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शिवरात्रि है, दिन...आज.. का ।

मित्रों, आज जगज्जननी पार्वती और जगतपिता शिव के परिणय दिवस की वर्षगांठ! महाशिवरात्रि। इसी पर आज की पंक्तियां आप पढ़ खुश हों, शिवशक्ति कृपा आप और हम रहे, कामना करता हूं। शिवरात्रि!   है,  प्रिय!  आज...,   दिन... यह!  शक्ति.. से,  उन..,  शिव मिलन का। चेतना से प्रकृति का सम्मिलन..  है  आदिशिव से, आदि-मां का... कल्याण जग का। शिवरात्रि!  है,  प्रिय!  आज...,  दिन..  यह,  शक्ति- शिव के मिलन का। नवल..  नवधा..  दुग्ध, स्निग्धा... खोलती, छवि.. ललछुहीं  पटबृंद,  उर..  के,  पार्वती वह.. तुषार... धवला..  शिवरात्रि है,  दिन... आज.. का  शक्ति से, उन.. शिव मिलन का। कोमल, मुलायम, नर्म,  उर...पट,  पंखुरी... से..  हाथ...,  मां... के, खोलते.. मुंह,  ललछुहे!  शिशु.. अधर.. से गुलाबी… से, लाल..  होता,  वर्ण है,   मां के  चिबुक  का। शिवरात्रि है,  दिन..! आज.. है  शक्ति-शिव के मिलन का। खिलने को आतुर! वैभवी... कैसे कहूं! ...

घूमता... हूँ, शहर... तेरे..!

मित्रों, आज आम आदमी को मात्र न्याय की दरकार है, लोग अपनी मेहनत से कमाते खाते हैं। उन्हें अगर मात्र न्यायपूर्ण जीवन मिले तो शिकायतें लगभग समाप्त हो जाएं, इसी पर आज की लाइने। घूमता... हूँ, शहर...  तेरे...  देख.. कैसे! दर..! बदर..!  ऐ, सदर!  ऐ!  तख्ते-ताउस-ए-नगर!   राजधानी.., लखनऊ..!   तूं...!  आस..  है,   सूबे... की इस,  इतने.. बड़े, इतने...  विपुल! सैलाब जन की, विश्वास! मन.. की,  आम जन की   सांस! है  तूं!  तूं ... माध्यम है,  जगह.. है, 'वह'   कष्ट, दुख, तकलीफ अपनी कह सकें, सब..। रख सकें, अपनी व्यथा. पिरते... मनों  की.. अरज़, अपनी  रख  सकें, हम बिपदा, विपद  की। अधिकारियों से,  तेरे, हे...! और वे...  बिन बिके, कुछ दमडियोंं पर सत्य को, आधार दें, निर्णय... करें,  शीघ्र ही,  और क्या! हमें चाहिए,  जनता हैं हम..  मांग..  करते, सदर ऐ!   लखनऊ!    मात्र! तुमसे न्याय.. की बस। शासन प्रशासन,  तुम्हारा है  राज्य मे...

पंख फ़ैलाए खड़ी है, सामने..

मित्रों, अपने जीवन का 98.00 प्रतिशत हम अपने अंदर रहते हैं, शेष दो प्रतिशत बाहरी वास्तविक दुनियां में, इस तरह हमारे विचारों की दुनियां हमारा मूल संसार होती हैं। इस प्रकार बाह्य दुनियां मात्र लिफाफा है और बहुत कम महत्व की है। जबकि आंतरिक दुनियां के लिए हमारा प्रयत्न दो प्रतिशत और बाहरी लिफाफे के लिए 98.00 प्रतिशत रहता है, इसी का परिणाम दुख और संताप! आपाधापी का जीवन। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए। विचारों की, एक दुनियां!  लपेटे.. अंदर कहीं,  जीते.. हैं, हम.. प्रिय!  जिंदगी... के, साथ.. इस। दी खती,  यह है, नहीं,  उम्र भर, है  सतत..  चलती हे मित्र मेरे,  साथ अपने, छाया सरीखी। जी.. रहे हम,  जाने... न कबसे... बाल.. पन से..  पर, घिरे..  इन..  विचारों... से,  अंदर ही.. अपने।  उर्वरा ये, शक्ति अपनी, मानसिक सदा.. उठती, सदा.. गिरती, उठाती मन व्योम, तक  एक क्षण में.. दूसरे ही,  धरातल पर,  ला... पटकती। वह...  दूर.. है,  सत्य... से,  यथार्थ... से,  इस.. जिंदगी के,  आज तक, इस बात को  जानता... ...

लंगूर है मन, लपकता है..!

