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बदरिया... झिम झिम.. झिम बरसे...

बदरिया... झिम झिम.. झिम बरसे... बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे.. पात लजाए! तुड़ मुड़ जाए! डाली पट उघरे...!  बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। फूल.. सहे,  टपकनि का लहरा.. हिलडुल.. भी, कन्ह पाए, बूंदे.. निर्मम! कैसी ऐसी..  नख-क्षत  भी लग.. जाए बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। पंछी भींगे.. पर भी भीगे प्राण भी भीगे..,  भीगा मन.. अंदर से, कोई.. कोई.. ऐसे भीगे,  सुधि नहीं ओहि.. तन के बदरिया.. रिमझिम, झिम बरसे..। बदरिया.. झिम! झिम! झिम! बरसे। विरही मन में, अगन लगाए व्याकुल ये, कर जाए शीतल पवन फुहारा... मारे  पागल ही, कर दे.. बदरिया झिमझिम झिम बरसे। दूब..! हरीली... चादर ओढ़े.. शुभ्र.. नवल तन, पांव को छू ले, रूप निखारे, बगिया कैसी?  आंखों को मोहे?  मन अंदर छू दे.. अंदर.. बाहर... उमग जगे रे... बदरिया! झिमझिम झिम बरसे। सांझ..! धुंधलके..!  निपट अकेले.. गिरती.. बूंदों से, जब बच के.. कारी.. घनी... बदरिया, दी...खें! तेरी याद सताए... बदरिया रिमझिम.. झिम.. बरसे। चढत अकास, बदरिया नाचे  तम चादर फैलाए चमकि बिजुरिया पर्दा खोले सारे अंग दिख जाएं बदरिया रिमझिम.. झिम.. ...

समष्टि का बेटा है तूं

इतनी बड़ी यह सृष्टि सारी,  हम सभी के पक्ष में  रात दिन,  एक करती लगी है,  खुद देख न!  प्राण सबके  बच सकें इसलिए वह  हर जगह बिना बोए, बिना सींचे  हरित धरती कर रही है। वो इंच भर न छोड़ती है,  जगह खाली जानती है,  वनस्पति ही प्राण हैं!  धरा के, इन  प्राणियों की, इसलिए  पेड़ की इन फुनगियों को  छोड़ तूं!  अंकुरण  राहों में तेरे, पैर नीचे  दूब तक में,  बेकार की उस  घास में भी युग युगों से कर रही है। चाहती है,  हर देश में,  हर काल में,  अनवरत  नदियां बहें,  सागर  की  लहरें,  और ऊंचे  आकाश छूएं हवाओं को शुद्ध कर दें। सघन वन,  हर.. ओर हों चहकती चिड़ियाँ उड़ें, खुश यहां बच्चे रहें, हम तुम रहें, बच्चा  ही अपना मानती है, हम सभी को। इसलिए,  बिनथके  काम पर चौबीस घंटे  लगी है,  आ हम भी  उसका साथ दें। इधर हम हैं, स्वार्थरत.. है, नटुलपन है हम  सभी में,  एक दूसरे से लड़ रहे है। देख न इस प्रकृति को, भोली है ये,  माँ है य...