Posts

संस्पर्श तो कर चरन उसके।

मित्रों,  स्फटिक सा  सामने,  पारदर्शी हमीं में,  जीवन है अपना दिखता नहीं पर  आंख से इसे क्या कहूं!  घटता सभी कुछ विश्व में इसलिए आ घटाता हूँ  'विश्व' को,  इस 'विश्व' से अब  क्या.. बचेगा.? पूछता हूँ बताओ न!  क्या शून्य होगा?  हर एक क्षण घटता यही  इस विश्व में पूरा का पूरा पुराना,  मिटता यहीं है  विश्व सारा पर नवल दिखता,  उससे भी  ज्यादा!  बहती नदी के वारि सा धार से, ले.. तली तक  बहता  हुआ जल जो  बह गया, वह बह गया बीता हुआ, फिर  न  मिलेगा  ध्यान दें  न!  वैसे की वैसे, ही पड़ी, रहती नदी बहती हुई,  हमें दीखती..  है सामने  यह  दृष्टि भ्रम है,  घट गई..  पूरी की पूरी,  बह गई..  अति  सूक्ष्म क्षण में  इस विश्व सी.. तू.. बह  रहा  है,  ध्यान से  कभी देख ना। विचारों की बाढ़ में  और  वास्तविक भी  स्थिर  नहीं कुछ,  स्थित नहीं  कुछ,  ऊतर  गहरे,  परिवर्तनों में देख ...

हे जलद! पुनि पुनि तूं आना।

मित्रों जल जीवन है, और जलद जल अक्षय दाता उन्हीं पर यह लाइने। हे जलद, निर्घोष! तुम  हवाओं के विमानों पर  उड़ रहे  रातों  में  इन..  कहां  जा रहे हो? छूते हुए, ऊंचे वहां..  मंदिरों के शिखर तुम..। आज यूं निर्घोष तुम.. स्पर्श देते, तृप्त करते,  भूमि मेरी हृदय मेरा, तन मेरा  यह मन मेरा  यह वसन मेरा भिगोते हो,  स्मित हंसी की नमी से  इन फुहारों से इस.. इस तरह विह्वल हूँ मैं तुम्हे देख कर लगते मुझे अपने हो तुम.. प्रिय जलद! आज क्यों निर्घोष तुम। कितने हैं रथ कैसे गिनूं.. स्तरों में, कितने तुम क्षितिज के इस पार से  उस पार तक,  एक से फैले हुए एकसार तुम तीन दिन से सतत ऐसे  आ रहे मेरी तरफ  बरसते पूरब दिशा से,  पश्चिम कहां प्रिय जा रहे तुम। टपकती ये बूँद टुप.. टुप..  और शीतल  लहरियां फब्तियाँ कसती हुई,  ये साथ तेरे  मचलती प्रिय बदलियां! आनंद घन तुम..  सत्य ही आनंद घन तुम। उड़ रहा  यह महासागर,  इतनी बड़ी जलराशि का इतने.. नीचे,  इस तरह से लहरता और मैं अंदर हूँ इसके,...

बाजार मैं, बाजार दुनियां।

बाज़ार दुनियां  और मैं..  बाज़ार खुद एक, खुला हूँ,  हर वक़्त अपने  विचारों.. की  दुकानों  में, तौलता हूँ,    सत्य सबका  आज के इस जमाने में, आप को, हर एक को आप खुद को,  अंदर कहीं  बुद्धि की निज, तराजू में। कुछ बोलता हूँ  बाद में, पहले तुम्हें मैं  तौलता हूँ कितनी रखूँ  और चीनी अपने स्वर में। हिसाब से, तौल कर, उसे मिलाता हूँ पेश करता हूँ तुम्हें  अन्यथा  बेरुखी से  टाल  देता हूँ  तुम्हें! तुम जानते हो,  सभी कुछ  अंदर का  मेरे दुकान  आखिर! बाज़ार की इस  तुम भी तो हो। चढ़तीं.. हुई साँसें ये मेरी,  स्वार्थ संग उतरतीं नुकसान.. में, टंग.. हैं जाती उसी  क्षण  संदेश पा, पड़ती हुई  घर रेड में। क्या क्या छुपाए घूमता मैं.. सामान इस बाजार का राह चलते  सौदा  करता आज मैं हूँ प्रेम का। बेंच डाला विश्वास अपना कुल भी अपना,  तन, रंग,  सौष्ठव, जाति अपनी और सच कहूं तो आत्मा। बालक हूँ मैं.. तिस पर अभी आज भी इस..  जिंदगी की रेत में,  मोह को...

