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इतना बड़ा त्यौहार किसका?

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इतना बड़ा त्यौहार किसका? चमचम चमकता,  रौनक.. भरा स्वर्ण  हो  फैला  पड़ा  इतनी बड़ी इस भूमि ऊपर जलते  हुए  दीपों  का रेला। महल सी  अट्टालिका की मुंडेरों पर दीपती, द्युति लहर सुंदर लाइनों से  देखकर  वह,  सोचती है,  तेल होता,  स्नेह  सा इनमें भरा  तो  पास की  ये..  झुग्गियां  सूनी न रहतीं, सोई हुई आज प्रिय, कुछ इस तरह? किसी का त्यौहार है यह किसी का मौका है  यह,  कमा  ले वह लग  गया है  भोर से,  होती सुबह..  धूम है, खुशी है, उत्साह है सभी भीतर  कोई मना ले, कोई कमा ले क्या यही,: कम है.. त्योहार है कितना बड़ा,  उत्साह सब में है भरा, आकंठ तक। सब बिकेंगे आज देखो..  किस तरह सड़कों के ऊपर  मिट्टी बिकेगी दीप बन कर रंगपुत गई तो देव क्या  श्रीगनेश बन कर  घी तेल सारे स्नेह बन कर निरस रूई सत्व  रूपी  बातियों का रूप लेकर.. सत्व, रज, तम सब बिकेंगे एक ही दूकान पर त्योहार है,  दीपालिका का कैसा सुंदर। असत्य हारे, सत्य जीते अन्याय ...

दिए तो मिट्टी के हैं मेरे

दिए तो  मिट्टी के हैं मेरे,  बहुत छोटे,  नन्हे..  मुन्ने.. पर स्नेह भर कर,  देखता हूँ, इन मिट्टियों की प्यालियों में, प्रेम की बाती रखूँगा सबसे ऊपर श्वेत निरलस राग रहकर सूत्र एक एक खुला होगा सूखकर! प्यास होगी अंतरों में,  स्नेह की तो खींच लेगा, हृदय तक। देखता हूँ, खड़ा होगा  क्या यही दीपक बनेगा..  प्रिये कल का अमावस की 'रात काली' से लड़ेगा  मृत्यु तक..! दिए तो मिट्टी के हैं मेरे, बहुत छोटे। पर यज्ञ है यह..  समिधा हैं हम सब,  उजाले की तरफ हैं हम लड़ेंगे, दीपावली के इन दियों से राम बनकर,  पैदल थे जो, रन भूमि में। बिना सेना, आदमी के..  रीछ, भालू बंदरों  संग.. प्रभुत्व शाली! दशानन से.. दीप से भी,  क्या हैं, कम हम..। दिए तो मिट्टी के हैं मेरे, बहुत छोटे..। हम इकट्ठे!  आकाश के तारों सरीखे!  उगेंगे.. हर रात यूं ही  अंधेरों में, जीतने..  अतिचार को तो नहीं देंगे.. राम के पीछे रहेंगे..। श्री राम के पीछ रहेंगे। दिए तो मिट्टी के हैं हम, बहुत छोटे..। जय प्रकाश मिश्र समालोचना भाग इस कविता में छोटे मिट्टी के द...

दिवाली.. आने.. को है,

दिवाली..  आने.. को है,  प्रकाश का यह पर्व है, चमचम है बाहर, सड़क पर आकंठ फैली दुकानें  सड़क के सीने पे चढ़कर लग चुकी हैं,  जमघट लगा है, आमजन का,  चलना  है  मुश्किल!  सड़क पर,  त्योहार  है..  चहल है,  हलचल मची है, हर तरफ। उम्मीद पाले लोग हैं,  कुछ  इन्हीं में,  दूर से आए हुए, बेचने और देखने  ये  शहर अपना, और  हमको.. आपको बच्चे भी  हैं, कुछ नन्हे मुन्ने  साथ उनके, इसलिए एक प्रार्थना है,  अंकुर हैं वे.. अनछुए हैं,  निसर्ग  ही.. हैं, ग्रामीण हैं कच्चे दियों के साथ हैं,  और कच्ची भावना  मन में लिए हैं।   आज देखा टिमटिमाते दीपकों से दुकानों पर  खिलौने ले मिट्टियों के आस में, बैठे हुए हैं। तहजीब की नगरी है अपनी पुरानी  इस लखनऊ की लाज रखना, शब्द कोई, काम कोई, सभी मित्रों, एक तुम ऐसा न करना दुःखी हों वे,  तल्खियों से सभी बचना...। यह छाप होगी,  उनके हृदय पर प्रेम की जब बड़े होंगे, लखनऊ अच्छा शहर है, दुवाएं वे हमें देंगे। आ बनाएं मिल दिवाली  और स...

