अचानक मेरे मुंह से निकला।
चित्र! तो मैं भी.. तेरे.. ही, हाथ.. का हूँ हे, प्रभू..! सोचता.. देखता.. मूरत प्रभू की आत्म में घुलता गया। अचानक! मेरे मुख से निकला आदमी ने.. रूप.. तेरा, इतना सुंदर.. क्यों चुना। क्या.. इसलिए सुंदर सभी है? सुंदर बहुत, मैं भी तो हूँ। होठ.. मेरे गुलाबी, हल्के से हैं, बाल काले, रंग उजला चितवन सुनहरी नीलिमा की चमक! इन नयनों में है। सुंदर अंगुलियां पोर सुंदर सुरीली मेरी नासिका उठती.. हुई, मोतियों से दंत हैं, क्या पंक्तियों में सज रहे मेरा रूप तो, सच जादुई है। पर क्यों.. है यह सब! इतना सुंदर..! सौंदर्य! का वह चितेरा, कहां है, और कौन है, उन्हीं को तो खोजता हूं। उन्हीं.. की, तलाश पर हूँ। मन बनाया रबर का, कन्दुक हो कोई.. उछलता.., रुकता नहीं, किसी ठांव पर यह बुद्धि मछली! चपल इतनी एक जगह रुकती नहीं। हाथ ऊपर, पैर नीचे, उंगलियाँ दस इनमें...