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पटाक्षेप:

कृपा हो आचार्य श्री! की, अनुग्रह! हो, देवता का, पिता श्री! की  प्रसन्नता.. थोड़ी और ले.. लो  मां चरन रज!  इन में, मिला.. लो. सब.., तुम्हे.. मिल जाएगा। बिना मांगे मां! ही देगी.. वह जानती है, भेद  तेरा.... प्रसन्न जननी...!  क्या.. नहीं, देगी.. तुम्हे ? सोच से, भी  अति  परे...  वरदान देगी , सोच न!  तूं... फूल है,  उस डाल का। पटाक्षेप:  बदलते! इस जमाने.. में,  एक थी, मेरी..  चिरैया!   पाल.. रखा था,  उसे, अरमान.. से..।   रोज.. बुनता,  ख्वाब  मैं.. था.. अहा सुंदर!  सपनों में..  अपने रंग भरता, लालसा का,  छुटपने से। तंतु..! ले.. ले.. प्यार.. का  छूता.. था,  उसको, दूर.. से,  उसे.. देखता था, प्यार ले..। नजर की छाया में रखा  सदा उसको,  भूल जाता,  खुद को था, मैं..  साथ.. उसके। कौन सा वह एंगिल था, देखा नहीं था, जहां..  से.. हर कमी,  मैं.., पूरता था  सदा उसकी..  दिल लगा के,  बिना सोचे!  और उसकी मुस्कुराहट!   मंत्र..! थ...

आदमी एक बार हो.. लूं..।

सुना.. है,  तुम! जा.. रहे हो.. दूर..!  अब, इस जहां.. से.., चिकित्सकों..!  ने,  कह दिया है,  गोपनी यह.. बात! तुमसे..। प्रेम.. की,  ये.. बाढ़..  क्या?   इस ही, लिए...  है,  आज प्रिय.. हम दानवों से..,  मानवों को,  क्षमा.. देते, क्षमा.. करते..  अंत में,  अब.. इस तरह,   छोड़ अपना, दुराग्रह!  और  अस्मिता, इस तरह तुम जा रहे हो  भाव: एक क्रिटिकल समय आता है, अभी के जीवन में इस धरा से विदाई, जब आदमी में अभूतपूर्व परिवर्तन दुनियां को लेकर, मूलभूत रूप से आता है  अप्रतिम तुम!  कितना कोमल! मन.. तुम्हारा..  विदाई  के, इन.. क्षणों में,  क्युँ है ये!  आज तक क्यों नहीं था, मैं, वही.. था, तुम! वही थे, जग वही था.. यही होता, मित्र पहले लाभ मिलता, हम सभी को। भाव: विडंबना है, असली समझ, आदमी को, मृत्यु के पास पहुंचकर, कुछ पलों पहले ही आती है। मत करो तुम!   शोर!   मत नारे लगाओ!  विदाई..!  मेरी..  है, यह.. मिल, सभी.. खुशियां मनाओ! उत्तेजना!  ...

और यह कुछ भी नहीं था।

मित्रों, इस नियति के खेल में हमसभी का जीवन एक सुसंयोगतः घटित सफल संभावना! नेचर के किए आदमी कुछ नहीं, एक स्थिति और प्रोसेस का बायप्रोडक्ट इसी पर यह लाइने आपके लिए। वह एक सहज प्रवाह मात्र। सरलता, सहजता!   ही.. है, नियति यह! प्रवहित, सदा से, एकरव !  कभी, मुलायम! कभी  क्रूरतम! तुझको लगी, वह...! बेखबर थी..  मुक्त थी,  इस.. बात से, हर एक को कैसी लगी। किस किनारे, किस.. ओर!  प्रिय! तूं था खड़ा था उस नदी के उस  वक़्त  जब वह  किनारों को तोड़ती सीध अपनी जटाओं को  कर रही थी। वह अपनी रव में बह रही है, आदि से,  हम झाग हैं,  उसके... लिए,  उससे बने,  तैर  लें,  जीवन है जब तक फिर, उसी... में, मिलेंगे। कुछ करें साथ उसके ही बहेंगे। यह बुद्धि तेरी, तर्क तेरे..  तेरे, लिए हैं उसके लिए, तूं मात्र तृण! है तैरता.. सबकी तरह उस सतह पर या गर्भ में, कर्म की खुद स्थिति से बस कुछ क्षणों के.. ही लिए तुम ही क्यों  यह.. सभ्यता इतनी बड़ी मनुष्यता! और, दिख रही यह दिव्यता कुछ नहीं उसके लिए, एक कर्म है, बहाए और बहे खुद इस समय नद म...

ये, हिचक क्यों है?

