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सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के,

बुनता रहा मैं जिंदगी दिन रात लग के, लगन से, अंत में सब.. कुछ  न! निकला.. सामने मेरे.. सवाल ही थे। इसलिए... प्रिय! क्या विधा है, क्या कहूँ,  यह जिंदगी! काढ़ता  हूँ  फूल कलियां!  कैनवस पर,  जब  कभी झाँकती..  हैं...  पत्तियां  मुझे बुलातीं,  हिलती हुई,  अंदर कहीं। रुक हूँ जाता,  काम से,  कई बार मैं  यह  सोचता.. जीवन खिलेगा,  पक्का है ये.. सभी का इस काम से, पर डर हूँ जाता  देखकर  मैं  इरादा,  आज के इस आदमी का। हर क्षण बदलता  तुच्छ से  किसी  स्वार्थ में मुझे ना भरोसा.. वरदान को, इस रेशमी  फैब्रिक्स को  यह कफ़न जैसा ओढ़ न ले। सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के, तिकड़मों,  तकनीक से,  नए उद्यमों, नई  नीति से पा रहा  हूं दूर..  खुद से,  स्वास्थ्य.. से आज अपनी, मरीचिका के क्षेत्र में। संवारता हूँ भविष्य अपना  आज जितना.. सोचकर नजदीक उतना  पहुँचता हूँ,  आदमी के, आप के..  संहार के। क्या विधा है, क्या कहूँ, यह जिंदगी! काढ़ता हूँ फ...

रूप श्री।

आप सभी मित्रों को शारदीय नवरात्रि के दशमी तिथि, विजय दशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। रूप श्री  और कीर्ति बाँधे,  पगों में  यह लक्ष्मी, काल रूपी पद्म थामे,  हाथ में,  मुख पर लपेटे लज्जा कैसे  कुलीनों की.. आंख में भर दया, करुणा  तैरती  स्थिर बिछी किसी झील में  शील सुंदर  वस्त्र में कैसे छुपाए बिहरतीं  हैं शरद की नवरात्रि के  अंतिम दिनों में...  सत्व वाले घरों में,  देखा है तुमने.. जैसे.. मैने? पग दो  ऐसे न तोड़ो फूल तुम,  इन डालियों से बेखबर  कांटे है  सारी.. डालियों में देख न कितने  नुकीले,  विष बुझे..।   मुलायम! तेरी उंगलियां हैं, पंखुरी ही..  प्यारी प्यारी.. गुलाबी,  पाटलों की, अतीव सुंदर,  फूलों से इन ये बहुत  मंहगी.. इसलिए  ऐसे न तोड़ो फूल तुम..। मुस्कुराया फूल!  हंस कहने लगा क्यों रोकते हो, प्रिया को तुम इस तरह  स्पर्श मैं भी चाहता हूँ.. स्नेह का, उन उंगलियों का सौंदर्य हूँ, सौंदर्य का  संसर्ग...   मैं भी चाहता हूं अस्तित्व हूँ, प्...

सीखता जब तक रहा

सीखता जब तक रहा  बच्चा रहा मैं, मुलायम सा, उत्स था मेरी  जिंदगी में..। थकता  नहीं  था,  बहता हुआ  कुलकुल कुलकता  झरता हुआ  झरना था मैं। आज भी जब सीखता हूँ!  मन से कुछ, एक  उछल भीतर रेंगती है, छुलुल छुलछुल... मन मेरा संगीत में है डूब जाता काम के.. तन भूल जाता  कितने समय से नच रहा मैं। मन लगे तो काम क्या है? कुछ नहीं,  आनंद  है,  अन्यथा यह  जेल है सबसे बड़ी.. देखा है मैने..लोगों को मन मार कर बैठे हुए..  बिलबिलाते  सीट पर हां!  काटते,  काम में,   यह जेल ही  इस जिंदगी भर ।  जिन्दगी!  क्या चीज़.. है, बहने को कुछ इसे  चाहिए.. आधार.. मीठा!  मिश्री जैसा, प्यार सा  जिस पर बहे.. काम का कोई धरातल हो, मन लगे। मीत कोई, स्वीट  हो या जगह सुंदर! कलियों भरी, प्रिय  महकती..  ठंडी ठंडी  मन जंचे..। पर क्यों है ये..  यह प्रश्न है,  काम तो बस काम है हर काम भी तो जरूरी है, हर आदमी जंचता नहीं  क्यों  आदमी तो आदमी है, कुछ तो है, वह.. तुझे प्रिय ...

