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मत भून मुझको, पैन में,

मित्रों, आज की स्थिति पर यह एक कॉकटेल रचना है। साथ ही मेरे अंतर्मन के उद्गार भी हैं, अच्छे लगे तो आखिरी तक पढ़े अन्यथा...। मत भून मुझको, पैन में, चिल्ला रहे ... कुछ.. यूं...  चने...!  उछल.. कर!  स्किन हों फटते..! चटक कर, दो टूक होते..। मैं..  निकल जाऊं  कैसे...   बाहर.. इस  झुलसती... आग... से, पर, कोशिशों में,  फेल होकर पैन में,  हर.. बार गिरते..! गर्म.. उन ही  सर्फ़ेसों पे...  पैर...,  जिन पर नहीं,  थमते..! नहीं रुकते, एक... क्षण!  आज देखा!  आदमी  को!  सच कह रहा हूं!  कुछ इस तरह से, स्वप्न.. में। चने... जैसे,  पैन में ही उछलते!  लाइनों से.. फट रहे थे,  मिसाइल की नोक पर,  रखे हुए  उस  लोड..  से.. बारूद था या न्यूक्लियर!  जांच इसकी छोड़ दे.. उस बॉम्ब्स को.. फटते हुए!  देखा है मैने, चित्र में, लाल गुब्बारा  हो.. कोई! बहुत ऊंचा.. धधकता!  ईश्वर करे, यह सच न! हो!  जो इकठ्ठा है, हो.. रहा, सामान.   सारा,  हे प्रभो!  वह न! ...

'किनक' बोली..! वह किशोरी..।

मित्रों, हम मानव अपने आवाज और काव्य की  मिठास  को कितना भी महान कह लें, पर प्रकृति की वास्तविक मिठास हम मानव से कहीं अधिक होती है, इसे चिड़ियों की कूंज और सरिता के प्रवहित निनादित स्वर में हम सुन सकते हैं। इसी पर यह लाइनें आपकी प्रसन्नता के लिए समर्पित हैं। और उन बेजुबान पशु पक्षियों की आत्माओं को भी समान समर्पित है, जो आज खाड़ी युद्ध में मारे गए या अपनों से बेघर होंगे। सूर.. के पद! श्री कृष्ण... दर्शन!  अद्भुत.. भजन!   मिष्ठान्न सम, आनंद, अनुपम..!  एक क्षण में,  डुबा.. दे ते,  बाल लीला, की रसीली...   सुरसरी  में, रसभरी,  उस धार में.. आज भी, आकंठ मुझको। क्षणों... में,  यह... भिगो.. देते,  मानस पटल को, हमारे  साथ.. अपने..!   मिला देते,  बाल मन के  तोतले! मधुरतम! स्वभाव में। मीठे बहुत है, सूर के पद!  रस घोल देते कर्ण में, श्रीकृष्ण वैभव, रस अहा!  अमृत!  परसते.. शब्द में !  सोच कैसा मृदुल होगा, भाव... उनका,  रस.. भरा जब, ब्रह्म.. ही हो, बंध.. गया  बालक स्वरूपा, पाश.. में। और.....

एक भ्रम है जिंदगी.. आखीर तक,

मित्रों आज के वैश्विक हालात पर कुछ लाइने आपके लिए प्रेषित हैं, पढ़ें और खुश हों। प्रश्न.. खुद से, होने.. लगें, जब..; स्थिति.. है, दुखद..! मित्रों,  शिकायत! किससे करें? जब! खुद ही हारें!  जानकर..  हम! उम्मीद.. तब, किससे.. करें अब? प्रश्न.. खुद से? स्थिति है, सुखद! मित्रों, देख,.. न! कोई.. जागता है!  अभी.. तेरा, अंतरों में, टोंकता.. है, कम.. से  कम!  तुझे! रास्तों को छोड़,  इन..,  किन! रास्तों.. पर, तूं... चले?  अंतर कहीं है, दिख रहा?  स्थिति तो,  एक ही है!  कोई पॉजिटिव  है सोचता.. और.. कोई.. निगेटिव.. है। इस  निगेटिव!   और... पॉजिटिव!  के बीच में, एक चेतना..  संवेदना.., चैतन्य.. है, यह, स्फटिक मणि परा.. निर्मल,  पारदर्शी मुक्त  है। पर, तन की छाया,  मन की छाया, और यह  प्रतिबिंब जग का,  इंद्रियों का  भास..  इसको छेड़ता है। अन्यथा! यह 'स्व'  स्वरूपा....  चिर... सुखी है। कौन है यह? बताता हूँ!  स्व.. तुम्हारा!  आत्म.. है, दीखता.. है, ध्यान में, तुम र...

कैसी बुनी! है.., दुनियां हमने,

मित्रों, आप सभी को श्रीशुभ श्रीरामनवमी की अनंत शुभकामनाएं। तत् आज का युद्ध और उसके हालात पर कुछ लाइने प्रस्तुत हैं। इनमें कारण क्या है युद्ध का इसे भी आप स्पर्श करें, यह मर्म है और आदमी आदमी होता तो अच्छा होता। काश! व्यापारी न होता।  आ...  देख न!  कैसी बुनी!  है.., दुनियां  हमने,  साथ.. मिलकर..!  मित्र.. मेरे,  परेशां...  हर आदमी हैं,  ग्लोब का इस !   हर जगह! एक सा, एक ही तरह! इस  पार.. से, उस... पार.. तल्लक!  एक... हैं,  सब..., एक.. ही... हैं!  आज.. के, बदले हुए  इस.., युद्ध के  हालात..  में। अन्यथा..,  थी... फिक्र...  किसको....?  कोई...? पड़ोसी की..  खबर ले..! इन्हें देखकर! महसूस कर!  मुझको! लगा... सच...., सब...,  एक जैसे... पस्त रे। सब उड़ रहे थे,  पंख पर, अपने ही अपने.. नाम... का, एक पंख... ले  मुफ्त की उस सुरक्षा में, मस्त..  नाटो...... नाम की छाया तले, प्रिय,  गगन.. में। गिर पड़े हैं, आज देखो!  शिखर से,  अंटके हुए हैं, कंगूरों.....

रस सुरीला, मुफलिसी का।

मित्रों, जीवन में संपत्ति बटोरते हमारा सारा समय निकल जाता है, मां पिता ने भी हमारे लिए इसे ही बटोरा और हम बच्चों के लिए वही बटोर रहे हैं। इतनी इसकी शायद जरूरत नहीं। इसी पर यह लाइनें आपको आपके प्रसन्नता की दृष्टि से प्रेषित हैं। संपत्ति भी, क्या.. चीज है,   पीछे.., सभी.. हैं,  इसी.. के, चाहते.. हैं.. बस..  अभी....,  मिल.. जाय!  हे प्रिय! प्रचुर.. उन को।  बस अभी मिल जाय..  असीमित!  अपरिमित! संपत्ति सबको !    पर?  पूछ न!  क्या... जानते हैं?  संपत्ति क्या है?  किसलिए!  यह चाहिए..? हे.. मित्र ! उनको..? एक....,  आदत.!.  हो... गई...  संपत्ति.... यह!  क्या कहूं! कैसे कहूं!   कितना बटोरूं!   कैसे बटोरूं?   दानवी! पिशाच की,  यह चाह..  ही...  अब.... हो गई है। इसी पर  एक... कथानक.. है, चाहता हूं, सुना दूं!  नागार्जुन एक भिक्षु थे;  दार्शनिक! विद्वान थे, प्रसिद्ध..,  थे,  निज  राज्य  में,  पूजित.. बहुत थे। कुछ.. नहीं ...