परस दे दो,
शीर्षक: बस परस दे दो।
भागो नहीं,
बस परस दे दो,
दरस मैं कहां मांगता हूँ,
जानता हूँ! काबिल नहीं हूँ,
बहुत छोटा,
मैं तो खुद को, मानता हूँ।
पर लगा हूँ, पीछे तेरे,
मैं हमेशा से
तूं..
जानता है,
क्या इसलिए ही भागता है?
कोई नहीं, तूं बड़ा है,
सब जानता है,
मैं मर्त्य प्राणी धरा का,
मिट्टी का पुतला
मात्र!
मुझको मानता है।
इशारा मैं समझ लूंगा,
आदमी हूँ,
मस्क युग का,
इशारा तो कोई कर दे..
कभी परस दे दे।
कुछ नहीं मैं मांगता हूँ, सुनो मेरी
कर्म मेरे, मात्र! तुम,
द्रव्य की
इन
प्राप्तियों से अलग कर दे..
दरस मैं कहां मांगता हूँ, परस दे दे।
निछावर गृहस्थ जीवन!
वादा है ये, खुशी से
सार्वभौमिक
उपकार
का
व्रत! पालन करूं
शक्ति इसकी मुझे दे दे।
सच कह रहा हूँ,
झूठ मैं तुमसे क्यों बोलूँ...!
आज ही से छोड़ दूंगा,
प्राणियों का अमिष भोजन!
सृष्टि से विद्वेष मेरा,
मेरे अंतरों
से
नष्ट कर दे..!
मैं प्रेम पाऊं सभी से,
प्रेम बांटूं सभी में,
बस बात इतनी सी ही कर दे,
कभी परस दे दे।
जय प्रकाश मिश्र
"मित्रों को मोती" के क्रम में
मोती - 1
दरस आँखों को होता है, आँखें धोखा खा जाती हैं,
परस आत्मा को होता है, वही ठहर जाता है।
मोती - 2
ईश्वर भागता नहीं, हम ही आँखें बंद कर के दौड़ते हैं,
ठहर कर देखो, वही तुम्हारे पीछे खड़ा है।
मोती - 3
मिट्टी का पुतला होना शाप नहीं है,
इसी मिट्टी में तो वह बीज फूटता है, जिसे वो खुद बोता है।
मोती - 4
मस्क युग में चेहरा नहीं, मन ढका है,
इशारा उसी को समझ आएगा, जो मन का मास्क उतारेगा।
मोती - 5
गृहस्थ छोड़ना त्याग नहीं, निछावर करना त्याग है,
छोड़ने में अहंकार है, निछावर में प्रेम।
मोती - 6
अमिष भोजन पेट का नहीं, मन का होता है,
जब मन में किसी के लिए विद्वेष न रहे, समझो व्रत पूरा हुआ।
मोती - 7
प्रेम पाना वरदान नहीं, प्रेम बाँट पाना वरदान है,
पहला भिखारी बनाता है, दूसरा भंडारी।
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