आदमी
मित्रों अपने और आपके ऊपर ये लाइने हैं आप पढ़ें और तन्मय हों। कभी कभी, कहीं कहीं कोई आदमी भी मिल जाता है, राह चलते शहर की इमारतों के जंगलों में पगडंडियों पर आराम से बैठा हुआ अलसुबह ताज़े खिले किसी फूल सा बेमतलब अलगर्ज खुद से जमाने से, हवाओं संग बह रही ताजा हरा। सीनों पे ढोती, भागती शहर भर की गाड़ियों को और पूरे शहर को ही गंतव्यों की उन मंजिलो को मिलाती और चुप बैठी हुई खुद सड़कों किनारे अकेला, फुटपाथ पर बेजान उन, खाली पड़े प्रतीक्षा की बेंच ऊपर विहग सा खुशनुमा निष्प्रयोजन देखता संसार को कोने से बिल्कुल चलचित्र हो कोई चल रहा अक्रिय निराला फटे हाल और फ्रेश! इतना सहज, इतना सरल तन, मन, चितवन सब एक संग भूला हुआ धन.. कहां मिलता है, ऐसा आदमी! आज के शहर में खुश बेवजह बादशाह सी तबियत हो जिसकी पास में थैला नहीं और मंजिल दूर तक कोई नहीं क्षण जी...