Posts

इस प्रकृति का एक खिलौना मैं भी था?

मैं..  कब नहीं था, रूप.. तब  कुछ अलग था, रुचि.. अलग थी,  योनि.. भी  यह  नहीं थी, पर मैं हमेशा  रंग, रूप अपना  बदलता..  प्रिय यहीं था। यह बात  सच  है,  भूल जाता हूँ  मैं खुद  को, आवरण*  जब बदलता हूँ,  देह का,  बदल जाते तुम भी हो  प्रिय! काल के साँचे में ढल के सोचना!  बालपन में  जो मिले थे तुम मुझे वह, यह नहीं थे,  बदले हुए हुए हो काल की धारा में बह के। रूप परिवर्तित तेरा,  रूप परिवर्तित मेरा हजार मृत्यु मर चुका तूं  एक मृत्यु.. मैं मरा। कौन हूँ!  मैं? जानते हो, क्या.. मुझे? पहचानते हो  मात्र तुम इसलिए की  साथ  हो। मित्र हो  इतने.. दिनों से,  मिले हो क्या? अलग होकर आप से संसार से, मेरे रूप से, मेरे रंग से,  मेरी आकृति से  भ्रांति से, कभी दूर रह के। बुलाती है प्रकृति मुझको, ठीक वैसे, बनाते हो तुम खिलौना! खेलने को, रूप लेता, इसी में मैं  देख न!  पानी वही, मिट्टी वही,  आकाश सबका एक ही, अग्नि है कब बदलती! यही तो सामान ले  हर ...

अप्रतिम कुछ देख तो (स्लाटर हाउस-5)

शीर्षक अप्रतिम कुछ देख तो। देह की सीमा है, सीमित! जिनसे बनी  उन अवयवों  तक, उसके आगे.. चन्दनों की महक है,  चांदनी का  नृत्य करता  राज् है,  फैला पड़ा  तारों  के नीचे,  अछूता,  निर्लिप्त, अनुपम! आ देख न!  तेरे लिए  पलकें बिछाए खड़ा है ये, शुरू से। चलोगे? क्या साथ मेरे, सफ़र पर, उस मन है  तुम्हारा?  छोड़ दोगे,  सभी लालच!  सच में तुम क्या?  इस धरा का! उड़ोगे तुम साथ मेरे,  नीले वहां,  उस चमकते गहरे! गगन तक? परा है, हर ओर अपने, मिट्टी से हट कर  सोच तो! देख तो, आंखों में गहरे, हंसते हुए किसी बाल शिशु के। मगन होकर, भूलकर  सब नृत्य में,  क्या भाग लोगे? बोल न,  गाती हुई, उस  नवलिमा,  इस प्रकृति के साथ मिलकर नचोगे क्या लय मिलाकर? कौन है तूं  जानता है?   समष्टि पूरी! दिखता जहां तक,  वह..  दूर तक  उस.. क्षितिज तक! सृष्टि सारी, इतनी बड़ी,  और यह सारा  जहां, इतना बड़ा,  सच मान.. मेरी, तेरा ही है, तेरे लिए! बाहर निकल  बस  क्...