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तुम अतीन्द्रिय हो, असीमित हो मित्र मेरे।

मित्रों, संपूर्ण विश्व, अनादि शक्ति से परिचालित है, यह शक्ति, संपूर्ण ग्रह नक्षत्रों सहित हमें और इस प्रकृति को एक साथ जन्म-मरण के रूप में गतिमान रखतीं हैं। इस शक्ति ने मनुष्य को अतीन्द्रिय प्राणी बनाया है, हर आत्मा को उसका शरीर, ईश्वरीय वरदान है। मनुष्यों ने अपनी को सोच को सीमित क्यों कर रखा है? इसी पर यह लाइनें। कौन लेगा,  गोद में,  तेरे... सिवा, इस सृष्टि का आधार, है..  तूं..! कैसे कहूं!  जो कुछ भी हूं,  जन्म से, ले मृत्यु तक!   मां! तेरा..  प्रसाद..मैं  हूं, हम सभी: में,  देह की  मिट्टी ही  क्यों,  "प्राण" है तूं! कौन.. कहता है की..  तुम!  हे..,  मानवों!   सीमित!  यहां हो,  इंद्रियों  तक!  मित्र!  तुम.. हो,  अतीन्द्रिय!  अपरिमित! आनंद!  लहरी,  परा.. विस्तृत!  लहरती.., इस प्रकृति के तो,   पुत्र.. हो तुम। देख..  तो,  क्या.. देखते हो,  मात्र.. तुम!   इन  नेत्र से... जादू! नहीं देखा कभी!  इन नेत्र का...

अरे अब, भारत हैं हम, और अपनी भारती।

सभी मित्रों, को पावन होली पर्व की, बधाई और शुभकामनाएं।  मित्रों मुसीबत और मुफलिसी में, दुश्मन कोई नहीं, आदमी.. आदमी से अपना काम चलाता है। आम जीवन आपस में राजनीति की पेचीदगी से नहीं प्यार और दायित्व की सादगी से जीता है। समय है हम जाति-पांति से ऊपर उठ आदर्श नवदेश बनाएं। इसी पर यह लाइनें, आपको भाएं। उतर आए लोग, हैं.. अब  बहुत नीचे..! रे, कीमियागर!  खेद है !  तूं अभी, बैठा.. वहीं पर!  दीखती तुझको नहीं,  क्या  जमीं की यह!   वास्तविकता!  अब... चुग रहे, भूखे हुए,  चूज़े..सभी, हर जात के संग प्रेम से,  नीचे यहां, अब जमीं ऊपर। क्या करेंगे,  जात लेकर पांत लेकर!  बेकार है, सब..,  और तेरी, कीमती कीमियागिरी... जरूरत में, मुफलिसी में,  ये सभी... अब, 'आदमी' बस!  इसलिए तो कह रहा हूँ, बंद कर, दूकान' यह! अब नया! युग.. है, सबके हृदय में क्रांति है परिवर्तन हुआ है देखकर!  कहां सोया, अरे! मेरा रहनुमा!  आग! ले बैठा हुआ है पुरानी... वह!  आजतक!  अरे अब,  भारत हैं हम सब, और अपनी भारती अब। जय प्रकाश मिश्र...

और इसको क्या कहूं?

आप सभी मित्रों को, बुराई पर अच्छाई के जीत की प्रतीक पर्व होली पर मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। प्रस्तुत है आज का गीत इस पर्व की पृष्ठभूमि पर टेक लेकर प्रगट होता। होली यहां है, मच रही, दीवाली मची है, पास में, जगमग.. हुए कई..देश हैं, कई रात से, और इसको क्या कहूं?  लोग हैं,  खुश हो रहे हैं देख कर, बस पटाखा...,  फूटा... है! किसका... कितना... बड़ा, कितना भयानक! किस आदमी का  किस आदमी के शहर पर। अच्छा तो ये था, कोई भी हो,  जो फोड़ता है, बम धमाका, मिल सभी भर्त्सना उसकी करें। पर खेद है,  कुछ लोग हैं,  उकसा रहे! जो, कुछ भी है,  भीषण  भयानक,  पास उनके शीघ्र उसको,  दाग... दें। चल छोड़ इसको, हम बुरा  किसको कहें?  और.. क्यों कहें?  आंख! सबके पास है, जमाना है, मीडिया का,  सत्य सबके पास है। होली तो है, रंग लाल है खुशी भी है, पर,  गम अधिक है, सच! बहुत .. है, इस बार 'रंग' ना है गुलाबी,   हे, प्रिए! यह लाल! रक्तिम! लाल है। रुधिर, ही तो,  बह रहा है किसी का हो, कहीं भी हो आदमी... का,  देख न, हाय! कैसा हाल है...
एक पेड़ था, एक थान* था,  एक 'देवता*' था,  सामने से  मौन...  पर  वह, बोलता था,  हर.. किसी के  मनों.. में    देखने में, सदा चुप!   था। पहचानता, हर एक को,  जन्म के, उस पार* से कल्याणकर,  सुखद..   शुभ..,  वर, वरद.. था। आस्था वह, आमजन की,  चिर काल... से था..। मुक्त.. हंसता, रूप उसका.. सांत्वना का, शांति.. का प्रतिरूप था, समा,  लेता..  चित्त को  विक्षिप्त* कैसे..! एक क्षण में, बदल देता, सहज करता,  गजब था। रूप का संभार था, आकार था,  वह निर्मिति*  था,  कला..  था..,  किसी हाथ  की, मुझको लगा, काल ही,  खुद.. बंध गया हो,  कला.. में,  चाह कर!  कुछ! ऐसा...  प्रिये, था। भावना!   खुद..  झांकती.. थी, कल्पना...!  खुद..  पर*  लगा कर..  खड़ी थी।  उन पृष्ठ ऊपर, उस मूर्ति में चमक बन कर!  शील तो हर पोर से ही टपकता था रस मंजरी रस छोड़ती थी, होठ पर, चिबुक पर मन विपुल कितने  बंधे थे,  थान  से... मैं क...

