विभाजन! वह है कहां ?

सभी मित्रों को चैत्र नवरात्रि की और हिंदू नववर्ष की हमारी ओर से बधाई और शुभकामनाएं। उन शक्ति के ऊपर ही ये पंक्तियां पढ़ें।

विभाजित है, विश्व यह! 
कितने.. धड़ों में...!
तरीकों.. में,
एक.. 
ही, बिचारी..
इस! जिंदगी को, खींचने में।

उपलब्धियों की दौड़ में,
यह..! 
हांफता.. है, 
दौड़ता है, भागता... है।
स्वर्ग सा..! एक लोक...! 
रक्खे.., 
जेब... में।
विभाजित.. है, 
विश्व यह! 
कितने.. धड़ों में...!

भूला... हुआ है, 
पीठ अपनी!  
भारी, 
है, 
कितनी.., 
लद..  चुकी,
उम्र भी तो, अरे! इसकी, 
देख!  कितनी.., ढल चुकी।

ढो सकेगा, 
और...? 
यह..!
संभव.. नहीं!
अब तो बस, ढो रहा! 
आदतन इच्छा बची

यह नशेड़ी... 
है, 
नशे.. की, 
इसे लत लगी...
अन्यथा, बहुत.. है, 
जी सके यह, और.. आगे, 
जिंदगी! 
पर श्राप है, 
इस...! आदमी की
प्यास! मिटती.. ही, नहीं। 

एक्, नशा! यह... जिंदगी है! 
उपलब्धियों का, और... का, 
अभी.. और, का.. 
कुछ और का! 
पूर्ण.. हो, कभी.. 
संभव नहीं! 
यह पिपासा!  है, 
जन्म से, ले मृत्यु तक, भरती नहीं।

देख न! आकार इसका? 
पांव..! 
आगे.. को, बने.. हैं!
आंख आगे.., मुंह है आगे.., 
सोच आगे..
बढ़ता.. रहा यह, 
और आगे..
पुनरावलोकन?   
समीक्षा?  
पृष्ठ
दर्शन?   खूँ... में, नहीं..! 
यह आदमी है, 
नियति ! इसकी... 
आज तक, ऐसी... रही।

विभाजन! वह.. है कहां ? 
जो काट देगा,
जिंदगी 
की
धार को,
बहती.. हुई! रस धार को 
इतने दिनों की
बस, एक क्षण में!
सोचता.. हूँ! सोच है वो..,!
बदल देगी, कोर्स को, 
किनारों को
जिंदगी 
के,
मुक्ति देगी! 
अनावश्यक! इसकी गती को! 

इस 
दौड़ में, 
कोलैप्स होते!  
देखता हूँ! फेल होते, जिंदगी को, 
न्यूज में, अखबार में,
रोज सुनते, रोज 
छपते! 
इसी पर तो, व्यथित होकर 
सोचता 
हूँ,
कौन सी वह शक्ति है! 
है, घेर लेती, 
प्रबुद्धों 
को
पटक देती, 
धरातल पर, इस तरह! 
बेलौस होके! 
सभी प्राणी बह रहे, 
एक रव! एक् पंक्ति ही तो, 
देख जग में।

उसी का तो, समय है, नवरात्र यह! 
सोच अपनी बदल ले,
भाग्य को निज
खोल दे, 
समर्पण कर दे अभी,
उपलब्धियां को 
और अपनी  जिंदगी को! 

फिर.. उठाओ,
उसी को
सब..
चढ़ा कर,
जो कुछ भी चाहो..
अर्पित हुई, प्रसाद सी, उसे मानकर
सुख चैन, जीवन में धरो। 

जिंदगी सुखमय रहेगी...
फिर जिंदगी आनंद होगी।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: मित्रों, निष्कीलन एक क्रिया है, जो मंत्र प्रभाव के लिए बताई गई है, इसमें सर्व समर्पण कर, मां को, शक्ति को, पुनः यह मानकर जीएं यह जीवन उनके हाथ है, जीवन सुखमय बन जाता है जैसे साधु और निरंजन जनों का।

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