इसलिए, उड़..
एक ही तो पुरुष है वो और एक ही तो प्रकृति है रे! शेष सारे, देह प्यारे जो हमे यहां दीखते हैं, मात्र छाया, डोलती.. सब उसी की रे..! इस लिए तो कह रहा हूँ मन, मन ही है, तैरता, इन इंद्रियों में डोलता, इस भरमते का, क्या भरोसा कब लौट आए, बैठ जाए.. पिंजरे में अपने, अचल होकर एक कोने..। इसलिए, उड़.. उड़ती हुई उन पतंगों पर, उतने ऊँचे बादलों तक, छू.. बदलियों को खेल ले, यह खेल सारा.. मधुर, मीठा, तीखा, खारा.. चषक भर भर, तृप्त हो ले। देख न! यह प्रकृति है, यह गतिज है गुणशील है, रंग इसमें, रूप इसमें खिल रहे, तुझे खींचते हैं यह चाहती है घोल ले उस परम शिव को, आप में, समा ले, अपनी शमां में, युगों से और तूं माध्यम है रे.. बस इसी का, वह संकल्प अपना पूर्ण कर लें। यही तो वह खेल है विश्व जिसमें बन रहा नित सिमटता। जय प्रकाश मिश्र समालोचना और सारांश इस कविता में हमने पुरुष और प्रकृति के संबंध को एक ऐसे विराट खेल के रूप में देखा है, जिसमें...