रस्म थी, राग था, अनुराग था और समय सबके पास था

मित्रों, दुनियां में हम, एक मृग-तृष्णा लिए  एक मृग-मरीचिका का पीछा करते रह जाते हैं और सांझ जीवन आंगन में घिर आती है आगे यह गीत पढ़ आनंद लें।

एक समय था! 
तब..
तलब.. थी,
तुझको.. मेरी.. मुझको... तेरी, 
दुनियां..!  अरी! 
तब..
किस तरह, 
तुम बाजुओं में...थी पडी।

तुम!  
हरी...थी, तब..
दूब.. छितरी! लह-लहाई, 
प्यास से,
कितनी.., बिकल थी।
सोचता हूँ, आज बैठा, 
संधि.. पर, 
इस... 
उम्र के,
प्रिय! क्षितिज, ऊपर
तुम! छद्मवेशी.., मरीचिका.. से,
कहां...!  कम थी? 


चकित..! हूँ.. 
देखकर..
यह..., 
उम्र, क्या.  है! 
अंक है, या सत्य..ही! 
अब तूं, वही.., 
और मैं.. वही! 
देख न!  
सर* हुआ सब, खतम! ही
अब कुछ नहीं.., अब कुछ नहीं..।

स्मृति, कहूं... अरे! ना, 
यह.. 
सपन.. सी...!
लुभावनी.., पर,..
आज जाना, शून्य.. थी!
दुनियां.. 
तेरी - 
मेरी,  प्रिये..
सच! के सिवा, सच! से, इतर थी।

लालसा ?
अरी लालसा क्या? 
तूं..., 
लालसा की लड़ी थी,
कितनी.. लदी थी,
उस समय! 
एक 
क्षण, फुर्सत नहीं थी।

रातदिन! बुनते
थे, सपने..  
तुम यहीं.., प्रिय!  हम यहीं।
हम तुम, यहीं.. 
अब ढेर 
हैं...
भवितव्यता, की
देखता हूँ, आंख! खोले..
इससे.... ज्यादा, कुछ.. नहीं! 

सोचता हूँ बैठकर! 
एकांत में अब,
तब...! 
निज जनों की परिधि.. 
कितनी..!  
बड़ी..... थी! 
रस्म थी, राग था, अनुराग था,
समय सबके पास था,
हे प्रिये!  देख...
न..!
अब कुछ नहीं..., अब कुछ नहीं...।

जय प्रकाश मिश्र






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