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सुचि

कौन है यह, तड़प जाता एक क्षण में दूसरे में, उछल जाता  गेंद सा, ⚾ मुस्कुराता फूल सा महक जाता🌸 सुची है वह, मेरी सुची है ! खग सरीखा, उड़ता उड़ता🐤 खाना खाता,🍛 पानी पीता, मुश्किलों से पपीहा सा,🥤 खेलता है, कंदुकों सा लुढ़क जाता,⚽ पार्क का जो नाम सुनकर चहक जाता😊 कौन है वो कौन है मेरी सुची मेरी सुची है। कौन है जो, मी मी करता कौन है जो, लैया खाता कौन है, जो पांव भीतर छुप है जाता, चक्कर लगाता, कुर्सियों का वो सुची है, मेरी सुची है। Rushika Mishra  class 5

शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!

शीर्षक:  शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!  चाहता हूँ,  गीत.. मेरे,  अधर, तेरे.. जब छुएं..!  कुल-कुल.. कुलाते,  बोल.. बन.. झरने... हों जैसे..!  बह.. उठें..। झुरझुर.. झुराते..!  समीर,...  सम..  पास से,  अंदर... छुएं! हृदय को, शीतल.. करें। स्वर तेरा..  झरना...  हो..,  कोई...  फूटता...!  खुशी का,  किसी..  ओरिफिश.. के  छिद्र सा,  नाचता!  मस्ती में  अपने,  लास्य..! करता,  मगन हो..!  हो! बहती... पवन, सा... आंचलों में, लिपट कर मन.., हृदय... स्पर्श! कर लें। कणन.. कंकन!  क़्वणन कंकन!   बज उठें..! यह.. मधुर....मंथर,  मदिर मंथर,:  मंजीर.. स्वर!  ले  बोल दें..  ताल लय में..  ढुलकते हों ओस कण, पत्तों पे जैसे। खिलते हुए किसी फूल..की,  खुशबू... बिखेरें!   सुरभि... भर भर,  भावना की  हर हृदय को, मगन... कर दें । कुछ इस तरह, अमृतकला!  ही  खिल उठें,  अधरों... पे, तेरे..। गीत... ये, ऐसे.. उठें..  सुर ताल ...

जिंदा रहा वो जब तलक

मित्रों, जीवन के कुछ अनुभव शब्दों में आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ें और आनंद पाएं। जीवन ये क्या है, अपूर्णता... है,  क्या! इस लिए.. उस पूर्णता की  प्राप्ति.. में, खोज.. में हर... गति यहां है। क्या इसलिए?  बस इसलिए!   जीवन यहां, गतिमान.. है। त्रस्त.. है,  यह, समस्या.. से,  दुख.. भरा, इतना.. बड़ा! विषाद का वितान.. है!  पूर्णता का  क्या करेगा, हाय यह!  इसको बता दो,  पूर्णता तो, अगति* है; गति* ही नहीं, उसकी कोई!  शांति.. है  वह, मृत्यु.. ही है, चांदनी नहिं, अमावस की रात है। यह रस.. विपुल, रस विविधता!   संसार.. की, उसमें नहीं है।  वह, एक रस है, प्रवाह उसमें नहीं है,  उत् तेजना, तेज, रज, तम छोड़, उसमे, सत भी नहीं है। छोड़ उसकी दौड़, खुश रह!  अपूर्णता में,  जीवन यही.. है, आनंद है, सुख है यहां  इस बिपन्नता में, याद रख!  मोड अपना रास्ता,  रास्ता वह पूर्णता का गलत है। जो नहीं है, पास तेरे, चाह उसकी ललच है, यह ललक है इतनी लगी..! किस तरह, सबको लगी?  यह ललच ही तो, जिंदगी है,  जी अभी, ...

वलय कैसे, हिल दुलकता, लहर लेता

मित्रों, बेल्लूर मठ उसको कहूं, परमहंस जी आश्रम उसको कहूं! नैसर्गिक शोभा घर! कहूं, हृदय स्पर्शी स्वर लिए परिंदों का कलरव स्थली कहूं, शांति का मंदिर कहूं, विभ्रमित हूँ हुगली का किनारा कहूं! गजब कहता हूँ, आश्चर्य की भूमि भी कह सकता हूँ, इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ें और हरीतिमा से, परिंदों से, आदमी से, विपुल जलराशि से भरे अद्वितीय या विवेकानन्द के निर्मित स्मारक की भूमि कहूं उसका आनंद लें। वह नदी थी?  या  बालिका थी!    शुभ्र बसना,  तनु-व-अंगी,  धार में बहती हुई,  कल कल, निनादित  गीत गाती,  गीता... सुनाती निम्न से, मध्यम स्वरी, सामने मेरे, बह रही थी। चंचल तरंगे, पृष्ठ पर थीं  जल के ऊपर, नाचती..! या मन था,  चंचल!   चुटल, चुलबुल!  नाचता, उस देह ऊपर!  वलय कैसे, हिल  दुलकते!  अलग होते, संग  मिलते,  अठखेल करते  उर्मियों से, उछलते रश्मियों, संग..., खेल....करते। थर थर थिरकते, सूर्य से, नीचे नदी पर स्वर्ण वर्षा हो रही हो!  कुछ इस तरह  किरणे लिए!   मुखर होते,  लाल होते,  डूबते...

