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शून्य के भीतर छुपा क्या?

आ..  प्रिये..!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर  छुपा,  वह कौन है, जो  दूर जग.. से!  भूति.. से,  एषणा.. से, कर्म से..  सुख.. दुख.. ही क्यों  अनुभूतियों से। सोच तो  एक बार उसको!  इतने दिनों से अकेला प्रिय मौन है, क्या यही वह शून्य है। शून्य है जो..  कुछ  नहीं, वह परिमाण में, स्थान में!  आकार.. में, और रूप में  ही नहीं  यह आस्वाद से भी  हीन है। दूर है इन  इंद्रियों... की चाह से!  विरस है, वह रसों से!  सौंदर्य से.. फिर भी प्रिये, य ह...  आसन जमाए क्यों जमा  है  शून्य सारी सृष्टि में,  इतने दिनों से। आ प्रिये!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर छुपा,  वह कौन है। क्या यही वह मौन है। कौन है यह!  बोलता ही है नहीं, डोलता हो, पैर से,  पैर इसके हैं नहीं गोल है यह, हर तरफ से  एक सा,  शून्य की यह  शक्ति है क्या  इसलिए। कुछ नहीं, पर काम का है, शून्य है, पर पूर्णता है, शांति है  यह परम  मित्रों,  शून्य बिन सब शून्य है। जय प्रकाश मिश्र जय ...

कितने निमंत्रण बाँटती हो।

जीवन के कुछ गूढ़ तत्व हैं उन्हीं में से एक पर यह लाइने आपके लिए। कितने निमंत्रण बाँटती हो,  ख्वाब के तुम,  निमिष  भर  में, पर लगा तुम कल्पना के  उड़ाती मुझे  दूर उस नीले... गगन में।   दृष्टि के निक्षेप में जोड़ा  कभी  है,  मासूम  मन, कितने गिराती 'हरीले' तुम!   जो देखते  चितपावनी  चितवन तेरी..  आह भरते  सभी  हैं  अंदर कहीं..! से। कभी सोचना  मेरे कहे हृदय कितने..  तोड़ती हो,  फूल.. से तुम, मुस्कुराती .  तुम्हे.. देख लें जो.. बचा कोई.. एक,  होगा शक मुझे है.. आज तक,  आहत हुए बिन! कौन हो तुम!  क्यों है ये.. प्रिय.. नहीं लगता मन  सभी का  इस जहां  में.. देख लें  जो  दृष्टि भर.. तुम्हे.   आभरण में, स्वस्थचित्ता  किसी.. भी दिन। मन है क्या यह.. रूप है क्या संबंध  इनके बीच कैसा.. प्यास यह, और आस है क्या.. सांस का कोई खेल है क्या.. एकाग्रता इस दृष्टि की शून्यता संवेग की शांत मन में मेल है क्या.. आनंद इनके बीच बसता  कहीं है क्या...

ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,

मित्रों आज के बंद शहरी जीवन पर ये पंक्तियां आपके लिए। ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,  मिलेगी क्या? ऊब  है  यह  जिंदगी  अंधेरी  इन  छांवों में धूप थोड़ी,  हवा ताज़ी मिलेगी  क्या..? देखता हूँ शाम होते, भागते  चार बजते,  काम पे तितलियों को शहर की  सड़कों पे इन..   सज़धज किए परिधान  पहने,  परियाँ हों  जैसे  निकलतीं। उत्साह  भर  भर  मत्स्यगंधा...  रूपसी,  हां रूपसी!  खिलखिलाती हंसती हुई,  मुक्त री अत्यंत छोटी बात पर कुलकुलाती..  फुदकतीं.. उड़ती हुई। सुष्ठु तन, मन, प्रसन्न हैं सब ताज़ी हरी, आज की उन सब्जियों  सी देखते ही  ललच आए, खिल उठे मन। फूल होंगे.., घरों में रखे हुए अधिक सुंदर, पर  रुग्ण होंगे आराम  कर  कर आलसी।   एक सच कहूं  आज की इस जिंदगी में सुबह से ले शाम तक खोजते आराम हम.. ए सी लगे  कमरों में  बंद.. बंद... यही बाकी अब बची ये जिंदगी..। ढूंढता हूँ प्यास थोड़ी,  मिलेगी क्या? ऊब है  अब जिंदगी  अंधेरी छांवों म...

आदमी अब वस्तु है।

मित्रों जीवन की सच्चाई का चित्र बनाने की कोशिश में लगा रहता हूँ उसी का एक पेज यह भी है। किस शांति से 'वह' झेलती है  गरीबी लाडो मेरी,  अभी उम्र कितनी, बहू थी,  लाजों भरी नवेली। गुलाबी  वह चूनरी.!  फेरे लिए थी सात  प्रिय संग अब भी है रखी  संदूक  में वैसे की वैसी पहन  जिसको  कल्पना में  उड़ चली थी.. ताजी हरी बिन सलवटों के सिसकती है  भाग्य पर, संसार  पर आज  वह  इस  शहर में। दो माह के ही बीतते  खोजती है,  काम धंधा  जुटाती है  रसद  अपनी  किस भी तरह,  काम कर, हर  शाम.. की।  देखा  है तुमने.. शहर की गलियों को इन बेबाक हैं ये  किस  तरह से  नीर- सी.. चाहती हैं  गार  लें  निचोड़ लें  श्रम महत्तम,  काम सारे  उससे ले लें  और वेतन न्यूनतम.. देना पड़े।  यही तो..  हम  चाहते हैं  श्रेष्ठ जन! बुद्धि का उपयोग सारा  इसी में है, तभी तो चालाक हम! अन्यथा बोल न  क्या नहीं हैं  मूर्ख  हम..। समस्या...

