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जब देखता हूं शहर को इस, सिर पीटता हूँ,

ऊंचे उठे हम! सत्य है यह!  देखता... हूं, बैठकर!  पैंता..लि..सहवें  फ्लोर...  की.. ! इस.. ऊंचाई पर। आलीशान! अंदर...  सोच... से भी वृहत्तर.. ! यह... प्रांगण!  बिना जाने, बिना पूछे!  नमस्ते!  करता हुआ.. किस प्रेम से, दरवांन  है,   इंट्रेंस...  पर..। कितना,  सहज!  कितना, मधुर, कितना प्रियल!  माहौल है,  पैसे के बल पर...। अहा!  अद्भुत है, महल!  जगमगाता... झिलमिली...,  इस  रोशनी...  से,  नहाता... हजार कलियों से बना!  खिलता हुआ!   बहुरंग पुष्पों से  गुँथा!   स्वचित्र-चित्रण*  का ये,  कोना...। जान.. है, प्रेस्टीज.. है, खड़े हो, फोटो, खिंच ...चा...ना। कालीन, गुदगुद  गुदगुदाते... नरम कितने! लरज़ जातें! स्वच्छ इतने, लांड्री से धुले हों इंग्लैंड के... ! धंसते हुए, उभरते  उर-रोज हों,  सच!  ऐसे हैं, लगते। रंगीन चम! चम!  दृश्य, बाहर!  पास की, दुनियां से... बिल्कुल, बे-खबर!  बाउंड्री के अंदर, पार्क की,  कैंपस के लॉन ...

चल बंधनों को खोलते हैं।

मित्रों, दुख, व्यथा, संताप, क्लेश, चिंता, भय सभी मानसिक ही हैं और इन सबकी  जड़  विचारों में दबी होती है। यद्यपि मन बना ही है खुश रहने के लिए, फिर भी अचानक कोई विचार आ जाता है और हम अच्छे माहौल में भी होते हुए उससे दूर! इसी पर आज की लाइने, आप पढ़ आनंद लें। मन की, सहज.. गति, शांति.. निर्मल,  और सुंदर..!  स्वभावतः यह...  अनवरत...,  मानस की अपनी,  झील... में  स्मृति.. के, पूल में  गोता लगाता,  तैरता है। फिर भी अचानक स्मृति...  कभी  उभरती, कभी डूबती धूमिल  सी  होती  बस एक दो  स्पष्ट होते विचारों की  तरंगों.... पर!  चांदनी... सी,  उछलती। कलकल, अनामय,  श्वेत निर्झर! प्रीति भर.. भर.. दौड़ती। और "मैं"  एक... व्यग्र.. हूँ! उद्विग्न.. हूँ!  दुनियां में इस, जल रहा,  बिन.. अग्नि ही!  इन विचारों की अग्नि में। देख.. कैसे?  अंतरों... में,  खुद ही अपने!  उन, एक क्षण के,  अनुभवों से,  स्मृति के रुकते.... नहीं यह !  अरे... रे!  प्रारंभ में कितने प्रियल!...

एक भांवर, डालता हूं, भंवर में..

मित्रों, जीवन आश्वासन का खेल! सुनहरे कल की दौड़! एक मृगमरीचिका का पीछा है। आज को छोड़ कल के लिए प्रयत्न यही है जीवन और अंत में क्या? इसी पर यह लाइनें आप खुश हों चाहना है। एक भांवर, डालता हूं, भंवर में.. जब तक, प्रिये, मैं... सोचता.. हूं दूसरी..  अब.. शुरू  कर.. दूं,  पूंछ... ही, मिलती... नहीं,  मैं, क्या करूं! भंवर...  हो जाता है गायब,  शून्य... में,  मिलता...  नहीं  अब। दूसरा... है,  उभरता,  उससे.. भी,  सुंदर!  खींचता पर..है, अलग! कुछ.., और प्यारा और गह्वर.. मरीचिका यह!   इंद्रधनुषी रंग लेकर.. । खुश.. हुआ  मैं.., दौड़ता.. हूं! फिर  वहीं मैं, पहुंचता हूं, पहले जहां  था, क्या है, ये.. सब... बता.. न!  आज तक, आया नहीं  चाहा हुआ कल"  चाह  जिसकी,  बे-सबब ले, उम्र घूमा, हर जगह!    एक आह!  लेकर,  छोड़  आया, जिंदगी के सुनहरे पल,  सच.. है ये,  वे.... जिंदगी के, सुनहरे... पल। उलझा हुआ, मैं.. इसी में बस इसी में, कल  आएगा, मेरे हाथ में मधुमास होग...

