बात.. मित्रों पुरानी है,
मित्रों, सभी के जीवन में कभी न कभी मधुर क्षण आते ही हैं। कभी तो यह मात्र छद्म आकर्षण होता है और कभी सच्चा प्रेम भी, इसे कैसे पहचाने इसी पर आज की रचना है। लंबी है पर पढ़ेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे। जटिल है पर सरल भी है रस सरस है। कुछ लोगों के काम की भी हो ऐसी मेरी कामना है। बात.. मित्रों पुरानी है, एक बाड़* थी, तटबंध.. था, बचपन को घेरे, लेकिन विकल.. था, अंदर... कहीं, दरार थी, तैयार.. थी अब.., टूट... जाऊं, छोड़, बचपन, पार जाऊं...! उम्र.. का, विहान था। मन, मधुर...! कुछ.. खोजता, अत्र-तत्त्रा* झांकता., अंदर कहीं, से चुलबुला..! बाहर से.., बिल्कुल सौम्य! था। वय-संधि*, मेरे.. सामने थी, बढ़ा दूं पग, पार जाऊं! चाहती.... थी। ललक.. लेती, लहर! मुझ में, उठ... रही थी, आकृति... इस, प्रकृति.. की, बदली हुई, सलोनी, मुझे लग रही थी। मुझको... लगा, मुझमें कहीं कुछ.. रिक्ति थी, वह पूर्ण होना, मांग ती थी । आज कुछ... बदलाव था, मन.... मेरा ही,...