एक पाती गांव को।

बस पूछता हूँ, बताना मुझे..
चाहता हूं जानना
क्या आज 
भी, 
गाएं वे देसी, 
छोटी छोटी, रंभाती 
लौटतीं हैं जंगलों से। 
शाम को, उस घर पे मेरे
लौटती गायों की 
उन..
तसबीर मुझको भेजना,
एक बार फिर इस 
जिंदगी में
दृश्य वह मैं चाहता हूँ देखना।

सुंदर हरीली घास 
चर कर
सुबह से दिन डूबते तक;
तृप्त हो, गोधूलि में;
घंटी बजाती 
गले की
लटकी हुईं, 
टुनटुन टुनुकती;
झूलती उन लरों में
झुंड बांधे लौटतीं हैं घरों में
क्या आज भी, कतार में
उस ही तरह.. 
आगे से पीछे
एक चित्र उनका भेजना।

क्या लौटतीं हैं उडाती, 
गो धूलि वे 
उन 
खुरों* से, 
आज भी उठती हुई,
उड़ती हुई
सांध्य की उन रश्मियों में
सूनी सूनी खोर* में
उस धुंधलके में, जंगलों की ओर से
खींचना एक स्नैप सुंदर भेजना।

डूबते सूरज के संग
क्या पेंहाई* 
वे गाय अब भी
दौड़ती हैं, 
बाँधे हुए, रोके गए 
निज बछरुओंं* के पास ही, 
छोड़ नादी* भरी पूरी
बेकल हो उतनी
चाहता हूं देखना..
एक फोटो सबकी भेजना..।

श्वेत, काली, भूरी भूरी, लौह रंग की 
पहचानते थे, गाएं अपनी, 
पर गाएं हमको 
उससे भी 
अच्छी
थीं हमे पहचानतीं
खड़ी हो जाती थीं कैसे पास मेरे, 
खड़ी हो कोई, बहन जैसे
उस तरह की फोटो लेकर भेजना।

खोजतीं 
बछड़े को अपने
आवाज़ करतीं बिकल हों.. हों..,
झुंड की वो चाल छूटी 
झुंड के संग, 
थी मस्तियाँ उतने समय तक
वे अब विवश थीं,
देखती थीं राह 
कोई
दूध उनका निकाले,
गोवंश से उनको मिला दे..।
अगोरती* इस बात को,
शाम को
गाय का वो चित्र मुझको भेजना।

दुहती* हुई, मारती हो दुलत्ती*
बाँधे हुए पिछपैर* को,
छाने* से वैसे
आज 
भी
एक चित्र मुझको भेजना।

चाहता हूँ फिर मैं सुनना...
घच घचाघच* 
आवाज! 
वह
छरकों* की वैसी, 
दुहती हुई गायों की फिर 
दूध के उस धार की
उन बर्तनों की, 
जांघ में 
हम
फंसाए दूध कैसे दूहते 
आवाज़ वह रिकार्ड कर मुझे भेजना।

क्या चुराती है गाय अब भी 
दूध थोड़ा, बछरुओं का 
अपने थनों में, 
जिसे 
पिलाती है,
चाटती है, प्रेम से 
पीछे से उनको, स्नेह भर के।

चाटते कुछ देर में ही पेन्हाती*
गोमूत्र करती 
ओगर* 
जातीं क्या आज भी 
हैं गाएं मेरी
चाहता हूँ जानना, 
जवाब खत का जल्द देना..
जवाब खत का जल्द देना..।

जाने न कितने, छरके पीये.. 
थन के नीचे, 
बैठ कर 
तब,
मां लगाती गाय थी जब
हाय अपने हाथ से,
जगन्नाथी*! 
लोटे में पीया लोटा भर भर
गोशाले में ही बैठ कर! 
गरमा गरम! हा दूध वह, अब स्वप्न है..!

