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Showing posts from July, 2026

यात्रा थी जिंदगी मृत्यु पर जाते सफर की।

हर एक क्षण मेरी जिंदगी का रंगीन सुंदर पृष्ठ था, खुलता रहा,  एक एक कर,  सामने, कोई परसता हो मुफ़्त ही। कुछ इस तरह, ये जिंदगी! एक संकलन थी, नित्य के, इन पृष्ठ की, क्रमवार मेरी उम्र बनती,  दिन महीने वर्ष की।  हर एक क्षण संग,  नाचता  मैं,  बीच में.. शरीर के और आत्मा के स्व-आत्म् का  स्पंद  था, नवल पल जीता हुआ दिनों... में  जुड़ता  रहा।  छप छप निकलती अखबार सी... सजीली  ये  जिंदगी छपती निकलती, द्रुत गति से  प्रिंट हो,  हर एक दिन, स्मृति में जमा होती  अनंत प्रिय, क्रमवार हैं रखी हुई  जब जिसे चाहूँ देख लूं मैं आज भी। वह  जादुई प्रेस कहां था..?  इस देह में! संसार में ?  जी नहीं,  काल का रहस्य भी तो  यही था अद्भुत था प्रिय, पर सच यही था। हर एक क्षण के  अलग  उस अखबार में  अनंतों संभावना के पृष्ठ थे, फरफरर करते, जिसे चाहूँ उसे खोलूं,  साथ ही सब अलग थे।   छपता हुआ संसार.. था संग संग सिले थे खाने बने थे,  असंख्य प्रिय कालम लिखे थे, किताबों का जिक्र था, जिधर दे...

परस दे दो,

शीर्षक: बस परस दे दो। भागो नहीं,  बस परस दे दो,  दरस मैं कहां मांगता हूँ, जानता हूँ! काबिल नहीं हूँ,  बहुत छोटा,  मैं तो खुद को, मानता हूँ। पर लगा हूँ, पीछे तेरे,  मैं  हमेशा से तूं..  जानता है,  क्या इसलिए ही भागता है? कोई नहीं, तूं बड़ा है,  सब जानता है, मैं मर्त्य प्राणी धरा का,  मिट्टी का पुतला मात्र!  मुझको  मानता  है। इशारा मैं समझ लूंगा, आदमी हूँ,  मस्क युग का,  इशारा तो कोई कर दे.. कभी  परस दे दे। कुछ नहीं मैं मांगता हूँ, सुनो मेरी कर्म मेरे, मात्र!  तुम,  द्रव्य  की  इन  प्राप्तियों से  अलग कर दे .. दरस मैं कहां मांगता हूँ, परस दे दे। निछावर गृहस्थ जीवन!  वादा है ये,  खुशी से सार्वभौमिक  उपकार का  व्रत! पालन करूं शक्ति इसकी मुझे  दे दे। सच कह रहा हूँ,  झूठ मैं तुमसे क्यों बोलूँ...! आज ही से छोड़ दूंगा,  प्राणियों का अमिष भोजन! सृष्टि से विद्वेष मेरा,  मेरे अंतरों से  नष्ट कर दे..! मैं प्रेम पाऊं सभी से,  प्रेम बांटूं सभी...

जीवन भी क्या है!

