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कोई देखता है, जब भी मुझको

मित्रों, समाज में पति पत्नी अटूट संबंध, पर आज सच, विकट स्थिति है बराबरी का दर्जा और सम्मान हम अपने साथी को नहीं देते उसे अपनी इच्छा में बाँधते हैं। इसी विषय पर यह लाइने आंशिक मनोविज्ञान भी इसमें मिलेगा आप पढ़ें, आनंद पाएं। उसने कहा, बिंदास हूँ मैं,  क्या करूँ, इसके लिए,  जाऊं कहां?  नज़रें नहीं, मुझे  छोड़तीं हैं,  किसी कोने; तुम भी तो प्रिय!  कभी सोचना,  उनमें से ही  तो  एक थे, मुझे, चुन लिए,  आज हो अपने लिए। अब क्या हुआ? जलते हो तुम! राख हो जाते हो पल में, कोई देखता है,  जब.. भी  मुझको  प्रेम  से  कनखियों में। पर.. देखती हूँ, खुश हो होते,  भांपती  हूँ,  चहकती चिड़ियों में कैसे?  आज भी तुम,  है, कसम!  तुमको  मुझे बराबरी का, हक तो दो। क्या चाहते हो, अंधेरों में,  बंद खिड़की,  रोशनी बिन!  बिन हवा.. के  झूमते, झोंकों से छुप के,  खुश रख सकोगे,  कभी मुझको। संभव नहीं,  निराशा  में, फूल.. आएंगे नहीं,  सौंदर्य के वे खिलखिलाते,  हंसते...

भूमि पुत्री जानकी।

मित्रों, श्रीसीताजी प्रभुराम को उनका यथेष्ट दिलाने के लिए जीवन पर्यंत कष्ट और दुख में रहीं, उन पर यह चंद लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ। एक बालिका… सुंदर सलोनी.. जनक की थीं, "जानकी…"  पालित! मगर वह मात्र..  उनसे, दुहिता… तो थी..  वह  राज्य के उस  भूमि की। जो पालती है, प्रजा को  निज कोख.. से कोष.. भर भर अन्न की। राजा जनक.. के राज्य से भी  बृहत्तर… भूमि.. के भूभाग,  भारत…, भूमि… ऊपर,  हां बालिका थी भूमि.. की वह भूमि पुत्री जानकी। सीता थीं वे,  संतति सलोनी धरा की। जननी है जो, इस जगत.. की माता.. है जो, इस विश्व... की। गुण सभी उनके निराले,  मातृवत थे, सौंदर्य थीं, वह.. इस प्रकृति की, धैर्य.. थीं वह,  इस धरा सी..  शांत.. थीं। शब्द थे, झरने सरीखे.. मृदुल, मीठे.. एक सच कहूं! प्रियव्रत  अनोखा धारतीं थीं, वह बालिका थीं, भारती की। कारण वहीं थीं,  मुक्त हो यह धरा, दूषण  कारकों से.. कनक मृग को मांग कर  कारण बनी। दुष्ट वध,  श्रीराम जैसे कर सके वह शक्ति पावन  सीता ही थीं, सीता ही थीं। इस धरा पर,  फिर सनातन...

स्वरूप: तव निरंजना..

मित्रों, मानव मनोविज्ञान पर एक छोटी सी प्रफुल्लिका प्रेषित है, यह लगभग सभी जीवनों को स्पर्श करती ही है। चाहत थी मन में, सच है ये, मैं, फिदा थी, पर,  कहूं कैसे? बात  वो,  लाज थी,  किशोर मन की विवशता, क्षमता मेरी, मैं कह सकूं,  बात अपनी,  खुल के तुमसे, बहुत कम थी..। इस लिए,  शर्म का एक आवरण, लाली लिए, मुख बदन पर ऊपर से डाला,  और मैं,  फिर, सामने थी। डर समाया था हृदय में,  तूं कहीं मुझे, ना न! कह दे, क्या करूंगी? टूट जाऊंगी मैं, चुप  घुप मन के अंधेरे,  बिना तोड़े अंदर कहीं से, सूख जाऊंगी, लता सी, मुरझ जाऊँगी, कली मैं बिन खिले। यह सोच के, अंदर  मुड़ी मैं,  अंतरों में और इस लिए, आज तक अंकुर  संजोए जी रही हूँ! आस में...  इस उम्र में भी,  जब तुम्हे मैं  देखती हूँ,  लाल हो जाती, कही से शर्म की, चादर मैं ओढ़े  बहुत  खुश हूं। अब चाहती हूँ खुल के कह दूं, तव स्वरूप निरंजना यह तूं ही था हे प्रिय  मेरा आदि  साथी,  शुरू से वो निरंजना।।। पटाक्षेप संसार की, बाहें हैं कितनी?  और कैसी,...

क्या छूटता है मुझसे ये..!

