प्रश्न तो रह ही गया।
मित्रों जीवन और जीवन चक्र के रहस्यों पर ये लाइने आप को प्रसन्न करें। शुरू से ही, हेरता.. हूँ खोजता हूँ, सत्य इस संसार में, अनंत हो, पर सहज हो, अवधारणा में आ सके, हर किसी के, कहां है वो ..? अतिसूक्ष्मता से ढूंढता हूं, अनुभवों के, आंगनों में बुद्धि से, तर्क की तलवार का वार कर.. कर.. काटता हूँ ! नागफणि के फनों को तौलता हूँ, तराज़ू में, अंतसों* के। कपास के उन तंतुओं में, निरलस हैं जो, श्वेत हैं, निर्मल भी है, अन्दर कहीं, स्पष्ट हैं, सुलझे हुए, रेशे अलग हैं, देखने में। और काले बिनौले में, बीज है जो... अंकुर छुपाए, राज़ सारे प्रकृति का इस, आत्म ज्ञानी संत सा, जो मौन है। क्या हूं मैं? कौन हूँ? यही तो वह प्रश्न है.. इसके लिए, क्या है, मुझमें अंदर भरा, यह चल इ से ही खोलता हूँ, एक एक को मैं ध्यान से अति देखता हूँ! कुछ नहीं, शांत होकर आप* भीतर, वस्तुओं से मिल रहा हूँ। दृश्य हैं, संसार के भावना है, ...