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धर्म की सीमा कहां तक।

  धर्म की सीमा कहां तक, जानना है? अधर्म को मैं जानता हूँ! अच्छी तरह,  यह.. आदमी  तक..  अधर्मी तक। आह!  ईश्वर, कहां तक  हम  मानवों का साथ देगा,  और कब तक पूछता हूँ! नाराज... हो मत,  इस जमीं के छोर तक,  जीवनों के अंत  तक या वहां.. मृत्यु के उस पार तक..! सत्व का वह पुंज है, अधर्म नाशक..! बिगड़े हुए इन मानवों का,  दानवों  का  कल्पना-गत वध करेगा वही है हल! अधर्म नाशक!  एक ईश्वर..!  या हम हैं कुछ  सीमा  के  भीतर,  पूछता हूँ  बली हैं वे..  किसके बलपर अधर्मी..! हम सभी से  शक्तिशाली और हम हैं सत्य वादी!  सत्व शाली!  फिर इन सभी से इस तरह से, त्रस्त क्यों हम? यह खेल क्या है? भेद क्या है?  इतने दिनों से  युद्ध की इस  महाजड का उच्छेद क्या है?  अधर्म के संग, धर्म के इस  युद्ध का  आखिरी में अंत क्या है...  कुछ गुण हैं हममें काम करते  हम सभी में, यह भेद है निर्माण में इन शरीरों के शुरू  से, पञ्चतत्वीकरण इस ब्रह्मांड के इन तत्व का.. पांच...

स्वाद यह कुछ अलग है।

एक कविता आज आपके साथ मिलकर, आप इसे पूरा करिए..। स्वाद यह कुछ अलग है, अप्रतिम है, अनोखा! है। कौन सी संज्ञा   दूँ इसको मौन के रस की तरह का हां! हां! कुछ.. कुछ.. उसी सा। शांति में..  अंदर की मेरी.. प्रशांति जो है घुली रहती..  चांदनी की ठंड सी सुंदर  सुकोमल  दूर तक फैली हुई, हर तरफ जो एक सी और इनके ज्ञान का  जो मर्म होता इन सभी के अंतरों में  एक जो आनंद रिसता अव्ययी हां उसी के स्वाद जैसा.. परम है। यह सांसारिक स्वाद से  हर विलग है ऐश्वर्य इसका हर किसी को  सुखद है यह..  स्वाद ही कुछ अलग है, अप्रतिम है, अनोखा! कौन सी संज्ञा  इसे दूँ..!  हां, हां, कुछ कुछ  प्रभु भजन सा। शब्दों से यह परे है,  अनुभूति में यह घुला है,  कौन जाने स्रोत से किस निकलता है यह बोध है बहता हुआ..  न रूप है, न रंग है,  फिर भी यही  सर्वत्र है,  कण-कण में है फैला हुआ मौन होकर  इस छोर से उस छोर तक  विस्तार इसका..  इसे छूने.. गर चलूँ,  तो स्वयं में हूं उतरता,  और जितना गहरा उतरूँ,  उतना ही लगता—  मैं...

मधुर हो तुम!

'मधुर'  एक खोज की समाप्ति इतने दिनों से खोजता बूढ़ा हुआ तुम्हे! और तुम इतने मधुर.. अब तक कहां थे.. कितना ढूंढा.. पुस्तकों में वेद.. के उपनिषद.. में, श्यामता की स्याहियों के बीच तुमको, अरण्यों.. में नदियों किनारे तीर्थ.. में इन और तुम यहां! इन रश्मिमय मुस्कान में ऐसे छुपे थे, निर्लिप्त सबसे, इस तरह एकांत में, इस मौन में.. इस शांति में, लिपटे हुए मुझे न दिखे तो, उम्र भर तुम न दिखे। अब एक हो, मेरे साथ हो, यह ज्ञान ही तो न मिटे, भ्रम न उठे, इतना करो। हे मधुर! तुम्हे सोचता हूँ निकट इतने, तुम मेरे थे.. प्रेम के इन रसों में, भीगे पड़े करुणा सने, इन भाव में, उद्गार में.. अंदर मेरे..। लीला तेरी.. यह छद्म ही अनुभूति की, मेरी दीवारों को वेधती जब.. रस निकलता आनंद का अंदर कहीं यह.. और मैं बहने हूँ लगता समीर सा भीतर ही भीतर हे मधुर! इतने चतुर! इतने दिनों तक पूछता हूँ क्यों छिपे थे। आज जाना, मधुरता का राज़ सारा, आज जाना झलकता सौंदर्य का इस प्रकृति में हल्का इशारा किस ओर था, मेरे लिए.., घेरे मुझे.. अरुण उषा खेल का खिलता नजारा! आवरण के पार्श्व में, आड़ में तुम खुद छुपे थे..। हे मधुर अब देखता हू...

उतर गहरे!

