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नमन! तुमको.., और किसको?

मित्रों, ईश्वर! एक पहेली, कोई कुछ भी कहे, आज तक एक भी इशारा और संकेत किसी को न दिया, तो न दिया। वह है, तो हम हैं, पर एक ही है, इसलिए धर्म सारे ...एक हों! इतना बड़ा बितान ब्रह्मांड का उसने ही ताना होगा, अन्यथा कौन इतना शक्तिशाली अन्य होगा जो सूर्य चंद्र बना ले गति कर दे। इसी पर एक आराधिका आपके लिए। सर्व प्रतिष्ठित!  शक्ति हे!  नमन!  तुमको..,  और किसको?   मैं करूं रे!  ढूंढता! इतने दिनों से, दहलीज! आई,  पार पाऊं! मन खुला ले, तेरी तरफ रे!  दिन कहां?  कितने बचे हैं, पास.. मेरे?  इसलिए..,  अधीर.. होकर,  पूछता हूँ, सीधे.. तुमसे..! विनत हो,  विनयी.. हुआ रे!  किस रूप को,  किस रंग को?  किस आकृति..को!   किस धर्म.. को?  किस आदमी को मैं करूं!  यह.. नमन! रे...।  आखिर में, अब तो, बता मुझको।  इतने.. दिनों से,  फंसा.. हूँ, धर्म की इन, दुकानों में, मंदिरों.. में मस्जिदों, गिरिजाघरों में,। कुछ नहीं है, जानता हूँ, सच कह रहा हूँ, अरे! इनमें,  ईंट पाथर मात्र हैं रे!  फंसा हूँ, मै...

सुना है, ए.आई. है आया मित्र जग में।

मित्रों प्रश्न है! क्या ए.आई. भविष्य में, शोषित सर्वहारा वर्ग और शोषक वर्ग के बीच तीसरा प्रतिमान बन कर उभरेगा। क्योंकि एक तरह, यह बुद्धिजीवी वर्ग का स्थान ले रहा है, और उसके महंगे श्रम को श्रमिक के श्रम के बराबर ला रहा है। आज की लाइने इसी पर बेस्ड हैं आप पढ़ आनंद पाएं यही कामना है। मनु..  पुत्र.. तेरी,  देखकर, हर..  छद्म-नी  चालाकियां..,  हदों... तक, बेई..मानियां..  किमिया..गिरी,  पेचीदगी..,  गांव,  शहरों से जुडी,  पर्दा हटा,  पहचान कर!  भेड़ियो की खाल में,  अब भी छुपा.. है, .. आदमी..! मन.. भर गया, इससे ज्यादा, क्या  कहूं?     इसलिए,  अब!  चाहता.. हूँ,  खत..  लिखूं,  और...,  खत.. में..,  सच...,  लिखूं!   पर,  जानता हूँ,  पाती.. मेरी!   तुम!  पढ़ो...!  संभव नहीं ! अक्षरों से भेंट, तेरी  आज तक!  एक, भी.. नहीं। तो..  क्या करूं?    सोचता... हूँ!  पास आकर...,  पास... तेरे,  बात..,  मुं...

आज! नारी दिवस है, नारी सदा मुकुलित रहे।

मित्रों, नारी में उसकी महानतम विभूति, मां के रूप में स्थित होतो है। इसमें वह इस विश्व को अपने निर्मल प्रेम और करुणा में भर सदैव, जीव-जीवन-प्रसव और वात्सल्य से संसार को कराल-काल से बचाकर, नवल एवं जीवंत रखती है। उस नारी को आज नारी-दिवस पर, अतुल्य उपकार के लिए संपूर्ण सृष्टि, प्रणाम! करती है। सभी नारियों को मै अपनी हार्दिक बधाई देता हूँ। रूप! लेता, विश्व..  यह,  इतना बड़ा..,  सतत..,  चोला, बदल.. कर,  नव.. ही, रहेगा!  कौन.. है?  वह..!   यज्ञ.. यह,  इतना.. बड़ा! इतने बड़े.. संसार... का, पूरा... करेगा। काल... को भी,  बांध... लेगा,  कालिका  की  चोटियों...  में,  इतनी काली, आंख की निज, पुतलियों में समा लेगा, प्रेम से स्नेह से,  वात्सल्य में, उसे झुला देगा, झूलना..  बाहों का अपने पुचकार दे गोदी भरेगा?  वह! कौन.. है, जो.. वश.. में,  रखे,  निष्ठुरे..इस काल को मुट्ठियों में,  बंद कर इस कुलिश,  को!  पाल लेगा,  अंक में। जो.. ठान बैठा  था...,  मनों..  में,  श...

अब यवनिका उठने को थी।

सांसारिक नृत्य करने, आत्मा, इस धरा पर उतरने के पूर्व अपना उत्कृष्ट रूप ले, शरीर बन, सौंदर्य भर गर्भ से निकलने को तैयार खड़ी है अर्थात यवनिका उठने को है। इस समय, इस आत्मा रूपी नायिका का दृश्य कैसा था! इसी पर ये लाइनें आपमें आनंद भरें यही लालसा है। सांसारिक नृत्य करने,  आत्मा खुद,  धरा ऊपर, उतरने, अब जा रही है  अंतिम घड़ी है, आतुर खड़ी है  यवनिका उठने को है.  पूर्व उसके,  वहां पर क्या दृश्य है:   अरि!  नरम पद,  कैसे थे, उस के..?  कैसे.. कहूं!  बिह्वल.. अभी.. हूं!  और...  गहरी...,  दृष्टि उसकी,  किस.. तरह, हर.. ले गई, मन!  परा.. विस्तृत...!  दूर तक, चितवनि! थी उसकी।   मधुमय.., मनोरम..  सौम्यता...  ही, खड़ी हो,  मूर्ति बन..। और.. क्या कहूं!  हर वृत्तियों... से, क्षीण  अनुपम...। शांत.. स्थिर!   नील उत्पल, सरोवर में,  खिल चुका हो, बिकच.. कच भर बिकस कर, रूप खुद, सौंदर्य भर भर आकृति कुछ इस तरह थी। संपूर्णता... में,  पूर्ण..  प्रमुदित!  प्रसन्ना......

