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Showing posts from October, 2026

होठ चुप हैं और मैं लेटा हुआ।

कहीं 'कुछ' अति बड़ा होगा,  रहस्यों में छुपा होगा, आंख खुल  जाएगी मेरी देखकर... मान कर यह रस्तों पे दौडा आजतक! पीछे मैं इनके,  आवरण  में  छुपाए  जो घूमते हैं अंक में  मंदिरों और मस्जिदों में  आदमी के ख्वाब को। ऊंचे वहां..  उन  गुंबद-ओ-मीनार पे चढ़ नहीं सकता  जहां मैं.. उम्र में इस, मोड़ पर दिखाते  हैं  बताते हैं,  रखा  हुआ है,  सपनों का सुख  और कोई स्वर्ग! मृत्यु के उस पार का.. सौदा हैं करते..  पल रहे  समाज के ही दान पर ये  आज भी आस्था पर विज्ञान के भी जमाने में देख तो। आखिरी इस द शक तक  खोजा बहुत.. पर नहीं  पाया,  सच में बाहर,  एक भी सच।  अंदर कहीं कुछ  चमकता है,  झलकता  है,  निथरता है, जब  शांत होता  मेरा मन..  और अब  जब थक गया हूँ गिर पड़ा हूं ,  दौड़ता   फुटपाथ पर इस जिंदगी के अपरवश मूर्छित हुआ सा छोड़ दी दुनियां मुझे, तब कहीं  पर्दा हटा।   मुखातिब मैं सत्य से  सच हो गया.. हूँ कुछ नहीं थी.. जिं...

कैसे मिलूं साथी मैं उसको

निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं   समय की बहती नदी में, डालता हूँ जाल  मन.. का,  ध्यान  के उस भंवर में, समर्पण से,  भाव से,  साध लेकर, बैठता हूं,  सच कह रहा हूँ,  आस लेकर   नित नई, आज वह  मछली मिले..। डूब जाता हूँ मैं गहरे  साथ साथी  उसी  के, तली में तब तक हूं रहता ढूंढता उसे.. दर बदर,  शाम तक  अंधेरा  होने..  से  पहले निरखता हूं ध्यान में छाया कहीं  उस  साक्षी की  एक तो मुझको मिले। पानी में दोनों यहीं हैं, संसार में पानी है उसमें और मुझमें एक ही, पर फर्क है विक्षुब्ध मैं  वह शांत है.. कैसे मिलूं साथी मैं उसको अंकुश धरूं, कैसे मैं मन पे? भागता है, मछलियों सा फुदकता है, गेंद सा लौट आता, स्टिंग जैसा.. डांट खाकर बैठता है बिल्लियों सा ताक में,  फिर भी लगा है  मुझमें अरे यह एक  कोने.. क्या करूं, दुनियां है ये.. रंगीन कितनी, लुभानी, और मन मिट्टी है रे!  निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं  समय की बहती नदी में। जय प्रकाश मिश्र जी मित्र। यह कविता आपकी अंतर्यात्रा ...