पढ़ जिसे मुस्कुरा दे, आदमी "रोता" हुआ।
मित्रों, जीवन एक छलावा, संसार विभ्रम! इसमें दौड़ सदैव अधूरी, प्रायश्चित भरी, और लालसाएं अतृप्त! अंतिम प्रहर में भी एक अजीब सी चाह क्यों बची रहती है जब की अमरत्व की नाव "मृत्यु" सामने लग चुकी है। कौन सा पछतावा है, क्यों छोड़ता नहीं, साथ अंत तक। इसी पर आपके मात्र आनंदर्थ आज की लाइने। जब बैठता हूँ, अकेले! में.., मात्र! अपने.. साथ..., अपने पास... चुप... एकाकी... प्रिये...; देखता... जग, इस तरह !! इतना सजग!! डरता हूं मैं..। मत पूछ मुझसे, किन! खयालों... में डूबता.., उतराता.. हुआ, बडी.., मुश्किलों.. से, अरे..! मैं... बाहर निकलता...! सोचता..! क्या.. कहूं ? तुम.. से.. प्रिये! है.. कहीं.. कोई! डर..! अरी... आज भी, अंदर... वहीं, गुप..! चुप..! छुपा..., यह, बज्र बाहू! सा मुझे, है.. घेर.. लेता , लग... गले! संसार को, इस... देखकर! राज... इसके, जानकार, रंग इसके, भोग.. कर, तब..., छोड़कर! मात्र!! अब,... क...