जीवन... मैं..! बुनता, हूँ..

मित्रों, 

समिधा..!  इकठ्ठी कर रहा हूँ! 

बहुत... दिन से,,  

तरतीब से, 

हर.., 

अनुभवों को, रख रहा हूं,

ताड़ता हूँ, समय.. की,  गति.., 

उम्र में इस, अकेले ! 

और.. बैठा, 

अंतिम प्रहर की सांझ में, 

एकांत में चुप..! 

जीवनों को बुन रहा हूँ,

जीवनों को लिख रहा हूँ।

इसी पर, यह गीत आपके लिए... 

आप पढ़ें और खुश हों।

शीर्षक: जीवन...!  मैं.. बुनता, हूँ..

जीवन...! 

मैं.., बुनता.., हूँ..

अब.. तो.., 

जीवन..! मैं.., बुनता, हूँ..!

झरते... फूलों, 

खिलते... 

फूलों..

कभी! कलियों.... से.., ... 

मिलता हूँ.....!

जीवन... मैं..!  बुनता, हूँ..

जीवन!  मैं... लिखता... हूँ! 


दूर.... चिरैया! 

इतनी... 

मीठी...

इतने.. धीमे..! 

विजन.. वनों... में, 

बैठ.. अकेले

हर्षित!  

कैसे..? बोली!  बोले..

चुप! चुप! 

छुप..!. 

सुनता.... हूँ..

जीवन!  मैं..., बुनता हूँ

जीवन मैं..!. गुनता.. हूं ! 


रोज.. सबेरे.., 

और.. 

अंधेरे! 

फूल.. खिलें! 

उससे,.. भी पहले!

ओस.. पड़े, पत्तों... से, 

टप टुप! 

मलयानिल...! 

ताजी.. जब हिलकर,

रंग.. बदलते, नील... गगन में,

तारे, मद्धिम मद्धिम होते...

ऊषा... 

से....,  

मिलता..... हूँ...!

जीवन....!  मैं..., लिखता... हूँ! 

जीवन, मैं बुनता हूं! 


झोपड़ पट्टी..!  

कुछ भी बोले, उसके... 

पहले.., 

घोर.. अंधेरे! 

बूढ़ा.. खांसे, पायल.. किनके! 

पन्नी की दीवारें!  

हिल कर!  

भोर... हुई, गुपचुप ही 

कह.. दें..

बर्तन बोलें.., कूकर बोले...! 

मैं, उठता... हूँ! 

बच्चों के, भूखे.. पेटों की, 

आवाज़ें...., 

पहली.. सुनता हूँ!

बैठा.. मैं,  जीवन बुनता हूँ।

अब तो बस जीवन लिखता हूँ। 


गाय रंभाए, बछरू कूदें..!

छान! लगाते, 

पिछले पग..! में, 

गैया.. मार, दुलत्ती.. हुलसे!  

दुधहारा की बल्टी बोले!

उसके पहले, 

भरी... 

चांदनी!  तिसरे.. पहरे! 

टीस... उठाती, 

कोयल 

कूके...

उससे पहले उठ जाता हूं! 

मैं तो अब जीवन लिखता हूँ!

मैं तो बस, जीवन बुनता हूँ।

जय प्रकाश मिश्र









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