इतना बड़ा त्यौहार किसका?
इतना बड़ा त्यौहार किसका? चमचम चमकता, रौनक.. भरा स्वर्ण हो फैला पड़ा इतनी बड़ी इस भूमि ऊपर जलते हुए दीपों का रेला। महल सी अट्टालिका की मुंडेरों पर दीपती, द्युति लहर सुंदर लाइनों से देखकर वह, सोचती है, तेल होता, स्नेह सा इनमें भरा तो पास की ये.. झुग्गियां सूनी न रहतीं, सोई हुई आज प्रिय, कुछ इस तरह? किसी का त्यौहार है यह किसी का मौका है यह, कमा ले वह लग गया है भोर से, होती सुबह.. धूम है, खुशी है, उत्साह है सभी भीतर कोई मना ले, कोई कमा ले क्या यही,: कम है.. त्योहार है कितना बड़ा, उत्साह सब में है भरा, आकंठ तक। सब बिकेंगे आज देखो.. किस तरह सड़कों के ऊपर मिट्टी बिकेगी दीप बन कर रंगपुत गई तो देव क्या श्रीगनेश बन कर घी तेल सारे स्नेह बन कर निरस रूई सत्व रूपी बातियों का रूप लेकर.. सत्व, रज, तम सब बिकेंगे एक ही दूकान पर त्योहार है, दीपालिका का कैसा सुंदर। असत्य हारे, सत्य जीते अन्याय ...