सीखता जब तक रहा
सीखता जब तक रहा बच्चा रहा मैं, मुलायम सा, उत्स था मेरी जिंदगी में..। थकता नहीं था, बहता हुआ कुलकुल कुलकता झरता हुआ झरना था मैं। आज भी जब सीखता हूँ! मन से कुछ, एक उछल भीतर रेंगती है, छुलुल छुलछुल... मन मेरा संगीत में है डूब जाता काम के.. तन भूल जाता कितने समय से नच रहा मैं। मन लगे तो काम क्या है? कुछ नहीं, आनंद है, अन्यथा यह जेल है सबसे बड़ी.. देखा है मैने..लोगों को मन मार कर बैठे हुए.. बिलबिलाते सीट पर हां! काटते, काम में, यह जेल ही इस जिंदगी भर । जिन्दगी! क्या चीज़.. है, बहने को कुछ इसे चाहिए.. आधार.. मीठा! मिश्री जैसा, प्यार सा जिस पर बहे.. काम का कोई धरातल हो, मन लगे। मीत कोई, स्वीट हो या जगह सुंदर! कलियों भरी, प्रिय महकती.. ठंडी ठंडी मन जंचे..। पर क्यों है ये.. यह प्रश्न है, काम तो बस काम है हर काम भी तो जरूरी है, हर आदमी जंचता नहीं क्यों आदमी तो आदमी है, कुछ तो है, वह.. तुझे प्रिय ...