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एक लम्बा करेक्शन इस व्यवस्था को चाहिए..!

पानी हुआ अब, सर.. से ऊपर  देख न, किशोर कैसे? मरे!  जल.. कर... जी  नहीं..,  मारे.. गए..हैं,  सभी ये.. मासूम प्रियतर..! उम्र थी,  अभी तो इक्कीस अंदर..  फूल थे, खिलते हुए... वे.., बगीचे के... आस में... बेहतर करेंगे...,  यहां.. पढ़के, आगे बढ़ेंगे..  पर स्वाहा हुआ सब.. किसकी वजह से...? पानी हुआ अब, सर.. से ऊपर  देख न, वे.. मरे! जल कर... जी नहीं...,  मारे  गए..हैं घेर कर मासूम प्रियतर..! कब तक चलेगा.. राज यह.. यह व्यवस्था..!  चोर हैं..! सब .., यहां पर जब...। सड़ चुकी है  व्यवस्था..यह घूस खाकर.. भीड़.. है,  भीड़ में.. एक तंत्र है, हांफता.. है,  साधन नहीं है, धन नहीं है, और न है, आत्म बल! पानी हुआ अब, सर.. से ऊपर  देख न,  वे.. मरे! जल कर... जी नहीं...  मारे..  गए.,  मासूम प्रियतर..! आदमी..! इस देश का,  आदमी..! अब  नहीं  है, हैवान! है, धन महालोलुप!  लालची, मक्कार है, बेइमान है टूटती उन.. सरहदों की  हदों तक..!  हाय! पैसा,  हाय पैसा, कर.. रहा,  हर आदमी.., ...

यह उथल कैसी!

मित्रों, पूरा जीवन आप कितनी भी सफलता से जीएं, फिर भी, कभी कभी जीवन दौड़ में अचानक कुछ छूटता सा लगता है, पिछड़ रहा हूं! मन छनछना जाता है, एक उतावलापन भागता सा घेर लेता है। पुनश्च मन को समझाना पड़ता है कि नहीं यह संसार ऐसे ही है।  इसी पर ये लाइने आपको समर्पित करता हूँ। यह, उथल..! कैसी..? छटपटह टी!  अंक..  भरती,  पृथक..  री!  विह्वली..!  उतावली..!  अंतर में मेरे..,  इस उम्र तक उठ रहीं। उतावली..! करती हमें,  हम मानवों के  मनों..  को,  पिछड़ने की,  अन्य से, परिवेश से, चहुंओर.. अपने.. ऐसे है देती.. एक... छ्मकन..! तप्त! कोई.. आयरन!  हो छू गया... विश्रांत मन..! बौना है करती..  यह, उथल..! कैसी..? छोड़... देती,  बस,  कुछ क्षणों.. में, सोचते ही, स्वस्थ..ता से... संसार की गति,  देख..  इसकी, प्रिय.. अधोगती..! यह, उथल! कैसी..? अचानक..! कोई शोर सुन..!  देखकर..  चमचम! चमाचम!  यार की, किसी कार को, मन ललच जाता,  सोचकर  साथ थे हम.. कुछ दिन ही पहले.. एक से.. मैं, रह.. गया, यह क्यों ...

स्वरूपे.. अहम् अद्वये..!

मित्रों, अच्छी लाइने हैं, आपको भी अच्छी लगें चाहता हूं। जीवन और जीवन में सत्य पर ये शब्द! आपको कुछ दें तो मुझे भी अच्छा लगेगा। एक भ्रांति! लेकर..  आज.. तक!  जीया...;  ये..  जीवन...!  "जग! मेरा... है,  और प्रियतम..!  अहा.. सुंदर!"   सोचता और भोगता.. पा रहा हूँ... मृत्यु के, मैं.., द्वार! आया..। या कोई! है, रख गया...  कौन था? वह!  खोजता..  हूँ.. कोई! नहीं.. मुझे नजर आया।  देखता हूँ...!  मुस्कुराता..!  सच! खड़ा.. है, सिद्ध साधक!  सृष्टि से  संहार तक, साध्य! को ही साधता,  रह गया... साधनों.  में, गुम..!  हुआ..  पर.. सत्य की छाया न पाया! जी! जी... वही..  सच..!  खड़ा... है, मेरे.. सामने समय.. है,  सब... रख है देता,  अवस्था को  भांप कर..! बिन कहे, और बिना मांगे.. अर्थ! इस संसार का। संधान "सच"  का "लक्ष्य"  था जीवन का मेरे.. खोजता..! इसे रह गया.. मैं जिंदगी में..। पर मिला था,  मुझे...!  कभी.. ये..  बस कुछ क्षणों  में.. फूल की अद्भुत! खिली...

