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होठ चुप हैं और मैं लेटा हुआ।

कहीं 'कुछ' अति बड़ा होगा,  रहस्यों में छुपा होगा, आंख खुल  जाएगी मेरी देखकर... मान कर यह रस्तों पे दौडा आजतक! पीछे मैं इनके,  आवरण  में  छुपाए  जो घूमते हैं अंक में  मंदिरों और मस्जिदों में  आदमी के ख्वाब को। ऊंचे वहां..  उन  गुंबद-ओ-मीनार पे चढ़ नहीं सकता  जहां मैं.. उम्र में इस, मोड़ पर दिखाते  हैं  बताते हैं,  रखा  हुआ है,  सपनों का सुख  और कोई स्वर्ग! मृत्यु के उस पार का.. सौदा हैं करते..  पल रहे  समाज के ही दान पर ये  आज भी आस्था पर विज्ञान के भी जमाने में देख तो। आखिरी इस द शक तक  खोजा बहुत.. पर नहीं  पाया,  सच में बाहर,  एक भी सच।  अंदर कहीं कुछ  चमकता है,  झलकता  है,  निथरता है, जब  शांत होता  मेरा मन..  और अब  जब थक गया हूँ गिर पड़ा हूं ,  दौड़ता   फुटपाथ पर इस जिंदगी के अपरवश मूर्छित हुआ सा छोड़ दी दुनियां मुझे, तब कहीं  पर्दा हटा।   मुखातिब मैं सत्य से  सच हो गया.. हूँ कुछ नहीं थी.. जिं...

कैसे मिलूं साथी मैं उसको

निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं   समय की बहती नदी में, डालता हूँ जाल  मन.. का,  ध्यान  के उस भंवर में, समर्पण से,  भाव से,  साध लेकर, बैठता हूं,  सच कह रहा हूँ,  आस लेकर   नित नई, आज वह  मछली मिले..। डूब जाता हूँ मैं गहरे  साथ साथी  उसी  के, तली में तब तक हूं रहता ढूंढता उसे.. दर बदर,  शाम तक  अंधेरा  होने..  से  पहले निरखता हूं ध्यान में छाया कहीं  उस  साक्षी की  एक तो मुझको मिले। पानी में दोनों यहीं हैं, संसार में पानी है उसमें और मुझमें एक ही, पर फर्क है विक्षुब्ध मैं  वह शांत है.. कैसे मिलूं साथी मैं उसको अंकुश धरूं, कैसे मैं मन पे? भागता है, मछलियों सा फुदकता है, गेंद सा लौट आता, स्टिंग जैसा.. डांट खाकर बैठता है बिल्लियों सा ताक में,  फिर भी लगा है  मुझमें अरे यह एक  कोने.. क्या करूं, दुनियां है ये.. रंगीन कितनी, लुभानी, और मन मिट्टी है रे!  निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं  समय की बहती नदी में। जय प्रकाश मिश्र जी मित्र। यह कविता आपकी अंतर्यात्रा ...

संस्पर्श तो कर चरन उसके।

मित्रों,  स्फटिक सा  सामने,  पारदर्शी हमीं में,  जीवन है अपना दिखता नहीं पर  आंख से इसे क्या कहूं!  घटता सभी कुछ विश्व में इसलिए आ घटाता हूँ  'विश्व' को,  इस 'विश्व' से अब  क्या.. बचेगा.? पूछता हूँ बताओ न!  क्या शून्य होगा?  हर एक क्षण घटता यही  इस विश्व में पूरा का पूरा पुराना,  मिटता यहीं है  विश्व सारा पर नवल दिखता,  उससे भी  ज्यादा!  बहती नदी के वारि सा धार से, ले.. तली तक  बहता  हुआ जल जो  बह गया, वह बह गया बीता हुआ, फिर  न  मिलेगा  ध्यान दें  न!  वैसे की वैसे, ही पड़ी, रहती नदी बहती हुई,  हमें दीखती..  है सामने  यह  दृष्टि भ्रम है,  घट गई..  पूरी की पूरी,  बह गई..  अति  सूक्ष्म क्षण में  इस विश्व सी.. तू.. बह  रहा  है,  ध्यान से  कभी देख ना। विचारों की बाढ़ में  और  वास्तविक भी  स्थिर  नहीं कुछ,  स्थित नहीं  कुछ,  ऊतर  गहरे,  परिवर्तनों में देख ...

