उछलती, आनंद-मग्ना नग्न-वदना वसनहीना हाल में,

मित्रों, विश्व में मात्र दो ही चीजें हैं, एक परमाणुओं से बना भौतिक यथार्थ और दूसरा इन सबमें व्याप्त अदृश्य चेतना या आत्मा। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद के लिए प्रेषित हैं।

बात.. है यह, शुरू की. 

विश्व, जब.. यह, बन.. रहा था,

उस समय, इस.. विश्व में

एक.. चेतनामय, आत्मा.. थी।

वह आत्मा.. थी! 

निष्कलुश..

शुद्ध.. थी, परिशुद्ध.. थी। 

अति निर्मला.. थी,  प्रकृति उसकी

विरस थी, चैतन्य... थी। 


आनंद में वह मगन थी,

हवाओ में मधुरता 

बन..! 

हर जगह, हर स्थिति में

धरा पर, निर्झरा... वह,

एक सी ही, बह रही, 

वह बह रही, सर्वत्र... थी।


बात उसकी, क्या करूं! 

हर.. जगह थी, प्रचुरता.. में, 

भौतिक नहीं थी, 

निरवयव... थी।

आह!  कितनी शांत थी, मृदुल थी

चेतना बन, जागृति संग 

जगत में इस, 

आदि से ले... उस समय तक, रह रही थी।


पृथक.. थी, 

वह गुणों से, व्यवहार से

सजग थी,

अभौतिक  अस्तित्व उसका,

अस्तित्व देती, सभी को

अलग, वह....  बस...

जगत में, साक्षी... बन खड़ी थी।

वह आत्मा थी, परम थी! 

संसार का इस मर्म थी।


समय था वह... 

प्रात.. का, इस.. सृष्टि का बिहान

प्रिय तब हो रहा था

आत्मा यह, जीवता थी, 

जीवनों... की, 

सुख.. दुखों.. से, दूर.. थी।

आनंद घन, प्रफुल्लित, 

वह.. स्वयं में 

प्रिय..! 

सतत, शाश्वत, मगन थी। 


दूर... थी... 

अलग थी, परमाणुओं से, 

निरवयव थी, 

इसलिए वह संग से, रज से,  तमों से

विलग थी।

उस समय वह....

मन भावना, हर कांक्षणा 

बुद्धि से, भी अलग थी।

पर ज्ञानमय थी, चेतना वह तरल थी।


क्या हुआ! 

बस... एक दिन!  

वह उछलती, आनंद-मग्ना  

नग्न-वदना.. 

वसनहीना हाल में, धरा पर इस, 

गिर.. पड़ी! 

धरा पर इस, गिर.. पड़ी! 


उठी... तो, 

पर.. गंदगी, इन पांच तत्वों की 

चिकस थी, धरा ऊपर

बचते बचाते, उसके  तनपर 

हल्की फुल्की, लग गई..।

अरूप थी जो आज तक, उस रूप में

प्रिय! रूप पाकर खिल गई।


गंदगी, इन पांच तत्वों की, चिपट 

उस दिन से उस पर, लग.. गई।

एक बिमारी! प्रिये 

रूप के सौंदर्य की 

उस दिन से उसको लग गई।


सच कहूं तो, 

बीमारी इस तन से सरकती

मन.. की उसको लग गई।

मन चतुर था, चंचल बहुत था

एक रस उससे हुआ

सुख.. दिया, सुखतर... किया

बुद्धि ले प्रस्तुत.. हुआ

आत्मा जो..., निस्पृहा.. थी..

उसी दिन से जीवात्मा बन

स्पृहा में बंध गई।


वही तो यह आत्मा, 

जीवात्मा का रूप लेकर..

कर्म के बंधन में बंध कर 

दुख सुखों के बीच में...

प्राणियों के रूप में..

विश्व बनकर है खड़ी।

विश्व बनकर है खड़ी।


एक वृत्त लेकर घूमती 

अज्ञान का, भ्रांतियों का, 

पाप का, दोष का, प्रवृत्ती का, 

जन्म मृत्यु और दुख का

क्या कहूं! आज तक यह ढो रही।

आज तक यह ढो रही।

जय प्रकाश मिश्र

 



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