बता न! कौन.. है, तूं..!

मित्रों, जीवन की पूर्णता क्या है, इसे एक लहर के रूपक में रखता हूं। जीवन ऐसे तो शून्य से शून्य की यात्रा है, फिर भी है, और वास्तविक महसूस किया जाता है इस लिए आप यह लाइने पढ़ सकते हैं। अंत में शायद कुछ काम का आपको मिले। बता न!  कौन.. है, तूं..!  और किसलिए,  पास.. तेरे,.. आएं! यें.. लहरें.. उछलती, इस जोश से और क्यूँ ..?      मन हृदय के द्वार, तेरे..,  पाथर पटे, इन तटों पर,  पटक दें!  सिर माथ अपना, समंदर के, किनारों पर!  इस तरह.. मस्तिष्क में,  न्यूरॉन बन कर घूमती फिरती रहें!  बता न! कौन है, तूं?   तरंगें यह क्यों उठें?  बार.. इतनी बार.. कितनी, पास तेरे, चढ़.. उतरती  सागरों के, वक्ष से गर्त.. श्रृंगों.. में सिमटती दूरी.. से उतनी,  इतनी, दूर... चल के! बता न! कौन... है तूं?  गिर पड़ें,  चरणों...पे,  झुक कर, विसर्जन कर, समर्पण कर!  अरे! ऐसे... और तूं.. दुत्कार, इनको... बता न! किसलिए!  अरे! कौन है तूं?  समय है यह, मात्र तेरा  स्लॉट भर है,  जिंदगी में, कुछ ही दिन का ध्यान ...

तुम अतीन्द्रिय हो, असीमित हो मित्र मेरे।

मित्रों, संपूर्ण विश्व, अनादि शक्ति से परिचालित है, यह शक्ति, संपूर्ण ग्रह नक्षत्रों सहित हमें और इस प्रकृति को एक साथ जन्म-मरण के रूप में गतिमान रखतीं हैं। इस शक्ति ने मनुष्य को अतीन्द्रिय प्राणी बनाया है, हर आत्मा को उसका शरीर, ईश्वरीय वरदान है। मनुष्यों ने अपनी को सोच को सीमित क्यों कर रखा है? इसी पर यह लाइनें। कौन लेगा,  गोद में,  तेरे... सिवा, इस सृष्टि का आधार, है..  तूं..! कैसे कहूं!  जो कुछ भी हूं,  जन्म से, ले मृत्यु तक!   मां! तेरा..  प्रसाद..मैं  हूं, हम सभी: में,  देह की  मिट्टी ही  क्यों,  "प्राण" है तूं! कौन.. कहता है की..  तुम!  हे..,  मानवों!   सीमित!  यहां हो,  इंद्रियों  तक!  मित्र!  तुम.. हो,  अतीन्द्रिय!  अपरिमित! आनंद!  लहरी,  परा.. विस्तृत!  लहरती.., इस प्रकृति के तो,   पुत्र.. हो तुम। देख..  तो,  क्या.. देखते हो,  मात्र.. तुम!   इन  नेत्र से... जादू! नहीं देखा कभी!  इन नेत्र का...

अरे अब, भारत हैं हम, और अपनी भारती।

सभी मित्रों, को पावन होली पर्व की, बधाई और शुभकामनाएं।  मित्रों मुसीबत और मुफलिसी में, दुश्मन कोई नहीं, आदमी.. आदमी से अपना काम चलाता है। आम जीवन आपस में राजनीति की पेचीदगी से नहीं प्यार और दायित्व की सादगी से जीता है। समय है हम जाति-पांति से ऊपर उठ आदर्श नवदेश बनाएं। इसी पर यह लाइनें, आपको भाएं। उतर आए लोग, हैं.. अब  बहुत नीचे..! रे, कीमियागर!  खेद है !  तूं अभी, बैठा.. वहीं पर!  दीखती तुझको नहीं,  क्या  जमीं की यह!   वास्तविकता!  अब... चुग रहे, भूखे हुए,  चूज़े..सभी, हर जात के संग प्रेम से,  नीचे यहां, अब जमीं ऊपर। क्या करेंगे,  जात लेकर पांत लेकर!  बेकार है, सब..,  और तेरी, कीमती कीमियागिरी... जरूरत में, मुफलिसी में,  ये सभी... अब, 'आदमी' बस!  इसलिए तो कह रहा हूँ, बंद कर, दूकान' यह! अब नया! युग.. है, सबके हृदय में क्रांति है परिवर्तन हुआ है देखकर!  कहां सोया, अरे! मेरा रहनुमा!  आग! ले बैठा हुआ है पुरानी... वह!  आजतक!  अरे अब,  भारत हैं हम सब, और अपनी भारती अब। जय प्रकाश मिश्र...