Posts

बाजार मैं, बाजार दुनियां।

बाज़ार दुनियां  और मैं..  बाज़ार खुद एक, खुला हूँ,  हर वक़्त अपने  विचारों.. की  दुकानों  में, तौलता हूँ,    सत्य सबका  आज के इस जमाने में, आप को, हर एक को आप खुद को,  अंदर कहीं  बुद्धि की निज, तराजू में। कुछ बोलता हूँ  बाद में, पहले तुम्हें मैं  तौलता हूँ कितनी रखूँ  और चीनी अपने स्वर में। हिसाब से, तौल कर, उसे मिलाता हूँ पेश करता हूँ तुम्हें  अन्यथा  बेरुखी से  टाल  देता हूँ  तुम्हें! तुम जानते हो,  सभी कुछ  अंदर का  मेरे दुकान  आखिर! बाज़ार की इस  तुम भी तो हो। चढ़तीं.. हुई साँसें ये मेरी,  स्वार्थ संग उतरतीं नुकसान.. में, टंग.. हैं जाती उसी  क्षण  संदेश पा, पड़ती हुई  घर रेड में। क्या क्या छुपाए घूमता मैं.. सामान इस बाजार का राह चलते  सौदा  करता आज मैं हूँ प्रेम का। बेंच डाला विश्वास अपना कुल भी अपना,  तन, रंग,  सौष्ठव, जाति अपनी और सच कहूं तो आत्मा। बालक हूँ मैं.. तिस पर अभी आज भी इस..  जिंदगी की रेत में,  मोह को...

मैं मुस्कुराहट! तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ:

मित्रों पढ़ें और आनंद लें।  खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब शाम को बैठा अलग  हो  जिंदगी की  दौड़  से, और पूछ बैठा,  उसी  से क्या चाहती है,  अब  बता तूं! आखिर मेरी इस  जान से..? वह चुप रही, कुछ भी न बोली देर तक, एकटक!  मुझे  देखती चटकती  कोई  कली हो, चटक  कर  मुस्कुरा कर  बोल  दी, मैं मुस्कुराहट!  तेरी हूं,  तेरी  खुशी हूँ। हर शख्श में, मैं गूंजती हूँ, सोच न!  मैं न रहूं! तो क्या हो तुम!  क्यूं परेशां है,  क्या थक गया है?   मुझसे तूं? तो बोल न!  आज़ाद कर दूं  अभी इस  क्षण   क्या तुझे..  जंजाल से..? आघात से,  इन  नश्तरों से कष्ट के..! मैं हिल गया, अरे नहीं री.. ऐसा नहीं, अभी काम है,  सामान है, घर मेरा है मेरी प्रेयसी है कुछ पुराना है  ठिकाने  उसे लगाना है,  बच्चे हैं मेरे.. छोटे छोटे अच्छी है तूं.. अच्छी है तूं! फिर खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब  शा...

शून्य के भीतर छुपा क्या?

आ..  प्रिये..!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर  छुपा,  वह कौन है, जो  दूर जग.. से!  भूति.. से,  एषणा.. से, कर्म से..  सुख.. दुख.. ही क्यों  अनुभूतियों से। सोच तो  एक बार उसको!  इतने दिनों से अकेला प्रिय मौन है, क्या यही वह शून्य है। शून्य है जो..  कुछ  नहीं, वह परिमाण में, स्थान में!  आकार.. में, और रूप में  ही नहीं  यह आस्वाद से भी  हीन है। दूर है इन  इंद्रियों... की चाह से!  विरस है, वह रसों से!  सौंदर्य से.. फिर भी प्रिये, य ह...  आसन जमाए क्यों जमा  है  शून्य सारी सृष्टि में,  इतने दिनों से। आ प्रिये!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर छुपा,  वह कौन है। क्या यही वह मौन है। कौन है यह!  बोलता ही है नहीं, डोलता हो, पैर से,  पैर इसके हैं नहीं गोल है यह, हर तरफ से  एक सा,  शून्य की यह  शक्ति है क्या  इसलिए। कुछ नहीं, पर काम का है, शून्य है, पर पूर्णता है, शांति है  यह परम  मित्रों,  शून्य बिन सब शून्य है। जय प्रकाश मिश्र जय ...

