मधुर हो तुम!
'मधुर' एक खोज की समाप्ति इतने दिनों से खोजता बूढ़ा हुआ तुम्हे! और तुम इतने मधुर.. अब तक कहां थे.. कितना ढूंढा.. पुस्तकों में वेद.. के उपनिषद.. में, श्यामता की स्याहियों के बीच तुमको, अरण्यों.. में नदियों किनारे तीर्थ.. में इन और तुम यहां! इन रश्मिमय मुस्कान में ऐसे छुपे थे, निर्लिप्त सबसे, इस तरह एकांत में, इस मौन में.. इस शांति में, लिपटे हुए मुझे न दिखे तो, उम्र भर तुम न दिखे। अब एक हो, मेरे साथ हो, यह ज्ञान ही तो न मिटे, भ्रम न उठे, इतना करो। हे मधुर! तुम्हे सोचता हूँ निकट इतने, तुम मेरे थे.. प्रेम के इन रसों में, भीगे पड़े करुणा सने, इन भाव में, उद्गार में.. अंदर मेरे..। लीला तेरी.. यह छद्म ही अनुभूति की, मेरी दीवारों को वेधती जब.. रस निकलता आनंद का अंदर कहीं यह.. और मैं बहने हूँ लगता समीर सा भीतर ही भीतर हे मधुर! इतने चतुर! इतने दिनों तक पूछता हूँ क्यों छिपे थे। आज जाना, मधुरता का राज़ सारा, आज जाना झलकता सौंदर्य का इस प्रकृति में हल्का इशारा किस ओर था, मेरे लिए.., घेरे मुझे.. अरुण उषा खेल का खिलता नजारा! आवरण के पार्श्व में, आड़ में तुम खुद छुपे थे..। हे मधुर अब देखता हू...