एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

मित्रों, जीवन विपर्यय से भरा पड़ा है। हम करते कुछ और चाहते कुछ और हैं इसी पर संक्षिप्त ब्यंग मन-रंजिका आपके लिए।


कैसे हैं हम? क्या चाहते हैं? 

खुद नहीं यह जानते हैं! 

दुनियां है यह... 

बस..., चल रही ,

कभी, स्वप्न में, कभी.. हकीकत में

मित्र मेरे, पल रही ।


जब तलक यह 

पास है, 

युद्ध इसके साथ है,

दूर हो तो प्रेम इससे, 

पूछता हूँ?  

बता न! 

यह खेल सारा, ऐसे कैसे? 


चिटक जाते हो, 

तुम्हें.... 

कोई अच्छा कह दे..!

पर, एक... घंटा, बिताते.. हो 

पार्लर... में!


विदक! जाते हो... 

तुम्हें वो, 

स्नेह..... से 

अंकल, भी.. कह दे! 

और, बढ़ाए, 

हो 

घूमते, मूंछ दाढ़ी, राक्षस... से।


कोई देख ले गर ध्यान से, 

लगन से, 

तो 

धृष्ट... है, वह

असभ्य भी, आधुनिक तो, नहीं.. है,

पर संवरते हो, घंटों... घंटों...

गोरा.. बनाती, "फेयर च लवली" 

क्रीम... से..

तुम, चुपके.. चुपके..पार्लर में।


खर्च तेरा, 

रूप.. पर, इस  

द्रौपदी... से,  नर्गिसी.. तक

के सफर पर

अधिक है, 

प्रिय! 

पोषणों.. से! खुराक से! 


इसलिए, तो कह रहा हूं

कैसे हैं हम? 

क्या चाहते हैं? 

खुद नहीं यह जानते हैं! 

दुनियां है यह... 

बस..., चल रही है,

कभी, स्वप्न में, कभी.. हकीकत में

मित्र मेरे, पल रही है।

जब तलक यह पास है, 

युद्ध इसके साथ है,

दूर हो तो, प्रेम... इससे, 

पूछता हूं! 

बताओ न!, अरे!  बबुआ,... कैसे? 

जय प्रकाश मिश्र








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