शेष! इनकी, आरज़ू... क्या!
शीर्षक: शेष! इनकी, आरज़ू... क्या! चाहता हूँ, गीत.. मेरे, अधर, तेरे.. जब छुएं..! कुल-कुल.. कुलाते, बोल.. बन.. झरने... हों जैसे..! बह.. उठें..। झुरझुर.. झुराते..! समीर,... सम.. पास से, अंदर... छुएं! हृदय को, शीतल.. करें। स्वर तेरा.. झरना... हो.., कोई... फूटता...! खुशी का, किसी.. ओरिफिश.. के छिद्र सा, नाचता! मस्ती में अपने, लास्य..! करता, मगन हो..! हो! बहती... पवन, सा... आंचलों में, लिपट कर मन.., हृदय... स्पर्श! कर लें। कणन.. कंकन! क़्वणन कंकन! बज उठें..! यह.. मधुर....मंथर, मदिर मंथर,: मंजीर.. स्वर! ले बोल दें.. ताल लय में.. ढुलकते हों ओस कण, पत्तों पे जैसे। खिलते हुए किसी फूल..की, खुशबू... बिखेरें! सुरभि... भर भर, भावना की हर हृदय को, मगन... कर दें । कुछ इस तरह, अमृतकला! ही खिल उठें, अधरों... पे, तेरे..। गीत... ये, ऐसे.. उठें.. सुर ताल ...