परस दे दो,
शीर्षक: बस परस दे दो। भागो नहीं, बस परस दे दो, दरस मैं कहां मांगता हूँ, जानता हूँ! काबिल नहीं हूँ, बहुत छोटा, मैं तो खुद को, मानता हूँ। पर लगा हूँ, पीछे तेरे, मैं हमेशा से तूं.. जानता है, क्या इसलिए ही भागता है? कोई नहीं, तूं बड़ा है, सब जानता है, मैं मर्त्य प्राणी धरा का, मिट्टी का पुतला मात्र! मुझको मानता है। इशारा मैं समझ लूंगा, आदमी हूँ, मस्क युग का, इशारा तो कोई कर दे.. कभी परस दे दे। कुछ नहीं मैं मांगता हूँ, सुनो मेरी कर्म मेरे, मात्र! तुम, द्रव्य की इन प्राप्तियों से अलग कर दे .. दरस मैं कहां मांगता हूँ, परस दे दे। निछावर गृहस्थ जीवन! वादा है ये, खुशी से सार्वभौमिक उपकार का व्रत! पालन करूं शक्ति इसकी मुझे दे दे। सच कह रहा हूँ, झूठ मैं तुमसे क्यों बोलूँ...! आज ही से छोड़ दूंगा, प्राणियों का अमिष भोजन! सृष्टि से विद्वेष मेरा, मेरे अंतरों से नष्ट कर दे..! मैं प्रेम पाऊं सभी से, प्रेम बांटूं सभी...