बैठ चिड़िया शाख पर है देखती,
बहक जाता हूँ, मैं.. अब भी फंस हूँ जाता, आज भी, मंजुली, हंसती हुई इन रस्सियों के जाल में, प्रियल कि तनी, लुभातीं, ये सुनहरी। लोल फंदे, झूलते ये, मोह.. लेते, चित्त.. मेरा साथ कैसे, ले के उड़ते। खींच लेते, दृष्टि मेरी, मन मेरा और मैं हूँ उलझ जाता, चिपक जाता फिर उन्ही कंटवासियों में, बेर के काँटो में फिर से तड़फड़ाता..! पंख मेरे छिल गए हैं खेल में इस और मन है, पा रहा हूँ अधभरा। सच सुनो मुझमें है कोई मत्स्य जिंदा! बहती नदी का, नवेला! लालची, यह कूदता है, मचल जाता, आज.. भी भूलकर पानी है कितना बह चुका। ताक पर रख, भूतियों को आज तक की दौड़ता हूँ, संसार पा लूं... मिथ्या है यह, अच्छी तरह हूँ जानता। जानता हूँ, जग है छिछला, गहराइयां इसमें नहीं हैं, कुछ नहीं हैं, पाट यह फैला हुआ। भ्रांति हैं सब दृश्य, क्षण.. हैं इन क्षणों में, कुछ नहीं मात्र छाया सोच की, स्वीकृति ...