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बैठ चिड़िया शाख पर है देखती,

बहक जाता हूँ, मैं.. अब भी  फंस हूँ जाता,  आज  भी, मंजुली, हंसती हुई इन रस्सियों के  जाल में,  प्रियल कि तनी, लुभातीं, ये  सुनहरी।   लोल  फंदे,  झूलते ये, मोह.. लेते,  चित्त..  मेरा  साथ  कैसे, ले के उड़ते। खींच  लेते,  दृष्टि मेरी, मन मेरा और मैं हूँ उलझ जाता,  चिपक जाता फिर उन्ही कंटवासियों में, बेर के काँटो में फिर से तड़फड़ाता..! पंख मेरे छिल गए हैं  खेल में इस और मन है,  पा रहा हूँ अधभरा।  सच सुनो  मुझमें है कोई  मत्स्य  जिंदा!   बहती नदी का, नवेला!  लालची,  यह कूदता  है, मचल जाता,  आज.. भी भूलकर पानी है कितना बह चुका। ताक पर रख, भूतियों को आज तक की  दौड़ता  हूँ,  संसार पा लूं... मिथ्या है  यह,  अच्छी तरह  हूँ जानता।  जानता हूँ, जग है  छिछला,  गहराइयां इसमें नहीं हैं,   कुछ नहीं हैं, पाट यह फैला हुआ। भ्रांति हैं सब दृश्य, क्षण.. हैं इन क्षणों में, कुछ नहीं मात्र छाया  सोच की,  स्वीकृति ...

इसे कैसे बेंचता

एक टुकड़ा जमीं का,  मेरे पास भी है,  आज भी  है, पैरों के  नीचे खड़ा हूँ, जिस जमीं पर, पाँव भर, तेरे सामने,  अब भी बचा है, इसे कैसे छींनता  संभव नहीं था। ज्यादा कभी था  तब  मैं सुखी  था  जोतता  था,  जमीं अपनी, बैल थे, हल था, कुआँ था। फसलें उगाता  हर तरह की, बेचता था। पसीने में डूबकर,  परिश्रम कर अंधेरों में ही सही,  तब खुशी थी अंदर कहीं दिन बीतता था। काम था, ईको बना था खर्च तो बिल्कुल नहीं था, मात्र!  माचिस,  नमक, मिट्टी तेल की  दरकार थी,  मुफलिसी में बहुत था पर सुखी था। क्या नहीं मैं उगाता था, हर खेत में, नेचुरल एक ढाल था, विशिष्टता थी, चढ़ता था कोई शक्ति लेता, बुवाई से, रहर, सनई  अन्यथा  किसी दाल से उतरता था, रबी की उन फसल से.. तब कहां यह  नत्रजन था,  ना कहीं पोटास था, मात्र तब कंपोस्ट गोबर खाद था। गाय के गोबर से घर तब लीपकर..  आम की पल्लव सजा कर ईश पूजा का यहां, विधान था घंटियां हर घर में बजतीं, गोधूलि में,  गाएं थीं  लगतीं, दूध देतीं शाम को मस्त जीवन,...

फुनगियां के आंचलों पर,

मित्रों आज के समाज और आज के आम जन जीवन पर एक कटाक्ष आप पढ़ें इन लाइनों में, आपको प्रेरणा दें कुछ कैसे भी तो सार्थक भी हो सकती हैं। फुनगियां के आंचलों पर,  दिख रहे  ऊपर ही  ऊपर,  बुंदकियों  से,  खिल रहे, गुलाबी  ये  फूल! सुंदर बहुत हैं, रंगीन कितने, मोहक भी हैं। हाइपर.. उस  लूप.. सी,  भागती  तकनीक हो, माडर्न कोई,  लहरती बस यह समझ  भारत में अपने  पुणे-बॉम्बे  बीच की बुलट वाली  ट्रेन हों,  ये.. फूल सुंदर, फुनगियों.. पर,  अच्छा तो हैं,  पर  अंधेरे हैं,  बीच में उन फुन्गियों के, वहां नीचे पेड़ में, अंदर कहीं,  उनका भी हक है जिंदा रहें, जरूरी रौशनी,  उनको मिले। प्राथमिक  विद्यालयों में,  पेयजल तो  शुद्ध हो.. पुणे-बॉम्बे रास्ते के बीच में, चल रहे, स्कूल में,  बालकों को, कम से कम, जरूरी पोषण मिले। अंतर है कितना!  सोचता  हूँ, आज अपने देश में,  तकनीक में, भव्यता में, रहन में कुछ लोग के,  ऊंचे   वहां सौवें तल्ले के भी  आगे रह रहे, आकाश...

