आदमी एक बार हो.. लूं..।
सुना.. है, तुम! जा.. रहे हो.. दूर..! अब, इस जहां.. से.., चिकित्सकों..! ने, कह दिया है, गोपनी यह.. बात! तुमसे..। प्रेम.. की, ये.. बाढ़.. क्या? इस ही, लिए... है, आज प्रिय.. हम दानवों से.., मानवों को, क्षमा.. देते, क्षमा.. करते.. अंत में, अब.. इस तरह, छोड़ अपना, दुराग्रह! और अस्मिता, इस तरह तुम जा रहे हो भाव: एक क्रिटिकल समय आता है, अभी के जीवन में इस धरा से विदाई, जब आदमी में अभूतपूर्व परिवर्तन दुनियां को लेकर, मूलभूत रूप से आता है अप्रतिम तुम! कितना कोमल! मन.. तुम्हारा.. विदाई के, इन.. क्षणों में, क्युँ है ये! आज तक क्यों नहीं था, मैं, वही.. था, तुम! वही थे, जग वही था.. यही होता, मित्र पहले लाभ मिलता, हम सभी को। भाव: विडंबना है, असली समझ, आदमी को, मृत्यु के पास पहुंचकर, कुछ पलों पहले ही आती है। मत करो तुम! शोर! मत नारे लगाओ! विदाई..! मेरी.. है, यह.. मिल, सभी.. खुशियां मनाओ! उत्तेजना! ...