समष्टि का बेटा है तूं
इतनी बड़ी यह सृष्टि सारी, हम सभी के पक्ष में रात दिन, एक करती लगी है, खुद देख न! प्राण सबके बच सकें इसलिए वह हर जगह बिना बोए, बिना सींचे हरित धरती कर रही है। वो इंच भर न छोड़ती है, जगह खाली जानती है, वनस्पति ही प्राण हैं! धरा के, इन प्राणियों की, इसलिए पेड़ की इन फुनगियों को छोड़ तूं! अंकुरण राहों में तेरे, पैर नीचे दूब तक में, बेकार की उस घास में भी युग युगों से कर रही है। चाहती है, हर देश में, हर काल में, अनवरत नदियां बहें, सागर की लहरें, और ऊंचे आकाश छूएं हवाओं को शुद्ध कर दें। सघन वन, हर.. ओर हों चहकती चिड़ियाँ उड़ें, खुश यहां बच्चे रहें, हम तुम रहें, बच्चा ही अपना मानती है, हम सभी को। इसलिए, बिनथके काम पर चौबीस घंटे लगी है, आ हम भी उसका साथ दें। इधर हम हैं, स्वार्थरत.. है, नटुलपन है हम सभी में, एक दूसरे से लड़ रहे है। देख न इस प्रकृति को, भोली है ये, माँ है य...