बाज़ार
बाज़ार क्या.. है? महासागर! कितना बड़ा! आप्शन, स्टॉक्स का लहरता यह उर्मियां ले नित दरों का..। लहरियां उत्ताल होतीं सर्प सी फन काढ़तीं और आगे, और आगे दौड़तीं ये तरंगों सी.. आगे बढ़ती.. हर एक क्षण में। विलय होतीं दूसरे सूचना संजाल की सुन आहटों को फेन फेनिल सी ये होतीं समा जातीं, उदर मे। चुप! घड़ी भर में उछलतीं मन भावना को शांत करतीं, दुखी, खुश हर साल करतीं कंदीलों के रंग से.. बाजार क्या है? कभी बैठ जातीं जमीं पर बूढ़े हुए, किसी बैल सी सालों न उठतीं निफ्टी सरीखीं, लौट आतीं और पीछे, झूमती दो साल से बोल न! बाजार क्या है? उछलती उम्मीद की मछली हो कोई! खुशियों भरी.. छटकती नाचती प्रिय एक दिन इन्वेस्ट पर निज नाज़ करती ख़ामोश! चुप हो तड़पती दिन दूसरे पश्चाताप करती, इंट्री पे; अपनी.. बाजार क्या है? अहा यह, वह...