार पर बहता हुआ, क्षण-क्षण सजग*। बाजार में सोने वाले को लहर बहा ले जाती है। जागने वाले को किनारा मिल जाता है।

जय प्रकाश जी, आपकी यह कविता किसी चार्ट से बड़ी है। यह बाजार का दर्शन है। मित्र इसे पढ़कर प्रसन्न ही नहीं, सजग भी होंगे।

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