और क्या हमे चाहिए
शीर्षक: और क्या हमे चाहिए संसार से। शुरूआत कर एक लरछ बन, अंकुरण होने तो दे, फूटने.. दे, निकलने.. दे आंखुरोंं को, आंख से उन डालियों के, सांस प्रिय लेने तो दे। कल यही हैं, इन्हीं में कल छुपा है, सब्र कर, फुनगियां बनने तो दे। देख लेना, एक दिन खिलखिलाकर ये हँसेंगी, और कलियां नन्ही नन्ही, खोलतीं.. वे, नयन अपनी, शीर्ष पर इन, खिल उठेंगी, और क्या हमे चाहिए, रे प्रिये, संसार से इस। फूल कलियां खिली हों, चहुंओर अपने, रंग बिरंगी, हंस रही.. फैली पड़ी, महकती, हों पंखुरी.. झरती हुई, पूर्ण जीवन सभी का हो, पूर्ण उपवन सभी का हो, पूर्णता में, 'पूर्णता' हो खिल रही और क्या हमे चाहिए संसार से इस। जब देखता हूँ पल्लवों को, बूंदों को इन, बदलते.. बरसती इन बदलियों के स्नेह को, इतनी जल्दी चमकती इन मोतियों में, कोर से, एक एक कर इन टपकती, मस्त हो जाता हूँ मैं अभिभूत हूँ, किस शांति से, किस प्यार से, सिहरती है नम्र होकर, रोपती हैं हस्त ये... गिरती रहें बूँदे यूं ही, झरते...