पटाक्षेप:
कृपा हो आचार्य श्री! की, अनुग्रह! हो, देवता का, पिता श्री! की प्रसन्नता.. थोड़ी और ले.. लो मां चरन रज! इन में, मिला.. लो. सब.., तुम्हे.. मिल जाएगा। बिना मांगे मां! ही देगी.. वह जानती है, भेद तेरा.... प्रसन्न जननी...! क्या.. नहीं, देगी.. तुम्हे ? सोच से, भी अति परे... वरदान देगी , सोच न! तूं... फूल है, उस डाल का। पटाक्षेप: बदलते! इस जमाने.. में, एक थी, मेरी.. चिरैया! पाल.. रखा था, उसे, अरमान.. से..। रोज.. बुनता, ख्वाब मैं.. था.. अहा सुंदर! सपनों में.. अपने रंग भरता, लालसा का, छुटपने से। तंतु..! ले.. ले.. प्यार.. का छूता.. था, उसको, दूर.. से, उसे.. देखता था, प्यार ले..। नजर की छाया में रखा सदा उसको, भूल जाता, खुद को था, मैं.. साथ.. उसके। कौन सा वह एंगिल था, देखा नहीं था, जहां.. से.. हर कमी, मैं.., पूरता था सदा उसकी.. दिल लगा के, बिना सोचे! और उसकी मुस्कुराहट! मंत्र..! थ...