भूमि पुत्री जानकी।

मित्रों, श्रीसीताजी प्रभुराम को उनका यथेष्ट दिलाने के लिए जीवन पर्यंत कष्ट और दुख में रहीं, उन पर यह चंद लाइने आपको सुपुर्द करता हूँ।

एक बालिका…

सुंदर सलोनी.. जनक की थीं,

"जानकी…" 

पालित! मगर वह मात्र.. 

उनसे,

दुहिता… तो थी.. वह 

राज्य के उस 

भूमि की।

जो पालती है, प्रजा को 

निज कोख.. से

कोष.. भर भर अन्न की।


राजा जनक.. के राज्य से भी 

बृहत्तर…

भूमि.. के भूभाग, 

भारत…, भूमि… ऊपर, 

हां बालिका थी भूमि.. की वह

भूमि पुत्री जानकी।


सीता थीं वे, 

संतति सलोनी धरा की।

जननी है जो, इस जगत.. की

माता.. है जो, इस विश्व... की।


गुण सभी उनके निराले, 

मातृवत थे,

सौंदर्य थीं, वह.. इस प्रकृति की,

धैर्य.. थीं वह, इस धरा सी.. 

शांत.. थीं।


शब्द थे, झरने सरीखे..

मृदुल, मीठे..

एक सच कहूं! प्रियव्रत 

अनोखा धारतीं थीं,

वह बालिका थीं, भारती की।


कारण वहीं थीं, 

मुक्त हो यह धरा, दूषण 

कारकों से..

कनक मृग को मांग कर 

कारण बनी।


दुष्ट वध, 

श्रीराम जैसे कर सके

वह शक्ति पावन 

सीता ही थीं, सीता ही थीं।

इस धरा पर, 

फिर सनातन यह, रह सके

स्थापना हो सत्य की, 

धर्म की

इस 

मूल में सीता ही थीं,

इस मूल में सीता ही थी।

जय प्रकाश मिश्र

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