मित्रों जीवन की तहों के भीतर जीवन है इसी पर ये पंक्तियां आप को। जीवन भी क्या है! समय का  एक  क्षेत्रफल?  हाथ तेरे, पास अपने, कर तूं गुजरे..  कुछ भी  इसमें  सबसे बडा, कुछ महत्तर..। जीवन तेरा, दो विंदु है क्या? बीच में कोई रेस है क्या?  क्या है जो यह  दोलता, पेंडुलम!  सोच न इसको कभी,  तूं! शांति से कभी  बैठ कर। लक्ष्य इसका, परिणाम इसका और तूं.. किस पर तुलेगा?  तराजू.. और बाट!  नित है, देखा नहीं क्या रुपए के मूल्य से बदलते जेनरेशनो में.. किस तरह,  बद  से... बदतर। देखा कभी है ध्यान से,  अपने को प्यारे कहां है तूं, आज... था कहां? कल! छोड़ चिंता,  आ मेरे तूं साथ आ.. आज जी..,  इस समय ही जिंदगी का.. यही पल!  महल ही न, चाहिए,  खुशियों भरा,  तुझे...  अतीव सुंदर! ख्वाब रखेगा मधुर..तर!  स्वप्न है, इसे स्वप्न में रख.. साकार कर मत..। सुखद है, चाह है  यह मात्र जब तक! क्या करेगा, उसमें रहकर,  जीवन नहीं है, आज उनमें  मान मेरी फूलती है, सांस उनमें  देख ले कभी जा के भीतर। ...

तन्हाईयों की जिंदगी, क्या.. जिंदगी है?

यदि ये पंक्तियाँ आपको छू रही हैं, तो जान लीजिए — आप अकेले नहीं हैं। आप के साथ इसी हालात में अन्य साथी भी हैं, इसलिए हम मिल कुछ अच्छा करेंगे। तन्हाईयों की जिंदगी,  क्या.. जिंदगी है?  सिमटी हुई,  लिपटी  हुई   कोने कहीं, रखी हुई, शांत! चुप,  अपने में बटुरी, वस्तु ही है। और 'मैं' भी, जी.. रहा हूँ, साथ इसके, जी यहीं,  अंदर कहीं, सुनसान  सा बेजान  सा,  निष्प्रयोजन! पड़ा हूँ, संसार से इस, और खुद से  रोज ही तो  पूछता हूँ। यूनिवर्स में इस,  इकाई.. क्या मैं भी हूँ? कैसे भी एक्टिव? तन्हाईयों की जिंदगी, ही क्यों बनी? सांस है,  अभी  साथ मेरे..  हाथ मेरे.. कुछ बची, बेशक उखड़ती..  गिनतियों की,  पर अभी यह, सीने से मेरे, आ रही..  और पा रहा हूँ, जा.. रही क्या यही है, जिंदगी!  सोचता हूँ! क्या,  जी रहा हूँ?  मैं नहीं जिंदा यहां क्या, शून्य हूँ ? मान मेरी, सच कह रहा हूँ, भीतर मैं केवल  'शून्य' हूँ, आखिर मैं क्यूं.. हूँ?  जहां में इस,  पूछता  हूँ,  अंतरों से,  आवाज़ द...

कोई देखता है, जब भी मुझको

मित्रों, समाज में पति पत्नी अटूट संबंध, पर आज सच, विकट स्थिति है बराबरी का दर्जा और सम्मान हम अपने साथी को नहीं देते उसे अपनी इच्छा में बाँधते हैं। इसी विषय पर यह लाइने आंशिक मनोविज्ञान भी इसमें मिलेगा आप पढ़ें, आनंद पाएं। उसने कहा, बिंदास हूँ मैं,  क्या करूँ, इसके लिए,  जाऊं कहां?  नज़रें नहीं, मुझे  छोड़तीं हैं,  किसी कोने; तुम भी तो प्रिय!  कभी सोचना,  उनमें से ही  तो  एक थे, मुझे, चुन लिए,  आज हो अपने लिए। अब क्या हुआ? जलते हो तुम! राख हो जाते हो पल में, कोई देखता है,  जब.. भी  मुझको  प्रेम  से  कनखियों में। पर.. देखती हूँ, खुश हो होते,  भांपती  हूँ,  चहकती चिड़ियों में कैसे?  आज भी तुम,  है, कसम!  तुमको  मुझे बराबरी का, हक तो दो। क्या चाहते हो, अंधेरों में,  बंद खिड़की,  रोशनी बिन!  बिन हवा.. के  झूमते, झोंकों से छुप के,  खुश रख सकोगे,  कभी मुझको। संभव नहीं,  निराशा  में, फूल.. आएंगे नहीं,  सौंदर्य के वे खिलखिलाते,  हंसते...

