वह 'मां' पुकारा 'जोर' से,
आज धर्म जिसे मनुष्य और मनुष्यता की रक्षा मां की तरह करेगा यह मान कर बनाया गया था आपसी तनाव के कारण बन गए हैं। इसी पर ये लाइने आप को समर्पित हैं। आप आनंद लें। धर्म क्या है, तुम्हारा? बस यूं ही पूछा! एक, तोतले बालक से मैने.. एक दिन.., अकेले में। वह 'मां' पुकारा 'जोर' से, मुझे देखकर, या.. प्रश्न मेरा सोचकर! रोने...! लगा, मुझको लगा, मेरे.. प्रश्न पर! और, मुझ.. पर! तरस खा वह.. रो.. दिया! अर्थ उसका स्पष्ट था.. धर्म मेरा... 'मां,' है मेरी, रक्षा है करती, रात दिन, प्रेम देती, आश्रय है देती विपद में। देखता हूँ सड़क पर, जब.. धर्म को चलता.. हुआ, इस शान.. से कुछ रंग तक, सिमटा.. हुआ, कुछ तरीकों के वस्त्र में.., बाल दाढ़ी में, ढके.., टीका फ़टीका में, पुते.., दूर... उस मीनार पर, तार से... लटका.. हुए, तो..... सोचता हूँ: क्या? धर्म है, आगे.. बढ़ा...! जिसे ओढ़ना था, तन हमें जिसे ढांपना था, मन हमें, बाजार में, वह फहरता है, बिक रहा। पर, धर्म तो कुछ भिन्न था, बाह्य इ...