कतरा कतरा बांट कर, बीते समय को।

परतें उतारूं, समय की..
गहराई... में देखूं! 
रोककर..! 
आज! 
मैं..., 
पुलकित.. प्रिये!  
बिताए, तेरे साथ सुंदर! 
चाहता हूं!  फिर, वही.. पल! 

चाहता हूं! 
फिर वही पल
पुनः आएं! लौट कर! 
इस जिंदगी में,
एक बार फिर से..
सरकते, 
सिल्क के पर्दों पे चढ़ कर,
नीलिमा के पटल पर
मुस्कुरा दें
झिलमिलाते..!
धुधलती, इस आंख से,
फिर.. देख.. पाऊंगा 
कभी..? 
संभव! नहीं.., अब।

कतरा.. कतरा.. 
बांट कर,
बीते... समय को, अलग कर लूं! 
आज फिर, मैं... 
उसी... 
क्रम.. में।
धीमे... चलाऊं !
रोक लूं! 
और देखूं, अपलक! 
देर तक, 
नीहारता, नजदीक से, 
चांदनी में चन्दनों की महक का
स्पर्श.. पाऊं! दूर मन में...
चाहता हूं! मैं.. रहूँ ! 
जिंदा...! 
तेरे.. 
अलविदा! के.... आखिरी क्षण! 

और.. थोड़ी देर, तुझको मिल सकूं! 
अन्तःस में अपने, 
भीगने दूं! 
आंसुओं से, और थोड़ा 
श्याम..?  हां, यह श्याम ही रे..., 
अपना कालघट! 

उदास होना चाहता हूँ!
और थोड़ी देर, 
तेरी सोच 
में! 
पर क्या करूं! 
मजबूर हूँ! तूं दूर होकर 
पास है...
शांत रह.. आज फिर
महसूस करना चाहता हूँ, 
बहता हुआ, पारा.. 
गरम! 
आज फिर इन रगों में...
इन शांत होती धड़कनों में
समा लेना चाहता हूँ, 
एक बार तुमको..।

इस बरसती, बरसात में, 
एकांत में, चुप अकेले!  
इस झिंमझिमी, 
पत्तों पे पड़ती, 
द्रुम डालियों
से, 
टुपटुप... टुपुकती 
मंथरी... आवाज में,
कहां हो तुम! 

खोजता हूं, 
अंधेरों की बाट में,
तूफान बन कर, बह रहे 
झोंको में तुमको, खोजता हूं 
कहां हो तुम! 
गिर रही, बौछार के इस शब्द में
तुम्हे सुन रहा हूँ! 
पत्तियों सी थरथराती, कांपती 
यह देह तेरी, छू रहा हूं! 
क्या यही है तूं, सोचता हूं  

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!