दुनियां वहीं पर, खड़ी है!
मित्रों, संसार! मरीचिका का नाच! हाथ आया, अब आ गया! सदा ही ऐसा लगा, पर दूर ही रहा। इसी पर आपके आनंदार्थ आज की लाइने। दूर.., दिखता नदी जल था, तृप्ति उस पर, तैरती थी, अहा! कैसी, सजल आँखें*, प्रिय, मेरी... तब... देख! उसको, ललचती थीं। पर, तप्त! नीचे, जल! रही, प्रिय.. बालुका! थी, भस्म... करती, दुनियां प्रिए, देखा है मैने... सत्य ही, यह..., बिल्कुल, यही... थी। मार्ग ही वह, अलग... था, मार्ग.. पर, जिस शांति.. थी संयम का, प्रिय! वह रास्ता था, कुईं* जल! जिस पर रखा था। सच..! पिया भी है, इसे.. मैने! यह नदी जल से, साफ सुथरा मधुर! शीतल! और मीठा.... अंत... में, प्रिय..! सच! अधिक था। जिंदगी की राह! यह कैसी, गजब! थी जितना गया, मैं दौड़ता, इस जिंदगी के सफर में, जिंदगी भर.. मरीचिका थी, स्वप्न थी, क्षितिज... थी, दूर थी, हाथ आई, ही नहीं, एक सुनहरी, रंगीन! हर क्षण रंग बदलती, सच कहूं तो बबल थी। सुख, की.. नदी, मुझे, लग रही...