कौन.. है, बैठा हुआ इन अंधेरों में।
मित्रों, कठिन को आसान करना भी मेरा काम है इसी क्रम में आप अपने को जाने इसी पर ये लाइने और इनका भावार्थ भी लिखा है, आप प्रसन्न हो यही उनसे याचना है। दीपक बना.. यह कौन.. है, बैठा हुआ इन अंधेरों में, स्वप्रकाशित! इतने गहरे गह्वरों में, अकेले, जन्म से ले आज इस अठवें दशक में। चुप मौन वैसे साक्षी.. इतनी बड़ी इस अवधि का चिद्रूप कैसा, एक सा, न कभी उद्विग्न होता न कभी उद्विग्न करता। नृत्य करता विश्व यह घेरे इसे कितने.. दिनों से, विश्राम करता रात्रि हर थक हार कर, और यह, मेरे दिल के जैसा, साथ देता, बता देता सुबह को, प्रिय स्वप्न हर नींद में भी सबसे गहरी जागता है, कभी न विश्राम करता स्वाद उसका बता देता, कौन है यह..! पांच धागों में बंधा रखा है कैसे पारदर्शी स्फटिक! दिखता नहीं इन नेत्र से, मन, बुद्धि, चाहत और मानस चाकरों से घूमते हर समय, हर ओर इसके..। ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों की सेज पर आराम से लेटा हुआ, अविचलित,...