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आदमी की ऊंचाई से, प्रश्न क्या कोई बदलता है

मित्रों, जीवन को जीवन में डूब कर जीना, जीवन से बाहर होकर जीना या इस पर तैरना (तटस्थ रहना) यह तीन तरीके संभव है। इसी पर आज की लाइने आप पढ़ें क्योंकि इन्हीं तरीको में जीवन के सुख दुख और आनंद सब बुने हुए हैं। प्रश्न.. मेरा, वही था,  आज भी वह,  वही  है, आदमी की, ऊंचाई... से प्रश्न...  क्या...  कभी!  बदलता..है? जवाब..  इसका, 'नहीं' है। सीढ़ियां...! कितनी चढ़ा.. हूँ,  उतरा.. भी  हूं, उस हिमालय से, लगायत! इस...! समंदर तक.. पैर से इन... पर... पांव 'मेरे'  उंगलियां यह... पैर की,  आज.. भी तो वही हैं। (आदमी की आदतें, इच्छाएं, कमजोरियां, वासना, मूल प्रवृत्ति आपके पद या स्थान से नहीं बदलती ) दुर्भाग्य... मेरा, मेरे मित्रों, जहां खोदा, फर्श.. को, उम्मीद रखकर.. मखमली.. हो  खुरदरी.. हो, हर परत को... महल में, क्या.. झोपड़े में,  आज के इन...  साधुजन के आश्रमों में नीचे... मुझे  मिट्टी... मिली..जो हर जगह  वह.., वही.. है। (भाव: दुनियां सर्वत्र व्यापार, धोखाधड़ी, स्वार्थ और छीनाझपटी का खेल कहीं भी जाय)  कैसे कहूँ?...

लंगूर की पूछें हों थोडी और लंबी...

मित्रों, जीवन से हारे हुए लोगों में, एकाकी और अवसाद में जा रहे लोगों के लिए सूक्ष्मशक्ति और नवउत्स भरने के लिए एक छोटा सा प्रयास मेरा इन लाइनों से है। नेचर की वनस्पतियों और जंतुओं में जीवन-प्राण देने की जादुई शक्ति है, आज शहरी जीवन में इससे दूर लोगों को समर्पित ये लाइने आप भी पढ़े। बस  पूछता.. हूँ!  बता.. न!  कुछ.! छुपा.. न,  सच.. बता.. दे! सब बता.. दे, आज की ये.., शाम..  तेरी..,  इस तरह से,  सुस्त...! क्यों.. है?  मटमैली.. है, इतनी..!  दीवार... पर, इन..  दीवटों  पर,  देहरी.. पर एक..! दीपक... तक नहीं है। यह, शाम!  है,  या...  खुदकुशी...!  अंधेरों.. संग अरी! तेरी, कुछ बोल न!  मुझ, प्रकाश...! की,  तूं... छोड़, उस... 'किरन' की किसी 'रौशनी' ... की,  तनिक!  भी  चाहत!   बची....,  तुममें.... नहीं है। क्या हुआ?  हे, मित्र... मेरे!  तूं... इस तरह! नाराज़... क्यों है?  आज,  सबसे... 'दूर' क्यों... है?  चल दूर कर, तन्हाई... उदासी!   छोड़... ये सब...

याद कर तूं भी, निमंत्रण!

कथानक: आज समृद्ध और अपने समय के समर्थ, ही नहीं मध्यम आय वर्ग के साथ अल्प आय वर्ग के भी वृद्ध और यंग लोग शहरों में एकाकीपन और उदासी से बीमार च अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं। अतिविकसित जगहों पर तो लोग समाज नाम की अवधारणा से दूर हो चुके हैं। केवल अपना और नितांत अपना जीवन जी रहे हैं। कैसे इस उदासी से पार पाएं इसी पर कुछ लाइने आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं। चल..,  आज थोड़ा..  निकल..! बाहर..!  इन घरों.. से, समय.. से,  तूं.. सैर कर..,  पैदल.. पथों पर..  पार्क में या सड़क पर,  थोड़ा.. और, पहले.., सबेरे,  दिनकर निकल, आंगन में आएं,  यदि हो सके  तो, उनसे पहले। अन्यथा, उगते.. समय भी। जानता हूँ, जानते हो! बहुत छोटी चीज है,  यह.. पर, विश्वास कर,  नाम..लेगा, यार! मेरा, विश्वास है!  टहलने के बाद, सच तूं। आ निकल बाहर!  यहां... पर.. आज!  हम,  मिल.. देखते हैं,  आकाश यह, अन्तर्प्रभासित!   किस तरह, आभामयी!   इतनी सुबह!  बितान कोई  तना  हो, चमकता..., नीलाभ.. सुंदर!  अपने ऊपर!  अनोखा.. विद...