वृथा! सोच है, अपनी मित्रों,

मित्रों, आज की ज्वलंत सामाजिक स्थिति पर यह पंक्तियां आपको समर्पित हैं। आप पढ़ें और आनंद ले। वैरागी है, तन..  मन..  जिसका संसारी... वह, कहां.. रहा, दुश्वारी, तो शब्द..  है,  उसका..,  संसारी... जो, अभी.. रहा। भाव: एक समय के बाद संसार की गति देख हर किसी को विराग हो ही जाता है, अवस्था प्राप्त होने पर भी यदि चाह बची रही तो दुश्वारियां भी उसे नहीं छोड़तीं। छोड़, दुराशा..  जग की, सारी...  तूं अपनी... बस, राह.. पकड़!  जग फेना है,  मिटता.., बनता,  चिंता.,  इसकी,  तूं... क्यों कर?  भाव: आज बच्चों, बच्चियों के बड़े हो जाने पर, उनकी गृहस्थी बस जाने पर भी मां पिता की दखलंदाजी और चिंताएं देख और अपनी अनदेखी पर आश्चर्य है।  रख दे, थैला..,   दे.. दे..  उसको...,  कब तक तूं..  ढोएगा इसको,   बीज सड़ेंगें, मिट्टी में... जब अंकुर! निकलेंगे, तब.. ही, तो...। भाव: हम कैसे! क्या! और कितना! अपनी संतति को दे जाएं यह भाव छोड़ता ही नहीं। जबकि तप से ही सिद्धि मिलेगी और अपने कर्म से ही वास्तविक सुख मिलता है हम भूल ...

भूल भुलैया जैसा ही जग!

जीवन!   है  क्या..?  एक झरोखा! बस, कुछ...   दिन.. का.., तैरता.., यह समय नद पर ,  स्वप्न के, तिरते.. महल.. का। और..  यह, संसार ही, क्या!  प्रकृति की..  इन  वस्तुओं का,  बदलता,  रंग भरता, रूप भरता, उभरता..!   उर्मियों.. सा,  गति लिए, प्रिय ..,! उछलता,  पुनि.. धराशायी!  हे, प्रिये! मिट्टी ही था,  मिट्टी में मिलता..। लेकिन..  प्रिये!  कुछ.. भी कहो!   आकर्षण..!  इसी का। यह सत्य.. हो, या झूठ... हो!  कुछ भी.. कहो!  एक डोर.. है, यह!   बहुत, पतली.. रेशमी..! कैसी सुनहरी ! मन, खींचती...है, काटती, अति-सूक्ष्मता से, हृदय सबका। राग भर भर बांध लेती,  मधुरता से, नम्रता से.. विमल होकर बंधनों में,  टीस देती, अहा! कैसी,..!  विषाद भर कर, अंजलि.. में  सच कहूं! नन्ही नवेली बालिका सी। क्या कहूं! रस..   अरे! कैसा!  कसैला है, करेले का,  मधुर लगता!  पर प्रिये! नहीं छूटता है छुड़ाने पर, तर्क से, ज्ञान से अभ्यास से भी, संन्यासियों के इस ...

मार्केट का हाल क्या है!

मित्रों आज के शेयर बाजार पर आपबीती ही आपको लिख भेज रहा हूं। आप पढ़ आनंद लें, और सट्टा बाजार से दूर हो रहें। साल, तीसों... हो गए,  देखा इधर था.. समय था,  तब युगल मैं था,  पुलकित  बहुत  था,  मन किया,  एक बार देखूं!  पर्दा हटाकर  बाजार  क्या  है?  और..  फिर.. क्या,.. घुस गया...  बाजार में आई. पी. ओ. नए थे,  निकलते,  दस रुपए में,  प्रीमियम भी कुछ,  उन पर, चढ़ा था। फॉरम भरा! चेक लगाया,  हजार! अप्लाई किया, सौ.., मिल गया!  पर,  खुश..  हुआ। पन्ना मिला, क्रमांक था,  हर.. शेयरों पर,  गुद  गुदा..। अच्छा लगा।   यह  गुदगुदा,  चलता रहा,  जो कुछ भी, बचता,  लगाता  बहुत दिन तक,  बिना बेचें, बिना खोचे, देख कर ही, खुश रहा। कुछ बिना पाए, देखता,  मैं रोज था, बाजार में, ट्रेडिंग का चढ़ना  उतरना.. भी गजब था...। कुछ चढ़ गए,  अधिकतर,  तो  उतर गए, शेष सारे, शून्य  हो,  कैसे.. कहूं!  बिना पगहा बैल थे, किस गली, किस घर...