निकलता कांटा नहीं मैं क्या करूं।
शीर्षक: निकलता कांटा नहीं, मैं क्या करूं। निकलता कांटा नहीं, अंदर कहीं समाज का इस, मन.. में धंसा है, करकता है, स्वांस संग हर कसक देता झेलना आसाँ नहीं है। पीड़ा उसी की नेत्र से पहले बही थी, शब्द बन बन लेखनी से वही है, जो लिख रही है। निकल जाए.. जिस किस तरह! उन आंसुओं संग चाहता था, चैन आए, थोड़ा जल्दी चाहता था। निकला नहीं यह आज भी इस चाह में शब्दों के इन जयमाल में, दिन रात इनको पिरोता हूँ। पर सूक्ष्म है वह.. स्थूल है यह दृष्टि मेरी, पुरानी, साफ दिखता कुछ नहीं है, धुंध है भीतर कहीं छंटती नहीं मैं क्या करूं? अचानक है करक जाता, और मैं, हूँ.. चिहुंक जाता, सोचकर बेकार हूँ आवाज़ सुनकर हर किसी की दौड़ जाना चाहता हूँ, साथ सबके, जी नहीं, आगे रहा हूँ, संसार की इस दौड़ में अपनी उमर में संसार में, जब तक रहा हूँ।...