ये, हिचक क्यों है?
मित्रों हम जो कुछ भी करते या सोचते हैं उसका एक असर हमारे अन्तस पर पड़ता रहता है, यदि यह क्षुद्र होगा तो पवित्र आत्मा या, निष्पाप व्यक्तित्व के सामने जाकर हम झुक जाएंगे और भीतर एक हीनता आपको घेर लेगी इसी पर ये लाइने आप सदा अच्छा करे व सोचे इसलिए।
आज, मैं.. क्यों! दूर.. उससे,
इस.. तरह हूँ!
फासला?
हां,
फासला! ही बढ़.. गया है,
मेरे, समझ से,
उम्र..
में।
इस.. तरह हूँ!
फासला?
हां,
फासला! ही बढ़.. गया है,
मेरे, समझ से,
उम्र..
में।
एक नन्हा..
मेमना!
मैं,
उस, समय.. था,
और वह! नन्हीं परी थी,
बावली...! सी.... महल में।
किस तरह हम खेलते थे!
बेलौस.. होके!
गले.. लगते!
लिपटते
थे!
कंधों पे..
चढ़.. कर घूमते थे,
साथ.. में,
उन नौकरों.. के!
क्या?
तब.. हम, और..! थे?
ये.. आज! जो..! हैं,
वो.. नहीं थे।
क्या हुआ है? मैं.. वही हूँ!
वह..! वही है,
उम्र..
थोड़ी, बढ़.. गई है,
समझ में, अंतर... हुआ है,
सभ्यता..!
थोड़ी चढ़ गई है!
पढ़ाई!
आज की, पूरी... हुई है।
क्या?
अब, नहीं, निष्पाप! हम!
तन मन में लादे गठरियां, पाप! की हम,
ढो रहे हैं,
विश्वास भी अब खो चुका है!
आखिर ये ऐसे!
ये, हिचक क्यों है?
साफ मन!
क्या
नहीं.. है,
हम.. बात कर लें!
गले.. मिल लें,
साथ घूमे..
खुशियां! मनाएं,
उस समय सी,
बेलौस होकर, हुल्लड़ मचाएं!
बांधाएं..! कहां है?
विश्वास भी अब खो चुका है!
आखिर ये ऐसे!
ये, हिचक क्यों है?
साफ मन!
क्या
नहीं.. है,
हम.. बात कर लें!
गले.. मिल लें,
साथ घूमे..
खुशियां! मनाएं,
उस समय सी,
बेलौस होकर, हुल्लड़ मचाएं!
बांधाएं..! कहां है?
लगता है मुझको?
किसी..
देवता की मूर्ति!
अब... वह! बन गई है,
निष्कलुश!
निष्पाप! है वह,
शुद्ध! इतनी विमल...! है,
और मैं...,
हिचकता हूँ, स्पर्श! से
आज... उसके।
डर! रहा
हूँ
पापों से,
अपने किए गुनाहों से,
पूर्व.. के,
इस बीच में!
इस लिए, हिम्मत नहीं है।
अब दूर हूँ! मैं,
आत्म के विश्वास से।
पास ना
अब दूर... उससे!
हो गया हूं आप से,
सोचता
हूँ;
क्या.. है.. ये...!
सोचता
हूँ;
क्या.. है.. ये...!
बचपन!
भी,... क्या है?
बचपने की..
उम्र..! भी, क्या.. चीज है?
दुबारा मिलती नहीं...!
फिर, जिंदगी में,
लौट कर,
कुछ भी.. दो, इसके लिए।
इस बचपने में
हम..सभी
हम-उम्र.. क्यों,
हर.. उम्र के, हर... मित्र से,
मिलते हैं खुल के...
बेलौस.. होके..
बिना चिंता, लोक लज्जा
सहज हो स्वभाव में।
अहा! बहता...
बचपने का, प्रेम निर्मल!
निष्पाप! तन मन
और चितवन!
कैसे? बंधे थे,
मित्रों हम सब स्नेह में।
आदमी..!
बनने से पहले,
सभ्य..
थे हम, निश्छल थे कैसे?
सभ्यता को पहन कर असभ्य से।
सभ्यता को पहन कर असभ्य से।
तब..! बिन पढ़ें,
एक शब्द!
कितने
भले
थे... हम
विश्वास था, हमको... खुद पे
इस लिए हम सहज थे,
सरल थे,
नम्र थे, कुटिल! न थे,
निष्पाप! थे, निष्णात! न थे।
एक शब्द!
कितने
भले
थे... हम
विश्वास था, हमको... खुद पे
इस लिए हम सहज थे,
सरल थे,
नम्र थे, कुटिल! न थे,
निष्पाप! थे, निष्णात! न थे।
कुछ, भी
कहते, बात करते,
उम्मीद बांधे, एक दूसरे से
कितने खुश थे, मस्त थे।
आसान..! कितना
सभी कुछ था
सरल था
पानी के जैसा,
जीवन था बहता पवित्र रे...!
बस थोड़ा...
आगे!
बचपने.. से
कुंवारे से, ज़रा.. पहले!
उम्र के इस रास्ते पर, .
फैली हुई, दहलीज! है,
नाजुक है ये...
मानसिक! एक रोक है।
अब
तुम अलग!
हम अलग हैं, आज से
दहलीज ही यह बांटती है,
एक दिन में।
पर मन है
ये...
कब मानता है,
फिर वही सब खोजता है,
दरार है एक, दूर करती सोच से
तुम! उधर हो, आज से इस गोल से।
और फिर क्या?
औप-...
-चारिकता..!
यहीं.. से शुरू है,
मुक्त जीवन, अबाधित!
बाधित यहीं से।
क्योंकि समझ विकसित हो रही है।
समझ ही, दम घोंटती है
आखिरी तक!
क्या है
ये,
"समझ!"
"समझ!"
समझ इसको
आ, मिल, इसे हम पकड़ते हैं।
आ, मिल, इसे हम पकड़ते हैं।
क्या गुनाहों! की
कोई गठरी,
समझ
है,
चल, इसे.. हम खोलते हैं।
संसार हो, कितना बड़ा,
और,.. कुछ भी!
ज़रा सोचो,
क्या है
ये..
मूल में,
आकृति! यह है बनी,
जड़.. पदार्थों की, पंचभूती...
इसके अलावा कुछ नहीं,
सच! कुछ नहीं।
और तुम!
तुम खुद..ही सोचो,
कौन हो तुम! चेतना..! हो,
इतने बड़े! ब्रह्मांड में, फैली हुई,
एक सी, जो समझती है
राज सारा प्रकृति का।
जागृत हो तुम! सुप्त न हो,
दिव्य हो तुम!
छोड़ दो, यदि क्षुद्रता!
क्षुद्र हैं जो..,
तो..
देव हो तुम!
सत्य को यदि थाम लो,
हाथों में अपने, प्रेम बो दो
तो अन्यतम तूं, और बचपन यही है
निर्मल हो मन, निर्मल हो तन
मिल सभी फिर एक हों
आनंद हो।
जय प्रकाश मिश्र
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