होठ चुप हैं और मैं लेटा हुआ।
कहीं 'कुछ' अति बड़ा होगा, रहस्यों में छुपा होगा, आंख खुल जाएगी मेरी देखकर... मान कर यह रस्तों पे दौडा आजतक! पीछे मैं इनके, आवरण में छुपाए जो घूमते हैं अंक में मंदिरों और मस्जिदों में आदमी के ख्वाब को। ऊंचे वहां.. उन गुंबद-ओ-मीनार पे चढ़ नहीं सकता जहां मैं.. उम्र में इस, मोड़ पर दिखाते हैं बताते हैं, रखा हुआ है, सपनों का सुख और कोई स्वर्ग! मृत्यु के उस पार का.. सौदा हैं करते.. पल रहे समाज के ही दान पर ये आज भी आस्था पर विज्ञान के भी जमाने में देख तो। आखिरी इस द शक तक खोजा बहुत.. पर नहीं पाया, सच में बाहर, एक भी सच। अंदर कहीं कुछ चमकता है, झलकता है, निथरता है, जब शांत होता मेरा मन.. और अब जब थक गया हूँ गिर पड़ा हूं , दौड़ता फुटपाथ पर इस जिंदगी के अपरवश मूर्छित हुआ सा छोड़ दी दुनियां मुझे, तब कहीं पर्दा हटा। मुखातिब मैं सत्य से सच हो गया.. हूँ कुछ नहीं थी.. जिं...