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वलय कैसे, हिल दुलकता, लहर लेता

मित्रों, बेल्लूर मठ उसको कहूं, परमहंस जी आश्रम उसको कहूं! नैसर्गिक शोभा घर! कहूं, हृदय स्पर्शी स्वर लिए परिंदों का कलरव स्थली कहूं, शांति का मंदिर कहूं, विभ्रमित हूँ हुगली का किनारा कहूं! गजब कहता हूँ, आश्चर्य की भूमि भी कह सकता हूँ, इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और हरीतिमा से, परिंदों से, आदमी से, विपुल जलराशि से भरे अद्वितीय या विवेकानन्द के निर्मित स्मारक की भूमि कहूं उसका आनंद लें। वह नदी थी?  या  बालिका थी!    शुभ्र बसना,  तनु-व-अंगी,  धार में बहती हुई,  कल कल, निनादित  गीत गाती,  गीता... सुनाती निम्न से, मध्यम स्वरी, सामने मेरे, बह रही थी। चंचल तरंगे, पृष्ठ पर थीं  जल के ऊपर, नाचती..! या मन था,  चंचल!   चुटल, चुलबुल!  नाचता, उस देह ऊपर!  वलय कैसे, हिल  दुलकते!  अलग होते, संग  मिलते,  अठखेल करते  उर्मियों से, उछलते रश्मियों, संग..., खेल....करते। थर थर थिरकते, सूर्य से, नीचे नदी पर स्वर्ण वर्षा हो रही हो!  कुछ इस तरह  किरणे लिए!   मुखर होते,  लाल होते,  डूबते...

वह 'मां' पुकारा 'जोर' से,

आज धर्म जिसे मनुष्य और मनुष्यता की रक्षा मां की तरह करेगा यह मान कर बनाया गया था आपसी तनाव के कारण बन गए हैं। इसी पर ये लाइने आप को समर्पित हैं। आप आनंद लें।  धर्म क्या है, तुम्हारा?  बस यूं ही पूछा!  एक,  तोतले बालक से मैने..  एक दिन.., अकेले में। वह 'मां' पुकारा 'जोर' से, मुझे देखकर,  या.. प्रश्न मेरा सोचकर! रोने...! लगा,  मुझको लगा, मेरे..  प्रश्न पर!  और, मुझ.. पर!  तरस खा वह.. रो.. दिया!  अर्थ उसका  स्पष्ट था.. धर्म मेरा... 'मां,' है मेरी, रक्षा है करती, रात दिन, प्रेम देती, आश्रय है देती विपद में। देखता हूँ  सड़क पर, जब.. धर्म को चलता.. हुआ, इस शान.. से कुछ रंग तक, सिमटा.. हुआ,  कुछ तरीकों के वस्त्र में.., बाल दाढ़ी में,  ढके.., टीका फ़टीका में, पुते.., दूर... उस मीनार पर,  तार से...  लटका.. हुए, तो..... सोचता हूँ:  क्या?  धर्म है, आगे.. बढ़ा...! जिसे ओढ़ना था,  तन हमें जिसे ढांपना था,  मन हमें, बाजार में, वह फहरता  है,  बिक रहा। पर,  धर्म तो कुछ भिन्न था, बाह्य इ...

खोल दें बस हृदय अपना उतरने दें सत्य को

मित्रों, हममें एक चेतना कहें या अस्तित्व जो सारे प्राणियों में एक ही है बहता है। ये लाइने आप को वहां तक ले जायें यही कामना है।  चाहता हूं!  खोल दो तुम!  हृदय.. अपना, एक बार बस.., मेरे.. कहे!  उतरने.. दो,  सत्य!   उसमें..  धीमे..., धीमे..,  और धीमे..,  पूरब.. दिशा से  उठ रहा, सूरज.. हो जैसे। धीमी.. करें,  थोड़ा और... धीमी..!  अरी.. यह..  उत्तेजना..!  इन सुख., दुःखो की  लालसा.. की, उद्विग्नता को...  शांत कर...  राख को.., नीचे.. रखें! मेरे कहे..!  कुछ.. देर.. बस!  परे हों..  घुमड़ते हर   विचारों.. से,  स्वार्थ.. के,  परमार्थ के,  हर तरह के.. अब  शांत.. हों, परिशांत हों कुछ देर...बैठें, भीतर ही अपने। खाली करें, यह हृदय अपना, हर भावना से दूर... हों, क्या मुक्त हैं?   अब.. शून्य है, सब!  मात्र बस, अस्तित्व हैं,  अब..! अस्तित्व किसका?   आप हैं,  अब.. ध्यान.. दें.. क्या.. मात्र अपने?  अन्यथा...  बहते.. हुए  अस्तित्व नद...

एक चिड़िया उत्स की भीतर कहीं है बोलती।

मित्रों, जीवन क्या है! इसी पर ये पंक्तियां आपको छू दें, अंदर कहीं से.. बस और क्या मुझे चाहिए इन लाइनों से। आप पढ़ें। जीवन! भी.. क्या है..; सोचता.. हूँ  बैठकर...  इन.. पत्थरों पर!  उभरे.. हुए,  खुद!  देख न!  इस जमीं.. ऊपर!   पैरों.. के, नीचे..  रईसों! के.. नेता.. बने,  इन दिग्गजों के पड़े कैसे?  बिना.. बोले..  चुप.. क्यों कहूँ!  सब मौन.. हैं!  ये आम जन हैं आज के.. जीवन... भी क्या है,  सोचता.. हूँ! जीवन भी क्या है?  गुन.. रहा हूँ! इतने.. दिनों से.. बैठकर!    अमराइयों की, छांव..! में देखता कुछ दूर पर,  पेड़ों के नीचे,  सूखी हुई, इस जमीं ऊपर!  उघड़ी.. हुई,  कराहती.., प्यासी.. पड़ी इनकी जड़ों.. को, देखकर..!  लगता है मुझको.. ये.. हड्डियां.. हों,  निकली.. पड़ी,  मेहनतकसो के  शरीरों पर...! चेहरों पे.. उनके... खुरदरी.. बे छाल की,  बे मांस की, अटपटी सी.. उसने कहा?  जी  नहीं...!  उससे भी बदतर!  जीवन भी क्या है,  सोचता.. हूँ!  जीवन भी क...

