पास आओ, मौन बैठो।
मित्रों, जीवन में फैले शब्दों के ताने बाने पर बुनी, कुछ लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ, आपको अच्छी लगें यह चाहना है।
शब्द! हैं? सुंदर! ही होंगे..
एक तरफ, रख दो,
साथी.. हो मेरे..
पास आओ,
मौन बैठो।
क्या..
करूंगा..?
भर.. चुका हूँ! जानता.. हूँ!
कुछ नहीं, सस्ता.. है,
इनसे,
शब्द! हैं, सुंदर! ही होंगे..
एक तरफ, रख दो।
फूल.. से,
हंसते.. हुए.., ये शब्द! तेरे
निर्झरी! झरती.. हो जैसे..
मुँह.. से तेरे.. प्रिय,।।।
निकलते..
बिन महक.., बिन परागों के
आत्मा स्पर्श के..!
बाहरी.... मन की सतह से
क्या.. करूंगा?
अर्थ इनके घुल गए हैं, आप में
शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे..
एक तरफ, रख दो।
तुम! कुछ कहो, यह झांकता..! है,
सत्य..! है, मरता..! नहीं है,
झलकता है,
तली
में..,
छुपता नहीं है;
एक नमी..
होती
है..
दिलों.. में,
लिपट.. आती, अक्षरों.. में..
शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे..
एक तरफ, रख दो।
चरमराहट..! डालियों की,
सुनना... कभी
जंगलों. में..
रगड़ भी
अंतरों
की..
शब्द.. है,
निकलती है, मूक! से..
लाए हो तुम भी
शब्द.. कुछ!
जाने न कैसे..? मरे से..!
पर ब्रह्म हैं, वे शब्द! हैं,
सुंदर! ही होंगे..
एक तरफ, रख दो।
विश्व..! तो
यह...
मौन! ही है,
पर नाद है, अंदर कहीं..
सुनना कभी..!
गगरियों
में...!
मुंह नहीं है, हर जगह है,
बोलती है, नदी
बहती...,
कुल कुल कुलाती,
बुलाती... है
रात की निस्तब्धता! में..,
शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे..
एक तरफ, रख दो।
मुंह नहीं है, प्रकृति में?
मुंह फाड़ है..!
दहाड़ सुनना, बादलों की गरजती!
दुबक! जाना घरों में..
शब्द! तेरे, हृदय के संगम नहीं हैं
बनावटी हैं, मूल न! हैं
मूल हैं, आज भी जिंदा
बजाते बांसुरी...
पहाड़ की उन सुरंगों में, छिद्र में...
सागरों की गर्जना में,
अस्तित्व हैं वे, शब्द हैं, इस प्रकृति के...
शब्द! हैं, सुंदर! भी होंगे..
एक तरफ, रख दो।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment