प्रश्न उसका यही था।
देखा है 'उसको' घूमते शहर में.. इस अल-सुबह, भागती.. सड़कें ये तेरी वीरान! थीं जब.. प्यास गहरी, प्रश्न पूरा छलकता.. उन आंखों में था.. चेहरे में नैराश्य मिश्रित आक्रोश..! अन्दर पल रहा था। कुछ झांकता आंखों से था उन बवंडर! सा आप में से उठ रहा आप में ही.. सिमटता बेकारी के मारे हुए उस युवा.. से, वह 'आदमी' बनने को था। विचारों की बाढ़.. भीतर बह रही हो झंझावात कोई घहर करता दूर से संकेत कोई दे रहा हो.. सूनी आंखे, और ऐंठन साथ में ले सूखती उन पसलियों में अकेले मृगराज हो.. शहर के इस छद्मकारी व्यवस्था से मुझको लगा वह मिल रहा था..। बेकार से उस युवा.. से, 'आदमी' वह बन रहा था। मुझको लगा वह थक चुका है, अनिर्णय की नाव पर बैठा हुआ, सोचता पग बढ़ाता प्रश्न अपने तौलता.. मूक ही, उन महल जैसी मुंह चिढ़ाती बिल्डिगों से, लड़ रहा है। स्वप्न था संसार उसका.. तितलियों के रंग का रंग रंगीला..! अभी कल तक अब फेल हो हो हर जगह, बेक...