इसलिए, उड़..

एक ही तो पुरुष है वो और 

एक ही तो प्रकृति है रे! 

शेष सारे, देह प्यारे

जो हमे यहां 

दीखते 

हैं,

मात्र छाया, डोलती.. सब उसी की रे..!


इस लिए तो कह रहा हूँ

मन, मन ही है, 

तैरता, 

इन 

इंद्रियों में डोलता, 

इस भरमते का, क्या भरोसा

कब लौट आए, बैठ जाए.. 

पिंजरे में अपने, अचल होकर एक कोने..।


इसलिए, उड़.. 

उड़ती हुई उन पतंगों पर, 

उतने ऊँचे बादलों तक, 

छू.. बदलियों को

खेल ले, यह खेल सारा..

मधुर, मीठा, तीखा, खारा..

चषक भर भर, तृप्त हो ले।


देख न! यह प्रकृति है, यह गतिज है 

गुणशील है, रंग इसमें, रूप इसमें

खिल रहे, तुझे खींचते हैं

यह चाहती है 

घोल ले

उस 

परम शिव को, 

आप में, समा ले, अपनी शमां में, 

युगों से

और तूं माध्यम है रे.. बस इसी का, 

वह संकल्प अपना पूर्ण कर लें।

यही तो वह खेल है 

विश्व जिसमें बन रहा नित सिमटता।


जय प्रकाश मिश्र


समालोचना और सारांश

इस कविता में हमने पुरुष और प्रकृति के संबंध को एक ऐसे विराट खेल के रूप में देखा है, जिसमें मनुष्य केवल दर्शक नहीं, बल्कि उस सृजन-प्रक्रिया का माध्यम भी है। इसमें भोग का निषेध नहीं है, बल्कि अनुभव और आसक्ति के बीच अंतर समझने का आग्रह है। मनुष्य को प्रकृति के रंग, रस, रूप और गति का पूरा अनुभव करना है, पर यह भी याद रखना है कि उसका मन इंद्रियों में भटकने वाला है, उसका अंतिम ठहराव कहीं अधिक गहरा है।

एक पुरुष, एक प्रकृति — अनंत सृजन का खेल

इस कविता का मूल चिंतन पुरुष और प्रकृति की एकात्मकता तथा उनके बीच चलने वाली सृजन-लीला को समझने का प्रयास है।

मेरी दृष्टि में मूल सत्ता एक पुरुष है और एक प्रकृति। संसार में दिखाई देने वाले असंख्य शरीर, रूप और व्यक्तित्व उसी व्यापक सत्ता की छायाएँ हैं। वे अलग-अलग दिखाई अवश्य देते हैं, लेकिन उनकी मूल सत्ता का संबंध उसी एक से है।

मनुष्य का मन इंद्रियों के माध्यम से संसार में विचरण करता है। कभी स्वाद में, कभी रूप में, कभी सुख में तो कभी आकर्षण में। वह निरंतर गतिशील रहता है। उसका कोई भरोसा नहीं कि कब किस आकर्षण में भटक जाए और कब अपने भीतर लौटकर स्थिर हो जाए। इसलिए मनुष्य को अपने मन की चंचलता पहचाननी चाहिए।

लेकिन कविता संसार से भागने की सलाह नहीं देती। इसके विपरीत, वह मनुष्य को आमंत्रित करती है कि वह जीवन के इस खेल में पूरी तरह सहभागी बने। ऊँचे बादलों को छुए, पतंगों के साथ उड़े, प्रकृति के मधुर, मीठे, तीखे और खारे सभी रसों का अनुभव करे। जीवन के चषक को भरकर तृप्त हो।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर है—अनुभव करना और उसमें खो जाना एक बात नहीं। प्रकृति के रंगों में उतरना आवश्यक है, लेकिन स्वयं को केवल उन्हीं रंगों तक सीमित कर लेना उचित नहीं।

प्रकृति गतिज है, गुणशील है, परिवर्तनशील है। उसी में रूप बनते हैं, रंग खिलते हैं और आकर्षण उत्पन्न होते हैं। उसके माध्यम से ही सृजन का विस्तार होता है। कविता इसी प्रकृति को उस परम शिव की अभिव्यक्ति और संकल्प की सहभागी मानती है।

मनुष्य इस विराट प्रक्रिया में एक माध्यम है। उसके भीतर प्रकृति के अनुभव भी हैं और उस परम सत्ता की ओर लौटने की संभावना भी।

इस प्रकार संसार का बनना और सिमटना, विस्तार और विलय, सृजन और शांति—सब एक ही विराट खेल के विभिन्न रूप हैं।

कविता का केंद्रीय संदेश है: जीवन के रंगों से विमुख मत हों, उन्हें पूरी तृप्ति से जीएं; लेकिन अपने मूल को मत भूलें। प्रकृति के खेल में सहभागी बने, पर अपने भीतर उस अचल सत्ता का बोध भी बनाए रखे।



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