आरती, अछूती दुनियां से वह।
अछूती दुनियां से वह, बस काम तक सुबह से ले शाम तक, एक घर से दूसरे.. होती हुई, रास्तों भर आ रही हूँ! अं..न्टी कहती हुई अभी.. पहुँचती हूं फोन पर, थुलथुली उस मालकिन से कह रही, थक चुकी थी.. काम पर। चाहती थी चाय पीना ठंड में उस.. काँपती देह उसकी अभी तो तेरह बरस की मात्र थी। उम्र से पहले ही वह संसार के यथार्थ से इस लड़ रही थी। हिम्मती थी, हार क्या है.. वो क्या जाने..! चार पैसे कमा लेना मेहनत से अपने जीत.. है, यही तो, वह जानती थी..। रिक्ति को स्थान कितना चाहिए उससे भी कम में रह रही थी आरती वह नाम से थी आरती होती है क्या? वह क्या जाने.. मैं जानता हूँ, जन्म से वह आर्त थी। वैभव है क्या.. शक्ति क्या.. मदद क्या..! कुछ नहीं, उसके लिए वह चाहती थी, एक दिन का मात्र! वेतन, उन महीनों का तीस से ज्यादा हैं, जो ज्यादा मिले..। तर्क तो यह सही था, सोचता हूं न्याय संगत बात थी, पर कोई नहीं इसे मानता था सोच इसको वह दुःखी थी..। इससे ज्यादा सो...