संस्पर्श तो कर चरन उसके।
मित्रों, स्फटिक सा सामने, पारदर्शी हमीं में, जीवन है अपना दिखता नहीं पर आंख से इसे क्या कहूं! घटता सभी कुछ विश्व में इसलिए आ घटाता हूँ 'विश्व' को, इस 'विश्व' से अब क्या.. बचेगा.? पूछता हूँ बताओ न! क्या शून्य होगा? हर एक क्षण घटता यही इस विश्व में पूरा का पूरा पुराना, मिटता यहीं है विश्व सारा पर नवल दिखता, उससे भी ज्यादा! बहती नदी के वारि सा धार से, ले.. तली तक बहता हुआ जल जो बह गया, वह बह गया बीता हुआ, फिर न मिलेगा ध्यान दें न! वैसे की वैसे, ही पड़ी, रहती नदी बहती हुई, हमें दीखती.. है सामने यह दृष्टि भ्रम है, घट गई.. पूरी की पूरी, बह गई.. अति सूक्ष्म क्षण में इस विश्व सी.. तू.. बह रहा है, ध्यान से कभी देख ना। विचारों की बाढ़ में और वास्तविक भी स्थिर नहीं कुछ, स्थित नहीं कुछ, ऊतर गहरे, परिवर्तनों में देख ...