बोल बम! बम! बोल बम. बम!
शीर्षक: बोल बम! बम! सृष्टि यह फैली पड़ी, अपरिमित! इतनी बड़ी, बाहें पसारे देख री, जोहती है बाट किसकी, बोल बम! उन.. एक शिव की, एक शिव की। दिग्दिगंतों में यहां, दूर.. तक विस्तृत क्षितिज के वक्ष पर शक्ति है, फैली पड़ी यह देख कैसी! सर्वदा, सर्वत्र ही, एक सी बाट किसकी जोहती, बोल बम! उन.. एक शिव की, एक शिव की। क्या कह रही चढ़ती उतरती सांस भीतर, शाश्वती बोल न, निर्द्वंद होकर बम-बमाबम! अरु उतारो सोमवारी, सोमधारी सदाशिव संग पार्वती की मिल सभी तुम आरती। बोल बम. बम! बोल बम. बम! नवलता यह विश्व की है, रूप किसकी? बता न! कौन है वह शक्ति इसमें समाई, देवि तो वह एक ही है अपर्णा, अनेकवर्णा! बोल दे न! पार्वती, हां.. पार्वती! अलग हो सकते नहीं, शिवशक्ति हैं यह आदि हैं काल हैं, खुद काल के सृष्टि ही सम्पूर्ण, दोनों हैं यही। बोल बम. बम! बोल बम. बम! नवल रस रसते सभी में आत्म में, इन देह में बहते यही रहते.. सदा इन जलों में, वायु में एक से य...