Posts

खुशी क्या है।

चित्त तितली बन उड़े,  फूल सा हँसता रहे, फटका  चिरैया*  यह बने.. हल्का  रहे,  हम  खुश रहें  कोई बताए न!  रास्ता  इसके लिए  हम क्या करें? तैयार हैं हम,  खर्चने को,  रोकड़ा,  बस,  जहां में हमे  नित्य नव  खुशियां मिलें। प्रसन्न मन, मेरा.. कैसे हो प्रश्न है यह  आज  का, कल भी रहेगा  सिलसिला  इस ही  तरह..  यह नित्य का। खुशी क्या है, आओ टटोलें बंद मन में, खुले मन  से,  प्रसन्नता का  राज क्या है, चित्त में, इसे मिल के ढूँढें.. मित्रता एक मित्र से, मन के अपने मीत से, रुचि  की अपने, सखा हो या सखी अपनी,  सुखी हो  जो,  क्या खुशी है  मुझे बताना!  कैसा लगा  ये तराना.. हां तराना..। पग आगे रखो.. धीमे, धीमे..  और आसाँ खुशी है यदि चाहते हो, पकड़ना  इसे पल याद  कर  लो, प्यार के.. पेंग के उस, जो नहीं तुम पा सके.. सांस हल्के हल्के लो तुम.. और भी आसान हैं ये प्रसन्नता.. जब पुण्यशीला आदमी को  सादगी को,  शील  उस...

प्रश्न हैं कुछ।

प्रश्न हैं  कुछ  अनुत्तरित  गूंजते हैं  शोर करते  आज भी,  अंतर्मनों में बालपन से, उम्र तक इस! ठीक वैसे ही पड़े हैं  पाथर! हैं ये.. गलते नहीं, घिसते नहीं,  पिघले नहीं..  हल 'समय'  इनका  नहीं है इस बात की मैं.. 'गवाही' हूँ! मैं कौन हूँ  खोजता हूँ आज तक! पाया नहीं,  शुरू से, ले अभी तक! बूढ़ा हुआ,  पक गए  विचार मेरे,  अंग मेरे, दृष्टि मेरी, छोड़ कर  साथी  गए,  सुरधाम कुछ..!  और मैं..  यह प्रश्न लेकर आज भी  बैठा हुआ  वैसे का वैसा..  पाथर! हैं ये..  घिसते नहीं,  पिघले नहीं.. गलते नहीं। क्या है ये..?  हम  'जहां' हैं,  'जहां' कहते हैं इसे? क्या हो रहा है काम इसमें.. 'काम' कहते हम किसे  संसार में..। जब घोलता हूँ  एक में ,  इतने बड़े  संसार  को मिट्टी है बनती,  मिट्टी ही बचती, मिट्टी ही सजती,  जिंदगी के महल में  देखा है मैने,  सारे दरो-दीवार पे। और क्या है,  मिट्टियों में.. अंतर्निहित! यह पूछता हूँ?  ...

ब्रेक-अप, थोड़ा समय दो।

ब्रेक-अप यह प्रिय  आज का,  बहु-उच्चरित  एक शब्द छोटा तोड़ता जीवन अनेकों,  एक क्षण में!  भीतर बहुत कुछ छोड़ जाता  सदा को, मोड गहरा!  बना देता कागज पे कोरे  मुडा था,  जीवन यहीं पर निशान पक्का  जीवनों में हमेशा को।  इसी पर ये लाइने। थोड़ा समय तो दो मुझे जुड़ मैं पाऊं  मृदा  से, अपनी जड़ों  से  फिर  दुबारा, जो आज की इन  तल्खियों की जिंदगी से  सूख कर  रेशा बचीं हैं,  नमी बिन,  बिन स्नेह के,  देख कैसे..  सूखी हुई,  उलझी पड़ी, मेरी लटों सी। मैं चाहती  हूँ,  आज  भी  इस हाल में भी प्यार से कुछ,  बचा लूं  सजा लूं, अंदर कहीं,  बस एक कोने। किस भी तरह,  सूखी हुई ये पंखुरीं  अपने सुनहरे ख्वाब की.. हीरा थीं ये, अभ्रक बचीं अब  पर बचा लूं इन्हें,  चाहती हूँ टूटने से। अस्तित्व हैं ये हमारी..  तुम्हारी भी.. जन्म में इस, हम मिले थे, खिले थे, एक सरोवर  हम!  झूले चढ़े थे,  हवाओं के कमलिनी और कमल से  हम  पंख...

धर्म की सीमा कहां तक।

  धर्म की सीमा कहां तक, जानना है? अधर्म को मैं जानता हूँ! अच्छी तरह,  यह.. आदमी  तक..  अधर्मी तक। आह!  ईश्वर, कहां तक  हम  मानवों का साथ देगा,  और कब तक पूछता हूँ! नाराज... हो मत,  इस जमीं के छोर तक,  जीवनों के अंत  तक या वहां.. मृत्यु के उस पार तक..! सत्व का वह पुंज है, अधर्म नाशक..! बिगड़े हुए इन मानवों का,  दानवों  का  कल्पना-गत वध करेगा वही है हल! अधर्म नाशक!  एक ईश्वर..!  या हम हैं कुछ  सीमा  के  भीतर,  पूछता हूँ  बली हैं वे..  किसके बलपर अधर्मी..! हम सभी से  शक्तिशाली और हम हैं सत्य वादी!  सत्व शाली!  फिर इन सभी से इस तरह से, त्रस्त क्यों हम? यह खेल क्या है? भेद क्या है?  इतने दिनों से  युद्ध की इस  महाजड का उच्छेद क्या है?  अधर्म के संग, धर्म के इस  युद्ध का  आखिरी में अंत क्या है...  कुछ गुण हैं हममें काम करते  हम सभी में, यह भेद है निर्माण में इन शरीरों के शुरू  से, पञ्चतत्वीकरण इस ब्रह्मांड के इन तत्व का.. पांच...

