चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!

पृष्ठभूमि: हर शहर की अपनी विशेषता होती है।और पेरिस की शाम अपने में कुछ अलग ही है।आप पढ़ें और आनंद लें।

यह, 

ऐसी..!  कैसी..!  

अलसाई.., अलसाई... 

लजाई.. सी, धुंधली.. धुंधली.. 

गहरी.. और गहरी.. 

सलेटी से... स्याह होती.. 

बादलों के फाहों से रंग में..रंगी.. 

लुक-छुप, खेलती

अंधेरों को गुप-चुप... बुनती, 

उदास.... गमगीन, धागों में 

मुझे बांधती.. संग खुद बंधती,  

धीमे.. धीमे..

भारी भारी, लदी नाव सी..  तिरती, 

अंधेरों के सागर में आगे... बढ़ती 

आज की प्रतीक्षित!  

शुष्क हवाओं में 

घुंघराली लटों सी उड़ती,  दिखती। 

तर होने के लिए घूंट भरते लोग

सरे राह! सड़कों पर, 

कुर्सियां लगाए, अपने में डूबते 

संग डूबते.. सूरज के।

काले काले.., लाल.. लाल.. अंजान चेहरे 

न जाने किसका इंतजार करते

पूरी बेफिक्री में बैठे...

इन सबको समेटे..  ये शाम.. 

इन बेनाम, लोगो से भरी

कैसे.. ... धीमी, धीमी

भीनी... भीनी,

सी, लिपटती... है, मुझसे।

कुछ खुले... कुछ बंद... रेस्तरां फैले हैं

इसी वक़्त के लिए, 

जहां लोग बैठें थके.. हारे...

जिंदगी के द्वारे... एक बार फिर से 

जिंदगी से मिलने के लिए।

जय प्रकाश मिश्र


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