खुशी गम की फैब्रिक जिंदगी ये।
मित्रों, जीवन खुशी और ग़म की एक फैब्रिक ही है, इन्हीं को डिफाइन किया है इन लाइनों में आपको अच्छी लगें और श्रम सफल हो। कम करूं कुछ, जरूरतें, अपनी प्रिये! खुशी से, मैं देखकर, सोचकर , लोगों का जीवन साथ में ही रह रहे, संसार में। बिन कहे, समझौता करूं, निज जिंदगी में, सुखों से थोड़े में रह लूं, बेशक कभी तकलीफ़ में; अच्छा करूं, उस बचत की धनराशि से, बिना मांगे, नीचे पड़े, निरीह को; मैं इसे दे दूं, तो... शुरू से ले अंत तक उस एक क्षण को सोचकर हमेशा जो उपजता है मेरे भीतर, सुरसुरा सिहरन सा देता महक उठता अंतरों में, खुशी है वो। बे-उम्मीद को मैं, उम्मीद दे दूं, ना-उम्मीद से, मैं ना, निकालूं, उम्मीद भर दूं! जब कभी, उम्मीद अपनी छोड़ के तो.. खुशी है, वो..! नाखुशी, मत पूछ मुझसे, एक ही है, तकलीफ है, जब देख खुद को, सोच खुद को, घृणा हो, पछतावा हो प्रिय, अंदर कहीं, अपने किए, पशु सरिस व्यवहार पे। हेय, मैं अपने ...