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Showing posts from May, 2026

और यह कुछ भी नहीं था।

मित्रों, इस नियति के खेल में हमसभी का जीवन एक सुसंयोगतः घटित सफल संभावना! नेचर के किए आदमी कुछ नहीं, एक स्थिति और प्रोसेस का बायप्रोडक्ट इसी पर यह लाइने आपके लिए। वह एक सहज प्रवाह मात्र। सरलता, सहजता!   ही.. है, नियति यह! प्रवहित, सदा से, एकरव !  कभी, मुलायम! कभी  क्रूरतम! तुझको लगी, वह...! बेखबर थी..  मुक्त थी,  इस.. बात से, हर एक को कैसी लगी। किस किनारे, किस.. ओर!  प्रिय! तूं था खड़ा था उस नदी के उस  वक़्त  जब वह  किनारों को तोड़ती सीध अपनी जटाओं को  कर रही थी। वह अपनी रव में बह रही है, आदि से,  हम झाग हैं,  उसके... लिए,  उससे बने,  तैर  लें,  जीवन है जब तक फिर, उसी... में, मिलेंगे। कुछ करें साथ उसके ही बहेंगे। यह बुद्धि तेरी, तर्क तेरे..  तेरे, लिए हैं उसके लिए, तूं मात्र तृण! है तैरता.. सबकी तरह उस सतह पर या गर्भ में, कर्म की खुद स्थिति से बस कुछ क्षणों के.. ही लिए तुम ही क्यों  यह.. सभ्यता इतनी बड़ी मनुष्यता! और, दिख रही यह दिव्यता कुछ नहीं उसके लिए, एक कर्म है, बहाए और बहे खुद इस समय नद म...

ये, हिचक क्यों है?

मित्रों हम जो कुछ भी करते या सोचते हैं उसका एक असर हमारे अन्तस पर पड़ता रहता है, यदि यह क्षुद्र होगा तो पवित्र आत्मा या, निष्पाप व्यक्तित्व के सामने जाकर हम झुक जाएंगे और भीतर एक हीनता आपको घेर लेगी इसी पर ये लाइने आप सदा अच्छा करे व सोचे इसलिए। आज, मैं.. क्यों! दूर.. उससे,  इस.. तरह हूँ! फासला?   हां,  फासला! ही बढ़.. गया है,  मेरे, समझ से,  उम्र..  में। एक नन्हा..  मेमना!  मैं,  उस, समय.. था, और वह! नन्हीं परी थी,  बावली...! सी.... महल में। किस तरह हम खेलते!  बेलौस.. होके!  गले.. लगते! लिपटते  कंधों  पे..  चढ़.. कर घूमते थे, साथ.. में,  उन नौकरों.. के! क्या?  तब.. हम, और..! थे?  ये.. आज! जो..! हैं,  वो..; नहीं थे। क्या हुआ है? मैं.. वही हूँ!  वह..! वही है, उम्र..  थोड़ी, बढ़.. गई है, समझ में, अंतर... हुआ है,    सभ्यता..!  थोड़ी चढ़ गई है!  पढ़ाई!  पूरी... हुई है। क्या?  अब, नहीं,  निष्पाप! हम!  तन मन में लादे  गठरियां,  पाप!...

सुचि! और संसार!

आप सभी मित्रों का आभार आपने इसे एक सफल गीत बना दिया। और अधिकतम लोगों ने इसे पढ़ा। संसार मधु.. था, मधुरतरम.. था मिट्टी.. से जन्मा मिट्टी.. ही, था.., पास से, तत्वतः  जब कूट कर  छाना इसे,  यह धूल! कण था। मैं जानता था, सभी.. कुछ! अच्छी तरह, दूर.. था! पर, सना.. था, अंदर कहीं मैं.. इसमें ही था, यह मुझमें.. था। गहरे! से देखा,  पंचभूतों का सम्मिश्रण!  मात्र.. यह!   नित नवल, रूप! बन बन,  लुभाता था,  दर्शना! कैसी बनाता, दृश्य में यह, लिपटता था। बीतरागी! जड़ भरत! सा एकांत के उस,  अरण का यह बाल.. मृग! था। राग  रस से..  यह... भरा, छूटता बस "समय+कण" था। मेरा नहीं, सभी का,  यह  "मैं..." ही था, मैं, में सना.. यह  मात्र भ्रम!! था,  पंचभूती आत्मसंज्ञक विकार था। संसार यह,  यदि.. इसे मैं, सच कहूं!  तो,  देखने में, फूल..! था, पंखुरी.. स्पर्श! था  महक! सरसिज भीनी भीनी मदिर! था,  प्यारा ही क्यों,  अतिशय! ये, प्रिय.. था। अदा..  था,  जादुई!  पर,  मात्र! भ्रम था,  इंद्र का यह जाल...