जब नच गई थी आत्मा।

मित्रों, अपना जीवन, इस विश्व-स्टेज पर, आत्मा का रूपमय लास्य-नृत्य! और उसकी अनुपमेय प्रस्तुति। इसी पर आज की लाइने आप पढ़ अनंग-आनंद पाएं, यही कामना है।

कितनी खुशी से, 
चीख..! कर, 
चिल्ला..! पड़ी..थी, 
आत्मा..! 
रूप... पा, 
इस, देह,.. का,
अनुभूत कर, इस जहां को
मारे, खुशी.. के, 
रो.. पड़ी थी, आत्मा..।

देखकर... ऐश्वर्य! 
व्य*.. का, 
प्रकाशा-च्छादित*! 
रूप..मय, 
संभार जगमग, 
अहा! ऐसा..!  
जादुई,
हो.. 
वास्तविक! 
आनंद में भर, 
जन्म.. लेने, के.. प्रहर!
नच गई थी आत्मा।

कैसे?  
उतर कर.. 
इस.. धरा पर,
अरूप... से, वह.. 
रूप पाकर, 
खिल उठी थी .....।

फूल! बनकर, प्रकृति ने, 
सुगंध ले, इस धरा की
स्वागत किया था! 
आगे 
आकर..! 
मयूरी सी नाचती! 
दिल खोलकर! 
और झुक गई थी, आत्मा! 

मां ने दिया था, 
उसी क्षण
वह 
'स्रोत-श्री' स्नेह का, 
प्रेम का, 
गोद की, उस.. खुशी.. का
वरदान.. वह, मातृत्व.. का
पा इसे, अरे कैसे! 
प्रफुल्लित थी आत्मा! 

हां..! इसी.. पर,  
रीझ... कर! 
था... 
गीत गाया, 
बुलबुलों... ने!
तितलियों ने, भ्रमर ने, 
स्वागत में 
उसके, 
रंग.. रंगे! 
और 
तारे हंस रहे थे, 
वहां.. ऊपर! 
गगन.. में....
तब, मुस्कुराती, 
हंस रही थी ......।
 
चंद्रमा, 
शीतल.. हुआ, था
रात्रिभर, जग मग! हुआ था,
बहकता, 
मधुमय हुआ था,
मधुर, अनुपम!  झूमकर! 
तब, 
बह उठी थी, यह.. हवा।
आवाज आई थी 
यहां... बा... 
मरहबा* तूं... मरहबा!  
झूम कर!  
पागल हुई थी, 
उस समय यह आत्मा! 

देखती!  वह... फूल, कलियां, 
सितारों को, खुश हुई! थी,
पट उठाती हवाओ
संग, 
पत्तियों ने,  
राज! खोला, जिंदगी का,
तब खिलखिला कर 
खिल गई थी आत्मा! 

घोंसलों में देख कर, 
नन्हे! फुदकते..!
रंगीन.. 
चूज़े..! 
होमर ने लिखे थे, 
देख इनको 
पसंदीदा..., शिकादा*!
प्रसाद में, तब!  
बह उठी "कामायनी*" 
सूखी कलम ने, प्रश्न पूछा
"कबतक और अकेले कह दो
अपनी निधि न व्यर्थ खोलो"
वाक्य यह! कहती हुई
और लास्य अद्भुत! 
कर रही थी 
आत्मा...।
 
जय प्रकाश मिश्र
व्य*.. का: दिखाई देने वाला, प्रत्यक्ष
प्रकाशा च्छादित*: प्रकाशित, दृष्टिगत
मरहबा*: अरबी शब्द, सादर स्वागत है
शिकादा* महाकवि होमर का काव्य रूप।
कामायनी* श्री जयशंकर प्रसाद की कृति


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