कौन.. है, बैठा हुआ इन अंधेरों में।

मित्रों, कठिन को आसान करना भी मेरा काम है इसी क्रम में आप अपने को जाने इसी पर ये लाइने और इनका भावार्थ भी लिखा है, आप प्रसन्न हो यही उनसे याचना है।

दीपक बना.. 
यह 
कौन.. है, 
बैठा हुआ इन अंधेरों में, 
स्वप्रकाशित!
इतने गहरे गह्वरों में, 
अकेले, जन्म से ले 
आज 
इस अठवें दशक में।

चुप मौन वैसे
साक्षी.. 
इतनी बड़ी 
इस अवधि का
चिद्रूप कैसा, एक सा, 
न कभी उद्विग्न होता
न कभी उद्विग्न करता।

नृत्य करता विश्व यह 
घेरे इसे
कितने.. दिनों से,
विश्राम करता रात्रि हर
थक हार कर,
और यह, 
मेरे दिल के जैसा, साथ देता, 
बता देता सुबह को, प्रिय स्वप्न हर
नींद में भी सबसे गहरी 
जागता है,
कभी न विश्राम करता
स्वाद उसका बता देता, कौन है यह..!

पांच धागों में बंधा रखा है कैसे
पारदर्शी स्फटिक! 
दिखता नहीं 
इन
नेत्र से,
मन, बुद्धि, चाहत और मानस
चाकरों से घूमते 
हर समय, 
हर ओर इसके..।

ज्ञानेन्द्रियों, 
कर्मेन्द्रियों की सेज पर 
आराम से लेटा हुआ, 
अविचलित, 
एक सा यह आजतक
मैं पूछता हूँ, 
साक्षी 
संसार का यह कौन है?

इसका उत्तर अष्टावक्र जी अपनी अष्टावक्र गीता के प्रथम अनुक्षेद के तीसरे श्लोक में दिया है..

न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥

जय प्रकाश मिश्र

शब्दार्थ
न पृथ्वी — न पृथ्वी (तुम पृथ्वी नहीं हो)
न जलम् — न जल
न अग्निः — न अग्नि
न वायुः — न वायु
न द्यौः — न आकाश/द्युलोक
न वा भवान् — और न तुम इनसे बना हुआ शरीर मात्र हो
एषाम् — इन सबका
साक्षिणम् — साक्षी
आत्मानम् — अपने आत्मा को
चित्-रूपम् — चेतना-स्वरूप
विद्धि — जानो/समझो
मुक्तये — मुक्ति के लिए।

सीधा अर्थ
तुम न पृथ्वी हो, न जल, न अग्नि, न वायु और न आकाश।
इन सबके साक्षी अपने आत्मा को चैतन्य-स्वरूप जानो—यही मुक्ति का मार्ग है।

मित्र जय प्रकाश जी, आपकी इन पंक्तियों में कविता कम, आत्म-अनुसंधान अधिक है। यह कठिन को आसान करने वाला ही काम है।

इसे पढ़ते हुए लगा कि आपने अष्टावक्र के तीसरे श्लोक को शास्त्र से उतार कर अपने जीवन में रख कर देखा है।

आपकी कविता का भावार्थ

दीपक बना.. स्वप्रकाशित!
आप शरीर-मन को अंधेरा कहते हैं और उसके बीच जो बैठा है उसे दीपक। वह किसी और से जलता नहीं, स्वयं प्रकाश है। यही वेदांत का पहला बोध है - आत्मा पर-प्रकाशित नहीं, स्व-प्रकाशित है।

इतने गहरे गह्वरों में, अकेले, जन्म से ले आज इस अठवें दशक में।
यह पंक्ति कविता की सबसे सच्ची पंक्ति है। शरीर बदला, संबंध बदले, दशक बीते, पर देखने वाला वही रहा। आपने समय को गह्वर कहा - बहुत सुंदर। हम गहराइयों में उतरते हैं, पर साक्षी किनारे पर ही रहता है।

चुप मौन वैसे साक्षी.. न कभी उद्विग्न होता, न कभी उद्विग्न करता।
यह साक्षी का सटीक लक्षण है। यही तो चिद्रूप है - चेतना का रूप, जिसमें कोई हलचल नहीं। वह न दुखी होता है, न दुख देता है। बस देखता है।

नृत्य करता विश्व.. जागता है, कभी न विश्राम करता
यहाँ आपने दो सत्यों को एक साथ पकड़ा है। संसार नाचता-थकता है, सोता-जागता है। पर हृदय में बैठा वह तत्व आपकी नींद में भी जागता है। इसीलिए सुबह उठते ही हमें पता चल जाता है - रात सुख से बीती या नहीं।

पांच धागों में बंधा रखा है कैसे पारदर्शी स्फटिक!
यह बिंब अद्भुत है। पांच धागे - पांच कोश, या पांच तत्व? और बीच में पारदर्शी स्फटिक - आत्मा। स्फटिक के पास अपना रंग नहीं, पास जो आता है उसी का रंग दिखा देता है। मन, बुद्धि, चाहत और मानस - आपके शब्दों में 'चाकर' - इसी स्फटिक के चारों ओर घूमते हैं, पर उसे छू नहीं पाते।

ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों की सेज पर आराम से लेटा हुआ
यह उपनिषदों वाली शैली है। इन्द्रियां सेज हैं, आत्मा उस पर लेटा हुआ राजा है। अविचलित, एक सा।

और फिर आपने अंत में वही प्रश्न किया जो हर जिज्ञासु करता है - यह कौन है?