एक समय में एक विषयक तेरा मन है।

मित्रों, हमारे ज्यादातर दुख, आने वाले समय की दुष्कल्पना के  भय मात्र होते हैं। अतः सोच को वर्तमान में रखना, और हमेशा पॉजिटिव रहना ही इनसे बचने का मार्ग है। आज इसी पर कुछ लाइने पढ़े और आनंद लें। उसने पूछा, दुख कहां है?   मैने सोचा, और ढूंढा... जद्दोजहद.. है,  जिस... जगह... अ..व्यवस्था.. फैली हुई है, जगह, जो... भी,  शांति... से, महरूम.... है प्रिय! दुख वहीं है, दुख वहीं है। और सोचा! थोड़ा... आगे,  दुख.. वहां, बाहर  नहीं... है,  बहुत कम है, बाह्य यह यह आंतरिक है. अंतरों में छुपा.. है,  हम सभी के, मात्र यह!  मन.. का विषय है। क्या कहूं!   क्यों खिन्न है, वह..!  दुखी.. है!  टंग.. गया है, खूंटियां.. पर!  सोच.. की, किसी.. विचारों पर रुक गया है, अन्यथा कोई चाह है,  बाकी अभी, अंदर कहीं,  लंगूर सा लटका हुआ है, पकड़ कर!  उतरता.., नीचे नहीं.. है, छोड़कर!  क्या कहूं, हे मित्र!   मेरे... चार... दिन से  चुप.. है बैठा, चौकियों... पर!  चार पाए, दुख में बांधे साथ अपने पांव रखता.. भूमि पर...

पहरुआ... बैठा रहा, नाकों.. पे, हर..

मित्रों, बहुत कुछ हम अपने लिए करते हैं और उससे ज्यादा नियति, समष्टि भी सभी के लिए करती रहती है। मन में आंतरिक शांति होनी चाहिए, जीवन एक रहस्य है और चलता ही है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ आनंद लें। पहरुआ... बैठा रहा,  नाकों.. पे, हर.. जिंदगी को!  रोक दे!  पर,  संभव नहीं था, उसे... मालूम, न!  था,, जिंदगी! बाहर.. नहीं..    भीतर.. कहीं  थी, पनपती,..  अंतर्मनों  मनों में,  सज़ रही  ,  रस..  रही, और  रिस रही। आग?    हां...  आग!  जब..  चहुंओर.. थी, घेरे इसे!  पसीना बन निकलती.. यह निःस्वांस.. बन बन..,  सुलगती   अंधेरों  में,  अतल उन  गहराइयों में सजग  हो,  अरुण को बस  जोहती थी,  अरुण को बस  जोहती थी। उस.. ताप.. में,  जब, जल.. रहा... पर.., परिंदों...  का, ये, जिंदगी थी,  बेखबर हो,  ताप से  संताप से,  संयम.. किए,    स्वप्न! कल के, आप संग ही  बुन रही  थी। पहरूआ बैठा रहा... इसे.. रोक दे, शिव.. सी...

जानता हूं, चूर्ण शीशे, की हैं ये..

मित्रों, जीवन सरलता में बीत जाय तो, यह अतिविशिष्ट स्थिति जाने। इससे सुंदर जीवन नहीं, लेकिन कभी कभी, कोई चिंता, कोई सोच, कोई इच्छा, इतनी प्रबल हो जाती है जीवन पर ग्रहण लग जाता है, नुकीले चंगुल में प्राणी फंस जाता है, निकल ही नहीं पाता। आज की लाइने इसी पर। अच्छा लगे तो पूरा पढ़ें अन्यथा छोड़ दें। इच्छाएं..... हों चिंताएं... हों,  सोच.. हो  कोई.!   बहुत.. गहरी.!  कांटा फंसा हो,  गले में,  सिंघी..  मछलियों का, अरे..भी!  तब भी वहां, एक मार्ग.. है,  प्रिय!  निकलने का,   मान तो थोड़ा रुको!  बात! तुम, एक बार  सुन लो...। समस्या!  कैसी... भी, हो,  कितनी..  प्रबल... हो,  हो...  बलवती...!  आग.. बन! हो तप्त करती!   अंतस्थल जलातीं!   धधकती..।  गुलउरि  के जैसी,  गांव.. की, चौबीस घंटों, गर्म.. रहती, लावा सरीखी, आप संग परिवार को भी,  भस्म करतीं। स्फुलिंग.. हों,  रह रह, चिंनकती,  चिन्हिकिती, चिल्हकतीं  चकमकों सी, एक क्षण में चमक जातींं, मन  हृदय म...

आ.. चलें, बाजार में, बस, घूमने

मित्रों, जीवन सीमित क्षेत्र में नहीं, असीमितता इसका गूढ़ार्थ है, मात्र जरूरत और दैनिक कार्य पद्धति से इतर इसका आनंद झरता है। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं। आ.. चलें, बाजार में,  बस, घूमने  देखें,  वहां,  कुछ, नया! है  क्या ?   क्या? कह... रहे हो!  बासी.. पड़ी,  सुस्त..  सी..,  उन, दुकानों..  में,  रह..-रह..., सुबुकुती,  इस,  रिमिझिमी...  बरसात में,  स्याह होते, धुंधलकों में,   टिप-टिप, टुपुकुती,  झरती हुई,  आंसुओं सी रिस रही,  चंचला...  इन बदलियों की, आंख से, नीचे धरा पर, भिगाती,  यह, जुल्फ मेरी, इस तरह!   ठंड के, इस महीने में, बता न! यहां  इस  बाजार में, रक्खा भी क्या है?  अरे..!  नहीं... रे!  हम... मिलेंगे,  चुटकुले से, हंस रहे,  किसी रंग.. से,  फ्रेश, फिसलती,  जिसे..!  हाथ से, हो.. पकड़ती!  जान कर, अंजान..  बन.. ती, बस  यूं..  ही...,  गुलाबी,  रंग..  ओढ़नी, से...!...