वह 'मां' पुकारा 'जोर' से,

आज धर्म जिसे मनुष्य और मनुष्यता की रक्षा मां की तरह करेगा यह मान कर बनाया गया था आपसी तनाव के कारण बन गए हैं। इसी पर ये लाइने आप को समर्पित हैं। आप आनंद लें।  धर्म क्या है, तुम्हारा?  बस यूं ही पूछा!  एक,  तोतले बालक से मैने..  एक दिन.., अकेले में। वह 'मां' पुकारा 'जोर' से, मुझे देखकर,  या.. प्रश्न मेरा सोचकर! रोने...! लगा,  मुझको लगा, मेरे..  प्रश्न पर!  और, मुझ.. पर!  तरस खा वह.. रो.. दिया!  अर्थ उसका  स्पष्ट था.. धर्म मेरा... 'मां,' है मेरी, रक्षा है करती, रात दिन, प्रेम देती, आश्रय है देती विपद में। देखता हूँ  सड़क पर, जब.. धर्म को चलता.. हुआ, इस शान.. से कुछ रंग तक, सिमटा.. हुआ,  कुछ तरीकों के वस्त्र में.., बाल दाढ़ी में,  ढके.., टीका फ़टीका में, पुते.., दूर... उस मीनार पर,  तार से...  लटका.. हुए, तो..... सोचता हूँ:  क्या?  धर्म है, आगे.. बढ़ा...! जिसे ओढ़ना था,  तन हमें जिसे ढांपना था,  मन हमें, बाजार में, वह फहरता  है,  बिक रहा। पर,  धर्म तो कुछ भिन्न था, बाह्य इ...

खोल दें बस हृदय अपना उतरने दें सत्य को

मित्रों, हममें एक चेतना कहें या अस्तित्व जो सारे प्राणियों में एक ही है बहता है। ये लाइने आप को वहां तक ले जायें यही कामना है।  चाहता हूं!  खोल दो तुम!  हृदय.. अपना, एक बार बस.., मेरे.. कहे!  उतरने.. दो,  सत्य!   उसमें..  धीमे..., धीमे..,  और धीमे..,  पूरब.. दिशा से  उठ रहा, सूरज.. हो जैसे। धीमी.. करें,  थोड़ा और... धीमी..!  अरी.. यह..  उत्तेजना..!  इन सुख., दुःखो की  लालसा.. की, उद्विग्नता को...  शांत कर...  राख को.., नीचे.. रखें! मेरे कहे..!  कुछ.. देर.. बस!  परे हों..  घुमड़ते हर   विचारों.. से,  स्वार्थ.. के,  परमार्थ के,  हर तरह के.. अब  शांत.. हों, परिशांत हों कुछ देर...बैठें, भीतर ही अपने। खाली करें, यह हृदय अपना, हर भावना से दूर... हों, क्या मुक्त हैं?   अब.. शून्य है, सब!  मात्र बस, अस्तित्व हैं,  अब..! अस्तित्व किसका?   आप हैं,  अब.. ध्यान.. दें.. क्या.. मात्र अपने?  अन्यथा...  बहते.. हुए  अस्तित्व नद...

एक चिड़िया उत्स की भीतर कहीं है बोलती।

मित्रों, जीवन क्या है! इसी पर ये पंक्तियां आपको छू दें, अंदर कहीं से.. बस और क्या मुझे चाहिए इन लाइनों से। आप पढ़ें। जीवन! भी.. क्या है..; सोचता.. हूँ  बैठकर...  इन.. पत्थरों पर!  उभरे.. हुए,  खुद!  देख न!  इस जमीं.. ऊपर!   पैरों.. के, नीचे..  रईसों! के.. नेता.. बने,  इन दिग्गजों के पड़े कैसे?  बिना.. बोले..  चुप.. क्यों कहूँ!  सब मौन.. हैं!  ये आम जन हैं आज के.. जीवन... भी क्या है,  सोचता.. हूँ! जीवन भी क्या है?  गुन.. रहा हूँ! इतने.. दिनों से.. बैठकर!    अमराइयों की, छांव..! में देखता कुछ दूर पर,  पेड़ों के नीचे,  सूखी हुई, इस जमीं ऊपर!  उघड़ी.. हुई,  कराहती.., प्यासी.. पड़ी इनकी जड़ों.. को, देखकर..!  लगता है मुझको.. ये.. हड्डियां.. हों,  निकली.. पड़ी,  मेहनतकसो के  शरीरों पर...! चेहरों पे.. उनके... खुरदरी.. बे छाल की,  बे मांस की, अटपटी सी.. उसने कहा?  जी  नहीं...!  उससे भी बदतर!  जीवन भी क्या है,  सोचता.. हूँ!  जीवन भी क...