वह..! नदी यह है नहीं..।

मित्रों आज नदियों को देख रोना आता है, इसी पर ये लाइने आपके लिए। अरे! यह....   वह..!  नद.... ही..  नहीं..,  किताबों... में...जिसे मैने थी.. पढ़ी.., किनारे! साफ..., सुंदर..!  निर्मल..है, जल,  सतत.., शीतल.., सुखद. अविरल विशद..., है जलराशि बहती, ठुमकती, हो इठल करती,  इस तरह वह आगे.. बढ़ती. अरे! यह....   वह..!  नद.... ही.. नहीं..। लहरें उठती, अरी.. उसमें,  देख.. उसको,  सच में,  मुझमें!  उर्मियां फंस उर्रिल होतीं!  पृष्ठ ऊपर, नदी के,  वे लहरती, मचलती.. अरे! यह..,  वह.. नदी!  है.. ही नहीं..।   पेड़.., जिसके किनारों पर, घने, छाया भरे तरुवर!  अंक में ले, इन  सभी को हवाओं से, पट उघड़ते  अंग, मोटे.. छिपाती वह. धार से हरदम पलटती..., अरे! यह..   वह..!  नद.. ही..  नहीं..। चिड़ियाँ!  उन्हीं बन छांव में  चूं चूं चहकती... मछलियां, सब तैर तरती,   उछलती.. गीत.. गाती, सभी  धारें..  उमड़तीं,।।।।  अरे! यह..,  वह..! नदी  है... ही,...

केतकी! के फूल यह, तेरे लिए!

मित्रों, एक सिंपल सी किताब है, 'वेदों की कथाएं' इसी में मुझे पड़ा मिला यह केतकी का फूल! सुगंध जाती ही नहीं इसकी मानस बोलूं या अंतर्मन से। इस लिए इसे आप को भी शब्दों में पिरो अग्रेषित करता हूँ,आप पढ़ सुगंध पाएं प्रसन्न हों यही चाहना है। कौन थी यह केतकी?  अनन्य.. सुंदर!  एक न!   था,  योग्य..  इसके!   वरण.. सम..! मानती थी..केतकी, हूँ...!  अनन्यतम!  सौंदर्य, गुण, आचार में, वह अतुल्यतम!  कहां..,  कैसे? भा... गईं!  इंद्र.. के, मन...!  पर.. स्वर्ग को, दुत्कार कर..!  देवेंद्र.. को भी,  श्राप.. कर !  जटाधारी, आदि शिव,  रक्षित..रही,  अंत तक, यह.. केतकी...  कौन थी  यह केतकी!    यह.. दक्ष पुत्री!   केतकी!  अनुपमेया..!  अनुपमम्... सौंदर्य..की ही.., 'डली' थी, उस देह में वह.., रूपसी,  उस काल मे, विशिष्टतम थी। किसको चुनती?   साथी नहीं,  उन योग्य कोई! कहीं पर, समय की उस परिधि ऊपर!  इस लिए... चिर! प्रतीक्षा... शिव समर्पित! खुद ही हुईं। केतकी तो सत...

उलझन है कैसी, सामने तुम!

एक सरिता, सी.. प्रिये!  बहती हुए...  तुम्हें..,  देखता हूं!  खोजता हूं, तुम्हें.. ही, तेरी...   इसी, जलराशि में,    डूबकर!  पा.... रहा हूँ!  अतल हो,  अगाधि.. हो,  तुम...!  प्रेम... हो हर जगह, हर रूप में ही!  सतत.. बहते.. काल की,  पल पल सिमटती  भूमि.. ऊपर,  वितृष्णा , की चाह हो तुम.!   पर हो  कहां? विकल..!   तुमको खोजता हूं! मिल नहीं पाता.. तुम्हे!   क्या अभी.. भी उस...  श्राप!  से,   श्रापित ही हूं! क्यों मिलन से,   अरी, री.., री...   वंचित! मैं... हूँ?  उलझन है कैसी!  सामने तुम!   रूप की सरिता.. मधुर!  बह.. रही !  बुलाती,  हर उर्मियों की ताल पर!  लहर ले, उत्तुंग तर...नी सुन रहा मै, शब्द तेरा,  पर अरी! मैं.. पार्थिव! हूँ। क्या... करूं। मैं भाव हूं, प्यास.. प्रिय!   तूं... रस प्रवण...! सौंदर्य की प्रतिमा! ही.. तूं.. रस माधुरी! का रूप..  तुम! मैं, मृत्तिका का पात्र! प्रिय!...

यह युद्ध क्यों है,

मित्रों, आज के परिस्थितियों पर कुछ लाइने आपको भेंट करता हूं। आपमें यह आनंद भरें यह मां सरस्वती से याचना है। यह युद्ध क्यों है, सोचता हूँ?  कोई.. बता दो?  मैं..!  पूछता हूं?  कुछ..  भी.. हो!  संतुलित..!  एक..  युग्म!  बनना.. चाहिए,  हम  मानवों  के, जीवनों..  में, 'समझ...'  का, 'आंतरिक'  और  'बाह्य..' में,  समन्वय सा । गठजोड़  इनका आज..  यह,  बिल्कुल  नहीं  है, सांसारिक....  बस्तुएं,  यह...! कुछ,  नहीं...  हैं। विश्वास...  होना... चाहिए, पदार्थ... ही, अंतिम... नहीं है। महा.. भीषण!  युद्ध था,  एक.. बहुत, पहले,  कामधेनु के,  लिए, नंदिनी.. कह!  गाय..  कह! जो... कुछ!  भी.. कह!  साधन.. थीं,  वह..!  सुख ...!  मात्र बस !  युद्ध तो,  सुख के लिए था, बीच विश्वामित्र रूपी.. शक्ति से और आंतरिक च वाह्य के उस समन्वय  प्रतिरूप मुनिश्रेष्ठ श्री.. वशिष्ठ में। दो शक्तियों, के बीच  में..  यह.. यु...