लंगूर है, मन लपकता है..!
जीवन एक उड़ान! मन पर नियंत्रण इसकी बागडोर और मन का सम्बन्ध विचारों से जुड़ा होता है। अतः जीवन की उड़ान अनुकूल हो इसके लिए विचार को बस में करना होगा जो स्वांस के सम होने पर ही संभव होता है। इसी पर कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूं। उड़ना तो था! नभ... में उसे...! त्वरित गति से रुक..., गया.. क्यों? रूप.. की, इन झाड़ियों.. में। तितलियों.. सा, रंग... लिया, मन... देख! कैसे.., आ.. फंसा... है, वासना के, जलाशय में। सुखी... हूँ! कहता है, मुझसे...! दुख नहीं.., परिभाषा नई... गढ़ता है, मुझ... से। कालक्रम के भेद... से, अनजान.. यह! दिन..., ढल.. रहा है, काल का पिंजरा पड़ा है, सामने.., खांसता, उसके ही घर.. में, देखता ही है नहीं! क्या कहूं! यौवन है, अंधा रे, प्रिये! लंगूर.. है मन, लपकता.. एक डाल पकड़े, हाथ से एक.. तोड़ता फल खा रहा, लालच लिए.. दूसरे से, दूसरी है पकड़ता, फेंकता.. फल.. कूदता, अब.. देख कैसे गिर गया, घिर गया, इस उम्...