इतनी बड़ी  इस राह ऊपर जिंदगी की सड़क पर  चलता हुआ  तूं और मैं..  जरूरी तो नहीं है,  नेक ही, हर  आदमी  हमेशा, हर बार ही,  हमको  मिले..। जो बिना देखे, रंग को  बदलते इस  रूप को  बिन पड़े किसी भरम में   सत्य परखे परखने में सफल हो हमे पास कर दे,  प्यार कर ले,  जिंदगी में। हर कोई तो इस तरह का नहीं होगा,  इस जहां में जान लें इसलिए  साहस बटोरें  अपने में ही माद्दा.. जब कोई हमें   ना कहे,   बिन गुने असफलता उसकी है ये..  अपनी नहीं हम न हिलें, अंदर कही से  विश्वास! अपने पर रखें रास्ता जीत का कायम रखें सद-रास्ते से न हटें। टूटें नहीं  उसे माफ़ कर दें,  सामना इस नापसंदी का करें विश्वास से, खुशी से, हिम्मत रखें। अन्यथा टूट कर  हमें क्या  मिलेगा,  गांठ कोई, एक मन की कंकरी एक सख्त  सी,  भीतर कहीं चुभती रहेगी, करकती जिंदगी भर, जिंदगी में। साथ में  एक क्षोभ भी  पलता हुआ भीतर कहीं उस आदमी के लिए ही  रिसता हुआ, कोई घाव सा नुकसान जो अपने लिए। इस लिए य...

आदमी है सबसे नीचे।

आसान हो या कठिन हो  दुनियां ये क्यूं.. है इस तरह की, इतनें  दिनों से,  बुन रही  कोई  जाल है क्या,  नटवरी!  काम पर रखा हमे है,  मुफ्त में.. इस जिंदगी भर,  भोजनों पर कुछ भी न देगी, फल हमें और अंत में, एक दिन  सब  छीन लेगी  बिन  बताए..  भगा देगी इस  जहां से.. नृशंसी! सोचता हूँ कौन है वह नित पट बदलती  सामने मेरे स्वांग  रचती,  लुभा लेती आदमी  को फांस  लेती औरतों को  किस तरह से एक साथ रखती, जिंदगी में जिंदगी से, बांध देती शरीरों को अपना बना लेती हमे,  किन लालचों में बाँधकर,  संतति हमारी  प्राप्त करती उसी से, यह और आगे साथ रहती मौन  यह बुद्धि दे, विवेक दे, शक्ति दे दे काम सारे कराती है इस जहां के.. और हम..सब,  जानकार सब  मूक हो.. बैल से भी  और बदतर  लगे रहते, नधे रहते,  छोड़कर  आराम  हर। और सुख हैं मानते हम इसी को संतुष्ट हैं, बिन पगारों के.. खुश हैं रहते  जाल में  उस  नटवरी के, देख कैसे, जिदगी भर। रूप रंग संवारती, चुपचा...

होठ चुप हैं और मैं लेटा हुआ।

कहीं 'कुछ' अति बड़ा होगा,  रहस्यों में छुपा होगा, आंख खुल  जाएगी मेरी देखकर... मान कर यह रस्तों पे दौडा आजतक! पीछे मैं इनके,  आवरण  में  छुपाए  जो घूमते हैं अंक में  मंदिरों और मस्जिदों में  आदमी के ख्वाब को। ऊंचे वहां..  उन  गुंबद-ओ-मीनार पे चढ़ नहीं सकता  जहां मैं.. उम्र में इस, मोड़ पर दिखाते  हैं  बताते हैं,  रखा  हुआ है,  सपनों का सुख  और कोई स्वर्ग! मृत्यु के उस पार का.. सौदा हैं करते..  पल रहे  समाज के ही दान पर ये  आज भी आस्था पर विज्ञान के भी जमाने में देख तो। आखिरी इस द शक तक  खोजा बहुत.. पर नहीं  पाया,  सच में बाहर,  एक भी सच।  अंदर कहीं कुछ  चमकता है,  झलकता  है,  निथरता है, जब  शांत होता  मेरा मन..  और अब  जब थक गया हूँ गिर पड़ा हूं ,  दौड़ता   फुटपाथ पर इस जिंदगी के अपरवश मूर्छित हुआ सा छोड़ दी दुनियां मुझे, तब कहीं  पर्दा हटा।   मुखातिब मैं सत्य से  सच हो गया.. हूँ कुछ नहीं थी.. जिं...

कैसे मिलूं साथी मैं उसको

निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं   समय की बहती नदी में, डालता हूँ जाल  मन.. का,  ध्यान  के उस भंवर में, समर्पण से,  भाव से,  साध लेकर, बैठता हूं,  सच कह रहा हूँ,  आस लेकर   नित नई, आज वह  मछली मिले..। डूब जाता हूँ मैं गहरे  साथ साथी  उसी  के, तली में तब तक हूं रहता ढूंढता उसे.. दर बदर,  शाम तक  अंधेरा  होने..  से  पहले निरखता हूं ध्यान में छाया कहीं  उस  साक्षी की  एक तो मुझको मिले। पानी में दोनों यहीं हैं, संसार में पानी है उसमें और मुझमें एक ही, पर फर्क है विक्षुब्ध मैं  वह शांत है.. कैसे मिलूं साथी मैं उसको अंकुश धरूं, कैसे मैं मन पे? भागता है, मछलियों सा फुदकता है, गेंद सा लौट आता, स्टिंग जैसा.. डांट खाकर बैठता है बिल्लियों सा ताक में,  फिर भी लगा है  मुझमें अरे यह एक  कोने.. क्या करूं, दुनियां है ये.. रंगीन कितनी, लुभानी, और मन मिट्टी है रे!  निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं  समय की बहती नदी में। जय प्रकाश मिश्र जी मित्र। यह कविता आपकी अंतर्यात्रा ...