जीया नहीं ये जिंदगी, मैं कभी खुल के।
१. फूल! जितने भी खिले थे खिल-खिलाकर, हंस रहे मुस्कुराते महकते पेड़ की उस डाल पर.. अच्छे थे कितने? २.और रखे, टेबुलों पर.. डंठलों संग काटकर, लपेटे कपड़ों में भीगे सरे सर-बाजार में सजाकर गुलदस्तों में भरकर बेचने.. ३.और कुछ थे रंग-बिरंगे रंग के मोहते मन घर में.. अपने मेज के गुलदान भीतर गुनगुने फूल ही तो सभी ये.. थे मुरझना इन सभी को था आज ही पर दुख हुआ मुझे मात्र बस उनके लिए घर में मेरे थे, मेज पर रखे हुए अन्यथा मुझसे जुड़े थे। क्यों है ये.. फूल तो बस फूल थे और सारे पेड़ के, इस प्रकृति के थे.. । आदमी क्यों बंद है, सीमा में अपने ...