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वह..! नदी यह है नहीं..।

मित्रों आज नदियों को देख रोना आता है, इसी पर ये लाइने आपके लिए। अरे! यह....   वह..!  नद.... ही..  नहीं..,  किताबों... में...जिसे मैने थी.. पढ़ी.., किनारे! साफ..., सुंदर..!  निर्मल..है, जल,  सतत.., शीतल.., सुखद. अविरल विशद..., है जलराशि बहती, ठुमकती, हो इठल करती,  इस तरह वह आगे.. बढ़ती. अरे! यह....   वह..!  नद.... ही.. नहीं..। लहरें उठती, अरी.. उसमें,  देख.. उसको,  सच में,  मुझमें!  उर्मियां फंस उर्रिल होतीं!  पृष्ठ ऊपर, नदी के,  वे लहरती, मचलती.. अरे! यह..,  वह.. नदी!  है.. ही नहीं..।   पेड़.., जिसके किनारों पर, घने, छाया भरे तरुवर!  अंक में ले, इन  सभी को हवाओं से, पट उघड़ते  अंग, मोटे.. छिपाती वह. धार से हरदम पलटती..., अरे! यह..   वह..!  नद.. ही..  नहीं..। चिड़ियाँ!  उन्हीं बन छांव में  चूं चूं चहकती... मछलियां, सब तैर तरती,   उछलती.. गीत.. गाती, सभी  धारें..  उमड़तीं,।।।।  अरे! यह..,  वह..! नदी  है... ही,...

केतकी! के फूल यह, तेरे लिए!

मित्रों, एक सिंपल सी किताब है, 'वेदों की कथाएं' इसी में मुझे पड़ा मिला यह केतकी का फूल! सुगंध जाती ही नहीं इसकी मानस बोलूं या अंतर्मन से। इस लिए इसे आप को भी शब्दों में पिरो अग्रेषित करता हूँ,आप पढ़ सुगंध पाएं प्रसन्न हों यही चाहना है। कौन थी यह केतकी?  अनन्य.. सुंदर!  एक न!   था,  योग्य..  इसके!   वरण.. सम..! मानती थी..केतकी, हूँ...!  अनन्यतम!  सौंदर्य, गुण, आचार में, वह अतुल्यतम!  कहां..,  कैसे? भा... गईं!  इंद्र.. के, मन...!  पर.. स्वर्ग को, दुत्कार कर..!  देवेंद्र.. को भी,  श्राप.. कर !  जटाधारी, आदि शिव,  रक्षित..रही,  अंत तक, यह.. केतकी...  कौन थी  यह केतकी!    यह.. दक्ष पुत्री!   केतकी!  अनुपमेया..!  अनुपमम्... सौंदर्य..की ही.., 'डली' थी, उस देह में वह.., रूपसी,  उस काल मे, विशिष्टतम थी। किसको चुनती?   साथी नहीं,  उन योग्य कोई! कहीं पर, समय की उस परिधि ऊपर!  इस लिए... चिर! प्रतीक्षा... शिव समर्पित! खुद ही हुईं। केतकी तो सत...

उलझन है कैसी, सामने तुम!

एक सरिता, सी.. प्रिये!  बहती हुए...  तुम्हें..,  देखता हूं!  खोजता हूं, तुम्हें.. ही, तेरी...   इसी, जलराशि में,    डूबकर!  पा.... रहा हूँ!  अतल हो,  अगाधि.. हो,  तुम...!  प्रेम... हो हर जगह, हर रूप में ही!  सतत.. बहते.. काल की,  पल पल सिमटती  भूमि.. ऊपर,  वितृष्णा , की चाह हो तुम.!   पर हो  कहां? विकल..!   तुमको खोजता हूं! मिल नहीं पाता.. तुम्हे!   क्या अभी.. भी उस...  श्राप!  से,   श्रापित ही हूं! क्यों मिलन से,   अरी, री.., री...   वंचित! मैं... हूँ?  उलझन है कैसी!  सामने तुम!   रूप की सरिता.. मधुर!  बह.. रही !  बुलाती,  हर उर्मियों की ताल पर!  लहर ले, उत्तुंग तर...नी सुन रहा मै, शब्द तेरा,  पर अरी! मैं.. पार्थिव! हूँ। क्या... करूं। मैं भाव हूं, प्यास.. प्रिय!   तूं... रस प्रवण...! सौंदर्य की प्रतिमा! ही.. तूं.. रस माधुरी! का रूप..  तुम! मैं, मृत्तिका का पात्र! प्रिय!...

