सुचि! और संसार!

आप सभी मित्रों का आभार आपने इसे एक सफल गीत बना दिया। और अधिकतम लोगों ने इसे पढ़ा।

संसार मधु.. था, मधुरतरम.. था
मिट्टी.. से जन्मा
मिट्टी.. ही,
था..,
पास से, तत्वतः 
जब कूट कर छाना इसे, 
यह धूल! कण था।

मैं जानता था, सभी.. कुछ!
अच्छी तरह, दूर.. था!
पर, सना.. था,
अंदर कहीं
मैं..
इसमें ही था, यह मुझमें.. था।

गहरे! से देखा, 
पंचभूतों का सम्मिश्रण! 
मात्र.. यह!  
नित नवल, रूप! बन बन, 
लुभाता था, 
दर्शना! कैसी बनाता,
दृश्य में यह, लिपटता था।

बीतरागी! जड़ भरत! सा
एकांत के उस, 
अरण का
यह बाल.. मृग! था।

राग रस
से.. 
यह... भरा,
छूटता बस "समय+कण" था।

मेरा नहीं, सभी का, यह 
"मैं..." ही था,
मैं, में सना..
यह 
मात्र भ्रम!! था, 
पंचभूती आत्मसंज्ञक विकार था।

संसार यह, 
यदि..
इसे मैं, सच कहूं! तो, 
देखने में, फूल..! था,
पंखुरी.. स्पर्श! था 
महक! सरसिज भीनी भीनी
मदिर! था, 
प्यारा ही क्यों, 
अतिशय! ये, प्रिय.. था।

अदा.. था, जादुई! 
पर, 
मात्र! भ्रम था, 
इंद्र का यह जाल था
चित्त था, फैला हुआ, मेरी चाह था।

कौन है यह, तड़प! जाता...
एक क्षण में
दूसरे में, उछल.. जाता 
गेंद सा, ⚾
मुस्कुराता.. फूल सा
महक.. जाता🌸
सुची.. है वह, मेरी सुची है!
अरे यही तो संसार मेरा।

खग सरीखा, उड़ता उड़ता🐤
खाना खाता,🍛
पानी पीता, मुश्किलों से
पपीहा सा,🥤
खेलता है, कंदुकों सा
लुढ़क जाता,⚽
पार्क का जो नाम सुनकर! 
चहक! जाता😊
कौन है वो, कौन है?
मेरी सुची, मेरी सुची है।
सच! यही यह संसार है।

कौन है जो, मी.. मी.. करता?
कौन है जो, लैया खाता?
कौन है, जो पांव भीतर
छुप है जाता?
चक्कर लगाता, कुर्सियों का!
वो सुची है, मेरी सुची है।
सोचना! थोड़ा उतर गहरे! 
क्या,... यही, 
भावना.. 
एक एक जुड़ती...
जो, बनी संसार है..यह।

संसार मधु.. था, मधुरतर.. था
मिट्टी.. से जन्मा
मिट्टी.. ही,
था..,
पास से, तत्वतः 
जब कूट कर छाना इसे, 
यह धूल कण भी, नहीं.. था।

Rushika Mishra 
class 5
और जयप्रकाश मिश्र


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