भूमि पुत्री जानकी।

मित्रों, श्रीसीताजी प्रभुराम को उनका यथेष्ट दिलाने के लिए जीवन पर्यंत कष्ट और दुख में रहीं, उन पर यह चंद लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ। एक बालिका… सुंदर सलोनी.. जनक की थीं, "जानकी…"  पालित! मगर वह मात्र..  उनसे, दुहिता… तो थी..  वह  राज्य के उस  भूमि की। जो पालती है, प्रजा को  निज कोख.. से कोष.. भर भर अन्न की। राजा जनक.. के राज्य से भी  बृहत्तर… भूमि.. के भूभाग,  भारत…, भूमि… ऊपर,  हां बालिका थी भूमि.. की वह भूमि पुत्री जानकी। सीता थीं वे,  संतति सलोनी धरा की। जननी है जो, इस जगत.. की माता.. है जो, इस विश्व... की। गुण सभी उनके निराले,  मातृवत थे, सौंदर्य थीं, वह.. इस प्रकृति की, धैर्य.. थीं वह,  इस धरा सी..  शांत.. थीं। शब्द थे, झरने सरीखे.. मृदुल, मीठे.. एक सच कहूं! प्रियव्रत  अनोखा धारतीं थीं, वह बालिका थीं, भारती की। कारण वहीं थीं,  मुक्त हो यह धरा, दूषण  कारकों से.. कनक मृग को मांग कर  कारण बनी। दुष्ट वध,  श्रीराम जैसे कर सके वह शक्ति पावन  सीता ही थीं, सीता ही थीं। इस धरा पर,  फिर सनातन...

स्वरूप: तव निरंजना..

मित्रों, मानव मनोविज्ञान पर एक छोटी सी प्रफुल्लिका प्रेषित है, यह लगभग सभी जीवनों को स्पर्श करती ही है। चाहत थी मन में, सच है ये, मैं, फिदा थी, पर,  कहूं कैसे? बात  वो,  लाज थी,  किशोर मन की विवशता, क्षमता मेरी, मैं कह सकूं,  बात अपनी,  खुल के तुमसे, बहुत कम थी..। इस लिए,  शर्म का एक आवरण, लाली लिए, मुख बदन पर ऊपर से डाला,  और मैं,  फिर, सामने थी। डर समाया था हृदय में,  तूं कहीं मुझे, ना न! कह दे, क्या करूंगी? टूट जाऊंगी मैं, चुप  घुप मन के अंधेरे,  बिना तोड़े अंदर कहीं से, सूख जाऊंगी, लता सी, मुरझ जाऊँगी, कली मैं बिन खिले। यह सोच के, अंदर  मुड़ी मैं,  अंतरों में और इस लिए, आज तक अंकुर  संजोए जी रही हूँ! आस में...  इस उम्र में भी,  जब तुम्हे मैं  देखती हूँ,  लाल हो जाती, कही से शर्म की, चादर मैं ओढ़े  बहुत  खुश हूं। अब चाहती हूँ खुल के कह दूं, तव स्वरूप निरंजना यह तूं ही था हे प्रिय  मेरा आदि  साथी,  शुरू से वो निरंजना।।। पटाक्षेप संसार की, बाहें हैं कितनी?  और कैसी,...

क्या छूटता है मुझसे ये..!

