आंचल पसारे।

आंचल पसारे मांगती है दुआ वह 
झुकी कैसे, झुक गई 
डाली हो जैसे
फलों से 
कुछ 
इस तरह,
हर शाम को, होते धुंधलके 
अकेले, अरे उनको!
उदास हो, 
नमी भर आंखों में अपने
बोल न किसके लिए..?
सोच न किसके लिए..?

तूं रह रहा है, दूर उससे
दूर.. 
उस परदेश में,
पत्नी.. बच्चों को लिए..
तूं लौट आए, 
रोज बस 
कुशल से, डेरे पे अपने..
खुश रहे.. हां इसलिए, हां इसलिए।

देखा कभी है, मां को अपने
आंसुओं में, मांगते 
भगवान से
कुछ!
पीले पीले आंचलों में
दयार्द्र हो.. हो...
धार* देते 
लोटे भरे उन जलों में
बुदबुदाते.. शब्द कुछ कहते हुए
विषय वह बस तुम ही हो..
तुम ही हो..
तूं लौट आए, 
रोज बस 
कुशल से, डेरे पे अपने..
खुश रहे.. हां इसलिए, हां इसलिए।

क्या याद करते हो कभी
किसी शाम को तुम..
गांव अपना..
मां 
को अपनी..
इस शहर में, भूले से भी
या खो गए तुम ले के बच्चे 
अपने छोटे इस शहर में।

जय प्रकाश मिश्र

शब्द अर्थ: 
धार* एक सुगंधित द्रव्य इसे ग्रामीण औरतें पानी में घोल कर अपनी मनौती के लिए देवीजी को सादर आज भी गांव में सुबह मुंह अंधेरे या शाम को अर्पित करती हैं।
लोटा * गांव के घरों पानी का एक पात्र जिसमें आदमी के एक बार पीने के लिए पर्याप्त जल आता है।

समालोचना भाग

जय प्रकाश जी, यह कविता पढ़कर आँखें नम हो आईं - यह हर प्रवासी बेटे की माँ की कथा है।

सार-भरती व्याख्यिका

पहला चित्र - झुकी डाली:
"आंचल पसारे मांगती है दुआ वह, कैसे झुकी, की झुक गई डाली हो कोई फलों से"
माँ की प्रार्थना-मुद्रा को आपने फलों से झुकी डाली कहा - कितना सटीक! जैसे डाली फल के भार से झुकती है, वैसे ही माँ ममता के भार से झुक गई है। हर शाम धुंधलके में, अकेले - यह समय भी अर्थपूर्ण है। गोधूलि वेला, जब बेटा घर लौटता है, पर परदेश गया बेटा नहीं लौटता।

दूसरा चित्र - धार देती माँ:
आपने 'धार' का अर्थ स्वयं दिया - ग्रामीण औरतें पानी में सुगंधित द्रव्य घोलकर देवी को अर्पित करती हैं। पीले-पीले आंचलों में, लोटे भरे जल को धार देते हुए, बुदबुदाते शब्द - और "विषय वह बस तुम ही हो.. तुम ही हो.."

यहाँ माँ पुजारी बन जाती है। उसका मंत्र कोई संस्कृत श्लोक नहीं, बेटे का नाम है। उसका प्रसाद कोई मिठाई नहीं, बेटे की कुशलता है। दयार्द्र होकर वह देवी से नहीं, स्वयं देवी होकर माँगती है।

तीसरा चित्र - प्रश्न:
"क्या याद करते हो कभी किसी शाम को तुम.. गांव अपना.. मां को अपनी.. या खो गए तुम इस शहर में।"

यह प्रश्न बेटे से नहीं, हम सबसे है। शहर की चकाचौंध में वह धुंधलके वाली आकृति धुंधली पड़ जाती है। पर माँ नहीं भूलती - वह रोज़ शाम को उसी समय आँचल पसारती है।

इस कविता की शक्ति इसकी सादगी में है। कोई बड़ा शब्द नहीं, पर हर शब्द में नमी है।

मित्रों के लिए चमकते मोती

मोती 1:
फलों से झुकी डाली सी माँ, हर शाम धुंधलके में आँचल पसारे दुआ माँगती है - विषय बस तुम ही हो।
मोती 2:
धार का जल, पीला आँचल, बुदबुदाते होंठ - माँ की पूजा में मंत्र नहीं, बेटे का नाम होता है।
मोती 3:
बेटा परदेश में बच्चों के साथ खुश रहे, इसलिए माँ अकेले उदास आँखों में नमी लिए मुस्कुराती है।
मोती 4:
शहर में खो गए हो तो एक शाम गाँव की धुंधलके वाली उस आकृति को याद कर लेना - वह आज भी तुम्हारे लिए आँचल पसारे है।
आपकी कविता में माँ केवल प्रतीक्षा करती हुई एक ग्रामीण स्त्री नहीं है। वह अपने बेटे के जीवन की अनकही संरक्षिका है—जो स्वयं अकेली, उदास और नमी भरी आँखों के साथ रहती है, लेकिन अपनी प्रार्थना में अपने लिए कुछ नहीं माँगती। उसकी सारी मनौती बेटे की कुशलता है।

