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उसकी, ये जिद है,

मित्रों, कुछ क्षणिकाएं आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं, आप पढ़ें आनंद लें। उसकी, ये जिद है,  रुस्तम,  वो, ही... बने,  मीनार..-ए-ऊंचाई.., वह..  ही..., चढ़ें, साथ जिद... ये भी,  जमीं....,  छूटे... नहीं, साथ.., रखे। वो चाहता है,  उसके, पास...  नीचे...  उतर.. आए,  उतनी.... ऊंची! बुर्ज ए  मीनार..!  सजी, सजाई.. आफ़ताबी!   जर्रा बन के। पैरों के  नीचे,  छूए..  तलवे उसके और वो,  नीचे  जमी पर, ही... रहे। वो, दरिया.. बेशक हो,  पर, समंदर! पे, राज.. करे। अहंकार! नकार है,  सांसों में,  अटक जाता है, 'नियति का नियंत्रण सबपर है,  प्रभुत्व.. उसका है' उठती.. लहरों से,  और  उससे,   ये बात, कौन..,  नीचे खड़ा हो, ऊपर..  कैसे.. कहे?    महत्वाकांक्षा, अच्छी है गति.. देती है, पर,  निगल लेती है जीवन के,  प्यार भरे, क्षण...! वो समझता ही नहीं रात दिन एक किए रहता है... जीवन का श्रृंग,  शिखर!   पहाड़... का  छोटा होता है,  आधार स...

कब तक लिखेगा फूल, पंछी, महल, मदिरा

कब तक लिखेगा फूल, पंछी, महल, मदिरा!  दम! अगर है,  जिगर! है, तो,  देश के हालात लिख!  इसलिए लो,  बुला लाया,  आज, उसको.. घर पे अपने, कह.. दिया,  छोड़ सारी,  अटकलें, और, चप्पलें,  बाहर..., वहीं, फेंक, सारी फूल.. माला हाथ.. की,  दोने में.. रखी, गले.. में, पहनी.. हुई, चाहे किसी हो, रंग... की सुरभित हो कितनी...! मखमली!  अब चाहता हूँ, इधर आ! जी  रही,  कैसे यहां है  जिंदगी  तूं...!  दास्तां-ए-हाल को बेबाक लिख!  अब साफ.. लिख!  कठिन है, जीना... यहां... हर एक पल, देख कैसे!  परख!  नख-शिख!  भारी है कितना,- जीवन बिताना, अरे जीना! सांस लेना, दूषित हवा में  देख न!  दब रही हूँ, पिस रही हूँ,  मर रही हूँ दिखता नहीं, किस तरह, मै... जी रही हूँ! मुफलिसी में,  चूर हूँ, थकावट! से, मजबूर हूँ, इस व्यवस्था से अरे!  इसे तूं...!   अब....!  बुर्ज-ए-मीनार! लिख!  गर आबरू है,  बची तुझमें!  आदमी... की!  आदमी की, जात है, तूं!  तो,  आज मेरी "बात*...

श्री हरये कृष्णाय नमः

ईश्वर,अपनी ईश्वरीय प्रभा में ही विलीन रहते हैं, हम एक उन्जाला स्वरूप ही उन्हें देख पाते हैं। शेष अपनी अपनी आस्था, विश्वास, समर्पण, अर्पण का रूप होता है जो मस्तिष्क और मन उसमें ढूंढ लेता है, वही देखता च पाता भी है। इसी पर आज की पंक्तियां आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं। श्री हरये कृष्णाय नमः द्युति..!   दूर करो,  प्रभु....  दीखते.. नहीं हौ..! जतन करि  हारी...,  तुम! दीठते नहीं... हौ !  नयन.. मोरे, , ये.., चर्म चक्षु हैं साधन और...,  नहिन हैं.. द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हैं..! ज्योति, तुम्हारी,  परचम..!  परचम..! दिव्य! नवल- रस सिक्त मनोरम..! चंचल इतने,  क्षण में  कितने रूप... संवरते..,  टिकतय.. तौ. नहीं, हौ...  द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..! राम.., श्याम... तुम,  सांवर.. सांवर.. सांवर.. पर मैं,  हुई.. निछावर जब तक खोजूं, रूप.. सांवरा बदरा बन, बरसत हौ....  द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..! कोई कहत तुम,  रंग चंपई! राधा,  संग बिहरत हौ  पीताम्बर फहरत है, ऐसौ.. नजर नह...

प्रसन्न होकर, मैटनी शो देखना!

मित्रों, भारत विशाल देश और मर्यादित राष्ट्र है। इसकी फैब्रिक अटूट ताने बाने से बनी हैं। शिवत्व और देवत्व की समरसता उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम हर आत्म और कण कण में संव्याप्त है। पवन के थपेड़े इसे गति देते हैं। हम सभी एक भारतवासी हैं और कुछ नहीं। इसपर कुछ लाइने और आज के लोगो की जीवन शैली पर एक नजर भी प्रस्तुत है। आप पढ़ आनंद लें। गंगा यमुना का देश है यह काव्य हो या गजल हो सब वस्त्र इसके अंत... इसका, कभी न.. हो !   जेहन में, जिंदा.. रहे  यह, ख्वाब बन,  खिल..  मुस्कुराए  गजल.., यह,  मनों में,  हिलती, लिली... सी काव्य से, सट कर रहे।   लट बिखर   उड़ती,  हवाओं में मित्र  प्रिय इस,  गजल.. की मकरंद सी,  ह्रदय संग  मस्तिष्क छूए, शब्द में, यह उतरती  पांव तेरे,  लिपट कर...  मां भारती! स्तुति करे। मां भारती! स्तुति करे। एक संगम,  गंगा.. जमुनी..,  इस धरा पर,  दाहिनी भुज, बाम सी कायम रहे। सत्य है, हम साथ हैं,  हम साथ थे,  चिर दिनों से,  बहुरंग रंगी फूल, इक संग हों खिले...