मित्रों कोई भी हो, एक उत्कंठा जीवन पर्यंत बनी रहती है मैं पीछे तो नहीं हो गया पिछड़ तो नहीं रहा हूँ। वह क्या है जो हम पकड़ना चाहते हैं, पाना चाहते हैं इसी पर ये लाइने आपके लिए। 'कुछ' क्या है..? वो..,  इतने.. दिनों से,  सोचता  हूँ! धड़क जाता है ये दिल!  जिसके लिए..! बिल्कुल अचानक,   धक! से, देखो. सब कुछ तो है, प्रिय..!  पास मेरे..। कुछ' क्या है..?  वो..! साथ...  तेरे, आज..!  मुझको,  और क्या... 'वह' चाहिए..? और.. किसलिए?  उचक! जाता है ये दिल! गिरने से बचता.. संभलता.. है.. धड़क! जाता.. एक पल में..  बेसबब, किसके लिए..? बस पूछता हूँ, बता दे न! कुछ' क्या है  वो..!  संसार में  इस,  क्या है वो... जिसके लिए..? यह मन मेरा, झटके! से  इतने.. उछल जाता..  देखता हूँ, भागते..! इंसान को.. दुश्वारियों में.. बिन थके..!  'मिस' हुई...  गोली... के जैसा,  ऐन! मौके 'फुस' हुआ, खुद को हूं पाता... क्या है वो... जिसके लिए! रहस्य! कुछ..,   लगता... है मुझको..!  है कहीं..  संसार में,  ज...

मार्ग कोई! सनातन.. को दिखाओ,

मित्रों, अब तो इस सनातन के सम्मान हेतु देवताओं का आवाहन ही करना होगा। अग्नि जो न्याय और सत्व के प्रतीक हैं उनसे प्रार्थना है कि अपना स्वरूप लें और देव, ऋषि, संत वाणी को सत्य करें। इस 'दीप' अंदर कौन है...?  पूछता हूँ, देव! क्या तूं,  सत्य!  है..?  तुम हो,  कहां?  तुम्हें.. खोजता... हूं? सुना था,  कोई, देव.. अद्भुत!   अग्नि! थे..,  जाग्रत यहां,  इस प्रार्थना के  दीप में,  हमे  आदि से वह,  सुखी करते। दीप के, इस मर्म.. में,  वह.. अवस्थित थे! 'सोम' के  उस,  'गान'  से, वह  प्रफुल्लित! थे राध*.. देते,  रयि*..  लाद* देते,  सुपथ  पथ..  हमे..  दिखाते थे,.. देव को उन खोजता हूँ!  वह हैं.. कहां..? समाहित!  हो,  दीप... में तुम! जानता हूं!  चाहता हूँ..!  निकल! आओ..;  आवरण से पार आओ..,  अब, सच! यही मै चाहता हूँ। अंधेरे..कैसे?  घने... हैं,  आदमी के हृदय में, जरा... यहां देखो..? लड़ रहे, वध कर रहे, कैसी चोरी कर रहे ये चढ़ावों की ध्व...

पास आओ, मौन बैठो।

मित्रों, जीवन में फैले शब्दों के ताने बाने पर बुनी, कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ, आपको अच्छी लगें यह चाहना है। शब्द! हैं? सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो,  साथी.. हो मेरे.. पास आओ, मौन बैठो। क्या.. करूंगा..?  भर.. चुका हूँ!  जानता.. हूँ!  कुछ नहीं,  सस्ता.. है,  इनसे, शब्द! हैं, सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो। फूल.. से,  हंसते.. हुए.., ये शब्द! तेरे निर्झरी! झरती.. हो जैसे..  मुँह.. से तेरे..  प्रिय,।।। निकलते.. बिन महक.., बिन परागों के आत्मा स्पर्श के..! बाहरी.... मन की सतह से क्या.. करूंगा? अर्थ इनके घुल गए हैं, आप में शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। तुम! कुछ कहो, यह झांकता..! है, सत्य..! है, मरता..! नहीं है, झलकता है,  तली  में.., छुपता नहीं है; एक नमी.. होती  है.. दिलों.. में, लिपट.. आती, अक्षरों.. में.. शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। चरमराहट..! डालियों की,  सुनना... कभी जंगलों.  में.. रगड़ भी अंतरों की..   शब्द.. है,  निकलती है, मूक! से.. लाए हो तुम भी  शब्द.. कुछ! जाने ...