धर्म की सीमा कहां तक।
धर्म की सीमा कहां तक, जानना है? अधर्म को मैं जानता हूँ! अच्छी तरह, यह.. आदमी तक.. अधर्मी तक। आह! ईश्वर, कहां तक हम मानवों का साथ देगा, और कब तक पूछता हूँ! नाराज... हो मत, इस जमीं के छोर तक, जीवनों के अंत तक या वहां.. मृत्यु के उस पार तक..! सत्व का वह पुंज है, अधर्म नाशक..! बिगड़े हुए इन मानवों का, दानवों का कल्पना-गत वध करेगा वही है हल! अधर्म नाशक! एक ईश्वर..! या हम हैं कुछ सीमा के भीतर, पूछता हूँ बली हैं वे.. किसके बलपर अधर्मी..! हम सभी से शक्तिशाली और हम हैं सत्य वादी! सत्व शाली! फिर इन सभी से इस तरह से, त्रस्त क्यों हम? यह खेल क्या है? भेद क्या है? इतने दिनों से युद्ध की इस महाजड का उच्छेद क्या है? अधर्म के संग, धर्म के इस युद्ध का आखिरी में अंत क्या है... कुछ गुण हैं हममें काम करते हम सभी में, यह भेद है निर्माण में इन शरीरों के शुरू से, पञ्चतत्वीकरण इस ब्रह्मांड के इन तत्व का.. पांच...