तन्हाईयों की जिंदगी, क्या.. जिंदगी है?

यदि ये पंक्तियाँ आपको छू रही हैं, तो जान लीजिए — आप अकेले नहीं हैं। आप के साथ इसी हालात में अन्य साथी भी हैं, इसलिए हम मिल कुछ अच्छा करेंगे।

तन्हाईयों की जिंदगी, 
क्या.. जिंदगी है? 
सिमटी हुई, 
लिपटी 
हुई  
कोने कहीं, रखी हुई,
शांत! चुप, 
अपने में बटुरी, वस्तु ही है।

और 'मैं' भी, जी.. रहा हूँ,
साथ इसके, जी यहीं, 
अंदर कहीं,
सुनसान 
सा
बेजान सा, 
निष्प्रयोजन! पड़ा हूँ,
संसार से इस, और खुद से 
रोज ही तो पूछता हूँ।

यूनिवर्स में इस, 
इकाई..
क्या मैं भी हूँ?
कैसे भी एक्टिव?
तन्हाईयों की जिंदगी, ही क्यों बनी?

सांस है, 
अभी साथ मेरे.. 
हाथ मेरे.. कुछ बची,
बेशक उखड़ती.. गिनतियों की, 
पर अभी यह, सीने से मेरे, आ रही.. 
और पा रहा हूँ, जा.. रही
क्या यही है, जिंदगी! 

सोचता हूँ!
क्या, जी रहा हूँ? 
मैं नहीं जिंदा यहां क्या, शून्य हूँ ?
मान मेरी, सच कह रहा हूँ,
भीतर मैं केवल 
'शून्य' हूँ,
आखिर मैं क्यूं.. हूँ? 
जहां में इस, पूछता हूँ, अंतरों से, 
आवाज़ दे? कोई है वहां?
पर यहां, है हताशा बैठी हुई, 
और तो कोई.. नहीं।

भ्रम! है मुझे, जिंदा हूँ मैं.. 
या मर गया हूँ,
क्यों दूर सबसे रह गया हूँ!
डर है लगता, रौशनी से 
अब मुझे
क्या अंधेरा! मैं.. बन... गया हूँ,
सांस भर तो रह गया हूँ।

बनाया मुझे किसलिए?
उसने अरे! 
कारण तो होगा? एक भी, 
दूर का, हो कहीं कोई, 
पर हर जगह तो, 
मैं जिंदगी में फेल हूँ।

मैं.. जानता हूँ, कौन हूँ,
सुना था, कभी बचपने में, दूर से, 
अपने लिए, कोई कह रही थी
मिरैकिल.. हूँ।
पर पा रहा हूँ, 
बड़ा होकर 'कुछ नहीं'
कोने में रखा, राख का कोई ढेर हूँ।

कोई नहीं देखे,  मुझे, 
मैं, देखता हूँ 
सभी 
को, 
बैठा हुआ, इन अंधेरों से,
मानकर दुत्कार! हूँ।

मैं जीतते इंसान की, 
उस.. जीत का
दौड़ती दुनियां की 
इस, स्पीड का दुश्मन नहीं हूँ,
आंतरिक कोई डर है मुझको..
मैं.. हेय! हूँ।

इसलिए नफरत है 
मुझको, 
अपने ही खुद से;
नफ़रत लिए, अपने लिए
इस जिंदगी को ढो रहा हूँ।
है कोई, बताए, आखिर मैं क्यूं हूँ?

दिन हुए मैं दूर हूँ, उन उजालों से
चौंध लगती है मुझे अब
चाँद की उजली किरन से,
अंधेरों को बुन रहा हूँ, 
अंधेरों में.. 
बैठकर.. चुप जिंदगी में
अंधेरों से पूछता हूँ, .... हूँ।

अचानक यह क्या हुआ,
धमाका मेरे सिर हुआ,
बम फटा है, 
भयानक
मैं चल पड़ा हूँ, 
इस समय मैं निडर! हूँ,
वीभत्स सारा दृश्य है,
चीख है, पुकार है, बचा लो आवाज़ है, 
भागते सब लोग हैं, 
कोई नहीं जो रिस्क ले, आगे बढ़े
जान का ही मोह है, 
मैं घुस चुका हूँ, निडर कोई सिंह है
कहीं मेरे भीतर..
लाद कर कंधों पर अपने ला रहा हूँ
घायलों को, बिलखते, रोते हुए
आह, भरते, फूल से बच्चों को इन!

आज खुश हूँ,
मैं आज खुश हूँ..
झुलस कर, मैं गिर गया हूँ 
आज जीवन जी रहा हूँ।

इस लिए अब कह रहा हूँ,
तन्हाई भरी ये जिंदगी
सजा नहीं,
एक कोना ईश्वर जहाँ
गढ़ता है तुमको छीनियो से
मिलाता है, खुद को तुमसे।

जो सिमटता और सड़ता
मिट्टियों में, 
वही तो, प्रिय बीज बन कर
यहां उगता.  
अंधेरे में अकुलता से
अंकुरित हो बीज फटकर पेड़ बनता।

उजालों से 
डर है लगता यदि तुम्हे
छोड़ दो ये उजाले,
रौशनी थोड़ा धीमी कर दो,
नन्हा कोई दीपक जलाओ।

मित्र मेरे.., तुम मेरे.. हो
पास आओ, 
स्नेह भर, 
सहयोग का, अत्यंत छोटा
काम ढूंढो, मेरे साथ मिल तुम 
कदम आगे को बढ़ाओ।

एक मैं है, सदा तुममें 
रूठो नहीं, 
मेरे कहे साथ उसके मुस्कुराओ।

जय प्रकाश मिश्र








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