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थोड़ी शांति मुझको चाहिए

मन भर गया संसार से, हर बात से,  अब  शांति मुझको  चाहिए वह कह उठा,  वन जंगलों की ओर बढ़ता..  हिमालय की तलहटी में रम गया। विचारों की बदलियां,  आ.. घुमड़तीं उस शांति में, एकांत में मन.. हृदय.. में बरस  जाती चुप वहां एकांत में। बूंद बन बन वाष्प बन बन आंख से शांति के वातावरण में, अकेले में वह दु:खी, अशांत था। एक दिन गहरे वो पैठा, सोचता यह शांति क्या है? उथल क्या है? अंतर  कहां है मूल में मूल में क्या क्या छुपा है मूल अपना ढूंढता शैशव में पहुँचा! आनंद था तब कितना अच्छा शांति मन में,  फर्क क्या है आज तब में,  मैं तब भी था,  मै आज भी हूँ, ठीक वैसे.  बस मैं मेरा यह, उस समय ऐसा न था। इस तरह का स्वार्थ न था, बँधा न था,  राग की इन रस्सियों में, आज सा  मैं आज में था, जी रहा और  मुक्त था। शांति बाहर नहीं होती.. अंदर है बसती, एक जैसी,  हर  किसी  के, अंतरों में। विचारों की  शांति ही तो शांति है! प्राप्त होती त्याग से  इस स्वार्थ के, आसक्ति के,  और प्रिय  भविष्य का डर छोड़ने से..। शांति प्रिय उस ...

आज फिर तकनीक को बट्टा लगा है,

शीर्षक: त्रिशूली की त्रासदी पहाड़ों पर उतने ऊँचे! इस तरह की  बाढ़  होगी..! ढलान  तीखी  सत्य है   जहां..  हर कदम पर  धरातल   की ,  तोड़.. उसको, छोड़ उसको सौ.. फुटी..! इससे  भी.. ऊंची!    दौड़ती  आ..  रही,  प्रलय! की  दीवार..  होगी,  किसको पता था? तरलता पानी की यह,  संग घोल  ले गी.. बिल्डिगों.. को,  गाड़ियों को,  आदमी को  एक में ! बहा ले जाएगी  नीचे..  उससे भी  नीचे..  घाटियों में लील लेगी काल बन!  इस तरह, किसको पता था?   बिना पूछे, निमिष!  गुजरे.. एक भी!  उसके भी,  पहले.., गोद में भर. समा लेगी हर किसी को  देखते.. ही, देखते.. इस बात का किसको पता था? धराशाई!  शहर होगा... ..!  प्रकृति की बेचारगी से रास्ता ही एक होगा निकलने का इस तरह!  का विध्वंश का  यह रूप होगा,  इतना भयानक! शांति में विप्लव मचेगा स्वप्न में सोचा न था, इन जीवनों का  अंत होगा  इस तरह!  किसको पता था?  सागरों सी गरजती...

इस प्रकृति का एक खिलौना मैं भी था?

मैं..  कब नहीं था, रूप.. तब  कुछ अलग था, रुचि.. अलग थी,  योनि.. भी  यह  नहीं थी, पर मैं हमेशा  रंग, रूप अपना  बदलता..  प्रिय यहीं था। यह बात  सच  है,  भूल जाता हूँ  मैं खुद  को, आवरण*  जब बदलता हूँ,  देह का,  बदल जाते तुम भी हो  प्रिय! काल के साँचे में ढल के सोचना!  बालपन में  जो मिले थे तुम मुझे वह, यह नहीं थे,  बदले हुए हुए हो काल की धारा में बह के। रूप परिवर्तित तेरा,  रूप परिवर्तित मेरा हजार मृत्यु मर चुका तूं  एक मृत्यु.. मैं मरा। कौन हूँ!  मैं? जानते हो, क्या.. मुझे? पहचानते हो  मात्र तुम इसलिए की  साथ  हो। मित्र हो  इतने.. दिनों से,  मिले हो क्या? अलग होकर आप से संसार से, मेरे रूप से, मेरे रंग से,  मेरी आकृति से  भ्रांति से, कभी दूर रह के। बुलाती है प्रकृति मुझको, ठीक वैसे, बनाते हो तुम खिलौना! खेलने को, रूप लेता, इसी में मैं  देख न!  पानी वही, मिट्टी वही,  आकाश सबका एक ही, अग्नि है कब बदलती! यही तो सामान ले  हर ...

अप्रतिम कुछ देख तो (स्लाटर हाउस-5)

शीर्षक अप्रतिम कुछ देख तो। देह की सीमा है, सीमित! जिनसे बनी  उन अवयवों  तक, उसके आगे.. चन्दनों की महक है,  चांदनी का  नृत्य करता  राज् है,  फैला पड़ा  तारों  के नीचे,  अछूता,  निर्लिप्त, अनुपम! आ देख न!  तेरे लिए  पलकें बिछाए खड़ा है ये, शुरू से। चलोगे? क्या साथ मेरे, सफ़र पर, उस मन है  तुम्हारा?  छोड़ दोगे,  सभी लालच!  सच में तुम क्या?  इस धरा का! उड़ोगे तुम साथ मेरे,  नीले वहां,  उस चमकते गहरे! गगन तक? परा है, हर ओर अपने, मिट्टी से हट कर  सोच तो! देख तो, आंखों में गहरे, हंसते हुए किसी बाल शिशु के। मगन होकर, भूलकर  सब नृत्य में,  क्या भाग लोगे? बोल न,  गाती हुई, उस  नवलिमा,  इस प्रकृति के साथ मिलकर नचोगे क्या लय मिलाकर? कौन है तूं  जानता है?   समष्टि पूरी! दिखता जहां तक,  वह..  दूर तक  उस.. क्षितिज तक! सृष्टि सारी, इतनी बड़ी,  और यह सारा  जहां, इतना बड़ा,  सच मान.. मेरी, तेरा ही है, तेरे लिए! बाहर निकल  बस  क्...