इस कविता की सबसे मार्मिक बात यह है कि माँ अपनी पीड़ा को बेटे के लिए चिंता नहीं बनने देती; वह अपनी चिंता को भगवान के सामने प्रार्थना बना देती है। और शहर में बसा बेटा शायद इस मौन प्रेम से अनजान नहीं, लेकिन उसकी स्मृति से दूर होता जा रहा है।

### भाव-सागरिका

### माँ की दुआ में बसा परदेशी बेटा

**भाव-सागरिका**

कुछ प्रेम ऐसे होते हैं, जो अपने होने की घोषणा नहीं करते। वे प्रतीक्षा करते हैं, प्रार्थना करते हैं और अपने प्रिय की कुशलता में ही अपना सुख खोज लेते हैं। माँ का प्रेम ऐसा ही प्रेम है।

गाँव की साँझ ढल रही है। दिन की हलचल धीरे-धीरे थम रही है। एक माँ आँगन में या देवी के स्थान पर आँचल पसारे खड़ी है। उसका झुका हुआ शरीर फलों से लदी डाल की तरह है—जैसे जीवन के अनुभवों, जिम्मेदारियों और ममता के भार ने उसे विनम्र बना दिया हो। आँखों में नमी है, मन में अकेलापन है, लेकिन उसके होंठों पर अपने लिए कोई शिकायत नहीं।

उसका बेटा परदेश में है। पत्नी और बच्चों के साथ अपना संसार बसा चुका है। माँ चाहती है कि वह वहीं सुखी रहे, स्वस्थ रहे, सुरक्षित रहे। वह लौट आए, तो अच्छा; लेकिन जब तक वह लौट नहीं सकता, तब तक उसकी कुशलता ही माँ के लिए पर्याप्त है। इसीलिए उसकी प्रार्थना में एक ही आग्रह बार-बार लौटता है—वह कुशल से अपने डेरे पर पहुँचे, उसका घर-परिवार सुखी रहे।

पीले-पीले आँचल, पानी से भरे छोटे लोटे, उसमें घुली सुगंधित धार और देवी के सामने बुदबुदाते शब्द—ये केवल ग्रामीण धार्मिक जीवन के दृश्य नहीं हैं। ये उस लोक-संस्कृति की स्मृतियाँ हैं, जिसमें माँ अपनी असहायता को आस्था में बदलती है। वह बेटे तक पहुँच नहीं सकती, उसके जीवन की हर कठिनाई दूर नहीं कर सकती; इसलिए अपनी सारी ममता उस शक्ति के सामने रख देती है, जिससे वह बेटे की रक्षा की आशा करती है।

इस प्रार्थना में माँ का अपना दुःख भी है, पर वह दुःख उसकी माँग नहीं बनता। उसकी माँग केवल बेटा है—उसकी कुशलता, उसका सुख, उसका सुरक्षित घर।

और यहीं कविता एक प्रश्न बन जाती है।

जिस बेटे के लिए माँ हर शाम भगवान से कुछ माँगती है, क्या वह बेटा कभी अपनी किसी शाम में माँ को याद करता है? क्या शहर की रोशनी, काम की व्यस्तता और अपने परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उसे गाँव का धुंधलका याद आता है? क्या उसे कभी वह झुकी हुई डाल दिखाई देती है, जो फल देने के बाद भी किसी के लिए झुकी रहती है?

कविता बेटे को अपराधी घोषित नहीं करती। वह केवल उसके सामने स्मृति का एक दर्पण रखती है।

क्योंकि माँ का प्रेम कोई ऋण-पत्र नहीं, जिसका हिसाब चुकाना हो। लेकिन उस प्रेम को पहचानना, माँ की कुशलता पूछना, समय देना और उसके अकेलेपन में सहभागी होना हमारी मानवीय जिम्मेदारी अवश्य है।

