दौड़ते ही दिन ये बीते,
सम्भाला है, होश जबसे दौड़ते ही दिन ये बीते, भागती.. दुनियां के पीछे.. अभी तक, तब से लगा हूँ, बिन रुके, सतत, अ..नथक। क्या स्वर्ण मृग यह..! मरीचिका है, प्यास कोई, वज्र श्रापित! अनबुझी यह! उम्र आई, क्या छोड़ दूं जग, अधूरे में, मन नहीं, यह मानता है, चाहता हूँ, हल करूं कठिनतम! जो प्रश्न था वह.. क्या है, यह सब..? यहां बाहर, इस तरह और मेरे अंदर। भार रख, विश्राम कर लो, मेरी सुनों, बस एक क्षण चंचलल्ता यह चित्त की उतार दो, कंधों से अपने। बुद्धि को, वापस वहीं अच्छे से रख दो, तर्क सारे छोड़ दो, बेकार हैं सब, पास आओ, अपने खुद के, साथ बैठो, देह का अभिमान, संग अपमान, सारा.. भूल जाओ, कुछ क्षणों को संसार का पर्दा उतारो, मानस पटल से। क्या अलग हो, इन क्षणों में देह से, खुद से पूछो, कुछ देर तो सोचो इसे तुम देह न हो..। बस चेतना का विंदु कोई चमकता हो, इन ...