आदमी की ऊंचाई से, प्रश्न क्या कोई बदलता है

मित्रों, जीवन को जीवन में डूब कर जीना, जीवन से बाहर होकर जीना या इस पर तैरना (तटस्थ रहना) यह तीन तरीके संभव है। इसी पर आज की लाइने आप पढ़ें क्योंकि इन्हीं तरीको में जीवन के सुख दुख और आनंद सब बुने हुए हैं। प्रश्न.. मेरा, वही था,  आज भी वह,  वही  है, आदमी की, ऊंचाई... से प्रश्न...  क्या...  कभी!  बदलता..है? जवाब..  इसका, 'नहीं' है। सीढ़ियां...! कितनी चढ़ा.. हूँ,  उतरा.. भी  हूं, उस हिमालय से, लगायत! इस...! समंदर तक.. पैर से इन... पर... पांव 'मेरे'  उंगलियां यह... पैर की,  आज.. भी तो वही हैं। (आदमी की आदतें, इच्छाएं, कमजोरियां, वासना, मूल प्रवृत्ति आपके पद या स्थान से नहीं बदलती ) दुर्भाग्य... मेरा, मेरे मित्रों, जहां खोदा, फर्श.. को, उम्मीद रखकर.. मखमली.. हो  खुरदरी.. हो, हर परत को... महल में, क्या.. झोपड़े में,  आज के इन...  साधुजन के आश्रमों में नीचे... मुझे  मिट्टी... मिली..जो हर जगह  वह.., वही.. है। (भाव: दुनियां सर्वत्र व्यापार, धोखाधड़ी, स्वार्थ और छीनाझपटी का खेल कहीं भी जाय)  कैसे कहूँ?...

लंगूर की पूछें हों थोडी और लंबी...

मित्रों, जीवन से हारे हुए लोगों में, एकाकी और अवसाद में जा रहे लोगों के लिए सूक्ष्मशक्ति और नवउत्स भरने के लिए एक छोटा सा प्रयास मेरा इन लाइनों से है। नेचर की वनस्पतियों और जंतुओं में जीवन-प्राण देने की जादुई शक्ति है, आज शहरी जीवन में इससे दूर लोगों को समर्पित ये लाइने आप भी पढ़े। बस  पूछता.. हूँ!  बता.. न!  कुछ.! छुपा.. न,  सच.. बता.. दे! सब बता.. दे, आज की ये.., शाम..  तेरी..,  इस तरह से,  सुस्त...! क्यों.. है?  मटमैली.. है, इतनी..!  दीवार... पर, इन..  दीवटों  पर,  देहरी.. पर एक..! दीपक... तक नहीं है। यह, शाम!  है,  या...  खुदकुशी...!  अंधेरों.. संग अरी! तेरी, कुछ बोल न!  मुझ, प्रकाश...! की,  तूं... छोड़, उस... 'किरन' की किसी 'रौशनी' ... की,  तनिक!  भी  चाहत!   बची....,  तुममें.... नहीं है। क्या हुआ?  हे, मित्र... मेरे!  तूं... इस तरह! नाराज़... क्यों है?  आज,  सबसे... 'दूर' क्यों... है?  चल दूर कर, तन्हाई... उदासी!   छोड़... ये सब...

याद कर तूं भी, निमंत्रण!

कथानक: आज समृद्ध और अपने समय के समर्थ, ही नहीं मध्यम आय वर्ग के साथ अल्प आय वर्ग के भी वृद्ध और यंग लोग शहरों में एकाकीपन और उदासी से बीमार च अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं। अतिविकसित जगहों पर तो लोग समाज नाम की अवधारणा से दूर हो चुके हैं। केवल अपना और नितांत अपना जीवन जी रहे हैं। कैसे इस उदासी से पार पाएं इसी पर कुछ लाइने आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं। चल..,  आज थोड़ा..  निकल..! बाहर..!  इन घरों.. से, समय.. से,  तूं.. सैर कर..,  पैदल.. पथों पर..  पार्क में या सड़क पर,  थोड़ा.. और, पहले.., सबेरे,  दिनकर निकल, आंगन में आएं,  यदि हो सके  तो, उनसे पहले। अन्यथा, उगते.. समय भी। जानता हूँ, जानते हो! बहुत छोटी चीज है,  यह.. पर, विश्वास कर,  नाम..लेगा, यार! मेरा, विश्वास है!  टहलने के बाद, सच तूं। आ निकल बाहर!  यहां... पर.. आज!  हम,  मिल.. देखते हैं,  आकाश यह, अन्तर्प्रभासित!   किस तरह, आभामयी!   इतनी सुबह!  बितान कोई  तना  हो, चमकता..., नीलाभ.. सुंदर!  अपने ऊपर!  अनोखा.. विद...