हे जलद! पुनि पुनि तूं आना।

मित्रों जल जीवन है, और जलद जल अक्षय दाता उन्हीं पर यह लाइने। हे जलद, निर्घोष! तुम  हवाओं के विमानों पर  उड़ रहे  रातों  में  इन..  कहां  जा रहे हो? छूते हुए, ऊंचे वहां..  मंदिरों के शिखर तुम..। आज यूं निर्घोष तुम.. स्पर्श देते, तृप्त करते,  भूमि मेरी हृदय मेरा, तन मेरा  यह मन मेरा  यह वसन मेरा भिगोते हो,  स्मित हंसी की नमी से  इन फुहारों से इस.. इस तरह विह्वल हूँ मैं तुम्हे देख कर लगते मुझे अपने हो तुम.. प्रिय जलद! आज क्यों निर्घोष तुम। कितने हैं रथ कैसे गिनूं.. स्तरों में, कितने तुम क्षितिज के इस पार से  उस पार तक,  एक से फैले हुए एकसार तुम तीन दिन से सतत ऐसे  आ रहे मेरी तरफ  बरसते पूरब दिशा से,  पश्चिम कहां प्रिय जा रहे तुम। टपकती ये बूँद टुप.. टुप..  और शीतल  लहरियां फब्तियाँ कसती हुई,  ये साथ तेरे  मचलती प्रिय बदलियां! आनंद घन तुम..  सत्य ही आनंद घन तुम। उड़ रहा  यह महासागर,  इतनी बड़ी जलराशि का इतने.. नीचे,  इस तरह से लहरता और मैं अंदर हूँ इसके,...

बाजार मैं, बाजार दुनियां।

बाज़ार दुनियां  और मैं..  बाज़ार खुद एक, खुला हूँ,  हर वक़्त अपने  विचारों.. की  दुकानों  में, तौलता हूँ,    सत्य सबका  आज के इस जमाने में, आप को, हर एक को आप खुद को,  अंदर कहीं  बुद्धि की निज, तराजू में। कुछ बोलता हूँ  बाद में, पहले तुम्हें मैं  तौलता हूँ कितनी रखूँ  और चीनी अपने स्वर में। हिसाब से, तौल कर, उसे मिलाता हूँ पेश करता हूँ तुम्हें  अन्यथा  बेरुखी से  टाल  देता हूँ  तुम्हें! तुम जानते हो,  सभी कुछ  अंदर का  मेरे दुकान  आखिर! बाज़ार की इस  तुम भी तो हो। चढ़तीं.. हुई साँसें ये मेरी,  स्वार्थ संग उतरतीं नुकसान.. में, टंग.. हैं जाती उसी  क्षण  संदेश पा, पड़ती हुई  घर रेड में। क्या क्या छुपाए घूमता मैं.. सामान इस बाजार का राह चलते  सौदा  करता आज मैं हूँ प्रेम का। बेंच डाला विश्वास अपना कुल भी अपना,  तन, रंग,  सौष्ठव, जाति अपनी और सच कहूं तो आत्मा। बालक हूँ मैं.. तिस पर अभी आज भी इस..  जिंदगी की रेत में,  मोह को...

मैं मुस्कुराहट! तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ:

मित्रों पढ़ें और आनंद लें।  खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब शाम को बैठा अलग  हो  जिंदगी की  दौड़  से, और पूछ बैठा,  उसी  से क्या चाहती है,  अब  बता तूं! आखिर मेरी इस  जान से..? वह चुप रही, कुछ भी न बोली देर तक, एकटक!  मुझे  देखती चटकती  कोई  कली हो, चटक  कर  मुस्कुरा कर  बोल  दी, मैं मुस्कुराहट!  तेरी हूं,  तेरी  खुशी हूँ। हर शख्श में, मैं गूंजती हूँ, सोच न!  मैं न रहूं! तो क्या हो तुम!  क्यूं परेशां है,  क्या थक गया है?   मुझसे तूं? तो बोल न!  आज़ाद कर दूं  अभी इस  क्षण   क्या तुझे..  जंजाल से..? आघात से,  इन  नश्तरों से कष्ट के..! मैं हिल गया, अरे नहीं री.. ऐसा नहीं, अभी काम है,  सामान है, घर मेरा है मेरी प्रेयसी है कुछ पुराना है  ठिकाने  उसे लगाना है,  बच्चे हैं मेरे.. छोटे छोटे अच्छी है तूं.. अच्छी है तूं! फिर खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब  शा...