और यह कुछ भी नहीं था।
मित्रों, इस नियति के खेल में हमसभी का जीवन एक सुसंयोगतः घटित सफल संभावना! नेचर के किए आदमी कुछ नहीं, एक स्थिति और प्रोसेस का बायप्रोडक्ट इसी पर यह लाइने आपके लिए। वह एक सहज प्रवाह मात्र। सरलता, सहजता! ही.. है, नियति यह! प्रवहित, सदा से, एकरव ! कभी, मुलायम! कभी क्रूरतम! तुझको लगी, वह...! बेखबर थी.. मुक्त थी, इस.. बात से, हर एक को कैसी लगी। किस किनारे, किस.. ओर! प्रिय! तूं था खड़ा था उस नदी के उस वक़्त जब वह किनारों को तोड़ती सीध अपनी जटाओं को कर रही थी। वह अपनी रव में बह रही है, आदि से, हम झाग हैं, उसके... लिए, उससे बने, तैर लें, जीवन है जब तक फिर, उसी... में, मिलेंगे। कुछ करें साथ उसके ही बहेंगे। यह बुद्धि तेरी, तर्क तेरे.. तेरे, लिए हैं उसके लिए, तूं मात्र तृण! है तैरता.. सबकी तरह उस सतह पर या गर्भ में, कर्म की खुद स्थिति से बस कुछ क्षणों के.. ही लिए तुम ही क्यों यह.. सभ्यता इतनी बड़ी मनुष्यता! और, दिख रही यह दिव्यता कुछ नहीं उसके लिए, एक कर्म है, बहाए और बहे खुद इस समय नद म...