आप को देखा, लगा.. कोई छाँव..! है
आप को देखा लगा कोई छाँव है शीतल.. मधुर.. बैठ लूं, तपती हुई, संसार की.. इस धूप में संग भागती, रेल सी इस जिंदगी में, कुछ ही पलों की। यह सोचता मैं रुक गया, तुम्हे देखते ही खो गया मैं भँवर में, इन पलों में बिन मुस्कुराते, मुस्कुराते.. होठ सुष्ठुर..! पाटल-कली हों, खिल रही रस पंखुरी हों, खोलतीं.. खिलती हुई। कोई कमलिनी हो महकती.. या चांदनी! हो.. दोपहर में मिल गई.. शीतली.. मुझे भ्रम हुआ। रूप.. मधु औदार्य.. झरता.. सौंदर्य हो, तुम निर-प्रकृति का इतने निकट! पाकर तुझे मैं चकित हूँ। टपकती कोई बूंद हो तुम अहा शीतल आकाश की अचानक नीचे.. गिरी, तप रही, मरु रेनु पर मैं, क्या कहूं! मैं नहीं था मगन था? पर अच्छा.. लगा। यह क्यों हुआ? यही तो है समझना यह.. रूप क्या है? सुख क्यों छुपा है इतना सघन इस रूप में, रंग का यह खेल क्या है? इसी को तो जानना है। मरीचिका का मो...