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खुशी तो, एक 'फूल' है खिलता हुआ।

मित्रों, आज की इस आपाधापी और विकल दुनियां में खुश होना एक उपलब्धि ही कही जाएगीं। खुशी क्या है यह भी जानना चाहिए, कैसे.. किनको.. मिलती है, आज की लाइने इसी पर, आप को खुशियां मिलें, पढ़ कर ही नहीं, जीवन में.. वास्तव में.. यही कामना है। मत, पूछ!  मुझसे,  यह..,  खुशी...  क्या... है?  खुशी तो,  एक 'फूल' है खिलता..है जब, यह.. बावला मन! दूर..., हो जाता है,  सच,  छोड़, सारे..  अरी.. बंधन.. सांसारिक!  भूल.. कर,  बिसरा.. है, देता.. पहचान! अपनी,  ध्यान अपना!  बस..,  उसी.. क्षण..! हां,  खुशी.. है,  बस उसी.. क्षण जब भूल कर, संसार को संसार..  से,  इस.. फैल.. जाता मुक्त हो, मकरंद बन!  अपने ही अंदर, महकता.. है हंसता.. हुआ, हिल.. दुलकता है..। दुनियां! कोई वह, और.. ही... है जो.., खुशी.. है, तब स्वयं में ही, बिहरता  वह..  मात्र, उस.. क्षण।   हो... प्रफुल्लित!  कर, प्रफुल्लित,  मुस्कुराता..,  संपूर्ण! यह वातावरण!  मत, पूछ! मुझसे, खुशी! क्या है?  जब.. झूम! उठता,  'उर.' ह...

मूल्य बिन, जीवन नहीं है।

मित्रों जीवन की मिठास प्राप्तियों में नहीं  बल्कि जीवन में जीवन मूल्यों के साथ जीने में है। इसमें एक संतुष्टि मिलती है अन्यथा सब पाकर भीतर एक खालीपन होता है। इसी पर यह लाइनें आप आनंदित हों यही चाहना है। संसार..!   है..,  बाहर..!  मेरे,  घेरे.. हुए,  मुझको..  यहां!  धन..! संपदा..,  यह..  भू...! धरा,  स्वर्ण, मणि,  मुक्ता..  न जाने  और कितने..  रूप ले..  किस तरह, फैला हुआ,  बिखरा.. पड़ा। जरूरतें.. हैं, जिंदगी.. की  सोचता.. हूं!   इन्हीं.. से,  पूरी.. तो  होंगीं...! अंत में,  जीवन के इस, बीच में,  हर, समय ही... इन्हीं का आश्रय वे लेंगीं!  कलकुलेशन,  मानसिक..  तो.. यही है, सभी की है, मेरे जैसी देखती .. हैं ,  अभी तो निश्चिंत हूँ!  सुख इन्हीं में है! क्या करूं!  कैसे बटोरूं!  यह... चाह है!  जल्दी करूं!  पर, हिचक है,  इसके लिए भी.. आत्मा, हो  किसी की.. कष्ट न दूं..। स्वयं की,  या ..और की,  यह ध्यान रखूं!...

संसार यह, बिखरा हुआ, एक ढेर है।

मित्रों, संसार बाहर कितना बड़ा दिखता हो लेकिन इसका आकार हम में से होकर ही जाता है अर्थात यह सूक्ष्मरूप से हमारी समझ, जानकारी और जरूरत तक सीमित रहा है। इसी पर ये लाइनें आप पढ़ आनंद लें। वह! काम्य*.. है, मेरा.. अगर... चाहना*.. है, हृदय.. की,  प्यास, कोई.. अधूरी!  राज* अपना  पुराना..! तो.., ही दिखेगा..,  शेष, सारा.. सामने  बिखरा.. हुआ, एक ढेर! है, राख..!  उसमें, रज*! कहां?  यही.., जग है। और  हम,  भी...  यहीं... ही;  तिरते..* हुए,  बहते हुए, तृण कणों से, समय सरिता में  प्रिये!   इस काल  नद  में सोचते हैं,  तैरता*.. हूँ,  परिश्रम.... से। समिधा*..  इकठ्ठी, कर रहा.. हूँ,  जीवनों.. की,  जी.. रहा हूँ,  तप*.. रहा हूं!  रातदिन,  मैं... ही अकेला   मर*.. रहा हूँ! जीवन  यही  है। लेकिन, इसी में हृदय भी है यह, अलग है,  करुणा!  है, इसमें, दया! है, यह प्रेम भी है। यह.., औषधि*.. है,  टूटे*.. हुए, हर आदमी.. की.. जिंदगी में जिंदगी की मार से हां! प्रिये.....

और क्या है, जिंदगी! जिसको लिए, फिरते सभी!

