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लंगूर है, मन लपकता है..!

जीवन एक उड़ान! मन पर नियंत्रण इसकी बागडोर और मन का सम्बन्ध विचारों से जुड़ा होता है। अतः जीवन की उड़ान अनुकूल हो इसके लिए विचार को बस में करना होगा जो स्वांस के सम होने पर ही संभव होता है। इसी पर कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूं। उड़ना तो था!   नभ... में उसे...!   त्वरित गति से रुक..., गया.. क्यों?   रूप.. की, इन झाड़ियों.. में। तितलियों.. सा,  रंग... लिया,  मन... देख! कैसे..,  आ.. फंसा... है,  वासना के, जलाशय में।   सुखी... हूँ!  कहता है, मुझसे...! दुख नहीं..,  परिभाषा नई...  गढ़ता है, मुझ... से। कालक्रम  के  भेद... से,  अनजान.. यह!  दिन..., ढल.. रहा है,  काल का पिंजरा पड़ा है,  सामने..,  खांसता,  उसके  ही  घर.. में, देखता ही है नहीं!  क्या कहूं!   यौवन है, अंधा रे, प्रिये!  लंगूर.. है मन,  लपकता.. एक डाल पकड़े, हाथ से एक.. तोड़ता फल खा रहा, लालच लिए.. दूसरे से, दूसरी है पकड़ता, फेंकता.. फल..  कूदता,  अब.. देख कैसे गिर गया, घिर गया, इस उम्...

वह, कहां? कब! मिला किससे?

अंत...  जिसका..,  आदि.. जिसका  शून्य था,  मुस्कुराता...  सत्य...! वह सामने..., दुनियां मेरी बन खड़ा था। प्रिय!  जग यही था सोच न! जग, और क्या.. था?  भाव: संसार में "लोग और वस्तुएं" निरंतर अन्यान्य से मिल रूप लेती और पुरानी हो रूप का परित्याग करतीं एक शून्य से निकलतीं, एक शून्य में जातीं पर हमे हमारे समय के निश्चित अंतराल में सत्य लगती हैं यही यह सतत बनती मिटती सृष्टि या संसार है। कुछ भी, कह... लो..,  कुछ भी, सोचो.. कोइ कोण..  है.. उसी पर जग दीखता.. है, खिलता हुआ, हर... फूल,  सच है,  सौंदर्य है, प्रसन्नता है,  महक है। पर उसके पहले, ध्यान दें वह शून्य  है। भाव: समय का एक एंगल है, जिसपर हमारी आत्मा शरीर रूप में चेतना के साथ संसार में दिखती है। उस कोण से हटते ही हम या वस्तुएं और यह प्रकृति समाप्त नए का आगमन और इसी के साथ गुण, दोष, खुशी, गमी भी चलती रहती है। यही जग है। यहीं..., लेता  आकृति  यह... यहीं,  देता..., पर,  पर.. मोह.... है,  इन... इंद्रियों का,  साध्य है,  बस, इस लिए, इस  रूप में...

दुनियां वहीं पर, खड़ी है!

मित्रों, संसार! मरीचिका का नाच! हाथ आया, अब आ गया! सदा ही ऐसा लगा, पर दूर ही रहा। इसी पर आपके आनंदार्थ आज की लाइने। दूर.., दिखता नदी जल था, तृप्ति उस पर,  तैरती थी, अहा!  कैसी, सजल आँखें*,  प्रिय, मेरी... तब...  देख!  उसको, ललचती थीं। पर, तप्त!  नीचे,  जल! रही, प्रिय.. बालुका! थी,  भस्म... करती, दुनियां प्रिए, देखा है मैने...  सत्य ही,  यह...,  बिल्कुल, यही... थी। मार्ग ही वह, अलग... था, मार्ग.. पर, जिस  शांति..  थी संयम का, प्रिय!  वह रास्ता था,  कुईं* जल!  जिस पर रखा था। सच..!  पिया भी है, इसे.. मैने! यह नदी जल से,  साफ सुथरा  मधुर! शीतल! और  मीठा.... अंत... में, प्रिय..!  सच! अधिक था। जिंदगी की राह!   यह  कैसी, गजब!  थी जितना गया, मैं दौड़ता,  इस जिंदगी के सफर में,  जिंदगी भर.. मरीचिका थी, स्वप्न थी,  क्षितिज... थी,  दूर थी, हाथ आई, ही नहीं, एक सुनहरी,  रंगीन! हर क्षण  रंग बदलती, सच कहूं तो  बबल थी। सुख, की.. नदी, मुझे, लग रही...

आओ.., कभी भीतर चलें..

