आदमी अब वस्तु है।
मित्रों जीवन की सच्चाई का चित्र बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ उसी का एक पेज यह भी है। किस शांति से 'वह' झेलती है गरीबी लाडो मेरी, अभी उम्र कितनी, बहू थी, लाजों भरी नवेली। गुलाबी वह चूनरी.! फेरे लिए थी सात प्रिय संग अब भी है रखी संदूक में वैसे की वैसी पहन जिसको कल्पना में उड़ चली थी.. ताजी हरी बिन सलवटों के सिसकती है भाग्य पर, संसार पर आज वह इस शहर में। दो माह के ही बीतते खोजती है, काम धंधा जुटाती है रसद अपनी किस भी तरह, काम कर, हर शाम.. की। देखा है तुमने.. शहर की गलियों को इन बेबाक हैं ये किस तरह से नीर- सी.. चाहती हैं गार लें निचोड़ लें श्रम महत्तम, काम सारे उससे ले लें और वेतन न्यूनतम.. देना पड़े। यही तो.. हम चाहते हैं श्रेष्ठ जन! बुद्धि का उपयोग सारा इसी में है, तभी तो चालाक हम! अन्यथा बोल न क्या नहीं हैं मूर्ख हम..। समस्या...