गंगा हूं मैं, स्वर्ग मेरा धाम है।

मित्रों, धरती पर रहते हुए हमे कुछ चीजे स्वर्ग की भी देखने और छूने को मिल जाती हैं उनमें, मां गंगा प्रमुख हैं।  मां गंगा को समर्पित एक शब्द पुष्करिणी, आप भी आनंद लें। गंगा हूँ ..."मैं"  वह!! 'स्वर्ग' मेरा धाम है, निवासिनी मैं..,  वहीं की.. तो,  मूल हूँ!  हे.., मनुष्यों!  कामना जिसकी.. लिए तुम! भरमते हो,  धरा ऊपर, जिंदगी भर। इसलिए तो कह रही हूँ, दिन, कुछ बिता लो, साथ मेरे किनारों पर,  स्वर्ग सा अनुभव यहां है,  आओ मिलो, इन रज कणों से रजत से ये, अधिक सुंदर। मानती हूँ, आज भी.. तप! तुम्हारा था,  महाप्राणी... भगीरथ का,  महाप्रण.. था,  क्या करें, वो... सामना..!  भगवान... श्री.. कपिलमुनि के, श्राप.. से था। सगर के, उस.. राजकुल के  बालकों का, तरन  सिवा मेरे, कैसे भी नहीं था। एक!  मैं, ही मात्र!  थी, संसार में, इस..,  स्पर्श! जिसका उनके लिए, उस पाप! से,  मुक्ति में,  तब, वांछित था। सुखी थी मैं...  स्वर्ग में... आनंद लहरी, ले.. रही थी, बह रही थी, तरंगों पर  थिरकती उर्मियों में, उर ...

अनुभूति शिव की परम पाएं,

मित्रों, श्रीकपिल मुनि आश्रम, गंगासागर का विशिष्ट स्थान। जो आज भी दिगम्बर मानव मणियों से सज्जित है। इसी पर आज की पंक्तियां आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ आनंद पाएं, कामना है। श्री... कपिल..  मुनि का, आश्रम!  आज भी, जीवंत.. है,  ठीक वैसे.., तब था, जैसे!  छत्ता..!  है.., प्रिय!  मधुमक्खियों..का,  हर.. तरफ  "ताखों*.."   में..  बैठे...,  भभूत.. पोते,  शिव सरीखे मुक्त.. हो, संसार से, संसार.. को,  कुछ,  इस..तरह,  ईंट.., पाथर..,  मान बैठे!   हे....  मित्र..!  मेरे,  शीत में भी,  नग्न .. वैसे , लंगोटी से हीन!  ये तुच्छ!  सब कुछ, समझते..  इन..  संन्यासियों को देख.. आया, पास से,  निज आंख.. से झरोखों.. में,  मणि..  जड़े.. हों, दहकते,  इस तरह से ..  दीखते हैं,  सत्य है ये!  निरंजन!   की  अलख! लखते... लखाते... हैं, पास से नजदीक जाओ! पूछ लो...,  जो, कुछ.. भी चाहो... उपलब्ध हैं, ये...! विकट हैं,  रुक्ष हैं,  दिगम्बर...

एक होगा, नेक होगा, बदल देगा

मित्रों, गंगासागर में 'डुबकी' एक महासुख की अनुभूति! इसी गंगासागर पर आज की लाइने आप पढ़ें और आनंद लें।  कपिल मुनि का आश्रम और कपिल मुनि,  समय के, उस.. खड्ड में, गिर.. समा... जाते, जाने... न कबके.! साथ  ही,  वह द्वीप.. भी। काल कवलित  हो, गया..  होता  कभी का... दोष.. लेकर  भस्मिता का। निर्दोष उन, हजारों  सगर सुतों, का। पर, भला हो, भगीरथ का, भागीरथी का,  पुष्प..  कलिका सा, खिला है  आज भी,  यह  गंगा सागर, रात दिन,  निज नाम, से मेला लगाए,  भक्त जन का। स्नान पुण्यक...  मुक्ति.. का ठीक वैसे, चल रहा है  आज भी सदियों से मित्रों! चल रहा था भव्य जैसें। वह, सगर थे, महा.. पुण्यज, महीपति.. थे,  उस.. समय के,  सागर थे बच्चे, षष्टदश सहस्त्र थे वे,  जो.. "राजसूयक-यज्ञ के उस अश्व" पीछे चले.. आए  खोजते.., खोजते... कपिल मुनि, आश्रम के नीचे!   इंद्र के, करतब से, मित्रों दुष्टता से।  लालसा  यह, सतत सुख की  पाप! है कर्म को ले डूबती है साथ अपने, अंत में, देखें न कैसे?  दोष द...