मित्रों, जीवन एक प्यास च तृष्णा जो पूर्ण होना तो चाहता है, पर प्रकृति के आंगन में उसके सौंदर्य और छलना में बार बार अतृप्त ही लौट जाता है। इसी पर यह पंक्तियां हैं आप पढ़ें और संतुष्टि पाएं। यह...  प्रकृति!  छलना... मयी!  है... खींचती..!  मुझे...  आप.. में,  एक रस कर, साथ में निज संतति की चाह में, जीव में, मुझे बदलती है, देह रूपी पाश में  मुझे  बांध कर,  अंत में फिर छोड़ती है। साथ में, मिल कर, रहेगा कुछ, नया हितकर,  करेगा.. खिला.. देगा,  धरा मेरी,  आनंद देगा..  आनंद.. लेगा.  और क्या है, जिंदगी! जिसको लिए, फिरते सभी!  प्रकृति है,  छलना मयी!  रसनामयी, रसमयी!   खींचती,  पर..!  प्यास  हैं,  हम..!  इंद्रियों के, दास हैं हम,   सत्य है यह, मानते.. हम!  और, तृष्णा.. को लिए  "मैं.."  उम्र भर... इन  इंद्रियों..  की,  भरमता, हूं। रस... खोजता हूँ  घूमता हूँ,  तरसता..हूँ...!  उतर आता,  यहां नीचे,  हाथ में, पाश में,  पंख...

जब देखता हूं शहर को इस, सिर पीटता हूँ,

मित्रों, मानव की अंधी चमकीली प्रगति कैसे उसके लिए काल का ग्रास बन गई ही और हमारे पर्यावरण का नाश हो चुका है इसी पर ये पंक्तियां आपको समर्पित हैं, आप पढ़ें और कुछ बदलाव हो यह कामना है। ऊंचे उठे हम! सत्य है यह!  देखता... हूं, बैठकर!  पैंतालि..सहवें  फ्लोर...  की.. ! इस.. ऊंचाई पर। आलीशान! अंदर...  सोच... से भी  वृहत्तर.. ! यह... प्रांगण!  बिना जाने, बिना पूछे!  नमस्ते!  करता.. हुआ.. प्रेम से, दरवांन  है,   इंट्रेंस...  पर..। कितना,  सहज!  कितना, मधुर, कितना प्रियल!  माहौल है,  पैसे के बल पर...। अहा!  अद्भुत है, महल!  जगमगाता... झिलमिलाती...,    रोशनी...  से,  नहाता...। हजार! कलियों से बना, खिलता हुआ!   बहुरंग पुष्पों से  गुँथा, स्वचित्र-चित्रण*  का ये,  कोना...। जान.. है, प्रेस्टीज.. है, खड़े हो, यहां साथ में फोटो, खिं चाना। कालीन, गुद! गुद!   गुदगुदाते... नरम कितने! लरज़ जातें! स्वच्छ इतने,  लांड्री धुले हों इंग्लैंड के... ! धंसते हुए...

चल बंधनों को खोलते हैं।

मित्रों, दुख, व्यथा, संताप, क्लेश, चिंता, भय सभी मानसिक ही हैं और इन सबकी  जड़  विचारों में दबी होती है। यद्यपि मन बना ही है खुश रहने के लिए, फिर भी अचानक कोई विचार आ जाता है और हम अच्छे माहौल में भी होते हुए उससे दूर! इसी पर आज की लाइने, आप पढ़ आनंद लें। मन की, सहज.. गति, शांति.. निर्मल,  और सुंदर..!  स्वभावतः यह...  अनवरत...,  मानस की अपनी,  झील... में  स्मृति.. के, पूल में  गोता लगाता,  तैरता है। फिर भी अचानक स्मृति...  कभी  उभरती, कभी डूबती धूमिल  सी  होती  बस एक दो  स्पष्ट होते विचारों की  तरंगों.... पर!  चांदनी... सी,  उछलती। कलकल, अनामय,  श्वेत निर्झर! प्रीति भर.. भर.. दौड़ती। और "मैं"  एक... व्यग्र.. हूँ! उद्विग्न.. हूँ!  दुनियां में इस, जल रहा,  बिन.. अग्नि ही!  इन विचारों की अग्नि में। देख.. कैसे?  अंतरों... में,  खुद ही अपने!  उन, एक क्षण के,  अनुभवों से,  स्मृति के रुकते.... नहीं यह !  अरे... रे!  प्रारंभ में कितने प्रियल!...

एक भांवर, डालता हूं, भंवर में..

मित्रों, जीवन आश्वासन का खेल! सुनहरे कल की दौड़! एक मृगमरीचिका का पीछा है। आज को छोड़ कल के लिए प्रयत्न यही है जीवन और अंत में क्या? इसी पर यह लाइनें आप खुश हों चाहना है। एक भांवर, डालता हूं, भंवर में.. जब तक, प्रिये, मैं... सोचता.. हूं दूसरी..  अब.. शुरू  कर.. दूं,  पूंछ... ही, मिलती... नहीं,  मैं, क्या करूं! भंवर...  हो जाता है गायब,  शून्य... में,  मिलता...  नहीं  अब। दूसरा... है,  उभरता,  उससे.. भी,  सुंदर!  खींचता पर..है, अलग! कुछ.., और प्यारा और गह्वर.. मरीचिका यह!   इंद्रधनुषी रंग लेकर.. । खुश.. हुआ  मैं.., दौड़ता.. हूं! फिर  वहीं मैं, पहुंचता हूं, पहले जहां  था, क्या है, ये.. सब... बता.. न!  आज तक, आया नहीं  चाहा हुआ कल"  चाह  जिसकी,  बे-सबब ले, उम्र घूमा, हर जगह!    एक आह!  लेकर,  छोड़  आया, जिंदगी के सुनहरे पल,  सच.. है ये,  वे.... जिंदगी के, सुनहरे... पल। उलझा हुआ, मैं.. इसी में बस इसी में, कल  आएगा, मेरे हाथ में मधुमास होग...