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एक यात्रा।

जीवन यात्रा पर कुछ शब्द हैं, आप पढ़ें और आनंद लें। फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं! शब्द थे कुछ, कुछ भाव थे, मानस में मेरे,  गूंजते   जिन्दगी के  सार थे वस्त्र  उनके ही मैं बैठा  शांति से अब  घर में अपने  काढ़ता हूँ, सजाता हूँ, सिल रहा हूँ। रंग सुंदर चढ़ाता हूँ प्रिय लगें, तैयार कर उन्हें, हर तरह पंक्तियों में पिरोता हूँ भेजता हूँ, नित्य सबको, मुफ़्त में, फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं! शक्ति का भी ग्राफ था, लहर जैसा, शुरू  में  उठता  हुआ,  बढ़ता रहा कुछ  दिनों को, था रुका.. शिखर पर,  फिर ढलता गया,  घटता हुआ क्षीण  होता,  उत्तल से अब अवतल हुआ। इसलिए,  फावड़े चलते नहीं  अब, क्या करूं! संसार गति है, गति विषय है, विषय विष है, विष  मृत्यु..  है, और तुमसे क्या कहूं!  मृत्यु में ही नवलता है, जन्म है जन्म ही संसार है,  यह  और क्या है?  मुक्ति बौरा मांगता है,  जानता ही नहीं वह, बंधन को पकड़े, खुद खड़ा है.. स्वांस में हर मुक्त होता,  छोड़ता जग, जिन्दगी  वह स्वांस भर भर...

प्रश्न तो रह ही गया।

मित्रों जीवन और जीवन चक्र के रहस्यों पर ये लाइने आप को प्रसन्न करें। शुरू से ही, हेरता.. हूँ खोजता हूँ, सत्य  इस  संसार में, अनंत  हो, पर  सहज हो, अवधारणा में आ सके,  हर किसी के,  कहां है वो ..? अतिसूक्ष्मता से ढूंढता हूं, अनुभवों के,  आंगनों  में  बुद्धि से,     तर्क की तलवार का वार कर.. कर.. काटता हूँ ! नागफणि के फनों को  तौलता हूँ, तराज़ू में,  अंतसों* के। कपास के  उन  तंतुओं में,  निरलस हैं जो,  श्वेत हैं,  निर्मल भी है,  अन्दर कहीं, स्पष्ट हैं, सुलझे हुए,  रेशे अलग  हैं,  देखने में। और काले बिनौले में, बीज है जो... अंकुर छुपाए, राज़ सारे प्रकृति का इस,  आत्म ज्ञानी संत सा, जो  मौन है। क्या हूं मैं?  कौन हूँ?  यही तो वह प्रश्न है.. इसके लिए, क्या है, मुझमें  अंदर भरा,  यह  चल इ से ही खोलता हूँ,  एक एक को  मैं ध्यान से  अति देखता हूँ! कुछ नहीं, शांत होकर आप* भीतर, वस्तुओं से मिल रहा हूँ। दृश्य हैं, संसार के भावना है,  ...

दस्तावेज़

सभी मित्रों को आज देश के स्वतंत्रता दिवस की बधाई।  अस्सी-ववां स्वतंत्रता यह दिवस है,  छोटे, बड़े, बच्चे च बूढ़े और पूरा देश,  अपना  प्राणियों संग, सभी खुश हैं हृदय से। उल्लसित,  प्रफुल्लित  और  मगन हैं, देखा है  मैने, अच्छा लगा, इन्हीं में  हम भी तो.. आखिर, एक हैं। इसलिए, बस पूछता हूँ,  आज  अमृत  काल में, हम  कहां  हैं? कितना है अंतर!  बढ़ गया है,  सफेदी में.. कपड़ों में मेरे, और उनके वस्त्र में। बैठे हैं जो जीतकर  चुनाव,  ऊंची मीनार  वाली मकरध्वज के  द्वार वाली संसदों में ,  सांसदों के,  विधायकों के,  विपक्षियों  के,  पक्षियों के धवल,  उजले  पंख में...। सेवक हैं वो?  जीवन दिए?  उठाए हैं कष्ट कोई! सत्य कह,  एक भी तेरे लिए, मेरे लिए ? व्यवस्था, अधिकार, सुविधा,  पास रखें, राज, हम तुम पर करें साथ रखें, सेठ को और चूस लें,  अमृत  सभी से, मेहनतों का कर लगा कर,  प्राकृतिक दोहन करें और क्या है खेल पूरा  हो रहा  इतने द...

स्मृतियाँ

मित्रों, उम्र हर क्षण शेष होती है, और स्मृति में अशेष रह जाती है। और एक दिन अंत में स्मृतिशेष हो लोगों में चली जाती है। जीवन पट का एक टुकड़ा आपके लिए प्रस्तुत करता हूं, आपको अच्छा लगे बस और क्या। उम्र की माला में, इस.. फूल से,  कुछ वर्ष हैं किशोर  वय  के,  धूसरित  होते  नहीं,  आज भी,  ताजे हरे हैं। महकते.. हैं  स्मृति में,  स्निग्ध वैसे,  आज भी रखे.. हुए  समय की भी मार से कुम्हलते.. बिल्कुल नहीं हैं। तरंगित मन, कैसा चंचल, सुकुमार था, तब! निष्पाप कह  सकता  हूँ,  मैं..  अब, भावना में लिपट कर,  यह मधुमयी!  गोते लगाया, डूब कर तब। कल्पना की  धार में  तैरता हो  मत्स्य, कोई, तरलता में सहज होकर अहा कैसा,  सरित में यह तैरता था सोचता हूँ आज प्रिय,  क्या मैं यही था? चित्र अद्भुत!  उस समय का अभी भी है उभरता  निकलता हो  चांद  काले बादलों से,  धीमे धीमे पूर्णिमा का,  बड़ा होता.. और मैं बैठा धरा पर,  देखता हूँ  समय की बहती नदी के किनारों पर चुप शांत...