कितने निमंत्रण बाँटती हो।

जीवन के कुछ गूढ़ तत्व हैं उन्हीं में से एक पर यह लाइने आपके लिए। कितने निमंत्रण बाँटती हो,  ख्वाब के तुम,  निमिष  भर  में, पर लगा तुम कल्पना के  उड़ाती मुझे  दूर उस नीले... गगन में।   दृष्टि के निक्षेप में जोड़ा  कभी  है,  मासूम  मन, कितने गिराती 'हरीले' तुम!   जो देखते  चितपावनी  चितवन तेरी..  आह भरते  सभी  हैं  अंदर कहीं..! से। कभी सोचना  मेरे कहे हृदय कितने..  तोड़ती हो,  फूल.. से तुम, मुस्कुराती .  तुम्हे.. देख लें जो.. बचा कोई.. एक,  होगा शक मुझे है.. आज तक,  आहत हुए बिन! कौन हो तुम!  क्यों है ये.. प्रिय.. नहीं लगता मन  सभी का  इस जहां  में.. देख लें  जो  दृष्टि भर.. तुम्हे.   आभरण में, स्वस्थचित्ता  किसी.. भी दिन। मन है क्या यह.. रूप है क्या संबंध  इनके बीच कैसा.. प्यास यह, और आस है क्या.. सांस का कोई खेल है क्या.. एकाग्रता इस दृष्टि की शून्यता संवेग की शांत मन में मेल है क्या.. आनंद इनके बीच बसता  कहीं है क्या...

ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,

मित्रों आज के बंद शहरी जीवन पर ये पंक्तियां आपके लिए। ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,  मिलेगी क्या? ऊब  है  यह  जिंदगी  अंधेरी  इन  छांवों में धूप थोड़ी,  हवा ताज़ी मिलेगी  क्या..? देखता हूँ शाम होते, भागते  चार बजते,  काम पे तितलियों को शहर की  सड़कों पे इन..   सज़धज किए परिधान  पहने,  परियाँ हों  जैसे  निकलतीं। उत्साह  भर  भर  मत्स्यगंधा...  रूपसी,  हां रूपसी!  खिलखिलाती हंसती हुई,  मुक्त री अत्यंत छोटी बात पर कुलकुलाती..  फुदकतीं.. उड़ती हुई। सुष्ठु तन, मन, प्रसन्न हैं सब ताज़ी हरी, आज की उन सब्जियों  सी देखते ही  ललच आए, खिल उठे मन। फूल होंगे.., घरों में रखे हुए अधिक सुंदर, पर  रुग्ण होंगे आराम  कर  कर आलसी।   एक सच कहूं  आज की इस जिंदगी में सुबह से ले शाम तक खोजते आराम हम.. ए सी लगे  कमरों में  बंद.. बंद... यही बाकी अब बची ये जिंदगी..। ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,  मिलेगी क्या? ऊब है  अब जिंदगी  अंधेरी छांवों म...

आदमी अब वस्तु है।

मित्रों जीवन की सच्चाई का चित्र बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ उसी का एक पेज यह भी है। किस शांति से 'वह' झेलती है  गरीबी लाडो मेरी,  अभी उम्र कितनी, बहू थी,  लाजों भरी नवेली। गुलाबी  वह चूनरी.!  फेरे लिए थी सात  प्रिय संग अब भी है रखी  संदूक  में वैसे की वैसी पहन  जिसको  कल्पना में  उड़ चली थी.. ताजी हरी बिन सलवटों के सिसकती है  भाग्य पर, संसार  पर आज  वह  इस  शहर में। दो माह के ही बीतते  खोजती है,  काम धंधा  जुटाती है  रसद  अपनी  किस भी तरह,  काम कर, हर  शाम.. की।  देखा  है तुमने.. शहर की गलियों को इन बेबाक हैं ये  किस  तरह से  नीर- सी.. चाहती हैं  गार  लें  निचोड़ लें  श्रम महत्तम,  काम सारे  उससे ले लें  और वेतन न्यूनतम.. देना पड़े।  यही तो..  हम  चाहते हैं  श्रेष्ठ जन! बुद्धि का उपयोग सारा  इसी में है, तभी तो चालाक हम! अन्यथा बोल न  क्या नहीं हैं  मूर्ख  हम..। समस्या...