थोड़ी शांति मुझको चाहिए
मन भर गया संसार से, हर बात से, अब शांति मुझको चाहिए वह कह उठा, वन जंगलों की ओर बढ़ता.. हिमालय की तलहटी में रम गया। विचारों की बदलियां, आ.. घुमड़तीं उस शांति में, एकांत में मन.. हृदय.. में बरस जाती चुप वहां एकांत में। बूंद बन बन वाष्प बन बन आंख से शांति के वातावरण में, अकेले में वह दु:खी, अशांत था। एक दिन गहरे वो पैठा, सोचता यह शांति क्या है? उथल क्या है? अंतर कहां है मूल में मूल में क्या क्या छुपा है मूल अपना ढूंढता शैशव में पहुँचा! आनंद था तब कितना अच्छा शांति मन में, फर्क क्या है आज तब में, मैं तब भी था, मै आज भी हूँ, ठीक वैसे. बस मैं मेरा यह, उस समय ऐसा न था। इस तरह का स्वार्थ न था, बँधा न था, राग की इन रस्सियों में, आज सा मैं आज में था, जी रहा और मुक्त था। शांति बाहर नहीं होती.. अंदर है बसती, एक जैसी, हर किसी के, अंतरों में। विचारों की शांति ही तो शांति है! प्राप्त होती त्याग से इस स्वार्थ के, आसक्ति के, और प्रिय भविष्य का डर छोड़ने से..। शांति प्रिय उस ...