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Showing posts from July, 2026

मार्ग कोई! सनातन.. को दिखाओ,

मित्रों, अब तो इस सनातन के सम्मान हेतु देवताओं का आवाहन ही करना होगा। अग्नि जो न्याय और सत्व के प्रतीक हैं उनसे प्रार्थना है कि अपना स्वरूप लें और देव, ऋषि, संत वाणी को सत्य करें। इस 'दीप' अंदर कौन है...?  पूछता हूँ, देव! क्या तूं,  सत्य!  है..?  तुम हो,  कहां?  तुम्हें.. खोजता... हूं? सुना था,  कोई, देव.. अद्भुत!   अग्नि! थे..,  जाग्रत यहां,  इस प्रार्थना के  दीप में,  हमे  आदि से वह,  सुखी करते। दीप के, इस मर्म.. में,  वह.. अवस्थित थे! 'सोम' के  उस,  'गान'  से, वह  प्रफुल्लित! थे राध*.. देते,  रयि*..  लाद* देते,  सुपथ  पथ..  हमे..  दिखाते थे,.. देव को उन खोजता हूँ!  वह हैं.. कहां..? समाहित!  हो,  दीप... में तुम! जानता हूं!  चाहता हूँ..!  निकल! आओ..;  आवरण से पार आओ..,  अब, सच! यही मै चाहता हूँ। अंधेरे..कैसे?  घने... हैं,  आदमी के हृदय में, जरा... यहां देखो..? लड़ रहे, वध कर रहे, कैसी चोरी कर रहे ये चढ़ावों की ध्व...

पास आओ, मौन बैठो।

मित्रों, जीवन में फैले शब्दों के ताने बाने पर बुनी, कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ, आपको अच्छी लगें यह चाहना है। शब्द! हैं? सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो,  साथी.. हो मेरे.. पास आओ, मौन बैठो। क्या.. करूंगा..?  भर.. चुका हूँ!  जानता.. हूँ!  कुछ नहीं,  सस्ता.. है,  इनसे, शब्द! हैं, सुंदर! ही होंगे.. एक तरफ, रख दो। फूल.. से,  हंसते.. हुए.., ये शब्द! तेरे निर्झरी! झरती.. हो जैसे..  मुँह.. से तेरे..  प्रिय,।।। निकलते.. बिन महक.., बिन परागों के आत्मा स्पर्श के..! बाहरी.... मन की सतह से क्या.. करूंगा? अर्थ इनके घुल गए हैं, आप में शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। तुम! कुछ कहो, यह झांकता..! है, सत्य..! है, मरता..! नहीं है, झलकता है,  तली  में.., छुपता नहीं है; एक नमी.. होती  है.. दिलों.. में, लिपट.. आती, अक्षरों.. में.. शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे.. एक तरफ, रख दो। चरमराहट..! डालियों की,  सुनना... कभी जंगलों.  में.. रगड़ भी अंतरों की..   शब्द.. है,  निकलती है, मूक! से.. लाए हो तुम भी  शब्द.. कुछ! जाने ...