जीवन एक उड़ान! मन पर नियंत्रण इसकी बागडोर और मन का सम्बन्ध विचारों से जुड़ा होता है। अतः जीवन की उड़ान अनुकूल हो इसके लिए विचार को बस में करना होगा जो स्वांस के सम होने पर ही संभव होता है। इसी पर कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूं। उड़ना तो था!   नभ... में उसे...!   त्वरित गति से रुक..., गया.. क्यों?   रूप.. की, इन झाड़ियों.. में। तितलियों.. सा,  रंग... लिया,  मन... देख! कैसे..,  आ.. फंसा... है,  वासना के, जलाशय में।   सुखी... हूँ!  कहता है, मुझसे...! दुख नहीं..,  परिभाषा नई...  गढ़ता है, मुझ... से। कालक्रम  के  भेद... से,  अनजान.. यह!  दिन..., ढल.. रहा है,  काल का पिंजरा पड़ा है,  सामने..,  खांसता,  उसके  ही  घर.. में, देखता ही है नहीं!  क्या कहूं!   यौवन है, अंधा रे, प्रिये!  लंगूर.. है मन,  लपकता.. एक डाल पकड़े, हाथ से एक.. तोड़ता फल खा रहा, लालच लिए.. दूसरे से, दूसरी है पकड़ता, फेंकता.. फल..  कूदता,  अब.. देख कैसे गिर गया, घिर गया, इस उम्...

वह, कहां? कब! मिला किससे?

अंत...  जिसका..,  आदि.. जिसका  शून्य था,  मुस्कुराता...  सत्य...! वह सामने..., दुनियां मेरी बन खड़ा था। प्रिय!  जग यही था सोच न! जग, और क्या.. था?  भाव: संसार में "लोग और वस्तुएं" निरंतर अन्यान्य से मिल रूप लेती और पुरानी हो रूप का परित्याग करतीं एक शून्य से निकलतीं, एक शून्य में जातीं पर हमे हमारे समय के निश्चित अंतराल में सत्य लगती हैं यही यह सतत बनती मिटती सृष्टि या संसार है। कुछ भी, कह... लो..,  कुछ भी, सोचो.. कोइ कोण..  है.. उसी पर जग दीखता.. है, खिलता हुआ, हर... फूल,  सच है,  सौंदर्य है, प्रसन्नता है,  महक है। पर उसके पहले, ध्यान दें वह शून्य  है। भाव: समय का एक एंगल है, जिसपर हमारी आत्मा शरीर रूप में चेतना के साथ संसार में दिखती है। उस कोण से हटते ही हम या वस्तुएं और यह प्रकृति समाप्त नए का आगमन और इसी के साथ गुण, दोष, खुशी, गमी भी चलती रहती है। यही जग है। यहीं..., लेता  आकृति  यह... यहीं,  देता..., पर,  पर.. मोह.... है,  इन... इंद्रियों का,  साध्य है,  बस, इस लिए, इस  रूप में...

दुनियां वहीं पर, खड़ी है!

मित्रों, संसार! मरीचिका का नाच! हाथ आया, अब आ गया! सदा ही ऐसा लगा, पर दूर ही रहा। इसी पर आपके आनंदार्थ आज की लाइने। दूर.., दिखता नदी जल था, तृप्ति उस पर,  तैरती थी, अहा!  कैसी, सजल आँखें*,  प्रिय, मेरी... तब...  देख!  उसको, ललचती थीं। पर, तप्त!  नीचे,  जल! रही, प्रिय.. बालुका! थी,  भस्म... करती, दुनियां प्रिए, देखा है मैने...  सत्य ही,  यह...,  बिल्कुल, यही... थी। मार्ग ही वह, अलग... था, मार्ग.. पर, जिस  शांति..  थी संयम का, प्रिय!  वह रास्ता था,  कुईं* जल!  जिस पर रखा था। सच..!  पिया भी है, इसे.. मैने! यह नदी जल से,  साफ सुथरा  मधुर! शीतल! और  मीठा.... अंत... में, प्रिय..!  सच! अधिक था। जिंदगी की राह!   यह  कैसी, गजब!  थी जितना गया, मैं दौड़ता,  इस जिंदगी के सफर में,  जिंदगी भर.. मरीचिका थी, स्वप्न थी,  क्षितिज... थी,  दूर थी, हाथ आई, ही नहीं, एक सुनहरी,  रंगीन! हर क्षण  रंग बदलती, सच कहूं तो  बबल थी। सुख, की.. नदी, मुझे, लग रही...

आओ.., कभी भीतर चलें..

मित्रों,  मेरे.,  आज मैं यह  चाहता हूं आप.. को,  आप.. तक,  लेकर चलूं!  इन पंक्तियों से,  आप पहुंचे, आप.. तक  तमन्ना..., करता यही हूँ। आओ.., कभी भीतर चलें.. एक, राज्य..  विस्तृत..  है, यहां!  तुम्हारा.  है...! तुम्हीं, में..  है,  आ, मिलाएं.. आप को हम,  आज उससे! मन, इंद्रियों... से, दूर..  प्रिय!  अद्भुत,  अलौकिक,  सच, कह रहा हूँ.. निष्कलुष! निष्पाप!  यह,  आनंद! मिश्रित । नीर है, देखो तो कैसा!  तीर, पर बैठो जरा!  जरा, छोड़ दो न!  विचारों को, मुक्ति दे दो, क्षण भरों  को.. साथ अपने। शांत हो?   क्या?  सोच लो! मुक्त हो?  अब!   विचारों  से?  पग रखो, तुम  पास-अपने* नजदीक आओ, बहुत.. धीमे। मन, चुप! खड़ा है, विचारों.. बिन! क्या!  वहां?  थोड़ी देर देखो, मित्र इसको..। जिस.., पटल पर,  रिपोर्टिंग,  मन  कर रहा था,  बस उसी पर ध्यान  कर तो। अंतस्थल, यही है,  पृष्ठ है, संसार जिस पर आ  चिपकता.....