पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

मित्रों, अपने बहुत से मित्रों को अधिवर्षता आयु तक श्रेष्ठ सेवाएं उपक्रमों को देने के बाद भी सेवानिवृत्ति पश्चात वृद्धावस्था सहारा अर्थात पेंशन नहीं मिलती। उनकी स्थिति पर संवेदना की कुछ लाइने समर्पित हैं। आप पढ़ें और आनंद लें।


कितनी खुशी.., कितनी कृपा.. 

भगवान... की,

नियुक्ति... 

जिस दिन मिली।

वह पत्र था! 

जी नहीं! 

परिणाम... था!  

आज तक के, परिश्रम.. का

प्रभु... कृपा, जिस... दिन.. हुई।


पा.. जिसे वह, 

जिंदगी.. की 

सहज..  सुंदर... नाव पर 

प्रिय!  आ चढ़ा।


वह मित्र मेरा

परमप्रिय था, 

साथी मेरा था, 

बचपने... का।


मिलता रहा, हर मोड पर,

वह जिंदगी में...

गाहे-बगाहे, 

सच कहूं!  

वह..  बहुत खुश.. था..।


सिल्क सी.. 

अब, चल रही थी

जिंदगी....

हर... महीने... 

पग़ारी..., 

जो.. बिना, नागा...

पहली.. तिथी को, 

मिल.. रही थी।


यज्ञ..., जीवन.. 

एक है, 

वह.. दौड़ता!   

प्रिय! फांदता...

हौसला भरपूर भरता..

सत्य,  इसको.. कर रहा था।


कितनी!  मिलीं, खुशियां.. 

उसे....,

बच्चे.. हुए, आगे.. बढ़े, 

डोर... पकड़े...,  

उन्नति.. की,

देश.. से, बाहर.... हुए...।


शादी किया, बहुएं मिलीं..

रूपसी.. थीं,

एक से बढ़ एक प्रिय! 

पोते हुए, 

पोतियां..! क्या कहूं! परियों... सी, थीं..। 


जिंदगी.. यह..., धार... में, 

बहती... रही.. 

बहती... रही,

आ... गया दिन, विदाई.. का, 

अधिवर्षता की आयु भी, 

पूरी... हुई।


एक दिन प्रिय! 

शाम... को, 

आखिरी... तारीख थी...

वह..., 

महीने... की..

चार पहिया.., विभाग की, 

एम्बेसडर.. 

चम.. चमाचम... चमकती, 

आकर रुकी..., प्रिय घर पे उसके...।


शान सेे बैठा हुआ वह,,,,  

आदर... सहित, 

उतारा... गया, अभिमान भर...

आगे बढ़ा....

कुछ लोग.. उसको

रख से... गए, आवास पर... 

और कह गए, मित्र अब! आराम कर! 


माला पहन कर , पुष्प... की, 

छड़ी... लेकर, हाथ.. में 

वह! प्रफुल्लित! 

गीता उठाए हाथ में, 

दाखिल हुआ....

अपने.. ही घर में, 

मेहमान सा...।


प्रिय...  क्या कहूं! 

सब कितने खुश थे, 

पैरों लगे, 

लिफाफे... में बंद, चेक.. 

पढ़ने लगे..।


क्या रंग था!  क्या ढंग था! 

साल बीता, बहुत अच्छा, 

धनार्जन अब कुछ नहीं था।

खर्च था, हर महीना..., 

पहले.. ही जैसा...।


बीमारी थी, 

कुछ... कर्ज था

खत्म था बैलेंस अब

वह क्या करे! 


मैं क्या कहूं! तुम समझ लो! 

मिल गया 

मुझे आज ही वह अल-सुबेरे..

दुखी... था, कहता गया

पेंशन.....,  नहीं थी, 

भाई....

मेरे... विभाग में।।।

मैं... चुक गया ....

बुझ... गया 

आज मैं वह... दीप... हूँ!  

स्नेह ही, निःशेष... जिसका हो गया।


बच्चे सभी आजाद हैं, 

पंछी के जैसे, दूर... हैं, 

बिजी हैं, दुनियां... में अपनी

खुद में ही, मशगूल... हैं।

मेरे सुख दुखों से दूर हैं।

मैं क्या करूं! 

मुफलिसी में यार सच मैं आ गया हूं; 


दिन है काला, रात काली...

शाम काली हो गई है

पेंशन बिन जिंदगी 

मेरी ये खाली हो गई है।

जय प्रकाश मिश्र



 


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