Posts

आदमी अब वस्तु है।

मित्रों जीवन की सच्चाई का चित्र बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ उसी का एक पेज यह भी है। किस शांति से 'वह' झेलती है  गरीबी लाडो मेरी,  अभी उम्र कितनी, बहू थी,  लाजों भरी नवेली। गुलाबी  वह चूनरी.!  फेरे लिए थी सात  प्रिय संग अब भी है रखी  संदूक  में वैसे की वैसी पहन  जिसको  कल्पना में  उड़ चली थी.. ताजी हरी बिन सलवटों के सिसकती है  भाग्य पर, संसार  पर आज  वह  इस  शहर में। दो माह के ही बीतते  खोजती है,  काम धंधा  जुटाती है  रसद  अपनी  किस भी तरह,  काम कर, हर  शाम.. की।  देखा  है तुमने.. शहर की गलियों को इन बेबाक हैं ये  किस  तरह से  नीर- सी.. चाहती हैं  गार  लें  निचोड़ लें  श्रम महत्तम,  काम सारे  उससे ले लें  और वेतन न्यूनतम.. देना पड़े।  यही तो..  हम  चाहते हैं  श्रेष्ठ जन! बुद्धि का उपयोग सारा  इसी में है, तभी तो चालाक हम! अन्यथा बोल न  क्या नहीं हैं  मूर्ख  हम..। समस्या...

काशी है क्या?

एक दिन  डगमग हुई,  उल्लास भर उद्यत हुई, वह..,   नाचने को, डमडम-डमाते डमरूओं  की थाप पर, नाथ,  भोले.. नाथ  के। कौन है?   कुछ बता तो बोलती, क्यों है नहीं, मुस्कुराती खड़ी है,  इतने दिनों से श्रीनाथ जी की नाच को  इस तरह  तूं देखकर बस नाचते।  काशी है क्या! जो डोलती है,  पिनाकी के, घुंघरुओं संग,  डमरूओं की,  डमडमाती,  थाप पर.. उन आदि शिव के,  हुलसती है नित्य ही तुम भोर में। लहरियां, गंगा की जिसको जगाती हैं क्या वही काशी है तूं? लोग कहते,  शूल  पर अटकी पड़ी तूं आदि से,  उन आदिशिव के,   शूल  तीनों,  बे-असर  क्या इसलिए तेरे लिए। देखता हूं, सत्व, तम, रज,  राज अपना  खोलते हैं!  सामने तेरे!  खड़े हैं    और तूं भागीरथी की गोद में  मस्त खुद में,  साथ  पा  अन्नपूर्णा संग आदिशिव का। बोल तो, कौन है  तूं.. काशी है क्या.. स्पर्श  कर… जिसको है, गंगा बह रही आदि से ले, आज तक  पावनमयी,   बह रही है आदि से सं...

प्रश्न उसका यही था।

देखा है 'उसको' घूमते  शहर में..  इस  अल-सुबह,  भागती..    सड़कें  ये तेरी  वीरान! थीं जब.. प्यास गहरी, प्रश्न पूरा  छलकता.. उन आंखों में था.. चेहरे में नैराश्य मिश्रित आक्रोश..! अन्दर पल रहा था।  कुछ झांकता  आंखों से था  उन  बवंडर! सा  आप में से उठ रहा  आप में ही.. सिमटता बेकारी के  मारे हुए  उस  युवा.. से,  वह  'आदमी'  बनने को था। विचारों की बाढ़.. भीतर  बह रही हो झंझावात कोई घहर करता दूर से संकेत  कोई  दे  रहा हो.. सूनी आंखे, और ऐंठन साथ में ले सूखती उन पसलियों में अकेले  मृगराज हो.. शहर के इस छद्मकारी  व्यवस्था से मुझको लगा वह  मिल रहा था..। बेकार से  उस  युवा.. से,  'आदमी' वह बन रहा था। मुझको लगा वह थक चुका है, अनिर्णय की नाव पर बैठा हुआ, सोचता पग बढ़ाता  प्रश्न अपने तौलता.. मूक ही, उन महल जैसी मुंह चिढ़ाती बिल्डिगों से, लड़ रहा है। स्वप्न था संसार उसका.. तितलियों के रंग का रंग रंगीला..! अभी कल तक अब  फेल हो हो हर जगह, बेक...

दिल चाहता है खूब भीगूं..।

उतने ऊपर सांवरी  उन बदलियों  की  कोख से,  जन्म  ले, ये  नन्ही बूंदे! प्यारी-प्यारी,  ठंडी- ठंडी उतरती हैं,  यहां  नीचे,  धरती पे अपने रसवती.. देख कैसे,   स्नेह भर रे..। चूमती मुख पत्तियों का फूल का,  एक  एक कर बारी..  से उनकी ,  जमीं ऊपर शाख पर  मच रही  चुलबुली,  आवाज  यह  फुसफुसाती.. सुरसुराती  धीमी धीमी,  मधुर  इतनी बज रही मंजीर हो  दूर.. प्रिय! कहीं रस..  झीनी झीनी, धीमी धीमी।  मुझको लगा, सब  प्रकृति की  मासूम  सी  ये.. बच्चियों हैं! कुलुल करतीं, कलिल करतीं एक संग कर रही  कोई  कार्यक्रम!  उन्ह बच्चियों का आपसी चुंबन है ये। कोई किलक उठती  अचानक, कोई छलक जारी  स्नेह भर कोई टपक जाती  प्रेम से कोई छटक जाती  फुदक कर, खेलती  हैं,  खेल ये,  रे प्रिए, देख न  झरती हुई,  बरसात में,  इस अमावस की रात में  आ निकल बाहर.. आज तूं भी प्यार कर और मिल.. इन्हें।   चाहता  हूँ,...

आप को देखा, लगा.. कोई छाँव..! है

आप को देखा लगा  कोई छाँव है शीतल.. मधुर.. बैठ   लूं, तपती  हुई,  संसार की.. इस धूप में संग भागती,  रेल सी  इस जिंदगी में,  कुछ ही पलों की। यह सोचता  मैं रुक गया, तुम्हे देखते ही खो गया मैं भँवर में, इन पलों में बिन मुस्कुराते,  मुस्कुराते..  होठ  सुष्ठुर..!  पाटल-कली हों,  खिल रही रस  पंखुरी हों, खोलतीं..  खिलती हुई।   कोई  कमलिनी हो  महकती.. या  चांदनी!  हो.. दोपहर में मिल गई..  शीतली.. मुझे भ्रम हुआ। रूप.. मधु  औदार्य.. झरता.. सौंदर्य हो, तुम  निर-प्रकृति का इतने निकट!  पाकर तुझे  मैं चकित हूँ। टपकती कोई बूंद हो तुम  अहा शीतल  आकाश  की अचानक  नीचे.. गिरी,  तप रही, मरु रेनु पर मैं, क्या कहूं! मैं नहीं था मगन था? पर अच्छा.. लगा। यह क्यों हुआ? यही तो  है  समझना यह..  रूप क्या है?  सुख क्यों  छुपा  है इतना  सघन  इस रूप में,  रंग का यह  खेल क्या है?  इसी को तो जानना है। मरीचिका का मो...