काशी है क्या?

एक दिन  डगमग हुई,  उल्लास भर उद्यत हुई, वह..,   नाचने को, डमडम-डमाते डमरूओं  की थाप पर, नाथ,  भोले.. नाथ  के। कौन है?   कुछ बता तो बोलती, क्यों है नहीं, मुस्कुराती खड़ी है,  इतने दिनों से श्रीनाथ जी की नाच को  इस तरह  तूं देखकर बस नाचते।  काशी है क्या! जो डोलती है,  पिनाकी के, घुंघरुओं संग,  डमरूओं की,  डमडमाती,  थाप पर.. उन आदि शिव के,  हुलसती है नित्य ही तुम भोर में। लहरियां, गंगा की जिसको जगाती हैं क्या वही काशी है तूं? लोग कहते,  शूल  पर अटकी पड़ी तूं आदि से,  उन आदिशिव के,   शूल  तीनों,  बे-असर  क्या इसलिए तेरे लिए। देखता हूं, सत्व, तम, रज,  राज अपना  खोलते हैं!  सामने तेरे!  खड़े हैं    और तूं भागीरथी की गोद में  मस्त खुद में,  साथ  पा  अन्नपूर्णा संग आदिशिव का। बोल तो, कौन है  तूं.. काशी है क्या.. स्पर्श  कर… जिसको है, गंगा बह रही आदि से ले, आज तक  पावनमयी,   बह रही है आदि से सं...

प्रश्न उसका यही था।

देखा है 'उसको' घूमते  शहर में..  इस  अल-सुबह,  भागती..    सड़कें  ये तेरी  वीरान! थीं जब.. प्यास गहरी, प्रश्न पूरा  छलकता.. उन आंखों में था.. चेहरे में नैराश्य मिश्रित आक्रोश..! अन्दर पल रहा था।  कुछ झांकता  आंखों से था  उन  बवंडर! सा  आप में से उठ रहा  आप में ही.. सिमटता बेकारी के  मारे हुए  उस  युवा.. से,  वह  'आदमी'  बनने को था। विचारों की बाढ़.. भीतर  बह रही हो झंझावात कोई घहर करता दूर से संकेत  कोई  दे  रहा हो.. सूनी आंखे, और ऐंठन साथ में ले सूखती उन पसलियों में अकेले  मृगराज हो.. शहर के इस छद्मकारी  व्यवस्था से मुझको लगा वह  मिल रहा था..। बेकार से  उस  युवा.. से,  'आदमी' वह बन रहा था। मुझको लगा वह थक चुका है, अनिर्णय की नाव पर बैठा हुआ, सोचता पग बढ़ाता  प्रश्न अपने तौलता.. मूक ही, उन महल जैसी मुंह चिढ़ाती बिल्डिगों से, लड़ रहा है। स्वप्न था संसार उसका.. तितलियों के रंग का रंग रंगीला..! अभी कल तक अब  फेल हो हो हर जगह, बेक...

दिल चाहता है खूब भीगूं..।

उतने ऊपर सांवरी  उन बदलियों  की  कोख से,  जन्म  ले, ये  नन्ही बूंदे! प्यारी-प्यारी,  ठंडी- ठंडी उतरती हैं,  यहां  नीचे,  धरती पे अपने रसवती.. देख कैसे,   स्नेह भर रे..। चूमती मुख पत्तियों का फूल का,  एक  एक कर बारी..  से उनकी ,  जमीं ऊपर शाख पर  मच रही  चुलबुली,  आवाज  यह  फुसफुसाती.. सुरसुराती  धीमी धीमी,  मधुर  इतनी बज रही मंजीर हो  दूर.. प्रिय! कहीं रस..  झीनी झीनी, धीमी धीमी।  मुझको लगा, सब  प्रकृति की  मासूम  सी  ये.. बच्चियों हैं! कुलुल करतीं, कलिल करतीं एक संग कर रही  कोई  कार्यक्रम!  उन्ह बच्चियों का आपसी चुंबन है ये। कोई किलक उठती  अचानक, कोई छलक जारी  स्नेह भर कोई टपक जाती  प्रेम से कोई छटक जाती  फुदक कर, खेलती  हैं,  खेल ये,  रे प्रिए, देख न  झरती हुई,  बरसात में,  इस अमावस की रात में  आ निकल बाहर.. आज तूं भी प्यार कर और मिल.. इन्हें।   चाहता  हूँ,...