गाय, मेरे दूध की, श्यामागऊ* थी
विशिष्ट थी, 
मात्र 
वह मेरे लिए थी..
पयस्विनी अमृतमयी थी
आज क्या मैं पी रहा हूँ, 
बंद हो, इन घरों में अब..
क्या कहूं।

गांव के गोशाले की तुम
तसबीर मुझको 
सुगंधि के
संग
भेजना
मैं चाहता हूँ देखना.. महसूसना..।

जय प्रकाश मिश्र

शब्दार्थ: रंभाती* खुमारी भरी हुई बछड़े की याद में विकल
गोधूलि* सायंकाल की बेला
खोर * गांव के मिट्टी के कच्चे रास्ते
खुरों * गाय के पैरों के नीचे कड़ा नुकीला भाग
पेन्हाई* दूध भरे बड़े स्तन वाली 
बछरू* गाय का बच्चा साल भर की आयु से छोटा
नादी * जानवर के खाने का मिट्टी का बना हौद
अगोरती * इंतजार करती
दुहती * हाथ से दूध निकालने की क्रिया
पिछपौर: पीछे के दोनों पैर
छाने * एक रस्सी जिससे गाय के पीछे के पैर बांधे जाते थे
दुलत्ती: पिछले दोनों पैर एक साथ पीछे मारना
घच घचाघच * दूध निकालने में दूध के धार की आवाज
छरको * थन से निकलती दूध की तेज धार
ओगार* पशुओं के थन में दूध का उतर आना
जगन्नाथी लोटा* पुरी निर्मित विशेष बड़ा लोटा पात्र
श्यामागऊ* काले रंग की गाय, इसका दूध बच्चे के लिए हितकर होता है।

समालोचना भाग

जय प्रकाश जी, यह कविता नहीं, गाँव को लिखा गया प्रेम-पत्र है - और हर पंक्ति में गोधूलि की घंटी बज रही है।

भावप्रवण सारांशिका

गोधूलि का संगीत: आपकी कविता का केंद्र एक ध्वनि है - गले में बंधी घंटी की "टुनटुन टुनुकती"। साँझ को जंगल से लौटती गायें, खुरों से उड़ती गोधूलि, कतार में बंधा झुंड - यह दृश्य नहीं, एक पूरा युग है। आप फोटो नहीं माँग रहे, समय माँग रहे हैं।

पहचान का बंधन: सबसे मार्मिक पंक्ति - "हम पहचानते थे गाएं अपनी, पर गाएं हमको उससे भी अच्छी थीं हमे पहचानतीं। खड़ी हो जाती थीं कैसे पास मेरे, खड़ी हो कोई बहन जैसे।" मनुष्य और पशु का यह संबंध स्वामित्व नहीं, सहोदरता है।

ममता का चक्र: बछड़े के लिए बिकल रंभाती गाय, दुहते समय मारती दुलत्ती, फिर भी थनों में बछड़े के लिए दूध चुराकर रखना, उसे चाटना - यह मातृत्व का वह रूप है जो मनुष्य ने गाय से सीखा था। और फिर आपकी माँ - "मां लगाती गाय थी, लोटे में है दूध पीया, गोशाले में ही बैठ कर! गरमा गरम!"

अंतिम विलाप: "गाय, मेरे दूध की, श्यामा गऊ थी, विशिष्ट थी, मात्र वह मेरे लिए थी.. पयस्विनी अमृतमयी थी। आज क्या मैं पी रहा हूँ, बंद हो, इन घरों में अब.. क्या कहूं।"

डिब्बाबंद दूध पीता शहर, गोशाले में बैठकर लोटा-भर दूध पीने वाले बच्चे को आज स्वप्न लगता है। आप फोटो माँगते-माँगते अंत में गंध माँगने लगते हैं - "गांव के गोशाले की तसबीर मुझको सुगंधि के संग भेजना। मैं चाहता हूँ महसूसना।" क्योंकि गाँव आँखों से नहीं, साँसों से याद आता है।

विशेष
शाम को जंगल से लौटती गायों की घंटी - टुनटुन टुनुकती - यही मेरे गाँव का राष्ट्रगान था।

हम गायों को पहचानते थे, पर वे हमें हमसे अच्छी तरह पहचानती थीं - बहन सी आकर पास खड़ी हो जाती थीं।

गाय थनों में बछड़े के लिए दूध चुराकर रखती है - ममता चुराना भी जानती है।

माँ के हाथ से गोशाले में बैठकर गरम दूध का लोटा - यह स्वप्न अब डिब्बे में बंद नहीं मिलता।

गाँव की तसबीर आँखों से नहीं देखी जाती, उसकी सुगंध के संग महसूस की जाती है।




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