स्वाद यह कुछ अलग है।

एक कविता आज आपके साथ मिलकर, आप इसे पूरा करिए..। स्वाद यह कुछ अलग है, अप्रतिम है, अनोखा! है। कौन सी संज्ञा   दूँ इसको मौन के रस की तरह का हां! हां! कुछ.. कुछ.. उसी सा। शांति में..  अंदर की मेरी.. प्रशांति जो है घुली रहती..  चांदनी की ठंड सी सुंदर  सुकोमल  दूर तक फैली हुई, हर तरफ जो एक सी और इनके ज्ञान का  जो मर्म होता इन सभी के अंतरों में  एक जो आनंद रिसता अव्ययी हां उसी के स्वाद जैसा.. परम है। यह सांसारिक स्वाद से  हर विलग है ऐश्वर्य इसका हर किसी को  सुखद है यह..  स्वाद ही कुछ अलग है, अप्रतिम है, अनोखा! कौन सी संज्ञा  इसे दूँ..!  हां, हां, कुछ कुछ  प्रभु भजन सा। शब्दों से यह परे है,  अनुभूति में यह घुला है,  कौन जाने स्रोत से किस निकलता है यह बोध है बहता हुआ..  न रूप है, न रंग है,  फिर भी यही  सर्वत्र है,  कण-कण में है फैला हुआ मौन होकर  इस छोर से उस छोर तक  विस्तार इसका..  इसे छूने.. गर चलूँ,  तो स्वयं में हूं उतरता,  और जितना गहरा उतरूँ,  उतना ही लगता—  मैं...

मधुर हो तुम!

'मधुर'  एक खोज की समाप्ति इतने दिनों से खोजता बूढ़ा हुआ तुम्हे! और तुम इतने मधुर.. अब तक कहां थे.. कितना ढूंढा.. पुस्तकों में वेद.. के उपनिषद.. में, श्यामता की स्याहियों के बीच तुमको, अरण्यों.. में नदियों किनारे तीर्थ.. में इन और तुम यहां! इन रश्मिमय मुस्कान में ऐसे छुपे थे, निर्लिप्त सबसे, इस तरह एकांत में, इस मौन में.. इस शांति में, लिपटे हुए मुझे न दिखे तो, उम्र भर तुम न दिखे। अब एक हो, मेरे साथ हो, यह ज्ञान ही तो न मिटे, भ्रम न उठे, इतना करो। हे मधुर! तुम्हे सोचता हूँ निकट इतने, तुम मेरे थे.. प्रेम के इन रसों में, भीगे पड़े करुणा सने, इन भाव में, उद्गार में.. अंदर मेरे..। लीला तेरी.. यह छद्म ही अनुभूति की, मेरी दीवारों को वेधती जब.. रस निकलता आनंद का अंदर कहीं यह.. और मैं बहने हूँ लगता समीर सा भीतर ही भीतर हे मधुर! इतने चतुर! इतने दिनों तक पूछता हूँ क्यों छिपे थे। आज जाना, मधुरता का राज़ सारा, आज जाना झलकता सौंदर्य का इस प्रकृति में हल्का इशारा किस ओर था, मेरे लिए.., घेरे मुझे.. अरुण उषा खेल का खिलता नजारा! आवरण के पार्श्व में, आड़ में तुम खुद छुपे थे..। हे मधुर अब देखता हू...

उतर गहरे!

इतनी बड़ी  इस राह ऊपर जिंदगी की सड़क पर  चलता हुआ  तूं और मैं..  जरूरी तो नहीं है,  नेक ही, हर  आदमी  हमेशा, हर बार ही,  हमको  मिले..। जो बिना देखे, रंग को  बदलते इस  रूप को  बिन पड़े किसी भरम में   सत्य परखे परखने में सफल हो हमे पास कर दे,  प्यार कर ले,  जिंदगी में। हर कोई तो इस तरह का नहीं होगा,  इस जहां में जान लें इसलिए  साहस बटोरें  अपने में ही माद्दा.. जब कोई हमें   ना कहे,   बिन गुने असफलता उसकी है ये..  अपनी नहीं हम न हिलें, अंदर कही से  विश्वास! अपने पर रखें रास्ता जीत का कायम रखें सद-रास्ते से न हटें। टूटें नहीं  उसे माफ़ कर दें,  सामना इस नापसंदी का करें विश्वास से, खुशी से, हिम्मत रखें। अन्यथा टूट कर  हमें क्या  मिलेगा,  गांठ कोई, एक मन की कंकरी एक सख्त  सी,  भीतर कहीं चुभती रहेगी, करकती जिंदगी भर, जिंदगी में। साथ में  एक क्षोभ भी  पलता हुआ भीतर कहीं उस आदमी के लिए ही  रिसता हुआ, कोई घाव सा नुकसान जो अपने लिए। इस लिए य...