मैं मुस्कुराहट! तेरी हूं, तेरी खुशी हूँ:

मित्रों पढ़ें और आनंद लें।  खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब शाम को बैठा अलग  हो  जिंदगी की  दौड़  से, और पूछ बैठा,  उसी  से क्या चाहती है,  अब  बता तूं! आखिर मेरी इस  जान से..? वह चुप रही, कुछ भी न बोली देर तक, एकटक!  मुझे  देखती चटकती  कोई  कली हो, चटक  कर  मुस्कुरा कर  बोल  दी, मैं मुस्कुराहट!  तेरी हूं,  तेरी  खुशी हूँ। हर शख्श में, मैं गूंजती हूँ, सोच न!  मैं न रहूं! तो क्या हो तुम!  क्यूं परेशां है,  क्या थक गया है?   मुझसे तूं? तो बोल न!  आज़ाद कर दूं  अभी इस  क्षण   क्या तुझे..  जंजाल से..? आघात से,  इन  नश्तरों से कष्ट के..! मैं हिल गया, अरे नहीं री.. ऐसा नहीं, अभी काम है,  सामान है, घर मेरा है मेरी प्रेयसी है कुछ पुराना है  ठिकाने  उसे लगाना है,  बच्चे हैं मेरे.. छोटे छोटे अच्छी है तूं.. अच्छी है तूं! फिर खीझ कर हालात से,  अलग होकर  आप  से, एक दिन जब  शा...

शून्य के भीतर छुपा क्या?

आ..  प्रिये..!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर  छुपा,  वह कौन है, जो  दूर जग.. से!  भूति.. से,  एषणा.. से, कर्म से..  सुख.. दुख.. ही क्यों  अनुभूतियों से। सोच तो  एक बार उसको!  इतने दिनों से अकेला प्रिय मौन है, क्या यही वह शून्य है। शून्य है जो..  कुछ  नहीं, वह परिमाण में, स्थान में!  आकार.. में, और रूप में  ही नहीं  यह आस्वाद से भी  हीन है। दूर है इन  इंद्रियों... की चाह से!  विरस है, वह रसों से!  सौंदर्य से.. फिर भी प्रिये, य ह...  आसन जमाए क्यों जमा  है  शून्य सारी सृष्टि में,  इतने दिनों से। आ प्रिये!  मिल देखते हैं शून्य के भीतर छुपा,  वह कौन है। क्या यही वह मौन है। कौन है यह!  बोलता ही है नहीं, डोलता हो, पैर से,  पैर इसके हैं नहीं गोल है यह, हर तरफ से  एक सा,  शून्य की यह  शक्ति है क्या  इसलिए। कुछ नहीं, पर काम का है, शून्य है, पर पूर्णता है, शांति है  यह परम  मित्रों,  शून्य बिन सब शून्य है। जय प्रकाश मिश्र जय ...

कितने निमंत्रण बाँटती हो।

जीवन के कुछ गूढ़ तत्व हैं उन्हीं में से एक पर यह लाइने आपके लिए। कितने निमंत्रण बाँटती हो,  ख्वाब के तुम,  निमिष  भर  में, पर लगा तुम कल्पना के  उड़ाती मुझे  दूर उस नीले... गगन में।   दृष्टि के निक्षेप में जोड़ा  कभी  है,  मासूम  मन, कितने गिराती 'हरीले' तुम!   जो देखते  चितपावनी  चितवन तेरी..  आह भरते  सभी  हैं  अंदर कहीं..! से। कभी सोचना  मेरे कहे हृदय कितने..  तोड़ती हो,  फूल.. से तुम, मुस्कुराती .  तुम्हे.. देख लें जो.. बचा कोई.. एक,  होगा शक मुझे है.. आज तक,  आहत हुए बिन! कौन हो तुम!  क्यों है ये.. प्रिय.. नहीं लगता मन  सभी का  इस जहां  में.. देख लें  जो  दृष्टि भर.. तुम्हे.   आभरण में, स्वस्थचित्ता  किसी.. भी दिन। मन है क्या यह.. रूप है क्या संबंध  इनके बीच कैसा.. प्यास यह, और आस है क्या.. सांस का कोई खेल है क्या.. एकाग्रता इस दृष्टि की शून्यता संवेग की शांत मन में मेल है क्या.. आनंद इनके बीच बसता  कहीं है क्या...