स्व..रूपस्य! क्व? रूपिता।
मित्रों आपके लिए सुंदर लाइने प्रेषित हैं, आप पढ़ें आनंद जरूर आएगा। कितनी विधाएं! वस्तुएं, कर्त्तव्य! कितने? यहां.. इस संसार में, एक.. पीछे! कई.. आगे...! जंजीर में, जुड़ते.. हुए, देखे हैं मैने। और फिर! जितना.. बढ़ा मैं... और.. आगे... सबल! सब.. होते गए..। कौन छोड़ूं...,? कौन पकडूं..? बोल न..! हैं... पंथ! कितने? धर्म..! कितने..? रास्ते..! और.. रास्ते...! बस.. रास्ते...! ही रास्ते... प्याज की परतें हों ऊपर! और नीचे....! महाभ्रम..! संसार.. यह...! और.. प्यारे! ज्ञान.. इसके। पुस्तकें.. हैं, ग्रंथ... कितने....? भयावह! सच.. स्थिति है... आज.. के, इन आदमी के... जीवनों में। इसलिए यह छोड़ता.. है, आज से अब.. हर जटिलता..! धर्म की, कटु.. बाध्यता! तौलता! है, जीवनों में सत्य! को.. आदि.. से प्रचलित! धर्मो... में..। आस्था, अंधी! नहीं अब..! दान की गति..! सोचता है.. भाव! कितना..? किसको.. देना..? विज्ञान! पर यह.. जांचता! है.. बदलता है, जग यहां अब...