**माँ की प्रार्थना में बेटा प्रतिदिन उपस्थित है। प्रश्न यह है कि बेटे की स्मृति में माँ के लिए कितनी जगह बची है।**

### मित्रों को मोती

### 🌼 मित्रों को मोती
**आज का मोती: माँ की शाम**

माँ की शाम में एक बेटा रोज लौटता है—प्रार्थना बनकर।

वह कहीं दूर शहर में रहता है। उसके अपने काम हैं, अपना परिवार है, अपनी व्यस्तताएँ हैं। माँ यह सब समझती है। वह उससे शिकायत नहीं करती। बस साँझ ढलने पर आँचल पसारकर भगवान से कहती है—मेरा बच्चा कुशल से रहे।

माँ के लिए प्रार्थना केवल शब्द नहीं होती। वह उसकी असमर्थता का सहारा है। वह बेटे के पास नहीं पहुँच सकती, उसके सिर पर हाथ नहीं रख सकती, उसके जीवन की हर चिंता नहीं बाँट सकती। इसलिए वह अपनी सारी ममता उस अदृश्य भरोसे को सौंप देती है, जिसे वह भगवान कहती है।

लेकिन एक प्रश्न हम सबसे भी है।

क्या हम कभी अपनी भागती हुई शामों में उस माँ को याद करते हैं, जिसकी शामें हमारी कुशलता माँगते हुए बीतती हैं?

माँ को हमेशा धन, उपहार या बड़े आयोजन नहीं चाहिए। कभी-कभी उसे केवल हमारी आवाज चाहिए, कुछ देर का साथ चाहिए, यह भरोसा चाहिए कि उसका बेटा उसे भूला नहीं है।

**तीन छोटे मोती**

💎 माँ का मौन प्रेम है; उसे हमारी ओर से संवाद चाहिए।

💎 अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए उस परिवार को न भूलें, जिसने हमें जीवन दिया।

💎 आज माँ से बात कर सकते हैं, तो कल के लिए मत टालिए। समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब हमें किसी की याद सबसे अधिक आती है, तब कभी-कभी वह हमारे पास नहीं होता।

**आज का संकल्प:** आज किसी अपने का हाल पूछिए—विशेषकर उसका, जो आपसे कुछ माँगता कम है, आपके लिए प्रार्थना अधिक करता है।

— *मित्रों को मोती* 🌿

### कविता पर एक विशेष साहित्यिक टिप्पणी

आपकी कविता के तीन बिंब इसे विशिष्ट बनाते हैं।

* “फलों से कुछ इस तरह” झुकी डाल: माँ की उम्र, ममता और विनम्रता का सहज ग्रामीण बिंब। इसमें कृत्रिम भावुकता नहीं है।

* पीले-पीले आँचल, धार और लोटे: ये कविता को किसी अमूर्त मातृ-वंदना से निकालकर भारतीय ग्रामीण जीवन की वास्तविक भूमि पर खड़ा करते हैं। आपने जिस ‘धार’ का अर्थ बताया है, वह इस दृश्य की सांस्कृतिक आत्मा है; इसे किसी सामान्य पूजा-सामग्री के शब्द से बदलना उचित नहीं होगा।

* “विषय वह बस तुम ही हो.. तुम ही हो..”: पूरी कविता का भावनात्मक केंद्र। माँ की प्रार्थना का विषय केवल बेटा है, लेकिन कविता का प्रश्न उस बेटे की स्मृति पर है।

एक जगह विशेष ध्यान देने योग्य है:

> तूं लौट आए, रोज बस कुशल से डेरे पे अपने..

यहाँ ‘डेरे’ शब्द में परदेश की अस्थायी-सी अनुभूति है। बेटा अपने घर-परिवार के साथ वहाँ रहता है, फिर भी माँ की दृष्टि में उसका वह ठिकाना ‘डेरा’ है। उसका अपना गाँव और माँ का घर जैसे अब भी उसकी मूल जगह बने हुए हैं। यदि आपने ‘डेरा’ सोच-समझकर रखा है, तो इसे अवश्य बचाइए।

और अंतिम प्रश्न—

> या खो गए तुम इस शहर में।

यह केवल शहर में खो जाने का प्रश्न नहीं है। यह उस संभावना का प्रश्न है कि कहीं आधुनिक जीवन की व्यस्तता मनुष्य को उसकी जड़ों और उन संबंधों से दूर तो नहीं कर रही, जिनसे उसका अस्तित्व बना है।

मेरी दृष्टि में इस कविता का सबसे गहरा सत्य यह है: माँ बेटे को अपने पास बुलाने से पहले उसके सुख की प्रार्थना करती है; कविता बेटे से कहती है कि उस निस्वार्थ प्रेम को केवल माँ की आदत समझकर अनदेखा मत करो।

यही इसकी करुणा है, यही इसकी सामाजिक सार्थकता।



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