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That very seed of the universe…

That very seed of the universe… which you long to behold— that… is none other than me. So leave this world aside for once, and look… at me. Within us the entire cosmos lies concealed, vast beyond measure. Unfold it— if truly you wish to see. In your eyes its reflection appears; within the pupils it gathers itself in but a moment— how unfathomably deep! Have you ever sat quietly and wondered— why is it so? What is it that you seek to know? You yourself are the universe. A single moment of waiting is an entire age… when stretched to its furthest intensity. Like a bow drawn back to the ear— savage, wild, amid forests, ravines, aimed toward me, only a few moments remain before release. Then remember: every passing instant had once felt immense. Life itself stood dwarfed before that one moment— how could a single instant be so endlessly long? This thing we call time is merely waiting— nothing more. If there were no possibility of ending, of death, then time itself would lose all meaning. De...

और यह कुछ भी नहीं था।

मित्रों, इस नियति के खेल में हमसभी का जीवन एक सुसंयोगतः घटित सफल संभावना! नेचर के किए आदमी कुछ नहीं, एक स्थिति और प्रोसेस का बायप्रोडक्ट इसी पर यह लाइने आपके लिए। वह एक सहज प्रवाह मात्र। सरलता, सहजता!   ही.. है, नियति यह! प्रवहित, सदा से, एकरव !  कभी, मुलायम! कभी  क्रूरतम! तुझको लगी, वह...! बेखबर थी..  मुक्त थी,  इस.. बात से, हर एक को कैसी लगी। किस किनारे, किस.. ओर!  प्रिय! तूं था खड़ा था उस नदी के उस  वक़्त  जब वह  किनारों को तोड़ती सीध अपनी जटाओं को  कर रही थी। वह अपनी रव में बह रही है, आदि से,  हम झाग हैं,  उसके... लिए,  उससे बने,  तैर  लें,  जीवन है जब तक फिर, उसी... में, मिलेंगे। कुछ करें साथ उसके ही बहेंगे। यह बुद्धि तेरी, तर्क तेरे..  तेरे, लिए हैं उसके लिए, तूं मात्र तृण! है तैरता.. सबकी तरह उस सतह पर या गर्भ में, कर्म की खुद स्थिति से बस कुछ क्षणों के.. ही लिए तुम ही क्यों  यह.. सभ्यता इतनी बड़ी मनुष्यता! और, दिख रही यह दिव्यता कुछ नहीं उसके लिए, एक कर्म है, बहाए और बहे खुद इस समय नद म...

ये, हिचक क्यों है?

मित्रों हम जो कुछ भी करते या सोचते हैं उसका एक असर हमारे अन्तस पर पड़ता रहता है, यदि यह क्षुद्र होगा तो पवित्र आत्मा या, निष्पाप व्यक्तित्व के सामने जाकर हम झुक जाएंगे और भीतर एक हीनता आपको घेर लेगी इसी पर ये लाइने आप सदा अच्छा करे व सोचे इसलिए। आज, मैं.. क्यों! दूर.. उससे,  इस.. तरह हूँ! फासला?   हां,  फासला! ही बढ़.. गया है,  मेरे, समझ से,  उम्र..  में। एक नन्हा..  मेमना!  मैं,  उस, समय.. था, और वह! नन्हीं परी थी,  बावली...! सी.... महल में। किस तरह हम खेलते थे!  बेलौस.. होके!  गले.. लगते! लिपटते  थे!  कंधों पे..  चढ़.. कर घूमते थे, साथ.. में,  उन नौकरों.. के! क्या?  तब.. हम, और..! थे?  ये.. आज! जो..! हैं,  वो.. नहीं थे। क्या हुआ है? मैं.. वही हूँ!  वह..! वही है, उम्र..  थोड़ी, बढ़.. गई है, समझ में, अंतर... हुआ है,    सभ्यता..!  थोड़ी चढ़ गई है!  पढ़ाई!  आज की, पूरी... हुई है। क्या?  अब, नहीं,  निष्पाप! हम!  तन मन में लादे  गठरियां,...

सुचि! और संसार!

आप सभी मित्रों का आभार आपने इसे एक सफल गीत बना दिया। और अधिकतम लोगों ने इसे पढ़ा। संसार मधु.. था, मधुरतरम.. था मिट्टी.. से जन्मा मिट्टी.. ही, था.., पास से, तत्वतः  जब कूट कर  छाना इसे,  यह धूल! कण था। मैं जानता था, सभी.. कुछ! अच्छी तरह, दूर.. था! पर, सना.. था, अंदर कहीं मैं.. इसमें ही था, यह मुझमें.. था। गहरे! से देखा,  पंचभूतों का सम्मिश्रण!  मात्र.. यह!   नित नवल, रूप! बन बन,  लुभाता था,  दर्शना! कैसी बनाता, दृश्य में यह, लिपटता था। बीतरागी! जड़ भरत! सा एकांत के उस,  अरण का यह बाल.. मृग! था। राग  रस से..  यह... भरा, छूटता बस "समय+कण" था। मेरा नहीं, सभी का,  यह  "मैं..." ही था, मैं, में सना.. यह  मात्र भ्रम!! था,  पंचभूती आत्मसंज्ञक विकार था। संसार यह,  यदि.. इसे मैं, सच कहूं!  तो,  देखने में, फूल..! था, पंखुरी.. स्पर्श! था  महक! सरसिज भीनी भीनी मदिर! था,  प्यारा ही क्यों,  अतिशय! ये, प्रिय.. था। अदा..  था,  जादुई!  पर,  मात्र! भ्रम था,  इंद्र का यह जाल...

शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!

शीर्षक:  शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!  चाहता हूँ,  गीत.. मेरे,  अधर, तेरे.. जब छुएं..!  कुल-कुल.. कुलाते,  बोल.. बन.. झरने... हों जैसे..!  बह.. उठें..। झुरझुर.. झुराते..!  समीर,...  सम..  पास से,  अंदर... छुएं! हृदय को, शीतल.. करें। स्वर तेरा..  झरना...  हो..,  कोई...  फूटता...!  खुशी का,  किसी..  ओरिफिश.. के  छिद्र सा,  नाचता!  मस्ती में  अपने,  लास्य..! करता,  मगन हो..!  हो! बहती... पवन, सा... आंचलों में, लिपट कर मन.., हृदय... स्पर्श! कर लें। कणन.. कंकन!  क़्वणन कंकन!   बज उठें..! यह.. मधुर....मंथर,  मदिर मंथर,:  मंजीर.. स्वर!  ले  बोल दें..  ताल लय में..  ढुलकते हों ओस कण, पत्तों पे जैसे। खिलते हुए किसी फूल..की,  खुशबू... बिखेरें!   सुरभि... भर भर,  भावना की  हर हृदय को, मगन... कर दें । कुछ इस तरह, अमृतकला!  ही  खिल उठें,  अधरों... पे, तेरे..। गीत... ये, ऐसे.. उठें..  सुर ताल ...

जिंदा रहा वो जब तलक

मित्रों, जीवन के कुछ अनुभव शब्दों में आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ें और आनंद पाएं। जीवन ये क्या है, अपूर्णता... है,  क्या! इस लिए.. उस पूर्णता की  प्राप्ति.. में, खोज.. में हर... गति यहां है। क्या इसलिए?  बस इसलिए!   जीवन यहां, गतिमान.. है। त्रस्त.. है,  यह, समस्या.. से,  दुख.. भरा, इतना.. बड़ा! विषाद का वितान.. है!  पूर्णता का  क्या करेगा, हाय यह!  इसको बता दो,  पूर्णता तो, अगति* है; गति* ही नहीं, उसकी कोई!  शांति.. है  वह, मृत्यु.. ही है, चांदनी नहिं, अमावस की रात है। यह रस.. विपुल, रस विविधता!   संसार.. की, उसमें नहीं है।  वह, एक रस है, प्रवाह उसमें नहीं है,  उत् तेजना, तेज, रज, तम छोड़, उसमे, सत भी नहीं है। छोड़ उसकी दौड़, खुश रह!  अपूर्णता में,  जीवन यही.. है, आनंद है, सुख है यहां  इस बिपन्नता में, याद रख!  मोड अपना रास्ता,  रास्ता वह पूर्णता का गलत है। जो नहीं है, पास तेरे, चाह उसकी ललच है, यह ललक है इतनी लगी..! किस तरह, सबको लगी?  यह ललच ही तो, जिंदगी है,  जी अभी, ...

वलय कैसे, हिल दुलकता, लहर लेता

मित्रों, बेल्लूर मठ उसको कहूं, परमहंस जी आश्रम उसको कहूं! नैसर्गिक शोभा घर! कहूं, हृदय स्पर्शी स्वर लिए परिंदों का कलरव स्थली कहूं, शांति का मंदिर कहूं, विभ्रमित हूँ हुगली का किनारा कहूं! गजब कहता हूँ, आश्चर्य की भूमि भी कह सकता हूँ, इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और हरीतिमा से, परिंदों से, आदमी से, विपुल जलराशि से भरे अद्वितीय या विवेकानन्द के निर्मित स्मारक की भूमि कहूं उसका आनंद लें। वह नदी थी?  या  बालिका थी!    शुभ्र बसना,  तनु-व-अंगी,  धार में बहती हुई,  कल कल, निनादित  गीत गाती,  गीता... सुनाती निम्न से, मध्यम स्वरी, सामने मेरे, बह रही थी। चंचल तरंगे, पृष्ठ पर थीं  जल के ऊपर, नाचती..! या मन था,  चंचल!   चुटल, चुलबुल!  नाचता, उस देह ऊपर!  वलय कैसे, हिल  दुलकते!  अलग होते, संग  मिलते,  अठखेल करते  उर्मियों से, उछलते रश्मियों, संग..., खेल....करते। थर थर थिरकते, सूर्य से, नीचे नदी पर स्वर्ण वर्षा हो रही हो!  कुछ इस तरह  किरणे लिए!   मुखर होते,  लाल होते,  डूबते...