मित्रों कोई भी हो, एक उत्कंठा जीवन पर्यंत बनी रहती है मैं पीछे तो नहीं हो गया पिछड़ तो नहीं रहा हूँ। वह क्या है जो हम पकड़ना चाहते हैं, पाना चाहते हैं इसी पर ये लाइने आपके लिए। 'कुछ' क्या है..? वो..,  इतने.. दिनों से,  सोचता  हूँ! धड़क जाता है ये दिल!  जिसके लिए..! बिल्कुल अचानक,   धक! से, देखो. सब कुछ तो है, प्रिय..!  पास मेरे..। कुछ' क्या है..?  वो..! साथ...  तेरे, आज..!  मुझको,  और क्या... 'वह' चाहिए..? और.. किसलिए?  उचक! जाता है ये दिल! गिरने से बचता.. संभलता.. है.. धड़क! जाता.. एक पल में..  बेसबब, किसके लिए..? बस पूछता हूँ, बता दे न! कुछ' क्या है  वो..!  संसार में  इस,  क्या है वो... जिसके लिए..? यह मन मेरा, झटके! से  इतने.. उछल जाता..  देखता हूँ, भागते..! इंसान को.. दुश्वारियों में.. बिन थके..!  'मिस' हुई...  गोली... के जैसा,  ऐन! मौके 'फुस' हुआ, खुद को हूं पाता... क्या है वो... जिसके लिए! रहस्य! कुछ..,   लगता... है मुझको..!  है कहीं..  संसार में,  ज...

मार्ग कोई! सनातन.. को दिखाओ,

मित्रों, अब तो इस सनातन के सम्मान हेतु देवताओं का आवाहन ही करना होगा। अग्नि जो न्याय और सत्व के प्रतीक हैं उनसे प्रार्थना है कि अपना स्वरूप लें और देव, ऋषि, संत वाणी को सत्य करें। इस 'दीप' अंदर कौन है...?  पूछता हूँ, देव! क्या तूं,  सत्य!  है..?  तुम हो,  कहां?  तुम्हें.. खोजता... हूं? सुना था,  कोई, देव.. अद्भुत!   अग्नि! थे..,  जाग्रत यहां,  इस प्रार्थना के  दीप में,  हमे  आदि से वह,  सुखी करते। दीप के, इस मर्म.. में,  वह.. अवस्थित थे! 'सोम' के  उस,  'गान'  से, वह  प्रफुल्लित! थे राध*.. देते,  रयि*..  लाद* देते,  सुपथ  पथ..  हमे..  दिखाते थे,.. देव को उन खोजता हूँ!  वह हैं.. कहां..? समाहित!  हो,  दीप... में तुम! जानता हूं!  चाहता हूँ..!  निकल! आओ..;  आवरण से पार आओ..,  अब, सच! यही मै चाहता हूँ। अंधेरे..कैसे?  घने... हैं,  आदमी के हृदय में, जरा... यहां देखो..? लड़ रहे, वध कर रहे, कैसी चोरी कर रहे ये चढ़ावों की ध्व...

पास आओ, मौन बैठो।

मित्रों, जीवन में फैले शब्दों के ताने बाने पर बुनी, कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ, आपको अच्छी लगें यह चाहना है। शब्द! हैं? सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो,  साथी.. हो मेरे.. पास आओ, मौन बैठो। क्या.. करूंगा..?  भर.. चुका हूँ!  जानता.. हूँ!  कुछ नहीं,  सस्ता.. है,  इनसे, शब्द! हैं, सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो। फूल.. से,  हंसते.. हुए.., ये शब्द! तेरे निर्झरी! झरती.. हो जैसे..  मुँह.. से तेरे..  प्रिय,।।। निकलते.. बिन महक.., बिन परागों के आत्मा स्पर्श के..! बाहरी.... मन की सतह से क्या.. करूंगा? अर्थ इनके घुल गए हैं, आप में शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। तुम! कुछ कहो, यह झांकता..! है, सत्य..! है, मरता..! नहीं है, झलकता है,  तली  में.., छुपता नहीं है; एक नमी.. होती  है.. दिलों.. में, लिपट.. आती, अक्षरों.. में.. शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। चरमराहट..! डालियों की,  सुनना... कभी जंगलों.  में.. रगड़ भी अंतरों की..   शब्द.. है,  निकलती है, मूक! से.. लाए हो तुम भी  शब्द.. कुछ! जाने ...

वह कौन था?

मित्रों, जब भीतर का दीप जल उठता है, आत्मबोध की ओर हमारे कदम बढ़ते हैं, तो एक आमूल चूल परिवर्तन जीवन में घटित होता है। इसी पर यह लाइनें आपको प्रेषित हैं। क्या..?  क्या... कहा..? वह! एक, मिश्रण?  जी, नहीं...!  अब..  एक यौगिक..!  बन गया   संसार  संग..,  जुड़ गया, अंदर कहीं से; घुल.. गया, इस सृष्टि.. में,  वह,   वह...,  न!  रहा...  आत्मविद!  आनंद ही अब, बच रहा,  स्वयं में.. ही खो गया। वह बोध है अब!  लहरियां..! उत्ताल..!  उठती..  नाग सी फनकार करतीं रात.. दिन  थीं सिर! पटकतीं अब नहीं,  शांत हैं, सब जो प्रबल मन..! था, सो.. गया.. अब..। धूमिल! हुआ  अब.. स्रोत सारा...  उर्मियों का...  रश्मियों का! झूमता.., सिसकार! करता.. खेल करता... नाचता था,  चित्त.. बनता.. भरमता था.. चित्त जो....! वह चित्त..! ही तो..  खो... गया...,  मन.. सो.. गया..! अब। आज तो  वह,  बोध है बस!  संसार पूरा, घना सा.. अंधेरों... का घेरे उसे...  उन बदलियों सा..!  फ़न उठाए..! अब...