जीवन भी क्या है!

मित्रों जीवन की तहों के भीतर जीवन है इसी पर ये पंक्तियां आप को।

जीवन भी क्या है!
समय का एक क्षेत्रफल? 
हाथ तेरे, पास अपने,
कर तूं गुजरे.. कुछ भी इसमें 
सबसे बडा, कुछ महत्तर..।

जीवन तेरा, दो विंदु है क्या?
बीच में कोई रेस है क्या? 
क्या है जो यह 
दोलता,
पेंडुलम! सोच न इसको कभी, 
तूं! शांति से कभी बैठ कर।

लक्ष्य इसका, परिणाम इसका
और तूं.. किस पर तुलेगा? 
तराजू.. और बाट! 
नित है,
देखा नहीं क्या रुपए के मूल्य से
बदलते जेनरेशनो में..
किस तरह, 
बद 
से... बदतर।

देखा कभी है ध्यान से, 
अपने को प्यारे
कहां है तूं, आज...
था कहां? कल!

छोड़ चिंता, 
आ मेरे तूं साथ आ..
आज जी.., 
इस समय ही
जिंदगी का.. यही पल! 

महल ही न, चाहिए, 
खुशियों भरा, 
तुझे... 
अतीव सुंदर!
ख्वाब रखेगा मधुर..तर! 
स्वप्न है, इसे स्वप्न में रख..
साकार कर मत..।

सुखद है,
चाह है 
यह मात्र जब तक!
क्या करेगा, उसमें रहकर, 
जीवन नहीं है, आज उनमें 
मान मेरी
फूलती है, सांस उनमें 
देख ले कभी जा के भीतर।

अनुभूतियां और भाव के संग भावना!
जड़ है होती, चुनीं जातीं 
हर महल में..
रखते ही प्रिय, नींव का वह  
पहला पत्थर!
जीवन भी क्या है!
समय का एक क्षेत्रफल। 

पटाक्षेप:

समय के इस प्लाट में,
जिंदगी के स्लॉट में
महल ही तुझे 
चाहिए 
न!

आ.. 
कल्पना का.. बनाता हूँ!
उससे भी सुंदर
सजीला 
तुम्हे 
खुश रखेगा,
जिंदगी भर, जिंदगी भर..!

जय प्रकाश मिश्र
क्या इसे और आगे बढ़ाया जाय?
या यहीं इति कर दूं।

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