थकने नहीं देगी तुम्हे ।

थकने नहीं देगी तुम्हे ये भूख है, तमन्ना, आशा है प्यारे! आस.. है,  संसार  की,  रंगरूप की  स्वर्ण की चमचम चमकती  रश्मियों  की  खींचतीं हैं चित्त तेरा बांध लेती हैं तुझे  मनोहर प्रिय,  छुलछुल छलकते  रेशमी उन बंधनों में..  अत्यंत धीमे.. और धीमे.. और तूं..  फिर  तड़फड़ाता  अंत में, एक  दिन  कोने में मिलता  यहीं इस संसार में..  अकेले  एकांत में,  कुछ बुदबुदाता बेकार था, यह खेल.. सारा! जो नहीं  बंधते हैं इनमें,  लुभावने,  चमचम चमकते  बंधनों में,  उनके लिए, पिंजरा.. अलग है पास उसके,  अस्तित्वनी वह! छद्मिनी वह! शक्तिनी वह! ग़ज़ब है,  पाश है हाथों में  उसके। बांध लेती ज्ञान के , बल बुद्धि के विवेक के, तर्क के.. आयाम में..। उलझा है लेती, विद्वान को सन्यासियों को पुस्तकों में, मौन  में,  समाधि में। फिर  झुलाती है  झूलना...  यश कीर्ति का,  सम्मान का,  नाम का रिद्धि, सिद्धि का,  नजदीकियों  का, अपने से त्याज्य इस संसार मे...

निकलता कांटा नहीं मैं क्या करूं।

शीर्षक: निकलता कांटा नहीं, मैं क्या करूं। निकलता कांटा नहीं,  अंदर कहीं  समाज का इस, मन.. में  धंसा  है,  करकता  है, स्वांस  संग हर  कसक  देता  झेलना  आसाँ  नहीं है। पीड़ा  उसी की  नेत्र से  पहले  बही थी, शब्द  बन बन  लेखनी से  वही है,  जो लिख रही है। निकल जाए..  जिस किस तरह! उन आंसुओं संग  चाहता था,  चैन  आए, थोड़ा   जल्दी  चाहता था।   निकला नहीं यह आज भी इस चाह में   शब्दों  के इन जयमाल में,  दिन रात इनको पिरोता हूँ। पर सूक्ष्म है वह.. स्थूल है यह  दृष्टि मेरी,  पुरानी,  साफ दिखता कुछ नहीं है,  धुंध है भीतर कहीं छंटती नहीं मैं क्या करूं?  अचानक  है करक जाता, और मैं, हूँ..  चिहुंक जाता, सोचकर  बेकार  हूँ  आवाज़ सुनकर हर किसी  की  दौड़ जाना चाहता हूँ,  साथ सबके,  जी नहीं,  आगे रहा हूँ,  संसार की इस  दौड़ में  अपनी उमर में संसार में,  जब तक रहा हूँ।...

सुपर इंटेलीजेंस

आज तक यह आदमी  सर्व.. था,  नियंता था, नियंत्रक!  इतनी बड़ी  इस सृष्टि का,  इस विश्व का,  इतने युगों तक।   अकेले इस आदमी का  एक क्षत्री  राज्य था   इतना बडा!  इस  भूमि ऊपर!  दूसरा कोई नहीं था  टक्कर में इसके  ज्ञान..  में बुद्धि..  में,  व्यापार.. में  चेतना के  क्षेत्र में, हर  चीज में  अंतिम यही था।  प्रथम भी  था..  प्रकृति को इस समझने में,  तर्क  में, विवेक में, और स्मृति में। अब मिला है,  जोड़ का कोई,  तोड़ का कोई, बराबर इतने दिनों पर,  हरा दे जो, तोड़ दे  ग़ुरूर इसका  एक क्षण में।   हर तरह से..  मात दे दे,  सेकंडों में..  इसे वह  इसलिए  आज सारे  शीर्ष पर उस खड़े है,  जो..  तकनीक के, त्याग कर हैं भागते . पद ही अपना इस तरह हार अपनी  मानते बड़ा कुछ होने को है शीघ्र अब कुछ ही दिनों में वे डर गए हैं,  हाल से,  सुपर इंटेलिजेंस के  बढ़ते हुए स्वतः के परिवर्तनों से नव...

खुशी क्या है।

चित्त तितली बन उड़े,  फूल सा हँसता रहे, फटका  चिरैया*  यह बने.. हल्का  रहे,  हम  खुश रहें  कोई बताए न!  रास्ता  इसके लिए  हम क्या करें? तैयार हैं हम,  खर्चने को,  रोकड़ा,  बस,  जहां में हमे  नित्य नव  खुशियां मिलें। प्रसन्न मन, मेरा.. कैसे हो प्रश्न है यह  आज  का, कल भी रहेगा  सिलसिला  इस ही  तरह..  यह नित्य का। खुशी क्या है, आओ टटोलें बंद मन में, खुले मन  से,  प्रसन्नता का  राज क्या है, चित्त में, इसे मिल के ढूँढें.. मित्रता एक मित्र से, मन के अपने मीत से, रुचि  की अपने, सखा हो या सखी अपनी,  सुखी हो  जो,  क्या खुशी है  मुझे बताना!  कैसा लगा  ये तराना.. हां तराना..। पग आगे रखो.. धीमे, धीमे..  और आसाँ खुशी है यदि चाहते हो, पकड़ना  इसे पल याद  कर  लो, प्यार के.. पेंग के उस, जो नहीं तुम पा सके.. सांस हल्के हल्के लो तुम.. और भी आसान हैं ये प्रसन्नता.. जब पुण्यशीला आदमी को  सादगी को,  शील  उस...