सुलझ जाएं उलझने
फव्वारा थी जब ये जिंदगी
फूटती उल्लास सी,
खिलती कली
यह फूल
थी
खोलती पर पंखुरी
संसार से इस मिल रही
नवल थी, मधुर थी, क्या यह वही थी।
मित्रों, जीवन एक ऐसा खेल, अपने रेशों में सबको उलझा लेता है, और उसके बाद क्या इसी को पढ़ें आगे।
सुलझ जाएं उलझने
इस जिंदगी
की
जिंदगी बुनती रही
अपने.. लिए
फैब्रिक्स
खुद!
तैयार है अब सिमटने को
बात यह किससे कहूँ!
यह मानकर, चालाक हूँ
मैं दौड़ता ही रह गया,
हांफता
इसके सफ़र में
भूल खुद को आज तक
नजदीक हैं, छू गईं अब, पकड़ लूंगा,
हाथ से, सुखों को मैं,
भूल थी।
मरीचिकाई की दौड़ थी
मिलती वो कैसे!
थी,
कुछ नहीं
फिसलती रेशमी, रश्मियों की चमक थी।
जिंदगी मंजिल नहीं थी
रास्ता थी..
रास्ते के सुख दुखों में ही छुपी थी,
बुनी थी, यह हर पगों पर
हर पलों में,
समय की उस रेख में
इन्द्रधनुषी, सप्तरंगी, मायाविनी
हर पोर में, क्षण के सजी थी,
एक सी
खर्च होती पहले ही दिन से..
घटती रही, और बीत गी...।
जिंदगी यह खोज थी, ओस सी,
आस थी, मदहोश थी
कुछ हल हुई, कुछ उड़ गई
कुछ लुट गई,
थोड़ी सी मेरे पास है यह बच रही।
जय प्रकाश मिश्र
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