और क्या है, जिंदगी! जिसको लिए, फिरते सभी!
मित्रों, जीवन एक प्यास च तृष्णा जो पूर्ण होना तो चाहता है, पर प्रकृति के आंगन में उसके सौंदर्य और छलना में बार बार अतृप्त ही लौट जाता है। इसी पर यह पंक्तियां हैं आप पढ़ें और संतुष्टि पाएं। यह... प्रकृति! छलना... मयी! है... खींचती..! मुझे... आप.. में, एक रस कर, साथ में निज संतति की चाह में, जीव में, मुझे बदलती है, देह रूपी पाश में मुझे बांध कर, अंत में फिर छोड़ती है। साथ में, मिल कर, रहेगा कुछ, नया हितकर, करेगा.. खिला.. देगा, धरा मेरी, आनंद देगा.. आनंद.. लेगा. और क्या है, जिंदगी! जिसको लिए, फिरते सभी! प्रकृति है, छलना मयी! रसनामयी, रसमयी! खींचती, पर..! प्यास हैं, हम..! इंद्रियों के, दास हैं हम, सत्य है यह, मानते.. हम! और, तृष्णा.. को लिए "मैं.." उम्र भर... इन इंद्रियों.. की, भरमता, हूं। रस... खोजता हूँ घूमता हूँ, तरसता..हूँ...! उतर आता, यहां नीचे, हाथ में, पाश में, पंख...