मैं...,  
हट.. गया हूं, 
मोर्चे.. से, और,  खाली... 
मोर्चे.. हैं! ऐसा..  नहीं.. है, 
लोग.. हैं, तैनात.. 
इनपर, 
मुझसे.. बेहतर! मुझसे बेहतर! 
देखता हूं, हर तरफ
मोर्चों में जान है 
वीरान थे जो
मोर्चे, 
आज उनमें प्राण है
रात... आधी, जा.. चुकी है
शांति.. गहरी, छा.. चुकी है
लोग हैं आगोश में
रात्रि के उस भोज में, 
निश्चेष्ठ हैं सब जीव जब, 
नींद के तालाब में
कुछ बीर हैं 
जो जागते.., नींद को धिक्कारते
चुप चुप खड़े हैं, 
धीर हैं, ये.. बीर हैं, कार्य.. पूजा मानते.
ये.. कार्य पूजा मानते! 





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