भूल भुलैया जैसा ही जग!
जीवन! है क्या..? एक झरोखा! बस, कुछ... दिन.. का.., तैरता.., यह समय नद पर , स्वप्न के, तिरते.. महल.. का। और.. यह, संसार ही, क्या! प्रकृति की.. इन वस्तुओं का, बदलता, रंग भरता, रूप भरता, उभरता..! उर्मियों.. सा, गति लिए, प्रिय ..,! उछलता, पुनि.. धराशायी! हे, प्रिये! मिट्टी ही था, मिट्टी में मिलता..। लेकिन.. प्रिये! कुछ.. भी कहो! आकर्षण..! इसी का। यह सत्य.. हो, या झूठ... हो! कुछ भी.. कहो! एक डोर.. है, यह! बहुत, पतली.. रेशमी..! कैसी सुनहरी ! मन, खींचती...है, काटती, अति-सूक्ष्मता से, हृदय सबका। राग भर भर बांध लेती, मधुरता से, नम्रता से.. विमल होकर बंधनों में, टीस देती, अहा! कैसी,..! विषाद भर कर, अंजलि.. में सच कहूं! नन्ही नवेली बालिका सी। क्या कहूं! रस.. अरे! कैसा! कसैला है, करेले का, मधुर लगता! पर प्रिये! नहीं छूटता है छुड़ाने पर, तर्क से, ज्ञान से अभ्यास से भी, संन्यासियों के इस ...