शून्य
यात्रा.. ये चल रही है शून्य में। पास मुझको पहुंचने दो कभी अपने, दूर.. न.. ऐसे करो, पर्दा करो, पर्दा रखो, अंश-अंशी बीच में, मुनासिब, जरूरी, वाजिब है, ये.. पर प्रार्थना है दूर मुझको, मेरे ही.. अस्तित्व से, यूं.. न..! करो। मैं... नहीं था, कल तक यहां, इस रूप में, यह सत्य है कहीं और था, न..! बिखरा हुआ, फैला पड़ा बिन अंग के, बिन स्वांस के विराट की सीमा के अंदर कणों में, मैं कब नहीं था? शून्य मेरी उपस्थिति थी, इस जहां में, एक क्षण भी, आज तक मत यह कहो। आकार क्या है? संयुग्म..नन! कुछ कणों का, बस एक संग! और मैं.. आकार हूँ, मानता हूँ इस समय, कुछ कणों का, कुछ अस्थियों.. का देख न इस चर्म भीतर..! प्यास है, इन कणों में इन यौगिकों के बीच में नाचती है, यही तो, मेरी.. जिंदगी बन..! आकाश के इस जाल में हम उपस्थित हैं सदा से आदि से अनादि तक, कभी चेतना को साथ ले.. कभी चेतना को...