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अप्रतिम कुछ देख तो (स्लाटर हाउस-5)

शीर्षक अप्रतिम कुछ देख तो। देह की सीमा है, सीमित! जिनसे बनी  उन अवयवों  तक, उसके आगे.. चन्दनों की महक है,  चांदनी का  नृत्य करता  राज् है,  फैला पड़ा  तारों  के नीचे,  अछूता,  निर्लिप्त, अनुपम! आ देख न!  तेरे लिए  पलकें बिछाए खड़ा है ये, शुरू से। चलोगे? क्या साथ मेरे, सफ़र पर, उस मन है  तुम्हारा?  छोड़ दोगे,  सभी लालच!  सच में तुम क्या?  इस धरा का! उड़ोगे तुम साथ मेरे,  नीले वहां,  उस चमकते गहरे! गगन तक? परा है, हर ओर अपने, मिट्टी से हट कर  सोच तो! देख तो, आंखों में गहरे, हंसते हुए किसी बाल शिशु के। मगन होकर, भूलकर  सब नृत्य में,  क्या भाग लोगे? बोल न,  गाती हुई, उस  नवलिमा,  इस प्रकृति के साथ मिलकर नचोगे क्या लय मिलाकर? कौन है तूं  जानता है?   समष्टि पूरी! दिखता जहां तक,  वह..  दूर तक  उस.. क्षितिज तक! सृष्टि सारी, इतनी बड़ी,  और यह सारा  जहां, इतना बड़ा,  सच मान.. मेरी, तेरा ही है, तेरे लिए! बाहर निकल  बस  क्...

बोल बम! बम! बोल बम. बम!

शीर्षक: बोल बम! बम!  सृष्टि यह फैली पड़ी,  अपरिमित!  इतनी बड़ी,  बाहें पसारे देख री, जोहती है बाट किसकी, बोल बम!  उन.. एक शिव की, एक शिव की। दिग्दिगंतों में यहां,  दूर.. तक  विस्तृत क्षितिज के वक्ष पर शक्ति है, फैली पड़ी  यह देख कैसी!   सर्वदा, सर्वत्र ही, एक सी बाट किसकी जोहती,  बोल बम!  उन.. एक शिव की, एक शिव की। क्या कह रही चढ़ती उतरती  सांस भीतर,  शाश्वती बोल न, निर्द्वंद होकर बम-बमाबम!  अरु  उतारो  सोमवारी, सोमधारी  सदाशिव संग पार्वती की   मिल सभी तुम आरती। बोल बम. बम!  बोल बम. बम!  नवलता यह विश्व की है, रूप किसकी? बता न!  कौन है वह शक्ति इसमें समाई, देवि तो वह एक ही है  अपर्णा, अनेकवर्णा! बोल दे न! पार्वती, हां.. पार्वती! अलग हो सकते नहीं, शिवशक्ति हैं यह आदि हैं काल हैं, खुद काल के  सृष्टि ही सम्पूर्ण, दोनों हैं यही। बोल बम. बम! बोल बम. बम!  नवल रस रसते सभी में आत्म में, इन देह में बहते यही  रहते..  सदा इन जलों में, वायु में  एक से य...

और क्या हमे चाहिए

शीर्षक: और क्या हमे चाहिए संसार से। शुरूआत कर  एक  लरछ बन,   अंकुरण  होने तो दे,  फूटने.. दे,  निकलने.. दे आंखुरोंं को,  आंख से  उन  डालियों के,  सांस प्रिय लेने  तो दे। कल यही हैं,  इन्हीं में  कल छुपा है,  सब्र कर, फुनगियां बनने तो दे। देख लेना,  एक दिन  खिलखिलाकर  हँसेंगी,    कलियां ये नन्ही खोलतीं.. वे, नयन अपनी, शीर्ष पर इन, खिल उठेंगी,  और क्या हमे चाहिए,  शेष अब,  संसार से। फूल कलियां खिली हों, चहुंओर अपने, रंग  बिरंगी, हंस  रही..  फैली पड़ी,  महकती, हों पंखुरी.. झरती हुई, पूर्ण जीवन सभी का हो, पूर्ण उपवन सभी का हो, पूर्णता में, 'पूर्णता' हो खिल रही और क्या हमे चाहिए  आज इस संसार से। जब देखता हूँ पल्लवों को, बूंदों को इन, बदलते.. बरसती इन बदलियों  के स्नेह को, इतनी जल्दी चमकती इन मोतियों में, कोर से, एक एक कर इन टपकती,  मस्त हो जाता हूँ मैं अभिभूत हूँ, किस शांति से, किस प्यार से, हैं सिहरती नम्र होकर, रोपती हैं हस्त ये... गिरती रहें...