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हर अंग तेरे फूल निखरे।

❁ सौंदर्य में मातृ-मूर्ति ❁ मातृत्व के सौंदर्य को समर्पित एक भावांजलि। हर अंग तेरे फूल निखरे,  कली खिलती  होठ तेरे अधर पर यह प्यास भीगी सावनी..!  झरती... हुई री.. प्रपाती, कौन है तूं..! संदली यह महक तेरी,  भीनी भीनी मधुर इतनी, मदिर कितनी मीठी.. मीठी...,  निमंत्रण है,  प्यार का मेरे लिए..! पूछता हूँ, चहक इतनी सारिका सी  स्वरों में,  नर्म कितनी त्वचा तेरी शील यह,  दबती हुई कोई पंखुरी हो सुंदर महकती, फुर्फुरापन चाल में यह दृष्टि में रतनार डोरे  हिल रहे  री चंचला, स्थिर नहीं तूं..। लोलता आरूप में ओढ़े हुए यह क्यों छुपी है..  तुम्हीं में बता दे न! कौन है तूं..?  कोई कुछ कहे, मैं मानता हूं शक्ति है तूं.. आधार है इस विश्व की  री प्रणयनी..  तुझे क्या कहूं! जननी भी है तूं!  संसार की तूं.. मूल है,  संसार तेरा रूप है सच कहूँ कारण भी तूं  संसार की..। हर अंग तेरे फूल निखरे,  कली खिलती  होठ तेरे अधर पर यह प्यास भीगी सावनी..!  झरती... हुई  री  प्रपाती! बोल दे न कौन है तूं..! जय प्रकाश मिश...

फूल से ज्यादा है कहती खिलती कलियां ।

एक फूल से ज्यादा है कहती  कली खिलती  खोलती  है प्रथम  पर  जब,  जगह देती  कल्पना को हमारी   दूर फैले उस क्षितिज तक तूं..!  पंखुरी में रंग भर.. अपने मनों का रंग भर! पुष्प में  अब क्या बचा..? जब बिकच कच वह खिल गया, उड़ रहा मधु और सौरभ! शेष अब कितने  दिनों तक..। पर  कली में है  कल्पना कितनी विशद्!  सोच कर  मन बड़ा रख।  मिल कभी  नजदीक से,  अमृत अनश्वर! है भरा इन कली में,  निसर्गता के रूप का रंग का अभी अनछुआ और अनकहा! कर कल्पना तूं.. कल्पना के लोक तक! तैर मन भर, तैर तन भर। मुस्कुराती  कली  कहती,  उम्मीद हूँ  मैं.. अनंतिनी..  तराश मुझको उम्र भर..  तूं तराश मुझको उम्र भर..! पटाक्षेप: अधूरी एक कलाकृति है, विंस्की के  हाथ की वाइल्डनेस  जेरोम  की,  देखना कभी  वह कली  ही है अधूरी  लाइन  खिची हैं  मात्र ही,  पर बोलती हैं, आज भी राज सारे खोलती है, आज भी जिंदगी के, हाथ में ले एक पत्थर! उन कागजों पर..  सदियाँ हैं बीतीं, समय गु...

एक लव जलती हुई।

मित्रों आज नारी की सुरक्षा और उसकी स्थिति पर ये लाइने आप पढ़ें और चिंतन करें। एक लव जलती हुई तुम..  दीप की,  डगमग  पगों पर  चल  रही  हवाओं सी  हिल रही बाहर कहीं,  अंदर.. नहीं मैं..  जानता हूं,  अग्नि हो तुम..! सख्त हो तुम, बज्र सी राख बनती, ताप से  अपने झुलसतीं  आज की नारी हो तुम.. एक लव जलती हुई, किसी दीप की। सड़क पर चलते हुए,  कितने लपेटे युग मनों में..; ताड़ती.. हर एक को पलड़ों में रख के, साधती हर स्थिति...को  आज की नारी हो तुम.. मधुर लव जलती हुई, किसी दीप की। जग कठिन है, धृष्ट है, दुर्बल कहीं है! तुम जानती हो, जड़ सभी की कोई कुछ कहे,  जननी  हो  तुम! हम सभी की..; पर क्या कहें इस आदमी को शर्म इसमें.. है नहीं.. कोई भी हो..  एक घर तो सभी का है.. एक मां तो सभी की.. फिर भी डर है, घर से बाहर निकलते ही.. कौन है ये, जिसका डर है.. आदमी है.., आदमी है..  आदमी क्या जंगली है आज भी.. एक लव जलती हुई तुम.. दीप की,  डगमग पगों पर चल रही  हवाओं सी हिल रही बाहर कहीं,  अंदर.. नहीं  मैं.....

सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के,

बुनता रहा मैं जिंदगी दिन रात लग के, लगन से, अंत में सब.. कुछ  न! निकला.. सामने मेरे.. सवाल ही थे। इसलिए... प्रिय! क्या विधा है, क्या कहूँ,  यह जिंदगी! काढ़ता  हूँ  फूल कलियां!  कैनवस पर,  जब  कभी झाँकती..  हैं...  पत्तियां  मुझे बुलातीं,  हिलती हुई,  अंदर कहीं। रुक हूँ जाता,  काम से,  कई बार मैं  यह  सोचता.. जीवन खिलेगा,  पक्का है ये.. सभी का इस काम से, पर डर हूँ जाता  देखकर  मैं  इरादा,  आज के इस आदमी का। हर क्षण बदलता  तुच्छ से  किसी  स्वार्थ में मुझे ना भरोसा.. वरदान को, इस रेशमी  फैब्रिक्स को  यह कफ़न जैसा ओढ़ न ले। सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के, तिकड़मों,  तकनीक से,  नए उद्यमों, नई  नीति से पा रहा  हूं दूर..  खुद से,  स्वास्थ्य.. से आज अपनी, मरीचिका के क्षेत्र में। संवारता हूँ भविष्य अपना  आज जितना.. सोचकर नजदीक उतना  पहुँचता हूँ,  आदमी के, आप के..  संहार के। क्या विधा है, क्या कहूँ, यह जिंदगी! काढ़ता हूँ फ...

रूप श्री।

आप सभी मित्रों को शारदीय नवरात्रि के दशमी तिथि, विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। रूप श्री  और कीर्ति बाँधे,  पगों में  यह लक्ष्मी, काल रूपी पद्म थामे,  हाथ में,  मुख पर लपेटे लज्जा कैसे  कुलीनों की.. आंख में भर दया, करुणा  तैरती  स्थिर बिछी किसी झील में  शील सुंदर  वस्त्र में कैसे छुपाए बिहरतीं  हैं शरद की नवरात्रि के  अंतिम दिनों में...  सत्व वाले घरों में,  देखा है तुमने.. जैसे.. मैने? पग दो  ऐसे न तोड़ो फूल तुम,  इन डालियों से बेखबर  कांटे है  सारी.. डालियों में देख न कितने  नुकीले,  विष बुझे..।   मुलायम! तेरी उंगलियां हैं, पंखुरी ही..  प्यारी प्यारी.. गुलाबी,  पाटलों की, अतीव सुंदर,  फूलों से इन ये बहुत  मंहगी.. इसलिए  ऐसे न तोड़ो फूल तुम..। मुस्कुराया फूल!  हंस कहने लगा क्यों रोकते हो, प्रिया को तुम इस तरह  स्पर्श मैं भी चाहता हूँ.. स्नेह का, उन उंगलियों का सौंदर्य हूँ, सौंदर्य का  संसर्ग...   मैं भी चाहता हूं अस्तित्व हूँ, प्...

सीखता जब तक रहा

सीखता जब तक रहा  बच्चा रहा मैं, मुलायम सा, उत्स था मेरी  जिंदगी में..। थकता  नहीं  था,  बहता हुआ  कुलकुल कुलकता  झरता हुआ  झरना था मैं। आज भी जब सीखता हूँ!  मन से कुछ, एक  उछल भीतर रेंगती है, छुलुल छुलछुल... मन मेरा संगीत में है डूब जाता काम के.. तन भूल जाता  कितने समय से नच रहा मैं। मन लगे तो काम क्या है? कुछ नहीं,  आनंद  है,  अन्यथा यह  जेल है सबसे बड़ी.. देखा है मैने..लोगों को मन मार कर बैठे हुए..  बिलबिलाते  सीट पर हां!  काटते,  काम में,   यह जेल ही  इस जिंदगी भर ।  जिन्दगी!  क्या चीज़.. है, बहने को कुछ इसे  चाहिए.. आधार.. मीठा!  मिश्री जैसा, प्यार सा  जिस पर बहे.. काम का कोई धरातल हो, मन लगे। मीत कोई, स्वीट  हो या जगह सुंदर! कलियों भरी, प्रिय  महकती..  ठंडी ठंडी  मन जंचे..। पर क्यों है ये..  यह प्रश्न है,  काम तो बस काम है हर काम भी तो जरूरी है, हर आदमी जंचता नहीं  क्यों  आदमी तो आदमी है, कुछ तो है, वह.. तुझे प्रिय ...

थकने नहीं देगी तुम्हे ।

थकने नहीं देगी तुम्हे ये भूख है, तमन्ना, आशा है प्यारे! आस.. है,  संसार  की,  रंगरूप की  स्वर्ण की चमचम चमकती  रश्मियों  की  खींचतीं हैं चित्त तेरा बांध लेती हैं तुझे  मनोहर प्रिय,  छुलछुल छलकते  रेशमी उन बंधनों में..  अत्यंत धीमे.. और धीमे.. और तूं..  फिर  तड़फड़ाता  अंत में, एक  दिन  कोने में मिलता  यहीं इस संसार में..  अकेले  एकांत में,  कुछ बुदबुदाता बेकार था, यह खेल.. सारा! जो नहीं  बंधते हैं इनमें,  लुभावने,  चमचम चमकते  बंधनों में,  उनके लिए, पिंजरा.. अलग है पास उसके,  अस्तित्वनी वह! छद्मिनी वह! शक्तिनी वह! ग़ज़ब है,  पाश है हाथों में  उसके। बांध लेती ज्ञान के , बल बुद्धि के विवेक के, तर्क के.. आयाम में..। उलझा है लेती, विद्वान को सन्यासियों को पुस्तकों में, मौन  में,  समाधि में। फिर  झुलाती है  झूलना...  यश कीर्ति का,  सम्मान का,  नाम का रिद्धि, सिद्धि का,  नजदीकियों  का, अपने से त्याज्य इस संसार मे...