कोई देखता है, जब भी मुझको
मित्रों, समाज में पति पत्नी अटूट संबंध, पर आज सच, विकट स्थिति है बराबरी का दर्जा और सम्मान हम अपने साथी को नहीं देते उसे अपनी इच्छा में बाँधते हैं। इसी विषय पर यह लाइने आंशिक मनोविज्ञान भी इसमें मिलेगा आप पढ़ें, आनंद पाएं।
उसने कहा, बिंदास हूँ मैं,
क्या करूँ, इसके लिए,
जाऊं कहां?
नज़रें नहीं, मुझे छोड़तीं हैं,
किसी कोने;
तुम भी तो प्रिय! कभी सोचना,
उनमें से ही तो एक थे,
मुझे, चुन लिए,
आज हो अपने लिए।
अब क्या हुआ? जलते हो तुम!
राख हो जाते हो पल में,
कोई देखता है,
जब.. भी
मुझको
प्रेम
से
कनखियों में।
पर.. देखती हूँ,
खुश हो होते,
भांपती
हूँ,
चहकती चिड़ियों में कैसे?
आज भी तुम,
है, कसम!
तुमको
मुझे बराबरी का, हक तो दो।
क्या चाहते हो, अंधेरों में,
बंद खिड़की,
रोशनी
बिन!
बिन हवा.. के
झूमते, झोंकों से छुप के,
खुश रख सकोगे, कभी मुझको।
संभव नहीं, निराशा में,
फूल.. आएंगे नहीं,
सौंदर्य के
वे
खिलखिलाते,
हंसते हुए, महक के
यह याद रखना, इन डालियों पर,
तरस जाओगे रसों को, जिंदगी में।
मुरझ जाएगा ये पौधा,
धूप बिन, हवा के
बिन
एक दिन, प्रिय अंधेरों में।
मुखर थे हम,
याद कर,
बात कर कर,
मुस्कुराते.., होठ में तब!
हंसोढ थे, जब मित्र! थे
डर नहीं था, किसी का
स्वतंत्र थे हम,
किस थे करते, किस प्यार से
सम्मान से हम।
आज क्या है, डर लगा है,
अविश्वास क्यों है,
सोच न,
अरे क्यों है ये सब..!
अधिकार! की सब बात है,
उससे बढ़ के, स्वार्थ है
मूल में,
है डर छुपा, उर में तेरे..
मेरे प्रति तुझमे भरा
प्रिय..
देखना, घृण्य अविश्वास है।
प्रेम पनपेगा कहां से
और कैसे?
तेरे मेरे बीच में, अब सोच तो!
चुप रहा मैं, सुन रहा था
बात सारी, गुन रहा था,
बैठे बैठे..।
बहुत धीमे, हाथ पकड़ा
और चूमा स्नेह से
फुसफुसाया, रूंधे..
गले,
गुलाबी उन भावना की रज्जुओं में
समर्पण कर हृदय तुमको
दे दिया था, सदा को
और तुमने,
बेड़ियों
में
बांध डाला है, मुझे
कभी सोचना,
मां पिता भाई बहन से दूर करके,
किस तरह! समाज से
सोचना तुम खुद प्रिये..
सोचना तुम खुद प्रिये..!
एक सामंजस्य ही यह जिंदगी है
आ मिले हम प्यार से,
कुछ तुमको दें, कुछ तुमसे लें
सम्मान दें एक दूसरे को,
बराबरी हम हर तरह दें,
मिठास मिल जुल बांट लें।
जय प्रकाश मिश्र
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