समष्टि का बेटा है तूं

इतनी बड़ी यह सृष्टि सारी, 
हम सभी के पक्ष में 
रात दिन, 
एक
करती लगी है, खुद देख न! 
प्राण सबके बच सकें
इसलिए वह 
हर जगह
बिना बोए, बिना सींचे 
हरित धरती कर रही है।

वो इंच भर न छोड़ती है, 
जगह खाली
जानती है, 
वनस्पति ही प्राण हैं! 
धरा के, इन प्राणियों की,
इसलिए 
पेड़ की इन फुनगियों को 
छोड़ तूं! अंकुरण 
राहों में तेरे, पैर नीचे दूब तक में, 
बेकार की उस घास में भी
युग युगों से कर रही है।

चाहती है, 
हर देश में, हर काल में, 
अनवरत नदियां बहें, 
सागर की लहरें, और ऊंचे 
आकाश छूएं
हवाओं को शुद्ध कर दें।

सघन वन, हर.. ओर हों
चहकती चिड़ियाँ उड़ें,
खुश यहां बच्चे रहें,
हम तुम रहें,
बच्चा 
ही
अपना
मानती है, हम सभी को।
इसलिए, 
बिनथके काम पर चौबीस घंटे 
लगी है, आ हम भी उसका साथ दें।

इधर हम हैं, स्वार्थरत.. है,
नटुलपन है हम 
सभी में, 
एक दूसरे से लड़ रहे है।
देख न इस प्रकृति को,
भोली है ये, माँ है ये, 
हम सभी की,
दुखित है, 
हम मानवों के कर्म से, 
वह क्या करे..! 
पहाड़ों पर घर है उसका, 
वहां ऊंचे
रोती कलपती उतरती है,
भूल कर अब, पहाड़ों को साथ ले।
रस्तों पे तेरे... तूं जगह उसकी छोड़ दे।

इतनी बड़ी यह सृष्टि! 
मिल कर एक है,
हर देश में
यह एक
है,
देश.. अपने अलग होंगे..
मात्र अपने सोच से, 
तेरा मानना है, पृथ्वी बंटी है..
सोच न मां कभी क्या बंटी है 

फूल तो हर जगह के
प्यारे ही होंगे,
घास 
और बच्चे, हर किसी के
फूल से...।

तूं बंट गया है, जाति में, धर्म में,
पंक्ति में और पंगतों में, 
सोच न! मां है 
वो,
हृदय उसका
एक है.. 
बेटे बंटे तो बंट हैं सकते 
मां... भागों में कैसे बंटे! 

कभी तो एक बार 
अपने साथ 
आ,
आ.. सोच गहरे, 
जन्म से भी और पहले,
कौन था, तेरा यहां, 
इतने बड़े ब्रह्मांड में,
अस्तित्व का तेरे ध्यान रखता..
प्रकृति की इस गोद में
कितने समय तक 
घूमता फिरता 
रहा तूं, 
मात्र बस अस्तित्व हो, 
शतक कितने ध्यान रखा इस
प्रकृति ने, अरे तेरा
शर्म कर रे...। 

और तुझको देह देकर 
मानवी.. यह
बुद्धि देकर सात्विक वह 
बाल शिशु का रूप देकर
शक्ति दे कर हाथ में
नीचे उतारा, 
दूध देकर, 
स्तनो में, मां के तेरे..
और करुणा उसे देकर बांध के
उसे बंधनों में, व्यवस्था तेरे लिए की
कभी शुक्रिया उसे बोल तो।

अकेला तूं नहीं था, अकेला तूं नहीं है,
आदि से तूं जुड़ा है, इस प्रकृति से
इस समष्टि का बेटा है तूं
बेटी है तूं..
बैठ गहरे सोच तो।

जय प्रकाश मिश्र




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