खुशी तेरी और तूं..!

मित्रों आपकी प्रसन्नता के लिए आज की पंक्तियां प्रस्तुत हैं। यह खुशी तेरी, और तूं..! संग मिलकर,  पिघल  कर, एक हो जाओगी  जब...,  और यह पहनी  खुशी,   कपड़ों सी ऊपर  समस कर, रसते हुए  कपड़ों के नीचे, सिमट कर तुझे ढाल लेगी, अपने अंदर... तब कहीं तूं खुश मिलेगी  हमेशा ही,  चहकती हर हाल में,  हर काल  में..., एक गुण तुझको मिलेगा पहचान देगा,  खुशी  का की वही है  तूं,  अन्यथा.. गर  रुनासी,  तो खुशी न!  कुछ और है, तूं..!  अप्रभावित! गुण तेरा,  संसार के हर  कारकों  से, अविचलित जब तक है, प्रिय यही तो, वह द्रव्यता द्रव्य की।  कीमती..! अपरिवर्तित, एक सी। अपरिवर्तित यह  रूप,  गुण, सौंदर्य है, औदार्य है, जो बांध लेता  सभी को,  एक जैसा,  विश्वास की ही रस्सियों में। अन्यथा इस रूप की  क्षण विकृति भी, दूर कर देगी  तुम्हें,  हर हृदय से, स्वर्ण हो, मुक्ता-नवल, हीर कण  चमकते हैं एक से  हर हाल में, हर स्थिति में तभी तो प्रिय,  हर किसी ...

खुशी गम की फैब्रिक जिंदगी ये।

मित्रों, जीवन खुशी और ग़म की एक फैब्रिक ही है, इन्हीं को डिफाइन किया है इन लाइनों में आपको अच्छी लगें और श्रम सफल हो। कम करूं कुछ, जरूरतें,  अपनी प्रिये!  खुशी से, मैं देखकर,  सोचकर ,  लोगों का जीवन साथ में ही रह रहे, संसार में। बिन कहे,  समझौता करूं,  निज जिंदगी में,  सुखों से थोड़े में रह लूं, बेशक कभी तकलीफ़ में; अच्छा करूं,  उस बचत की धनराशि से,  बिना मांगे,  नीचे पड़े, निरीह को; मैं इसे दे दूं,  तो...  शुरू से ले अंत तक उस एक क्षण  को  सोचकर हमेशा  जो उपजता है  मेरे भीतर,  सुरसुरा सिहरन सा देता   महक उठता अंतरों में,  खुशी है वो। बे-उम्मीद को मैं, उम्मीद दे दूं,  ना-उम्मीद से, मैं  ना,  निकालूं, उम्मीद भर दूं! जब  कभी,  उम्मीद अपनी छोड़ के तो.. खुशी है, वो..! नाखुशी, मत पूछ मुझसे,  एक ही है,  तकलीफ है,  जब देख खुद को,  सोच खुद को,  घृणा हो,  पछतावा हो प्रिय,  अंदर कहीं,  अपने किए, पशु सरिस व्यवहार पे। हेय, मैं  अपने ...

न्याय की दरकार किससे।

मित्रों, संसार स्वयं में सुंदर और अप्रतिम प्रगतिशील है। मनुष्य केवल आपस में प्रेम से रहें और अन्य प्राणियों को प्रेम करें तो आज ही सारी समस्याएं स्वतः हल हैं। इसी पर ये लाइने। तत्व होंगे बहुत सुंदर,  पुराने आदर्शों में..  मनुष्यता के,  संस्कृति के  सजा कर  रखे हुए करीने से,  बांट के,  छांट के,  खांचों  में भर  के, धारणीय हैं क्या ? आज भी सब उस तरह ही,  आदमी की जिंदगी में,  बात है ये..! इसलिए, सार्थक  एक बहस होनी चाहिए आदर्श ऊपर, संस्कृति के, धरणीय हों वे,  यम नियम आदर्श सारे न रहें रखे हुए,  केवल वहां  बस किताबों तक सुशोभित  किसी मेज़ पर रखे हुए शांत! चुप! खिलते हुए गुलदान से। वह समय बीता  राज बीता विदेशियों का  काल बीता, सदी बीती.. अरी यह इस नव सदी में  मानसिकता हर किसी की अब बदलनी चाहिए और कानून भी वो.. राजसी,   सारे बदलने चाहिए। नियामक इतने कड़े..,  आदर्श! प्रिय इतने बड़े.. ये.. किस लिए? आदमी,  आदमी ही, बस रहे जानवर वह न बने। वह सहज हो, सामान्य हो बुद्धि का उपयोग अपन...