शून्य के भीतर छुपा क्या?
आ.. प्रिये..! मिल देखते हैं शून्य के भीतर छुपा, वह कौन है, जो दूर जग.. से! भूति.. से, एषणा.. से, कर्म से.. सुख.. दुख.. ही क्यों अनुभूतियों से। सोच तो एक बार उसको! इतने दिनों से अकेला प्रिय मौन है, क्या यही वह शून्य है। शून्य है जो.. कुछ नहीं, वह परिमाण में, स्थान में! आकार.. में, और रूप में ही नहीं यह आस्वाद से भी हीन है। दूर है इन इंद्रियों... की चाह से! विरस है, वह रसों से! सौंदर्य से.. फिर भी प्रिये, य ह... आसन जमाए क्यों जमा है शून्य सारी सृष्टि में, इतने दिनों से। आ प्रिये! मिल देखते हैं शून्य के भीतर छुपा, वह कौन है। क्या यही वह मौन है। कौन है यह! बोलता ही है नहीं, डोलता हो, पैर से, पैर इसके हैं नहीं गोल है यह, हर तरफ से एक सा, शून्य की यह शक्ति है क्या इसलिए। कुछ नहीं, पर काम का है, शून्य है, पर पूर्णता है, शांति है यह परम मित्रों, शून्य बिन सब शून्य है। जय प्रकाश मिश्र जय ...