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कैसी बुनी! है.., दुनियां हमने,

मित्रों, आप सभी को श्रीशुभ श्रीरामनवमी की अनंत शुभकामनाएं। तत् आज का युद्ध और उसके हालात पर कुछ लाइने प्रस्तुत हैं। इनमें कारण क्या है युद्ध का इसे भी आप स्पर्श करें, यह मर्म है और आदमी आदमी होता तो अच्छा होता। काश! व्यापारी न होता।  आ...  देख न!  कैसी बुनी!  है.., दुनियां  हमने,  साथ.. मिलकर..!  मित्र.. मेरे,  परेशां...  हर आदमी हैं,  ग्लोब का इस !   हर जगह! एक ही तरह! ही। इस  पार.. से, उस... पार.. तल्लक!  सब...,  एक... हैं,  एक.. ही... हैं!  आज.. के, बदले हुए  इस.., युद्ध के  हालात..  में।   इन्हें देखकर!  महसूस  कर!  मुझको!  लगा... सच...., सब..., एक जैसे... पस्त रे। अन्यथा..,  थी... फिक्र...  किसको....?  कोई...? पड़ोसी की..  खबर ले..! सब उड़ रहे थे,  पंख पर, अपने ही अपने.. नाम... का, एक पंख... ले  मुफ्त की उस सुरक्षा में, मस्त..  नाटो...... नाम की छाया तले, प्रिय,  गगन.. में। गिर पड़े हैं, आज देखो!  शिखर से,  अं...

रस सुरीला, मुफलिसी का।

मित्रों, जीवन में संपत्ति बटोरते हमारा सारा समय निकल जाता है, मां पिता ने भी हमारे लिए इसे ही बटोरा और हम बच्चों के लिए वही बटोर रहे हैं। इतनी इसकी शायद जरूरत नहीं। इसी पर यह लाइनें आपको आपके प्रसन्नता की दृष्टि से प्रेषित हैं। संपत्ति भी, क्या.. चीज है,   पीछे.., सभी.. हैं,  इसी.. के, चाहते.. हैं.. बस..  अभी....,  मिल.. जाय!  हे प्रिय! प्रचुर.. उन को।  बस अभी मिल जाय..  असीमित!  अपरिमित! संपत्ति सबको !    पर?  पूछ न!  क्या... जानते हैं?  संपत्ति क्या है?  किसलिए!  यह चाहिए..? हे.. मित्र ! उनको..? एक....,  आदत.!.  हो... गई...  संपत्ति.... यह!  क्या कहूं! कैसे कहूं!   कितना बटोरूं!   कैसे बटोरूं?   दानवी! पिशाच की,  यह चाह..  ही...  अब.... हो गई है। इसी पर  एक... कथानक.. है, चाहता हूं, सुना दूं!  नागार्जुन एक भिक्षु थे;  दार्शनिक! विद्वान थे, प्रसिद्ध..,  थे,  निज  राज्य  में,  पूजित.. बहुत थे। कुछ.. नहीं ...

प्रेम ही आनंद परमं. प्रेम ही है जीवनं!

मित्रों, जीवन का प्रथम भाग 'सक्षम काल' होता है, इस में हम संभ्रमित होते हैं, और प्रेम जो जीवन के स्वर्णिम पलों का "ग्लू" है उसे तरजीह ही नहीं देते, पर जीवनांत में सब समझ में आ जाता है कि आखिर जरूरत तो स्नेह भरे दो हाथों की ही थी, रूप रंग की कदापि नहीं। इसी पर ये पंक्तियां! आप प्रसन्न हो पढ़ कर, यही प्रयास है। प्रेम..  'श्री..' है,  मानिए..,  शोभन.. यही..  है.., जीव... का, आनंद  परमम्!  प्रेम.. है,  आत्मां... की,  तृप्ति, भी.. है।  प्रेम... ही ,  हर...  जीव.. का..  उद्देश्य, पावन!  उपहार, इसका यदि मिले...  किसी, प्राणि... को;  निर्मल..! विमल..!  प्रिय!  अनछुआ!  जीवन-सुरभि!  समझ तो, उसको मिले। इस... देह.. को,  किसी... देह.. से, और क्या... है   एषणा..?    नीरव.., निरवयव.. प्रेम.. का,  अनवरत.. आजन्म बस वर्षण मिले।। प्रेम क्या है?  पूर्णता.. है, तृप्ति.. है,  चाह! की  अंतिम.. अवस्था,  भर गई!  और  कोई... अब, नहीं शेष है!  प्रेम......

माहौल..! क्या है? आज... का,

माहौल..! क्या है?   आज... का,   और.... कहां.. है, खड़े हम...? इस आदमी.. की,   दौड़.. में, पास.. हैं,  या... दूर... हैं हम! आज के इस हाल में, उम्मीद किससे!     करें,  हम!  आदमी.. की,  अपेक्षा.. से, देख न ..!  कितने हैं!   नीचे!  खड़े हम.। और, कितने.., दिन.. लगेंगे बस.. आदमी  हम..., बन.. सकें,  थोड़ा.. ठीक से। पशु हमे, मालिक कहें.. हत्यारा नहीं, अपने मनों में। मैं.. पूछता हूं!  रूप.. में,  विज्ञान.. में, युद्ध.. में,  शैतानियत!  संग्राम... में हम.. बहुत आगे,  सबसे.. आगे,  आज हैं बस नाश.. में..! विनाश में प्राकृतिक भंडार में। बस आदमी की दौड़ में  पिछड़े हुए हैं.. आज तक,  खुद पर विवश हैं!  वह, हम सभी ही, आदमी हैं। हम  दूर.. क्यों है?   आदमी की,  अपेक्षा.. से?   अरे! क्योंकि जन्म  से  हम,  यहां पर, .. विविध बंधो.. में, बंधे.. हैं मनुष्यों के बंध में।   मुक्त तो, हम हैं नहीं!  गुलाम ही हैं!  सोच ...

