कौन हूं मैं?

मित्रों, आत्म विश्लेषण और तत्व परक इसकी अनुभूति इसी पर आज की लाइने प्रस्तुत हैं। आप को कुछ मिले यह प्रयास है।

खाद, पानी, हवा, मिट्टी और गोबर! 
सब दिया, जब समय पर..
और.. बीज बोया, 
समझ, का..
तो.. 
फूल..
निकला, तत्व का..!

देख.. उसको, खुश हुआ,
सुंदर! बहुत था।
पर..!
काटता.. 
वह 'पर' मेरा.. 
मुझको, 
बहुत... छोटा... किया।

हल्का हुआ मैं, 
सोच से
और... 
खुद में खो गया! 
अब..
देखता हूँ..विश्व को, 
मैं.. वही! जग.. वही! 
यह.. 
क्या.. हुआ! 

परतें.. हैं सारी, खुल.. रही
दीख़ती... हैं, 
सूखती! 
अब रस नहीं! 
राग का
स्पर्श
तो, बिल्कुल नहीं! 

प्रेम है, छैला...! हुआ, 
हर ओर....
पींगे... मारता,
अंदर... कहीं.., झूला पड़ा! 
मैं.. झूलता, 
जग मधुर.. था, मधुतर... हुआ।

आज.. जाना! 
प्राण! हैं
जो, 
तृप्त होते, 
विकल.. होते, 
भूख से और प्यास से,
बोल..! सकते... यह, नहीं।
मात्र हैं आभास देते,
अब, बस करें, 
हम.. भर! 
चुके ।


एक मन.. है, मुझी.. में
प्राण से 
यह अलग है, 
प्राण के वश, मृत्यु है! 
यह मूल है, यह आत्मा है,
आधार.. जीवन! सच.. यही है।

प्राण.., भीतर! आ.. रहा है,
प्राण बाहर जा.. रहा है, 
यही तो प्रिय! 
आत्मा है,
नवल! 
है।

देख! खुद
यह अमर..! है,
मरता... कहां है, 
बाहर है जाता अंदर है आता, 
जब तलक है, चाहता!  
यह एक ही है, 
सभी भीतर, परख इसको।

यह 
प्राण है।
तेरे.. मेरे, सभी भीतर, 
एक यह, प्रिय! एक... ही,  है।

अलग कर लो, कर सको तो! 
बांध लो, संभव नहीं है! 
भूल मत कर,
हवा यह
वह! 
नहीं है।
यह हवा का भी,  
प्राण.. है, शक्ति है, यह सूक्ष्म है, 
उन्नत बहुत, सच अलग है।


एक 'हम' 
हैं, 
मन! प्राण! 
के ही 
बीच.. रहते! 
पर, अलग इनसे.. 
शुरू ही... से। 

हम, 
मन! नहीं, हैं! 
मन.. दुःखी, चित.. में चिंता, 
बता न ! 
हम यही होते.. 
तो.., कैसे कहते? 

ये तो हैं.., साधन हैं हमारे!  
बुद्धि भी, विवेक भी 
हम.. नहीं हैं,
अन्यथा ऐसे क्यूं 
कहते! 
मारी गई थी बुद्धि मेरी, 
विवेक मेरा हर लिया,
यह! कौन कहता! 

क्या? 
चाहते हैं, जानना? 
कौन हैं हम? आसान है, 
एक कथानक है, आराम से 
इसको पढ़ें.. फिर हल्का सोचें।

राजा.. चढ़ा था, हस्ति पर..
प्रजा उसे, देखती..! 
ताली बजाती! 
मस्त..! 
थी।
तीन पद थे, 
एक राजा, एक हाथी  
एक परज़ा खडी नीचे

एक 
चौथा.. 
और.. था 
दूर से सब देखता 
इन तीन को वह, बहुत खुश था।
मैने पूछा क्या हुआ? 
क्यों हंस रहा? 
उसने कहा, 
देख 
न!  
एक ऊपर, एक सब कैसे चढा! 

मैने कहा, बस ये बता..?
बीच में, है कौन? 
तुझको दीखता..? 
हाथी कभी..
परजा कभी.. वह बोलता! 

अचानक! 
हाथी तभी पागल हुआ,
राजा है नीचे!  
पांव के,
उस हस्तिनी के, जान का 
भिक्षुक बना,
प्रजा खुश है, देखकर, 
अन्यायी था, राजा 
अंत इसका हो चला! 

बीच में अब कौन है? 
मैने ये पूछा! 
भ्रम! है दुनियां?  
एकदम ना! 
सत्य है यह! जो भी है।

क्या भ्रमित 'हम' हैं?  
जी नहीं.., 
हम! 
स्फटिक मणि, 
पारदर्शी, शुद्ध निर्मल! 
आत्मा, विलग! हैं, 
इस.. जहां से, 
सभी कुछ 
से,
चेतना... 
हम स्निग्ध उज्ज्वल!  
एक संधि है, इस बीच में,
आत्मा और विश्व के..
वही है कम! 
परिभाषाएं हमारी, हमरा भ्रम! 

स्फटिक मणि है चमकती, हमारी
बता न! किस... रंग की
जगच्छाया उसपे
पड़ती,
अहा! है, जिस रंग की! 
जिस तरह की, तुमको दिखती..
वही हैं हम!   
रंग ले उन परस्थिति की,
रूप ले उस भावना 
का, 
भरमते 
भर जिंदगी हम।


किरदार अपना बदलता है
परिस्थिति चढ़, समय के संग, 
हम तो वही, वह एक ही
चेतना स्फटिक मणि! 

परिस्थिति हो! मात्र बस! तुम! 
जन्म से ले  मृत्यु तक,
चेतना ही खेलती है! 
हर स्थिति से तेरे संग
इससे ज्यादा कुछ नहीं हम! 

जय प्रकाश मिश्र












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