खुशी तेरी और तूं..!
मित्रों आपकी प्रसन्नता के लिए आज की पंक्तियां प्रस्तुत हैं। यह खुशी तेरी, और तूं..! संग मिलकर, पिघल कर, एक हो जाओगी जब..., और यह पहनी खुशी, कपड़ों सी ऊपर समस कर, रसते हुए कपड़ों के नीचे, सिमट कर तुझे ढाल लेगी, अपने अंदर... तब कहीं तूं खुश मिलेगी हमेशा ही, चहकती हर हाल में, हर काल में..., एक गुण तुझको मिलेगा पहचान देगा, खुशी का की वही है तूं, अन्यथा.. गर रुनासी, तो खुशी न! कुछ और है, तूं..! अप्रभावित! गुण तेरा, संसार के हर कारकों से, अविचलित जब तक है, प्रिय यही तो, वह द्रव्यता द्रव्य की। कीमती..! अपरिवर्तित, एक सी। अपरिवर्तित यह रूप, गुण, सौंदर्य है, औदार्य है, जो बांध लेता सभी को, एक जैसा, विश्वास की ही रस्सियों में। अन्यथा इस रूप की क्षण विकृति भी, दूर कर देगी तुम्हें, हर हृदय से, स्वर्ण हो, मुक्ता-नवल, हीर कण चमकते हैं एक से हर हाल में, हर स्थिति में तभी तो प्रिय, हर किसी ...