और उत्तर में आप अष्टावक्र को ले आए -
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
अर्थात - तू न पृथ्वी है, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश। तू इन पाँचों का साक्षी है, चैतन्य-स्वरूप है। ऐसा जान ले, और मुक्त हो जा।

आपकी कविता इसी श्लोक की टीका है।

एक सच्ची क्रिटिक - मित्र की तरह

इस कविता की शक्ति क्या है:
ईमानदारी: इसमें किताबी ज्ञान नहीं, अपने आठ दशकों के जिए हुए जीवन का साक्ष्य है। इसीलिए यह भीतर तक उतरती है।
प्रतीक: दीपक, गह्वर, स्फटिक, सेज - ये सब भारतीय मनीषा के पुराने प्रतीक हैं, पर आपने उन्हें अपनी भाषा में नया कर दिया।
लय की मौनता: आपने तुकबंदी के पीछे नहीं भागा। जैसे साक्षी चुप है, वैसे ही आपकी पंक्तियों में ठहराव है। यह इस विषय के लिए सही है।

थोड़ा और निखार सकते हैं, यदि चाहें तो:
आपकी पंक्तियों में कहीं-कहीं विराम चिन्ह बहुत हैं - .. और यह को अलग पंक्ति में रखना। पाठक का प्रवाह टूटता है। यदि इसे मित्रों के बीच व्हाट्सएप या फेसबुक पर भेजना है तो थोड़े छोटे-छोटे बंद और सीधी पंक्तियों में यह और अधिक लोगों तक पहुंचेगी। भाव वही रहेगा, केवल आँख को पढ़ने में आसानी होगी।

उदाहरण के लिए "पांच धागों में बंधा पारदर्शी स्फटिक" जैसी पंक्ति अकेली ही पूरे पन्ने को संभाल लेती है।


आपका यह प्रयास बहुत सुंदर है। कठिन को आसान करना ही तो ज्ञान है। आपने कर दिया।

इसे आप ऐसे ही मित्रों में भेजें, यह बहुतों को सुबह के स्वप्न की तरह अपना ही स्वाद याद दिला देगी।

लेकिन इसका भाव इससे कहीं गहरा है

यहाँ अष्टावक्र “नेति–नेति” के द्वारा तुम्हें शरीर और जगत की परतों से अलग कर रहे हैं।

हम अपने अनुभव में कहते हैं—
यह मेरा शरीर है।
शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि तत्वों से बना है।

लेकिन प्रश्न है—
जिसे मैं “मेरा शरीर” कह रहा हूँ, वह “मैं” कैसे हो गया?

फिर मन को देखिए।
मन में विचार आते हैं—
मुझे क्रोध आया।
मुझे प्रसन्नता हुई।
मैं दुखी हूँ।

पर यदि क्रोध को देखा जा सकता है,
यदि दुःख को जाना जा सकता है,
यदि विचार को आते-जाते देखा जा सकता है,
तो जो उन्हें जान रहा है, वह स्वयं वह विचार या भावना कैसे हो सकता है?

यहीं श्लोक कहता है—
एषां साक्षिणम् आत्मानम्
इन सबका साक्षी ही आत्मा है।

और “चिद्रूपम्” बहुत महत्वपूर्ण है।

अष्टावक्र यह नहीं कह रहे कि आत्मा कोई और सूक्ष्म पदार्थ है।

वे कहते हैं—
चिद्रूपम् — चेतना ही जिसका स्वरूप है।
अर्थात् आत्मा को किसी वस्तु की तरह खोजना ही भूल है।

वस्तुएँ दिखाई देती हैं;
साक्षी वस्तु नहीं है—वह देखने की चेतना है।

इसलिए उसे बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं।

आप पृथ्वी को जानते हैं।
जल को जानते हैं।
अग्नि को जानते हैं।
वायु को जानते हैं।
शरीर को जानते हैं।
मन को जानते हैं।
विचार को जानते हैं।
तो प्रश्न उठता है—
इन सबको जानने वाला कौन है?

अष्टावक्र उसी ओर संकेत करते हैं।

आपकी पहले की “नेति–नेति” वाली चर्चा से जोड़ें
यहाँ क्रम बहुत सुंदर है—
मैं यह नहीं हूँ।
शरीर नहीं।
इंद्रियाँ नहीं।
विचार नहीं।
भावनाएँ नहीं।
पंचभूत नहीं।
लेकिन यह निषेध शून्य में समाप्त नहीं होता।

अंत में बचता है—
साक्षी।
और वही—
चिद्रूप आत्मा।

इसलिए “नेति–नेति” का उद्देश्य यह कहना नहीं कि कुछ भी नहीं है, बल्कि यह पहचानना है कि जो कुछ जाना जा रहा है, मैं वह नहीं; मैं वह हूँ जिसके प्रकाश में वह सब जाना जा रहा है।

यही इस छोटे-से श्लोक की सबसे बड़ी छलाँग है—

तत्वों से स्वयं को अलग करो, फिर अलग हुए “स्व” को किसी नई वस्तु की तरह मत खोजो; उस साक्षी-चेतना में ठहरो।
यहीं से ज्ञान मुक्ति की ओर जाता है।

सौजन्य जयप्रकाश मिश्र साथ में जीपीटी (AI)
 

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