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और क्या हमे चाहिए

शीर्षक: और क्या हमे चाहिए संसार से। शुरूआत कर  एक  लरछ बन,   अंकुरण  होने तो दे,  फूटने.. दे,  निकलने.. दे आंखुरोंं को,  आंख से  उन  डालियों के,  सांस प्रिय लेने  तो दे। कल यही हैं,  इन्हीं में  कल छुपा है,  सब्र कर, फुनगियां बनने तो दे। देख लेना,  एक दिन  खिलखिलाकर  ये हँसेंगी,  और  कलियां नन्ही नन्ही, खोलतीं.. वे, नयन अपनी, शीर्ष पर इन, खिल उठेंगी,  और क्या हमे चाहिए, रे प्रिये,  संसार से इस। फूल कलियां खिली हों, चहुंओर अपने, रंग बिरंगी, हंस  रही.. फैली पड़ी,  महकती, हों पंखुरी.. झरती हुई, पूर्ण जीवन सभी का हो, पूर्ण उपवन सभी का हो, पूर्णता में, 'पूर्णता' हो खिल रही और क्या हमे चाहिए संसार से इस। जब देखता हूँ पल्लवों को, बूंदों को इन, बदलते.. बरसती इन बदलियों  के स्नेह को, इतनी जल्दी चमकती इन मोतियों में, कोर से, एक एक कर इन टपकती, मस्त हो जाता हूँ मैं अभिभूत हूँ, किस शांति से, किस प्यार से, सिहरती है नम्र होकर, रोपती हैं हस्त ये... गिरती रहें बूँदे यूं ही, झरते...

कौन मै, कौन यह संसार था।

 शीर्षक: कौन मै, कौन यह संसार था। संसार तो संसार का था,  और मैं..  जो  'मैं' बना  था,  खेल में इस इतने दिनों तक पूछता हूँ उम्र में इस, जब  देखता हूँ  अलग उसको  मुझसे से भी खुद,  मुस्कुराते..  पास में,  यूं..  खड़ा हो,  निश्चिंत!  कोई  दूसरा हो। मेरे ही ऊपर, हंस रहा अचरज में हूँ,  सब  देख कर अब आज!  तक की जिन्दगी में,  गिरता, पड़ता, भागता,  उठता था 'जो' वो.. 'मैं'  कहां  हूँ,  इनमें से मैं.. कौन हूँ?  बस यूं समझ, ग़र तूं समझ!  कमाता रखता गया,  शौक था  भरता..  गया,  वो..  पसीनों से तर बतर  ही रह गया,  जो  उम्र... भर,  लौटा  नहीं,  सब  रह गया,  रखा हुआ, यह क्या हुआ? कौन है जो हँस रहा, सब देख कर  अपने ही भीतर यही तो मैं पूछता हूँ,  क्या 'मैं' यही हूं? अन्यथा लेटा हुआ,  बेजान सा इन बिस्तरों में,  क्या यही.. मैं हूँ?   मैं दो नहीं था,  उम्र भर इस उम्र में, क्यों...

उड़ान ही क्या जिंदगी थी।

उड़ चुका हूं,  बहुत पहले, बहुत ऊंचे! अंत में, थक हार कर,  अब उतर नीचे जमीं ऊपर  सोचता  हूँ,   ये, उड़ान क्या है,  प्रिय सभी  को,  इतनी..  क्यूं..  है? पैर पर जिन,  टिकी थी,  ये जिन्दगी,  जन्म से, ले.. आज तक,  भूल उसको  पंख पर उड़ने की  ख्वाईश!  आदमी में ऐसी.. क्यूं है? संसार ही तो, वहां.. था, दूर.. उतने,  काम थोड़ा  अलग था , प्राप्तियां भी, अधिक थीं कल्पना सा लोक था।  मानता हूँ! साधन भी थे,  सामान था,  आराम भी था,  सम्मान पर वह, उधारी था, कुछ भी हो तूं मान मेरी..  यहां जैसा, सुख वहां  प्रिय,   क्या कभी था। इतना बड़ा  घर बार अपना छोड़ कर, शीतल हवाएं ताल की, उत्ताल लहरों पर थिरकतीं  फर फर फरकतीं, स्पर्श देतीं  दूर तक फैली हुई ये चांदनी क्या सुलभ थी?  कूचे में, चुप रह, एक कोने एक दड़बा चूहों सा जीवन बिताना छोड़ संग,  हित मीत का  क्या सरल था?  छोड़ कर सम्बन्ध सारे, तोड़कर  हम प्रेम धागे, गांव के रस मधुर को  थे,  ...