इस प्रकृति का एक खिलौना मैं भी था?
मैं.. कब नहीं था, रूप.. तब कुछ अलग था, रुचि.. अलग थी, योनि.. भी यह नहीं थी, पर मैं हमेशा रंग, रूप अपना बदलता.. प्रिय यहीं था। यह बात सच है, भूल जाता हूँ मैं खुद को, आवरण* जब बदलता हूँ, देह का, बदल जाते तुम भी हो प्रिय! काल के साँचे में ढल के सोचना! बालपन में जो मिले थे तुम मुझे वह, यह नहीं थे, बदले हुए हुए हो काल की धारा में बह के। रूप परिवर्तित तेरा, रूप परिवर्तित मेरा हजार मृत्यु मर चुका तूं एक मृत्यु.. मैं मरा। कौन हूँ! मैं? जानते हो, क्या.. मुझे? पहचानते हो मात्र तुम इसलिए की साथ हो। मित्र हो इतने.. दिनों से, मिले हो क्या? अलग होकर आप से संसार से, मेरे रूप से, मेरे रंग से, मेरी आकृति से भ्रांति से, कभी दूर रह के। बुलाती है प्रकृति मुझको, ठीक वैसे, बनाते हो तुम खिलौना! खेलने को, रूप लेता, इसी में मैं देख न! पानी वही, मिट्टी वही, आकाश सबका एक ही, अग्नि है कब बदलती! यही तो सामान ले हर ...