मानुषी हो, प्रेम हो तुम।
मित्रों जीवन दो पाटों (पुरुष और प्रकृति) से ही बनता है, दोनों दूर, किनारों पर, लेकिन नदी एक, जिसमें प्रेम का विशुद्ध जल बहता है, नारी पुरुष के बीच। इसी पर ये पंक्तियां ।
कार्य, कारण सब तुम्हीं
मेरे लिए..
अलग तुम हम अब नहीं
कार्य, कारण सब तुम्हीं
मेरे लिए..
अलग तुम हम अब नहीं
एक दूसरे से,
पर प्रिये! यह देखना..
बढ़ती हवा के दबाओं को, रोकना..
फट न जाए,
रंगीन गुब्बारा कहीं ये, ख्वाब का।
जिंदगी है, बदलती है,
समय के संग
रंग
भरती
हर कदम संग,
झूमती.. है, बहती.. नदी है
ढलानों को खोजती है मोड पर,
अंधी है ये, बहते हुए
इसे रोकना,
बह न जाए सुंदर
खतोना अपना कहीं ये प्रीति का।।
स्वर्ण का एक जाल है
फैला हुआ इस
सृष्टि भर
में,
मोह लेता हर किसी को
तुम सजग रहना, दृष्टि भ्रम से
चमक है वो, कुछ नहीं है, लोलता है
पर खींच लेता, सिद्धजन के मनों को...।
तुम रोक रखना, चाहना पर
बह न जाना धार में
पकड़े रहना
हाथ
मेरा तुफानो के दौर में...
कार्य, कारण सब तुम्हीं मेरे लिए
अलग हम तुम अब नहीं
एक दूसरे से।
मैं जानता हूँ स्वर्ण! हो तुम
तृप्त हो तुम, पूर्ण हो तुम
सहज हो,
सुखद इतनी, इस लिए तुम।
चमक! तुममें,
ज्योति! तुममें तनिक न है
यह रश्मियों की, पड़ रही हर दृष्टि की
अस्वीकार्यता है, बह रही है
लोलता बन
हृदय
उनके झर रही..है।
दोष तुममें, एक नहीं है,
पर सच कहूं, एक सत्य.. है
पूछ लेना पारखी से
निर्दोष माणिक!
बिन फ्लाज!
के,
आज तक संभव नहीं है।
इस लिए
तो कह रहा हूँ
मेरे लिए तुम मानुषी हो, प्रेम हो..!
पर प्रिये! यह देखना..
बढ़ती हवा के दबाओं को, रोकना..
फट न जाए,
रंगीन गुब्बारा कहीं ये, ख्वाब का।
जिंदगी है, बदलती है,
समय के संग
रंग
भरती
हर कदम संग,
झूमती.. है, बहती.. नदी है
ढलानों को खोजती है मोड पर,
अंधी है ये, बहते हुए
इसे रोकना,
बह न जाए सुंदर
खतोना अपना कहीं ये प्रीति का।।
स्वर्ण का एक जाल है
फैला हुआ इस
सृष्टि भर
में,
मोह लेता हर किसी को
तुम सजग रहना, दृष्टि भ्रम से
चमक है वो, कुछ नहीं है, लोलता है
पर खींच लेता, सिद्धजन के मनों को...।
तुम रोक रखना, चाहना पर
बह न जाना धार में
पकड़े रहना
हाथ
मेरा तुफानो के दौर में...
कार्य, कारण सब तुम्हीं मेरे लिए
अलग हम तुम अब नहीं
एक दूसरे से।
मैं जानता हूँ स्वर्ण! हो तुम
तृप्त हो तुम, पूर्ण हो तुम
सहज हो,
सुखद इतनी, इस लिए तुम।
चमक! तुममें,
ज्योति! तुममें तनिक न है
यह रश्मियों की, पड़ रही हर दृष्टि की
अस्वीकार्यता है, बह रही है
लोलता बन
हृदय
उनके झर रही..है।
दोष तुममें, एक नहीं है,
पर सच कहूं, एक सत्य.. है
पूछ लेना पारखी से
निर्दोष माणिक!
बिन फ्लाज!
के,
आज तक संभव नहीं है।
इस लिए
तो कह रहा हूँ
मेरे लिए तुम मानुषी हो, प्रेम हो..!
जय प्रकाश मिश्र
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