कतरा कतरा बांट कर, बीते समय को।
परतें उतारूं, समय की..
गहराई से देखूं!
चाहता हूं! लौट आएं!
फिर, वही..
पल!
लौट कर!
धुधलती, इस आंख से,
फिर.. देख.. पाऊंगा कभी,
संभव! नहीं.., अब।
कतरा कतरा
बांट कर,
बीते समय को, अलग कर लूं!
आज फिर, क्रम में उसी..।
धीमे चलाऊं,
रोक लूं!
और देखूं, अपलक!
देर तक, नीहारता ही
मैं.. रहूँ !
तेरे.. अलविदा के
आखिरी क्षण!
और.. थोड़ी देर, तुझको मिल सकूं!
अन्तःस में अपने,
भीगने दूं!
आंसुओं से, और थोड़ा
श्याम, अपना कालपट!
उदास होना चाहता हूँ!
और थोड़ी देर,
तेरी सोच
में
महसूस करना चाहता हूँ,
बहता हुआ, पारा
गरम!
आज फिर इन रगों में।
इस बरसती, बरसात में,
एकांत में, चुप अकेले!
झिंमझिमी, रिमझिमी,
पत्तों पे पड़ती,
द्रुम डालियों
से,
टुपटुप... टुपुकती
मंथरी... आवाज में।
जय प्रकाश मिश्र
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