स्वरूप: तव निरंजना..
मित्रों, मानव मनोविज्ञान पर एक छोटी सी प्रफुल्लिका प्रेषित है, यह लगभग सभी जीवनों को स्पर्श करती ही है।
चाहत थी मन में, सच है ये,
मैं, फिदा थी,
पर,
कहूं कैसे? बात
वो,
लाज थी,
किशोर मन की विवशता,
क्षमता मेरी, मैं कह सकूं,
बात अपनी,
खुल के तुमसे, बहुत कम थी..।
इस लिए,
शर्म का एक आवरण,
लाली लिए, मुख बदन पर
ऊपर से डाला,
और मैं,
फिर, सामने थी।
डर समाया था हृदय में,
तूं कहीं मुझे, ना न! कह दे,
क्या करूंगी?
टूट जाऊंगी
मैं, चुप
घुप
मन के अंधेरे,
बिना तोड़े
अंदर कहीं से,
सूख जाऊंगी, लता सी,
मुरझ जाऊँगी, कली मैं बिन खिले।
यह सोच के, अंदर
मुड़ी मैं, अंतरों में
और इस लिए, आज तक अंकुर
संजोए जी रही हूँ!
आस में...
इस उम्र में भी,
जब तुम्हे मैं देखती हूँ,
लाल हो जाती, कही से
शर्म की, चादर मैं ओढ़े
बहुत खुश हूं।
अब चाहती हूँ खुल के कह दूं,
तव स्वरूप निरंजना
यह तूं ही था हे प्रिय
मेरा आदि साथी,
शुरू से वो निरंजना।।।
पटाक्षेप
संसार की, बाहें हैं कितनी?
और कैसी, सबलतम!
मैं, बीच उनके
कितना छोटा
क्षुद्र
एकल जीव,
उनसे खेलता हूँ,
खेलता हो, बाल शिशु कोई,
पकड़ता हो चांद को
उछलता, अंजान बिल्कुल
हाथों से अपने।
दर्प फिर भी, भरा मुझमें
देख न,
किस बात का,
बात मुझको पता अबतक
एक न है, प्राथमिक!
मैं, कौन हूँ?
चुप हूँ सुनकर, प्रश्न यह
और रॉधता हूँ, द्रोह करता सभी से।
जय प्रकाश मिश्र
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