मित्रों,  मेरे.,  आज मैं यह  चाहता हूं आप.. को,  आप.. तक,  लेकर चलूं!  इन पंक्तियों से,  आप पहुंचे, आप.. तक  तमन्ना..., करता यही हूँ। आओ.., कभी भीतर चलें.. एक, राज्य..  विस्तृत..  है, यहां!  तुम्हारा.  है...! तुम्हीं, में..  है,  आ, मिलाएं.. आप को हम,  आज उससे! मन, इंद्रियों... से, दूर..  प्रिय!  अद्भुत,  अलौकिक,  सच, कह रहा हूँ.. निष्कलुष! निष्पाप!  यह,  आनंद! मिश्रित । नीर है, देखो तो कैसा!  तीर, पर बैठो जरा!  जरा, छोड़ दो न!  विचारों को, मुक्ति दे दो, क्षण भरों  को.. साथ अपने। शांत हो?   क्या?  सोच लो! मुक्त हो?  अब!   विचारों  से?  पग रखो, तुम  पास-अपने* नजदीक आओ, बहुत.. धीमे। मन, चुप! खड़ा है, विचारों.. बिन! क्या!  वहां?  थोड़ी देर देखो, मित्र इसको..। जिस.., पटल पर,  रिपोर्टिंग,  मन  कर रहा था,  बस उसी पर ध्यान  कर तो। अंतस्थल, यही है,  पृष्ठ है, संसार जिस पर आ  चिपकता.....

गीत गा, गोविंद मन के।

मित्रों! कृष्ण हमारे ईश, उनके कार्य हमारी श्रेष्ठ संपदा और उनके गीत, आनंद! इसी पर ये लाइने आपको समर्पित हैं आप आनंदित हों कामना है। ये शब्द सिद्ध के प्रसाद हैं। कौन पूछे!  कृष्ण से... वय.. बंध के, संग, पुष्प! अनुपम!   कहां, कब.. कब..,  और, कितने..? गोविंद मन,     कैसे.. खिले! यह कौन पूछे! कृष्ण से...! तारिकाएं!  कैसे....?  कह दूं...! सारिका..!  कैसे... कहूं ! हृदय! असमंजस!  बड़ा... है, प्रभु...!  हृदय... की,   अभिसारिका..!  मैं...!  किसे.. कह  दूं!  इसे, पूछें! कृष्ण से...! पुष्प की, ही... पंखुरी!   नरमो मुलायम!  मुझको..,  लगीं...: सब, रंग...!  प्रभु... को,  कौन?  प्यारा.... अधिक.. था, किस... पंखुरी का बता न!  मैं.. !  कैसे... कह दूं। इसे, पूछें!  कृष्ण से... ! जानता हूँ!   कोई,  पुष्प..! थीं,  कोई..,  प्रेरणा..! थीं,  अस्त्र.. थीं, कोई..  मंत्रणा थीं,  दायित्व.. थीं अनेकों.. नरकासुरी...,  अबोध! बाला, राजसी..!...

बस, पूछता हूँ, बता दो न!

मित्रों, जीवन तृष्णा का नृत्य! और हम उसके पात्र! अंत में देखा भी है, क्या शेष बचता है, और क्या चाह बचती है, आज की पंक्तियां इसी पर, आप पढ़ आनंद लें। बस, पूछता हूँ, बता दो न!  अंत में, क्या चाह!   बच, रहती  यहां,  पर,  सभी को ?   इन जीवनों  में...,  जन्म से ले, मृत्यु तक,  व्यापार कर,  बलिदान कर दान कर, उत्सर्ग कर,  हर एषणा से,  भावना, कर्तव्य कर, अभिमान भर भर  जिए जो!   अहा, उनके भी प्रिये!  अंतिम  चरण... में। क्या है बचता, प्रयाण में अवसान के क्षण!  शेष रहता। कुछ तो होगा बस चाहता हूं जानना, मुझको बता दो?  कौन सी वह कामना! निःशेष  रहती, और सब  तिरोहित होता..  उसी  में। शब्द तो वह 'एक' ही है, पर शब्द भी तो  नहीं.. है, क्या  कहूं! तुम खुद  समझ  लो...,  वह प्रार्थना भी, मौन ही है मन हृदय से,  दूर है, ध्वनि तरंगों से सूक्ष्म है, अतिसूक्ष्म से।   निःशब्द!  प्रिय!  तब  शब्द होते!  छिटक जाते... कंठ से स्वांस से ये नि...

श्रीकृष्णरस-अमृतम-अनुपमेयम'

मित्रों  'कृष्णरस-अनुपमेय-अमृत' आप भी चखें। श्रीराधेसखा-बालकृष्ण श्रीराधिका जी से जीवन भर के लिए, अंतिम विदा लेने खड़े हैं, अक्रूर जी उन्हें मथुरा ले जाएंगे, कंस के कारण उनका लौटना असंभव। राधा के सामने कृष्ण एकांत में खड़े हैं, श्रीराधा! क्या कहें, इसी पर आज की पंक्तियां आप के आनंदार्थ। बिदाई.. पर,  शब्द!   राधे... क्या कहें! अक्षर,  अधर! पर, उभरते.. फिर, छलक..  जाते,  दृगों.. से ढुर..ढुर.. ढुलकते आंसू, बने... बिदाई पर, शब्द.. राधे क्या कहे! कपोलों के, रंग ले...  अनुरक्त.. होते,  भावना.. में बदलते, स्वेद बन... कर  ठुड्डियों पर  चमकते! बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे! टपक! जाते,  वक्ष पर, मणि कौस्तुभ हों,  हिलते डुलते, हृदय पाथर, रिस रहा हो,  कष्ट अपना, कह रहा हो हर तरफ से !   बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे! वन-लताओं से,  हाथ पर,  पुंछते हुए,  स्पर्श करते उंगलियों का नीचे,... सरकते उतरते.... वसुओं के संग, तर्जनी  की  आखिरी  उस पोर पर  आ अंटकते... बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे! आंचल क...