यात्रा थी जिंदगी मृत्यु के जाते सफर पर।

हर एक क्षण मेरी जिंदगी का

रंगीन सुंदर पृष्ठ था,

खुलता हुआ, एक एक कर, 

मेरे सामने, कोई परसता हो

मुफ़्त ही,

कुछ इस तरह,

ये जिंदगी! एक संकलन थी,

नित्य के, इन पृष्ठ की

क्रमवार मेरी उम्र बनती, वर्ष थी। 


हर एक क्षण संग, नाचता मैं बीच में..

शरीर के और आत्मा के

स्व-आत्म् का 

स्पंद 

था,

नवल पल जीता हुआ

दिनों... में 

जुड़ता

रहा। 

छप छप निकलती सजीले 

अखबार सी...

ये 

जिंदगी

छपती निकलती द्रुत गति से 

प्रिंट हो, हर एक दिन, स्मृति में जमा होती 

अनंत प्रिय, क्रमवार हैं रखी हुई 

जब जिसे चाहूँ देख लूं

मैं आज भी

वह 

जादुई प्रेस कहां था.. 

इस देह में, संसार में, जी नहीं, 

काल का रहस्य ही तो यही था

अद्भुत था प्रिय, पर सच यही था।


हर एक क्षण के अलग उस अखबार में 

अनंतों संभावना के, पृष्ठ थे,

फर फरर करते, जिसे चाहूँ

उसे खोलूं, 

सभी में अलग ही 

छपता हुआ संसार.. था

संग संग सिले थे

खाने बने थे, 

असंख्य प्रिय कालम लिखे थे,

किताबों का जिक्र था,

जिधर देखूं झांकता कोई 

दूसरा संसार था।


एक पुस्तकालय मेरा दिन 

हर रोज था

करोड़ों अखबार का, ऐतबार का

आज भी क्रमवार वैसे 

बिन हिले 

स्मृति में यथावत रखा हुआ।


अब सामने कुछ पृष्ठ हैं

छपने को हैं

क्या आखिरी हैं...

किताब क्या इन दिनों की अब बंद होगी

कुछ नहीं, 

अरे यह होना ही था..

पर पूछ्ता हूँ एक बात तुमसे..

आखिरी उस पल के आगे...

अखबार में.. उन

अब क्या छपा है, कोई आइडिया है।


पुरानी पीली पड़ी, किताबों में थी छपी

सौ साल पहले 

वो झुर्रियों में मुकुर सी

मुझे देखती 

प्यार से कोई आंख! 

मुझको झरोखों से 

ताकती है क्या वहां?

पटाक्षेप: 

अनवरत! आज तक 

जन्म से ले मृत्यु तक,

मैं खुद उसी प्रिय, 

काल पट पर छप रहा था,

कुछ नहीं था...

जिन्दगी का राज यारा

कितनी जल्दी देख कर हैरान था

एक बीते सूक्ष्म क्षण का आयाम सारा

हर तरह से भिन्न था।


न मिला चेहरा कभी वो जिंदगी भर..

ढूंढता ही रह गया,

उम्र बीती और मैं बूढ़ा हुआ

देखने को दुबारा 

इस जिंदगी में रूप वह

सत्य है यह 

जो भी मिला एक दूसरे से अलग था।


करोड़ों पल जिंदगी थी, 

करोड़ो संभावना थी

चुन सका, बस कुछ मैं उनसे,

शेष पुस्तक बंद कर दीं..

भाग्य कह, 

संयोग कह.. जीवन पहेली 

आज भी है, मृत्यु के क्षण 

ठीक वैसी

जन्म के पहले जहां थी। 


कितना जीता और दिन मैं 

अनंतों का खेल है यह,

छोड़ दे,

दकियानुसी उत्साह भर 

और जी ले जिंदगी।

पोत दे हर रंग उस पर, 

पोत ले हर रंग खुद पर

बस यात्रा थी जिंदगी

मृत्यु के जाते सफर पर।

जय प्रकाश मिश्र


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