क्या छूटता है मुझसे ये..!

मित्रों कोई भी हो, एक उत्कंठा जीवन पर्यंत बनी रहती है मैं पीछे तो नहीं हो गया पिछड़ तो नहीं रहा हूँ। वह क्या है जो हम पकड़ना चाहते हैं, पाना चाहते हैं इसी पर ये लाइने आपके लिए।

'कुछ' क्या है..?
वो.., 
इतने.. दिनों से, 
सोचता 
हूँ!
धड़क जाता है ये दिल! 
जिसके लिए..!
बिल्कुल अचानक,  
ठक! से, देखो.
सब कुछ तो है, प्रिय..! 
पास मेरे..।
कुछ' क्या है..? वो..!

साथ... तेरे,
आज..! मुझको, 
और क्या... 'वह' चाहिए..?
और.. किसलिए? 
उचक! जाता है ये दिल!
गिरने से बचता..
संभलता..
हूँ..
धड़क! जाता..
एक पल में.. 
बेसबब, किसके लिए..?
बस पूछता हूँ, बता दे न!
कुछ' क्या है..? वो..! 

संसार में 
इस, 
क्या है वो...
जिसके लिए..?
यह मन मेरा, झटके! से 
इतने.. उछल जाता.. 
जब देखता हूँ, भागते..!
इंसान को....
दुश्वारियों में.. बिन थके..! 
'मिस' हुई... 
गोली... के जैसा, 
ऐन! मौके
'फुस' हुआ, खुद को हूं पाता...
क्या है वो... जिसके लिए!

रहस्य! कुछ..,  
लगता...
है मुझको..! है कहीं.. 
संसार में, 
जो... खोजता है
मन... मेरा, 
कुछ शेष.. है, अशेष... सा.. 
या भ्रम..! मुझे।
पूछता हूँ सभी से... 
कोई बता दो... न!
क्या है वो...?

ये अजब तृष्णा! घेर कर मुझे..
क्यों खड़ी है..?
देख... न!
उम्र.. 
के अठवें, दशक में,
क्या करूंगा..? संसार का, 
हूँ, सोचता! 
बस तभी! यह 'कसक' उठती...
'कुछ' क्या है..?
वो.., 
इतने.. दिनों से, सोचता हूँ!
धड़क जाता है ये दिल! 
जिसके लिए..!

जय प्रकाश मिश्र

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