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जीया नहीं ये जिंदगी, मैं कभी खुल के।

१. फूल!  जितने भी खिले थे    खिल-खिलाकर,  हंस रहे    मुस्कुराते महकते     पेड़ की उस  डाल पर..    अच्छे थे कितने?     २.और रखे, टेबुलों पर..    डंठलों संग    काटकर,     लपेटे कपड़ों में भीगे    सरे सर-बाजार में     सजाकर     गुलदस्तों में भरकर बेचने.. ३.और कुछ थे रंग-बिरंगे रंग के    मोहते मन  घर में.. अपने     मेज के गुलदान     भीतर  गुनगुने     फूल ही     तो सभी ये.. थे    मुरझना इन  सभी को था     आज ही    पर दुख हुआ मुझे    मात्र बस  उनके लिए     घर में  मेरे थे, मेज पर रखे हुए     अन्यथा  मुझसे जुड़े थे।    क्यों है ये..    फूल तो बस फूल थे    और सारे पेड़ के, इस प्रकृति के थे.. ।    आदमी क्यों बंद है,    सीमा में अपने   ...

बाज़ार

बाज़ार क्या है महासागर  इतना  बड़ा!  आप्शन..,  स्टॉक्स, इटीएफ, एमफ का लहरता  उर्मियां ले  नित नई  बदलते नव भाव का..। उत्ताल होतीं लहरियां ये भाव की फन  काढ़तीं   सर्प सी  आगे, और आगे दौड़तीं  तरंगों सी..  कूद  बढ़ती..  हर  एक  क्षण  बच्चे के जैसी.. लौट आतीं पुनः पीछे दुधमुंहे बछड़े के जैसी। लय-विलय होतीं  क्षणों में सूचना संजाल की  सुन आहटों को फेन फेनिल सी ये होतीं  समा जातीं,  उदर  मे.. चुप!  घड़ी भर में उछलतीं   मन भावना को  शांत करतीं,  दुख,  खुशी देती पलों में   कंदीलों के रंग में..  बाजार क्या है?  कभी बैठ जातीं  जमीं पर  बूढ़े हुए,  किसी बैल सी सालों न  उठतीं  निफ्टी सरीखीं,  लौट आतीं और पीछे,  झूमती दो साल से बोल न! बाजार क्या है? उछलती  उम्मीद  की मछली हो  कोई!  खुशियों भरी..  छटकती नाचती  प्रिय  एक दिन  इन्वेस्ट पर निज नाज़ करती  ख़ामोश! चुप हो तड़पती ...

कौन.. है, बैठा हुआ इन अंधेरों में।

मित्रों, कठिन को आसान करना भी मेरा काम है इसी क्रम में आप अपने को जाने इसी पर ये लाइने और इनका भावार्थ भी लिखा है, आप प्रसन्न हो यही उनसे याचना है। दीपक बना..  यह  कौन.. है,  बैठा हुआ  इन अंधेरों में,  स्वप्रकाशित! इतने गहरे गह्वरों में,  अकेले,  जन्म से ले  आज  इस  अठवें दशक में। चुप  मौन वैसे साक्षी..  इतनी बड़ी  इस अवधि का चिद्रूप कैसा,  एक सा,  न  कभी उद्विग्न होता न कभी उद्विग्न करता। नृत्य करता विश्व यह  घेरे इसे कितने.. दिनों से, विश्राम करता  रात्रि हर थक हार कर, और यह,  मेरे दिल के जैसा,  साथ देता,  बता देता  सुबह को, प्रिय स्वप्न हर नींद में भी सबसे गहरी  जागता है, कभी न विश्राम करता स्वाद उसका बता देता, कौन है यह..! पांच धागों में बंधा रखा है कैसे पारदर्शी स्फटिक!  दिखता नहीं  इन नेत्र से, मन, बुद्धि, चाहत और मानस चाकरों से घूमते  हर समय,  हर ओर इसके..। ज्ञानेन्द्रियों,  कर्मेन्द्रियों की सेज पर  आराम से लेटा हुआ,  अविचलित,...

अचानक मेरे मुंह से निकला।

चित्र! तो   मैं भी..  तेरे.. ही,  हाथ.. का हूँ  हे,  प्रभू..!  सोचता.. देखता.. मूरत प्रभू की आत्म में  घुलता  गया। अचानक!  मेरे मुख से निकला आदमी ने..  रूप..  तेरा,  इतना सुंदर.. क्यों चुना। क्या.. इसलिए  सुंदर सभी है? सुंदर बहुत, मैं भी तो हूँ। होठ..  मेरे  गुलाबी,  हल्के  से  हैं, बाल काले, रंग उजला  चितवन  सुनहरी नीलिमा  की  चमक!  इन नयनों में है। सुंदर अंगुलियां पोर सुंदर सुरीली मेरी नासिका  उठती.. हुई, मोतियों से दंत हैं,  क्या पंक्तियों में सज रहे मेरा रूप तो, सच जादुई है। पर क्यों.. है  यह सब!  इतना सुंदर..! सौंदर्य!  का  वह  चितेरा,  कहां है, और कौन है,  उन्हीं को तो खोजता हूं। उन्हीं.. की, तलाश पर हूँ। मन बनाया  रबर  का,  कन्दुक हो  कोई..  उछलता..,  रुकता नहीं,  किसी ठांव पर  यह बुद्धि मछली!  चपल इतनी एक जगह रुकती नहीं। हाथ ऊपर, पैर नीचे,  उंगलियाँ दस  इनमें...

रत्नगर्भा

मित्रों, सम्पूर्ण सृष्टि नारी अर्थात मातृवर्ग रत्नगर्भा से उत्पन्न हो, अपनी चेतना और देह उस से ही पाती है, सारी सृष्टि का जीवन व्यापार उसी से शुरू होता है। उस रत्नगर्भा पर ये पंक्तियां आपके लिए। चमचम चमकते  रत्न सारे..  फबते ये किस पे.. पड़े रहते मिट्टियों में  मिट्टियों से, कौन..  इनको ढूंढता  इतना विकल  हो..  रत्नगर्भा..!  तूं अगर होती नहीं तो। संसार में हैं चेतनाएं एक से बढ़ एक  कर  करके आतीं  कहां से,  सोचता हूँ,  रत्नगर्भा!  तूं.. अगर होती नहीं तो। अमरावती की.. बेल है तूं.. वरदान है इस सृष्टि का पर इतनी नाजुक! पिघल जाती बात सुन तूं मोम सा.. रोने है लगती,  सिसक देती  दिल पे लेती,  बात मेरी इतने गहरे रत्नगर्भा! हैरान हूँ, तुझे देख कर, क्या.. नहीं तूं? प्यार की बहती नदी पयधार है  तूं.. आधार शिशु का प्राण देती,  इस जहां.. को  स्वांस से निज.., रत्नगर्भा! कृतघ्न है संसार यह जो नहीं सम्मान  से  तुम्हे  देखता सब कुछ तुम्हीं से  प्राप्त कर विपत्ति में तुम्हे छोड़ता! अन्याय ...