चंद्र सा, सुख.. है तुम्हारा!

मां रसमणि ने अठारहवीं शताब्दी में कलकत्ता में हुगली के किनारे पर मां-काली का दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया था। श्री रामकृष्ण परमहंस जी, बेलूर मठ रहते वहां से यह मंदिर जैसे आसमान में चंद्रप्रभा हो चमकता था। वे प्रायः यहां आकर काली पूजा करते। एक रूपक काव्य आपको इसी पर प्रस्तुत है पढ़ें और आनंद लें। चंद्र सा, सुख.. है तुम्हारा!  अरी हे..!  ताराधिपे...!  दूर..  उतनी..,  आसमां.. पर मुस्कुराती..!  खड़ी.. तुम!  उतरती.. हो,  चांदनी.. चढ़!  शुभ्र.. कितनी!  हृदय.. में शीतल मधुर  नव ज्योत्सना.. बन। अत्यंत धीमे.., और  धीमे...,  पांव..  थामे... प्राणों...  में..  मेरे!  हल्के...  कदम!   शांत, कि तनी...,  शीतली..!   मिलती.. मुझे..। उस..  एक क्षण में..  विलक्षण !  निथर कर,  हो...  बैठता,  विलयन.. कोई,  आराम.. से, निज ही  तलों में। बैठती हो!  सहज! तुम, मेरे.. हृदय में। पर.. सच, कहूं!  निठुर.. हो तुम!  निष्ठुरी! तुम!  कच्चा... कलश हो, म...

जीवन मेरा, भागता मृग!

मित्रों, जीवन आज, एक भागता मृग! बदलता हर क्षण, हाथ आया और आने से पहले चला गया। सब अस्थिर और क्षणिक! इसी पर यह लाइनें पढ़ें, अच्छी लगें आपको बस और क्या?  सोचता हूँ!  दिन हुए.. कितने,  प्रिये...!  हमें, साथ में रहते.. हुए, इसलिए अब चाहता हूँ;  देख लूं...  एक बार तुमको, पास से!  भिज्ञ हो लूं!  अंदर... से, तुमसे.. और तेरे.., रहस्यों से। पर क्या करूं!  मैं...  खुद.. में, भ्रम.. हूँ...! देखने में, नया! बिल्कुल!  आधुनिक!  पर, जर्जरित!  टूटा.. हुआ,  वो भी पुराना!  भीतर कहीं, दर्पण ही हूं!  अक्स तेरा, वास्तविक!  खींचूं... मैं, किसमें..   असमंजस में हूँ। फिर.. भी  सुनो... मैं..,  जानता.. हूं!  तुम अलग हो..!  रूप तो, बिल्कुल.. नहीं हो, समझता हूं राज..!  तुम,  अनश्वरा!   अविच्छिन्न गति हो!   इसलिए, इतने दिनों से साथ हो। तुम, वह... वह..,  नहीं... हो,  जो.. दीखती हो, नवल रस की नवलिमा.. हो परे हो, जंजाल से तुम!  कांचनी,  काया से इस,  ...

दिल.. मेरा पत्थर का था, पर! रो.. दिया।

भाव: इन महानगरों में कभी कभी जीवन में 360 डिग्री कंट्रास्ट देखने को मिलता है, हम स्तब्ध! निशब्द! मूर्तिवत हो जाते है। अधखिले.. सुंदर गुलाबी फूल को छोटे से बच्चे की कब्र पर चढ़ते हुए देखना अन्तस को रुला देता है, ऐसे ही किसी बहुत बड़े घर के अतीव सुविधा में पले बच्चे को निहायत दयनीय स्थिति में देखना अंतःव्यथ कर देता है। महत्वाकांक्षा आज बहुत बड़ी बीमारी है, जो शीर्ष को ही नहीं मध्यम वर्ग को भी कठोर धरातल पर पटक रही है। इन्हीं पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। मित्रों..!  विशुद्ध.. सूती,  कपास...  निर्मित,  परम.. निर्मल.., हर एक  कन..,  नर्मो-मुलायम.., श्वेत.. सुंदर पर!  पाद-तल्लक*!   रूप में, उसे देख कर,  उस  हाल.. में,  दिल.. भर गया.. किस्मत.. पे उसकी..  और उसकी..  पोशीद-ए-उस-परवरिश....  उम्दा.. नशीं  का, खयाल.. कर,  उसे.. सोच.. कर,  दिल.. मेरा  पत्थर का था, पर!  रो.. दिया। पूछ.. बैठा  एक दिन.. मैं..  नीचे... बिछे, पादान* से, कपास थे तुम.. कितने उजले, वहां.. ऊंचे पेड़ पे, बालक से थे...