दूधिया... हंसी, वह!
मित्रों आत्मा का नियम एक ही है। पर यह विभिन्न स्थान व समय पर विभिन्न लोगों में और संपूर्ण इस ब्रह्मांड में अलग रूपों में अभिव्यक्त होता है, जैसे तारों ग्रहों में गुरुत्वाकर्षण बल, परमाणु, अणु में च क्षुद्र में अट्रैक्शन खिंचाव और हम में प्रेम बन हृदय के बीच रहता है। यह जोड़ता है दूर नहीं करता। इसी पर ये लाइनें आप को प्रेषित हैं, आनंद दें यही चाहना है।
आँख... उसकी,
निर्दोष..,
सुंदर...
बाल शिशु सी,
चहकती,
चुप! कह गईं,
कुछ!
बिना बोले, बीच सबके
एक क्षण में!
डूबकर .., मेरे हृदय में।
फुरफुर! फ़ुरकतीं!
लहरिया!
जादुई..., संदेश..! देकर,
हट गई,
पर छप गईं,
अमिट हो, अंतस में मेरे।
कैसा कहूं!
कोई, झील...थी,
थोड़ा, और.. गहरी!
तेरी सोच से
थोड़ा और, चौड़ी..,
फैली हुई, थीं.., कर्ण.. तक।
निष्पाप! आँखें! इतनी सजल!
देखीं नहीं थीं,
आज तक,
और, वह
दूधिया... हंसी,
नेवत!
मुझको..,
अंदर! कहीं... से,
हर ले.. गईं,
मन मेरा, साथ अपने,
दूर... उतनी, दूर.. तक..।
ठगा.. सा,
मैं, देखता ही, रह गया..
बंध गया, प्रिय साथ उनके,
मत पूछ! मुझसे,
अरे कैसे?
आत्मा का नियम तो प्रिय!
एक! ही
है
सार में, सभी में
जीवित.., अजीवित
सारे... जहां, ब्रह्मांड.. में।
यह, मुक्त.. ही है,
दूर..
से..जो
बांधता.. है
आज तक, सभी कुछ!
बिन, रस्सियों.. के।
चरित्र को हर,
हर समय, हर जगह!
संपूर्ण प्रिय! इस प्रकृति में, ब्रह्मांड में।
गुरुत्व बन कर, धरा को,
गति बना, परमाणु में।
प्रेम बन कर बांधता है,
हम सभी को,
और काव्य बन,
मस्तिष्क को।
दूर से, प्रिय..! दूर से!
छूता नहीं है,
पर है, छूता..,
अंदर कहीं से।
जय प्रकाश मिश्र
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