एक यात्रा।

जीवन यात्रा पर कुछ शब्द हैं, आप पढ़ें और आनंद लें। फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं! शब्द थे कुछ, कुछ भाव थे, मानस में मेरे,  गूंजते   जिन्दगी के  सार थे वस्त्र  उनके ही मैं बैठा  शांति से अब  घर में अपने  काढ़ता हूँ, सजाता हूँ, सिल रहा हूँ। रंग सुंदर चढ़ाता हूँ प्रिय लगें, तैयार कर उन्हें, हर तरह पंक्तियों में पिरोता हूँ भेजता हूँ, नित्य सबको, मुफ़्त में, फावड़े चलते नहीं अब, क्या करूं! शक्ति का भी ग्राफ था, साइन लहर सा, शुरू  में  उठता  हुआ,  बढ़ता रहा यौवनों के  दिनों तक,  फिर रुका.. उस शिखर पर,  अंत में ढलता गया,  घटता हुआ क्षीण  होता,  उत्तल से अब अवतल हुआ। इसलिए,  फावड़े चलते नहीं  अब, क्या करूं! संसार गति है, गति में विषय है, विषय ही तो शुद्ध विष है, विष  मृत्यु..  है, और तुमसे क्या कहूं!  मृत्यु में ही नवलता है, जन्म है जन्म ही संसार है,  यह  और क्या है?  मुक्ति बौरा मांगता है,  जानता ही नहीं यह, बंधन को पकड़े, खुद खड़ा है.. स्वांस में हर मुक्त होता,  छ...

प्रश्न तो रह ही गया।

मित्रों जीवन और जीवन चक्र के रहस्यों पर ये लाइने आप को प्रसन्न करें। शुरू से ही, हेरता.. हूँ खोजता हूँ, सत्य  इस  संसार में, अनंत  हो, पर  सहज हो, अवधारणा में आ सके,  हर किसी के,  कहां है वो ..? अतिसूक्ष्मता से ढूंढता हूं, अनुभवों के,  आंगनों  में  बुद्धि से,     तर्क की तलवार का वार कर.. कर.. काटता हूँ ! नागफणि के फनों को  तौलता हूँ, तराज़ू में,  अंतसों* के। कपास के  उन  तंतुओं में,  निरलस हैं जो,  श्वेत हैं,  निर्मल भी है,  अन्दर कहीं, स्पष्ट हैं, सुलझे हुए,  रेशे अलग  हैं,  देखने में। और काले बिनौले में, बीज है जो... अंकुर छुपाए, राज़ सारे प्रकृति का इस,  आत्म ज्ञानी संत सा, जो  मौन है। क्या हूं मैं?  कौन हूँ?  यही तो वह प्रश्न है.. इसके लिए, क्या है, मुझमें  अंदर भरा,  यह  चल इ से ही खोलता हूँ,  एक एक को  मैं ध्यान से  अति देखता हूँ! कुछ नहीं, शांत होकर आप* भीतर, वस्तुओं से मिल रहा हूँ। दृश्य हैं, संसार के भावना है,  ...

दस्तावेज़

सभी मित्रों को आज देश के स्वतंत्रता दिवस की बधाई।  अस्सी-ववां स्वतंत्रता यह दिवस है,  छोटे, बड़े, बच्चे च बूढ़े और पूरा देश,  अपना  प्राणियों संग, सभी खुश हैं हृदय से। उल्लसित,  प्रफुल्लित  और  मगन हैं, देखा है  मैने, अच्छा लगा, इन्हीं में  हम भी तो.. आखिर, एक हैं। इसलिए, बस पूछता हूँ,  आज  अमृत  काल में, हम  कहां  हैं? कितना है अंतर!  बढ़ गया है,  सफेदी में.. कपड़ों में मेरे, और उनके वस्त्र में। बैठे हैं जो जीतकर  चुनाव,  ऊंची मीनार  वाली मकरध्वज के  द्वार वाली संसदों में ,  सांसदों के,  विधायकों के,  विपक्षियों  के,  पक्षियों के धवल,  उजले  पंख में...। सेवक हैं वो?  जीवन दिए?  उठाए हैं कष्ट कोई! सत्य कह,  एक भी तेरे लिए, मेरे लिए ? व्यवस्था, अधिकार, सुविधा,  पास रखें, राज, हम तुम पर करें साथ रखें, सेठ को और चूस लें,  अमृत  सभी से, मेहनतों का कर लगा कर,  प्राकृतिक दोहन करें और क्या है खेल पूरा  हो रहा  इतने द...