जीवन मेरा, भागता मृग!
मित्रों, जीवन आज, एक भागता मृग! बदलता हर क्षण, हाथ आया और आने से पहले चला गया। सब अस्थिर और क्षणिक! इसी पर यह लाइनें पढ़ें, अच्छी लगें आपको बस और क्या? सोचता हूँ! दिन हुए.. कितने, प्रिये...! हमें, साथ में रहते.. हुए, इसलिए अब चाहता हूँ; देख लूं... एक बार तुमको, पास से! भिज्ञ हो लूं! अंदर... से, तुमसे.. और तेरे.., रहस्यों से। पर क्या करूं! मैं... खुद.. में, भ्रम.. हूँ...! देखने में, नया! बिल्कुल! आधुनिक! पर, जर्जरित! टूटा.. हुआ, वो भी पुराना! भीतर कहीं, दर्पण ही हूं! अक्स तेरा, वास्तविक! खींचूं... मैं, किसमें.. असमंजस में हूँ। फिर.. भी सुनो... मैं.., जानता.. हूं! तुम अलग हो..! रूप तो, बिल्कुल.. नहीं हो, समझता हूं राज..! तुम, अनश्वरा! अविच्छिन्न गति हो! इसलिए, इतने दिनों से साथ हो। तुम, वह... वह.., नहीं... हो, जो.. दीखती हो, नवल रस की नवलिमा.. हो परे हो, जंजाल से तुम! कांचनी, काया से इस, ...