मित्रों हम जो कुछ भी करते या सोचते हैं उसका एक असर हमारे अन्तस पर पड़ता रहता है, यदि यह क्षुद्र होगा तो पवित्र आत्मा या, निष्पाप व्यक्तित्व के सामने जाकर हम झुक जाएंगे और भीतर एक हीनता आपको घेर लेगी इसी पर ये लाइने आप सदा अच्छा करे व सोचे इसलिए। आज, मैं.. क्यों! दूर.. उससे,  इस.. तरह हूँ! फासला?   हां,  फासला! ही बढ़.. गया है,  मेरे, समझ से,  उम्र..  में। एक नन्हा..  मेमना!  मैं,  उस, समय.. था, और वह! नन्हीं परी थी,  बावली...! सी.... महल में। किस तरह हम खेलते थे!  बेलौस.. होके!  गले.. लगते! लिपटते  थे!  कंधों पे..  चढ़.. कर घूमते थे, साथ.. में,  उन नौकरों.. के! क्या?  तब.. हम, और..! थे?  ये.. आज! जो..! हैं,  वो.. नहीं थे। क्या हुआ है? मैं.. वही हूँ!  वह..! वही है, उम्र..  थोड़ी, बढ़.. गई है, समझ में, अंतर... हुआ है,    सभ्यता..!  थोड़ी चढ़ गई है!  पढ़ाई!  आज की, पूरी... हुई है। क्या?  अब, नहीं,  निष्पाप! हम!  तन मन में लादे  गठरियां,...

सुचि! और संसार!

आप सभी मित्रों का आभार आपने इसे एक सफल गीत बना दिया। और अधिकतम लोगों ने इसे पढ़ा। संसार मधु.. था, मधुरतरम.. था मिट्टी.. से जन्मा मिट्टी.. ही, था.., पास से, तत्वतः  जब कूट कर  छाना इसे,  यह धूल! कण था। मैं जानता था, सभी.. कुछ! अच्छी तरह, दूर.. था! पर, सना.. था, अंदर कहीं मैं.. इसमें ही था, यह मुझमें.. था। गहरे! से देखा,  पंचभूतों का सम्मिश्रण!  मात्र.. यह!   नित नवल, रूप! बन बन,  लुभाता था,  दर्शना! कैसी बनाता, दृश्य में यह, लिपटता था। बीतरागी! जड़ भरत! सा एकांत के उस,  अरण का यह बाल.. मृग! था। राग  रस से..  यह... भरा, छूटता बस "समय+कण" था। मेरा नहीं, सभी का,  यह  "मैं..." ही था, मैं, में सना.. यह  मात्र भ्रम!! था,  पंचभूती आत्मसंज्ञक विकार था। संसार यह,  यदि.. इसे मैं, सच कहूं!  तो,  देखने में, फूल..! था, पंखुरी.. स्पर्श! था  महक! सरसिज भीनी भीनी मदिर! था,  प्यारा ही क्यों,  अतिशय! ये, प्रिय.. था। अदा..  था,  जादुई!  पर,  मात्र! भ्रम था,  इंद्र का यह जाल...

शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!

शीर्षक:  शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!  चाहता हूँ,  गीत.. मेरे,  अधर, तेरे.. जब छुएं..!  कुल-कुल.. कुलाते,  बोल.. बन.. झरने... हों जैसे..!  बह.. उठें..। झुरझुर.. झुराते..!  समीर,...  सम..  पास से,  अंदर... छुएं! हृदय को, शीतल.. करें। स्वर तेरा..  झरना...  हो..,  कोई...  फूटता...!  खुशी का,  किसी..  ओरिफिश.. के  छिद्र सा,  नाचता!  मस्ती में  अपने,  लास्य..! करता,  मगन हो..!  हो! बहती... पवन, सा... आंचलों में, लिपट कर मन.., हृदय... स्पर्श! कर लें। कणन.. कंकन!  क़्वणन कंकन!   बज उठें..! यह.. मधुर....मंथर,  मदिर मंथर,:  मंजीर.. स्वर!  ले  बोल दें..  ताल लय में..  ढुलकते हों ओस कण, पत्तों पे जैसे। खिलते हुए किसी फूल..की,  खुशबू... बिखेरें!   सुरभि... भर भर,  भावना की  हर हृदय को, मगन... कर दें । कुछ इस तरह, अमृतकला!  ही  खिल उठें,  अधरों... पे, तेरे..। गीत... ये, ऐसे.. उठें..  सुर ताल ...

जिंदा रहा वो जब तलक

मित्रों, जीवन के कुछ अनुभव शब्दों में आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ें और आनंद पाएं। जीवन ये क्या है, अपूर्णता... है,  क्या! इस लिए.. उस पूर्णता की  प्राप्ति.. में, खोज.. में हर... गति यहां है। क्या इसलिए?  बस इसलिए!   जीवन यहां, गतिमान.. है। त्रस्त.. है,  यह, समस्या.. से,  दुख.. भरा, इतना.. बड़ा! विषाद का वितान.. है!  पूर्णता का  क्या करेगा, हाय यह!  इसको बता दो,  पूर्णता तो, अगति* है; गति* ही नहीं, उसकी कोई!  शांति.. है  वह, मृत्यु.. ही है, चांदनी नहिं, अमावस की रात है। यह रस.. विपुल, रस विविधता!   संसार.. की, उसमें नहीं है।  वह, एक रस है, प्रवाह उसमें नहीं है,  उत् तेजना, तेज, रज, तम छोड़, उसमे, सत भी नहीं है। छोड़ उसकी दौड़, खुश रह!  अपूर्णता में,  जीवन यही.. है, आनंद है, सुख है यहां  इस बिपन्नता में, याद रख!  मोड अपना रास्ता,  रास्ता वह पूर्णता का गलत है। जो नहीं है, पास तेरे, चाह उसकी ललच है, यह ललक है इतनी लगी..! किस तरह, सबको लगी?  यह ललच ही तो, जिंदगी है,  जी अभी, ...