प्रिय! पीड़ा कुछ ऐसी ही होती!
मित्रों! व्याधिग्रस्त स्वांस रोगियों के दर्द और पीड़ा की हृदय विदारक अनुभूति, मुझे यहां आई.सी.यू. वार्ड में हुई है। उसे ही लिपिबद्ध कर आपको भेज रहा हूँ।
प्रिय!
बहता... है, कुछ...
यहां.. हवा... में, धीमे.. धीमे,
नश्तर.. जैसे!
चुभता.. है, यह...!
कसक... लिए, टूटे कांटों.. सा,
करक.. लिए, जियतार...,
हिया हिल जाये जैसे!
कैसा?
तुमको बतलाऊं..!
काट रहा हो, हृदय.. कोई!
लेजर.., नजरों...से अपने जैसे।
आर्त... हुआ,
बेबस! हो हो कर, मुझे देखता!
दीन.. पड़ा, वह!
बिस्तर अपने, पकड़ हाथ से कस कर,
कैसे!
आहें भरता!
हाल यही....,
हाल यही....,
आई.सी.यू... का।
पग दो:
दर्द.. भी
क्या चीज.. है,
सिसकारता है, सीटियों.. सा,
सिसकता.. है, दूसरे पल।
आह! में
यह, सिसकारियां.. भर
गूंजता.. है, पवन संग...
निकलता.. है,
सुन रहा हूँ, दर्द को बहता.. हुआ
मैं हवाओं पर।
गूंजता.. है, पवन संग...
निकलता.. है,
सुन रहा हूँ, दर्द को बहता.. हुआ
मैं हवाओं पर।
उर्मियों की तरंगों पर,
सर्प हो,
कोई लहर लेता,
आगे पीछे झूमता, यह दर्द है।
और क्या लिखूं!
कैसे कहूं!
दंश देता, विश्राम लेकर,
देर थोड़ी, आराम से, रह!
यह पुनः
इसको... डंस रहा है।
दर्द है! अलग है यह!
व्यक्तिगत है,
निजी है, मजबूर है,
प्रिय! इसे जो भी भोगता है।
निजी है, मजबूर है,
प्रिय! इसे जो भी भोगता है।
पग तीन:
पीड़ा..,
कैसे.. बहती है!
सरिता.. सी, ही... तो,
लहर.. लिए, आती. जाती .. है,
कष्ट प्रवण, प्राणी.. के ऊपर!
रह..! रह..! कल! कल!
बहती... रहती... ,
उठती, गिरती
स्पंद.. लिए
देखा
है,
मैने आंखों से इन.. तरल गरल सी।
पीता.. है
वो.., परम दुखी!
अपराधी.. बन कर,
कष्ट प्रिये!
चुपचाप यहां पर।
चुपचाप यहां पर।
इसके आगे मार्ग नहीं,
अब!
कौन बचाए, कष्ट से प्रियवर!
नियति नटी के, हाथों प्रियतर!
पीना ही है,
चिल्ला चिल्ला, शोर मचा कर!
गरल... कष्ट ही, उस को.. केवल ।
कौन बचाए, कष्ट से प्रियवर!
नियति नटी के, हाथों प्रियतर!
पीना ही है,
चिल्ला चिल्ला, शोर मचा कर!
गरल... कष्ट ही, उस को.. केवल ।
पग चार:
कैसी.. है,
पीड़ा... मित्रों, यह...
क्या... बतलाऊं! छू.. देती हों
बालक... शिशु, को...
प्यासी.. किरणे..
पूर्ण चन्द्र
की
ये ही समझें!
प्यास.. मिटाएं, पानी.. खींचे,
नर्म त्वचा से, नमी निकाले,
व्याकुल... कर दे!
छटपटा मचाती,
उस बच्चे में प्रिय!
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पग पांच:
अति धीमे से, कितनी.. मीठी..
नर्म.. हस्त से...
हृदय रसों का, दोहन करती,
प्रिय! पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
प्रथम.. प्रसूता,
नवधा.. गौ, सी.. आर्त मचाती!
करुण प्रिये!
करुणोत्तर होती...,
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पग छह:
किरणे
जैसी प्रथम, अरुण की
नए... उगे... रोओं, पर.. पड़ती
नर्म! मुलायम!
असि धारों सी काट रही हों,
त्वचा हृदय की।
नहीं नहीं
पीड़ा.. कैसी! तुम्हें समझाता हूं
क्षीण अरे! दुर्बल के स्वर सी
परम अपाहिज मुख से मुखरित!
मुरझाते कोमल उत्पल सी।
अरे! नहीं यह!
ठंडी..., अति शीतित
प्रिय भूखी... सी
पवन बह रही पछुआं जैसी
फटी बिवाई दुखती हो
किसी वृद्ध पुरुष की।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पवन बह रही पछुआं जैसी
फटी बिवाई दुखती हो
किसी वृद्ध पुरुष की।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पग सात:
क्या तुमने देखी है पीड़ा
काजल की पतली रेखों सी,
आंखों में प्रिय शिशु की पहली..
गाढ़ी, चम चम चमक लिए
कोमल शिशु मुख पर,
चाबुक की कोई रेख पड़ी सी।
प्रथम पुष्प के तरल गंध सी
व्याकुल करती।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
पीड़ा, कुछ ऐसी ही होती।
जय प्रकाश मिश्र
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