आ.. पास बैठें,

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आ..  पास बैठें,  सहज बहती,  रसभरी  गाती नदी के.. किनारे ,  अंदर! चलें,  भीतर ही अपने तिरते हुए से , टहलते  थोड़ी देर को एकांत में, सुनसान में,  खुद से मिलें..। बहुत दिन से सोचता था.. एक दिन तुमसे मिलूं.., पूछ लूँ.. कौन हो तुम..? अजनबी तो नहीं लगते,  देखने में.. मीत.. हो? तो इतने दिनों से मौन.. हो क्यूं..! क्या कहा..?  थोड़ा  तेज बोलो.., सुन सकूं..! पार्थिव.. हो!   मिट जाओगे..!  ऐसे यहीं  तुम  एक दिन! भाग हो,  भागती इस प्रकृति के. समय रथ पर  बैठ कर शरीर के तुम सारथी हो.. कौन हो, ठीक से परिचय तो दो..। तुम मेरी चिंता मत करो, साथी ही समझो.. पर सारथी  मुझे  मत कहो कभी फंस गया था  जाल में,  बहती नदी की धार में आज तक! उलझा हुआ हूँ! उसी में। तुम 'समझ' हो, इस देह में थोड़ा और समझो चित्त, मन,  और  बुद्धि अपनी कुछ नहीं है, परमाणु का ही अंश है,  संसार है, संसार में ही उलझता है विश्व के तुम पार हो सुपर हो.. सच  कहूं  जो दीखते हो,  वह नहीं हो क्या कहा आनंद हो,...

अछूती दुनियां से वह।

अछूती दुनियां से वह,  बस काम तक सुबह से ले शाम तक,  एक घर से दूसरे..  होती हुई, रास्तों भर  आ रही हूँ! अं..न्टी कहती हुई अभी.. पहुँचती हूं फोन पर,   थुलथुली उस मालकिन से कह रही,  थक चुकी थी..  काम पर। चाहती थी चाय पीना ठंड में उस.. काँपती देह उसकी  अभी तो  तेरह बरस की मात्र थी। उम्र से पहले ही वह  संसार के  यथार्थ से इस लड़ रही थी। हिम्मती थी, हार क्या है.. वो क्या जाने..! चार पैसे कमा लेना  मेहनत से अपने जीत.. है, यही तो, वह जानती थी..। रिक्ति को स्थान कितना चाहिए उससे भी कम में रह रही थी आरती वह नाम से थी आरती होती है क्या?  वह क्या जाने.. मैं जानता हूँ,   जन्म से वह आर्त थी। वैभव है क्या.. शक्ति क्या.. मदद क्या..! कुछ नहीं, उसके लिए  वह चाहती थी,  एक दिन का  मात्र! वेतन,  उन  महीनों का  तीस से ज्यादा हैं, जो  ज्यादा मिले..। तर्क तो यह सही था, सोचता हूं  न्याय संगत  बात थी,  पर कोई नहीं  इसे  मानता था  सोच इसको  वह दुःखी थी..। इससे ज्यादा  सो...

बदरिया... झिम झिम.. झिम बरसे...

बदरिया... झिम झिम.. झिम बरसे... बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे.. पात लजाए! तुड़ मुड़ जाए! डाली पट उघरे...!  बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। फूल.. सहे,  टपकनि का लहरा.. हिलडुल.. भी, कन्ह पाए, बूंदे.. निर्मम! कैसी ऐसी..  नख-क्षत  भी लग.. जाए बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। पंछी भींगे.. पर भी भीगे प्राण भी भीगे..,  भीगा मन.. अंदर से, कोई.. कोई.. ऐसे भीगे,  सुधि नहीं ओहि.. तन के बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। बदरिया.. झिम! झिम! झिम! बरसे। विरही मन में, अगन लगाए व्याकुल ये, कर जाए शीतल पवन फुहारा... मारे  पागल ही, कर दे.. बदरिया झिमझिम झिम बरसे। दूब..! हरीली... चादर ओढ़े.. शुभ्र.. नवल तन, पांव को छू ले, रूप निखारे, बगिया कैसी?  आंखों को मोहे?  मन अंदर छू दे.. अंदर.. बाहर... उमग जगे रे... बदरिया! झिमझिम झिम बरसे। सांझ..! धुंधलके..!  निपट अकेले.. गिरती.. बूंदों से, जब बच के.. कारी.. घनी... बदरिया, दी...खें! तेरी याद सताए... बदरिया रिमझिम.. झिम.. बरसे। चढत अकास, बदरिया नाचे  तम चादर फैलाए चमकि बिजुरिया पर्दा खोले सारे अंग दिख जाएं बदरिया रिमझिम.. झिम.. ...

समष्टि का बेटा है तूं

इतनी बड़ी यह सृष्टि सारी,  हम सभी के पक्ष में  रात दिन,  एक करती लगी है,  खुद देख न!  प्राण सबके  बच सकें इसलिए वह  हर जगह बिना बोए, बिना सींचे  हरित धरती कर रही है। वो इंच भर न छोड़ती है,  जगह खाली जानती है,  वनस्पति ही प्राण हैं!  धरा के, इन  प्राणियों की, इसलिए  पेड़ की इन फुनगियों को  छोड़ तूं!  अंकुरण  राहों में तेरे, पैर नीचे  दूब तक में,  बेकार की उस  घास में भी युग युगों से कर रही है। चाहती है,  हर देश में,  हर काल में,  अनवरत  नदियां बहें,  सागर  की  लहरें,  और ऊंचे  आकाश छूएं हवाओं को शुद्ध कर दें। सघन वन,  हर.. ओर हों चहकती चिड़ियाँ उड़ें, खुश यहां बच्चे रहें, हम तुम रहें, बच्चा  ही अपना मानती है, हम सभी को। इसलिए,  बिनथके  काम पर चौबीस घंटे  लगी है,  आ हम भी  उसका साथ दें। इधर हम हैं, स्वार्थरत.. है, नटुलपन है हम  सभी में,  एक दूसरे से लड़ रहे है। देख न इस प्रकृति को, भोली है ये,  माँ है य...