यह युद्ध क्यों है,

मित्रों, आज के परिस्थितियों पर कुछ लाइने आपको भेंट करता हूं। आपमें यह आनंद भरें यह मां सरस्वती से याचना है। यह युद्ध क्यों है, सोचता हूँ?  कोई.. बता दो?  मैं..!  पूछता हूं?  कुछ..  भी.. हो!  संतुलित..!  एक..  युग्म!  बनना.. चाहिए,  हम  मानवों  के, जीवनों..  में, 'समझ...'  का, 'आंतरिक'  और  'बाह्य..' में,  समन्वय सा । गठजोड़  इनका आज..  यह,  बिल्कुल  नहीं  है, सांसारिक....  बस्तुएं,  यह...! कुछ,  नहीं...  हैं। विश्वास...  होना... चाहिए, पदार्थ... ही, अंतिम... नहीं है। महा.. भीषण!  युद्ध था,  एक.. बहुत, पहले,  कामधेनु के,  लिए, नंदिनी.. कह!  गाय..  कह! जो... कुछ!  भी.. कह!  साधन.. थीं,  वह..!  सुख ...!  मात्र बस !  युद्ध तो,  सुख के लिए था, बीच विश्वामित्र रूपी.. शक्ति से और आंतरिक च वाह्य के उस समन्वय  प्रतिरूप मुनिश्रेष्ठ श्री.. वशिष्ठ में। दो शक्तियों, के बीच  में..  यह.. यु...

मत भून मुझको, पैन में,

मित्रों, आज की स्थिति पर यह एक कॉकटेल रचना है। साथ ही मेरे अंतर्मन के उद्गार भी हैं, अच्छे लगे तो आखिरी तक पढ़े अन्यथा...। मत भून मुझको, पैन में, चिल्ला रहे ... कुछ.. यूं...  चने...!  उछल.. कर!  स्किन हों फटते..! चटक कर, दो टूक होते..। मैं..  निकल जाऊं  कैसे...   बाहर.. इस  झुलसती... आग... से, पर, कोशिशों में,  फेल होकर पैन में,  हर.. बार गिरते..! गर्म.. उन ही  सर्फ़ेसों पे...  पैर...,  जिन पर नहीं,  थमते..! नहीं रुकते, एक... क्षण!  आज देखा!  आदमी  को!  सच कह रहा हूं!  कुछ इस तरह से, स्वप्न.. में। चने... जैसे,  पैन में ही उछलते!  लाइनों से.. फट रहे थे,  मिसाइल की नोक पर,  रखे हुए  उस  लोड..  से.. बारूद था या न्यूक्लियर!  जांच इसकी छोड़ दे.. उस बॉम्ब्स को.. फटते हुए!  देखा है मैने, चित्र में, लाल गुब्बारा  हो.. कोई! बहुत ऊंचा.. धधकता!  ईश्वर करे, यह सच न! हो!  जो इकठ्ठा है, हो.. रहा, सामान.   सारा,  हे प्रभो!  वह न! ...

'किनक' बोली..! वह किशोरी..।

मित्रों, हम मानव अपने आवाज और काव्य की  मिठास  को कितना भी महान कह लें, पर प्रकृति की वास्तविक मिठास हम मानव से कहीं अधिक होती है, इसे चिड़ियों की कूंज और सरिता के प्रवहित निनादित स्वर में हम सुन सकते हैं। इसी पर यह लाइनें आपकी प्रसन्नता के लिए समर्पित हैं। और उन बेजुबान पशु पक्षियों की आत्माओं को भी समान समर्पित है, जो आज खाड़ी युद्ध में मारे गए या अपनों से बेघर होंगे। सूर.. के पद! श्री कृष्ण... दर्शन!  अद्भुत.. भजन!   मिष्ठान्न सम, आनंद, अनुपम..!  एक क्षण में,  डुबा.. दे ते,  बाल लीला, की रसीली...   सुरसरी  में, रसभरी,  उस धार में.. आज भी, आकंठ मुझको। क्षणों... में,  यह... भिगो.. देते,  मानस पटल को, हमारे  साथ.. अपने..!   मिला देते,  बाल मन के  तोतले! मधुरतम! स्वभाव में। मीठे बहुत है, सूर के पद!  रस घोल देते कर्ण में, श्रीकृष्ण वैभव, रस अहा!  अमृत!  परसते.. शब्द में !  सोच कैसा मृदुल होगा, भाव... उनका,  रस.. भरा जब, ब्रह्म.. ही हो, बंध.. गया  बालक स्वरूपा, पाश.. में। और.....