बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!
मित्रों, कभी कभी कोई होता है, स्मृति से बिस्मृति में जाता ही नहीं। उसी पर अति संक्षिप्त शब्दपुष्पमाल आपके लिएं
पृष्ठभूमि:
अल्लाह की, दौलत... है वो...
धरती पे उतर, आई है,
प्यासी नजरों से
धरती पे उतर, आई है,
प्यासी नजरों से
मत देख..
.उसे....
मेरे शब्दों की, रौशनाई* है।
खुदा गवाह है,
चन्द्रकिरण
ही,
है.... वो
कितने हौले से
मेरी, सतरों* में उतर आई है।
कितने हौले से
मेरी, सतरों* में उतर आई है।
मुख्य लाइने:
अरि!
ओ अरी!
तूं गति नहीं!
कुछ.. और है, बहती हुई...
कुईं..*..जल में, तैरती..
प्रिय! इस तरह!
ओ अरी!
तूं गति नहीं!
कुछ.. और है, बहती हुई...
कुईं..*..जल में, तैरती..
प्रिय! इस तरह!
जल
बिहग* सी,
आगे है होती...
एक क्षण,
एक क्षण,
पीछे है
होती, मयूरी सी, हे!. नवेली..।
ओ.., दृष्टिपर्शा..., पद्म....पुष्पी!*
बिरहि..णी..?
नहीं...
बिरहि..णी..?
नहीं...
तूं..
किसी....
श्री...कछव की,
कछुइ...नी*
प्रणयिनी! तूं
कछुइ...नी*
प्रणयिनी! तूं
राजहंसी! मधुर, इतनी
रस, घोलती.,
डोलती...
मन, मदिर मेरे,
मन, मदिर मेरे,
मंद... मंथर
मंजरी..! हो आम्रवन
की....
महकती, आभावती,
बोल दे, इक बार,
तूं....
इश्क ना है...., "प्रेम..." है, री...।
तूं....
इश्क ना है...., "प्रेम..." है, री...।
देख!
तुझको...
शिथिल है, तन...
विस्मृत सा है, मन!
नयन तेरे अरे! कैसे
बावरे.... हैं,
शिकारी*.....!
अरि!
ओ अरी!
तूं गति नहीं!
कुछ.. और है, बहती हुई।
"बारे नयन"
तेरे.....!
मोहते मन!
विकल करती, दृष्टि... चितवन!
दरश तेरा,.. खींचता मन!
अरी..., तूं आमोद री!
विकल करती, दृष्टि... चितवन!
दरश तेरा,.. खींचता मन!
अरी..., तूं आमोद री!
प्रमोद उपवन।
ले स्वर्ग
नीचे
उतर आई, बावरी
सामने
हम
मर्त्य* के
सौभाग्य से,
सौभाग्य से,
स्खलित* हो स्वर्ग के
उस राज्य से
तूं इतने नीचे,
बोल तो, कोई अप्सरा ही....।
अरि!
ओ अरी!
तूं गति नहीं!
कुछ.. और है, बहती हुई
नदी जल में, तैरती..
किसी मनोहारी, रूपसी, जलपरी सी
पढ़िन* जैसी,... मत्स्य री।
जय प्रकाश मिश्र
रौशनाई*... शब्दों की आत्मा, शब्दसार
सतरों* में... लाइनों में, रचना में
कुईं..*जल... शांत निर्मल मीठा जल
जल बिहग* सी... कमनीय जल पक्षी
दृष्टिपर्शा पद्म पुष्पी! प्यासी दृष्टि का विश्राम स्थल कमलकली सी खिली
श्रीकछव कछुइनी* कच्छप अवतार विष्णु की श्री लक्ष्मी जी
शिकारी*... सांसारिक भ्रांतियां
बारे नयन... निर्मल, अकलुष नेत्र
मर्त्य* के सौभाग्य से... मानव के भाग्य से
स्खलित* हो.. आनंद के कारण नीचे गिरना,
पढ़िन* जैसी मत्स्य.. स्वस्थ, युवा, चंचल मछली सी
सतरों* में... लाइनों में, रचना में
कुईं..*जल... शांत निर्मल मीठा जल
जल बिहग* सी... कमनीय जल पक्षी
दृष्टिपर्शा पद्म पुष्पी! प्यासी दृष्टि का विश्राम स्थल कमलकली सी खिली
श्रीकछव कछुइनी* कच्छप अवतार विष्णु की श्री लक्ष्मी जी
शिकारी*... सांसारिक भ्रांतियां
बारे नयन... निर्मल, अकलुष नेत्र
मर्त्य* के सौभाग्य से... मानव के भाग्य से
स्खलित* हो.. आनंद के कारण नीचे गिरना,
पढ़िन* जैसी मत्स्य.. स्वस्थ, युवा, चंचल मछली सी
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