स्वरूपस्य! क्व? रूपिता..।

मित्रों आपके लिए सुंदर लाइने प्रेषित हैं, आप पढ़ें आनंद जरूर आएगा। कितनी विधाएं! वस्तुएं,  कर्त्तव्य! कितने? यहां..  इस  संसार में,  एक.. पीछे!  कई.. आगे...! जंजीर में,  जुड़ते.. हुए,  देखे हैं मैने। और फिर!  जितना.. बढ़ा मैं...  और.. आगे...  सबल! सब.. होते गए..। कौन छोड़ूं...,? कौन पकडूं..? बोल न..!  हैं...  पंथ! कितने?  धर्म..! कितने..? रास्ते..!  और.. रास्ते...!  बस.. रास्ते...! ही रास्ते... प्याज की परतें हों  ऊपर!  और नीचे....! महाभ्रम..!  संसार.. यह...!  और.. प्यारे! ज्ञान.. इसके। पुस्तकें..  हैं, ग्रंथ... कितने....? भयावह!  सच.. स्थिति है...  आज.. के, इन आदमी के... जीवनों में। इसलिए यह छोड़ता.. है, आज से  अब..  हर जटिलता..! धर्म की,  कटु.. बाध्यता! तौलता! है, जीवनों में सत्य! को.. आदि.. से प्रचलित! धर्मो... में..। आस्था,  अंधी! नहीं अब..! दान की गति..! सोचता है..  भाव! कितना..? किसको.. देना..? विज्ञान! पर यह.. जांचता! है.. बदलता है, जग यहां  अब...

बात.. मित्रों पुरानी है,

मित्रों, सभी के जीवन में कभी न कभी  मधुर क्षण आते ही हैं। कभी तो यह मात्र छद्म आकर्षण होता है और कभी सच्चा प्रेम भी, इसे कैसे पहचाने इसी पर आज की रचना है। लंबी है पर पढ़ेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे। जटिल है पर सरल भी है रस सरस है। कुछ लोगों के काम की भी हो ऐसी मेरी कामना है। बात..  मित्रों  पुरानी है,  एक बाड़* थी, तटबंध.. था, बचपन को घेरे, लेकिन  विकल.. था,  अंदर... कहीं, दरार थी,  तैयार.. थी अब.., टूट... जाऊं,  छोड़,  बचपन,  पार  जाऊं...!  उम्र.. का, विहान था। मन,  मधुर...!  कुछ.. खोजता, अत्र-तत्त्रा* झांकता..! अंदर कहीं, से चुलबुला..! बाहर से.., बिल्कुल सौम्य! था। वय-संधि*, मेरे.. सामने थी, बढ़ा दूं पग, पार  जाऊं!   चाहती.... थी।  ललक..  लेती, लहर!   मुझ में, उठ... रही थी, आकृति... इस, प्रकृति.. की,  बदली हुई, सलोनी, अब  लग रही थी। मुझको... लगा,  मुझमें कहीं  कुछ.. रिक्ति  है, वह पूर्ण  होना, मांग ती है । आज कुछ... बदलाव था,  मन.... मेरा ही,  क्य...

पटाक्षेप:

कृपा हो आचार्य श्री! की, अनुग्रह! हो, देवता का, पिता श्री! की  प्रसन्नता.. थोड़ी और ले.. लो  मां चरन रज!  इन में, मिला.. लो. सब.., तुम्हे.. मिल जाएगा। बिना मांगे मां! ही देगी.. वह जानती है, भेद  तेरा.... प्रसन्न जननी...!  क्या.. नहीं, देगी.. तुम्हे ? सोच से, भी  अति  परे...  वरदान देगी , सोच न!  तूं... फूल है,  उस डाल का। पटाक्षेप:  बदलते! इस जमाने.. में,  एक थी, मेरी..  चिरैया!   पाल.. रखा था,  उसे, अरमान.. से..।   रोज.. बुनता,  ख्वाब  मैं.. था.. अहा सुंदर!  सपनों में..  अपने रंग भरता, लालसा का,  छुटपने से। तंतु..! ले.. ले.. प्यार.. का  छूता.. था,  उसको, दूर.. से,  उसे.. देखता था, प्यार ले..। नजर की छाया में रखा  सदा उसको,  भूल जाता,  खुद को था, मैं..  साथ.. उसके। कौन सा वह एंगिल था, देखा नहीं था, जहां..  से.. हर कमी,  मैं.., पूरता था  सदा उसकी..  दिल लगा के,  बिना सोचे!  और उसकी मुस्कुराहट!   मंत्र..! थ...

आदमी एक बार हो.. लूं..।

सुना.. है,  तुम! जा.. रहे हो.. दूर..!  अब, इस जहां.. से.., चिकित्सकों..!  ने,  कह दिया है,  गोपनी यह.. बात! तुमसे..। प्रेम.. की,  ये.. बाढ़..  क्या?   इस ही, लिए...  है,  आज प्रिय.. हम दानवों से..,  मानवों को,  क्षमा.. देते, क्षमा.. करते..  अंत में,  अब.. इस तरह,   छोड़ अपना, दुराग्रह!  और  अस्मिता, इस तरह तुम जा रहे हो  भाव: एक क्रिटिकल समय आता है, अभी के जीवन में इस धरा से विदाई, जब आदमी में अभूतपूर्व परिवर्तन दुनियां को लेकर, मूलभूत रूप से आता है  अप्रतिम तुम!  कितना कोमल! मन.. तुम्हारा..  विदाई  के, इन.. क्षणों में,  क्युँ है ये!  आज तक क्यों नहीं था, मैं, वही.. था, तुम! वही थे, जग वही था.. यही होता, मित्र पहले लाभ मिलता, हम सभी को। भाव: विडंबना है, असली समझ, आदमी को, मृत्यु के पास पहुंचकर, कुछ पलों पहले ही आती है। मत करो तुम!   शोर!   मत नारे लगाओ!  विदाई..!  मेरी..  है, यह.. मिल, सभी.. खुशियां मनाओ! उत्तेजना!  ...