उलझन है कैसी, सामने तुम!
एक सरिता, सी.. प्रिये! बहती हुए... तुम्हें.., देखता हूं! खोजता हूं, तुम्हें.. ही, तेरी... इसी, जलराशि में, डूबकर! पा.... रहा हूँ! अतल हो, अगाधि.. हो, तुम...! प्रेम... हो हर जगह, हर रूप में ही! सतत.. बहते.. काल की, पल पल सिमटती भूमि.. ऊपर, वितृष्णा , की चाह हो तुम.! पर हो कहां? विकल..! तुमको खोजता हूं! मिल नहीं पाता.. तुम्हे! क्या अभी.. भी उस... श्राप! से, श्रापित ही हूं! क्यों मिलन से, अरी, री.., री... वंचित! मैं... हूँ? उलझन है कैसी! सामने तुम! रूप की सरिता.. मधुर! बह.. रही ! बुलाती, हर उर्मियों की ताल पर! लहर ले, उत्तुंग तर...नी सुन रहा मै, शब्द तेरा, पर अरी! मैं.. पार्थिव! हूँ। क्या... करूं। मैं भाव हूं, प्यास.. प्रिय! तूं... रस प्रवण...! सौंदर्य की प्रतिमा! ही.. तूं.. रस माधुरी! का रूप.. तुम! मैं, मृत्तिका का पात्र! प्रिय!...