कोई देखता है, जब भी मुझको
मित्रों, समाज में पति पत्नी अटूट संबंध, पर आज सच, विकट स्थिति है बराबरी का दर्जा और सम्मान हम अपने साथी को नहीं देते उसे अपनी इच्छा में बाँधते हैं। इसी विषय पर यह लाइने आंशिक मनोविज्ञान भी इसमें मिलेगा आप पढ़ें, आनंद पाएं। उसने कहा, बिंदास हूँ मैं, क्या करूँ, इसके लिए, जाऊं कहां? नज़रें नहीं, मुझे छोड़तीं हैं, किसी कोने; तुम भी तो प्रिय! कभी सोचना, उनमें से ही तो एक थे, मुझे, चुन लिए, आज हो अपने लिए। अब क्या हुआ? जलते हो तुम! राख हो जाते हो पल में, कोई देखता है, जब.. भी मुझको प्रेम से कनखियों में। पर.. देखती हूँ, खुश हो होते, भांपती हूँ, चहकती चिड़ियों में कैसे? आज भी तुम, है, कसम! तुमको मुझे बराबरी का, हक तो दो। क्या चाहते हो, अंधेरों में, बंद खिड़की, रोशनी बिन! बिन हवा.. के झूमते, झोंकों से छुप के, खुश रख सकोगे, कभी मुझको। संभव नहीं, निराशा में, फूल.. आएंगे नहीं, सौंदर्य के वे खिलखिलाते, हंसते...