बाजार मैं, बाजार दुनियां।
बाज़ार दुनियां और मैं.. बाज़ार खुद एक, खुला हूँ, हर वक़्त अपने विचारों.. की दुकानों में, तौलता हूँ, सत्य सबका आज के इस जमाने में, आप को, हर एक को आप खुद को, अंदर कहीं बुद्धि की निज, तराजू में। कुछ बोलता हूँ बाद में, पहले तुम्हें मैं तौलता हूँ कितनी रखूँ और चीनी अपने स्वर में। हिसाब से, तौल कर, उसे मिलाता हूँ पेश करता हूँ तुम्हें अन्यथा बेरुखी से टाल देता हूँ तुम्हें! तुम जानते हो, सभी कुछ अंदर का मेरे दुकान आखिर! बाज़ार की इस तुम भी तो हो। चढ़तीं.. हुई साँसें ये मेरी, स्वार्थ संग उतरतीं नुकसान.. में, टंग.. हैं जाती उसी क्षण संदेश पा, पड़ती हुई घर रेड में। क्या क्या छुपाए घूमता मैं.. सामान इस बाजार का राह चलते सौदा करता आज मैं हूँ प्रेम का। बेंच डाला विश्वास अपना कुल भी अपना, तन, रंग, सौष्ठव, जाति अपनी और सच कहूं तो आत्मा। बालक हूँ मैं.. तिस पर अभी आज भी इस.. जिंदगी की रेत में, मोह को...