निगाहे छुअन ही, कुछ थी ऐसी,

बना दिया, तुमको सुंदर!   

निगाहे छुअन ही, थी.. ऐसी,

रंग.. होठों में, उतर!  आये.. 

थी..., फूलों की रंगत!  ऐसी।


पर होते भी, पक्षी... न उड़ा,

थी, दिदार की, लगन.. ऐसी,

कहने... को तो, मदीना.. है, 

जालिम..! 

देख न! आ यहां...भी, वो.. 

मांगता हैं, दुनियावी, किस्मत अपनी।


हां!  

ये वही दुनियां है,

देख! इसे... अच्छे से,

अच्छे अच्छों ने यहां, केवल 

मान की  खातिर!  

वक़्त, बेवक्त है अस्मत बेची।

 

ये उपवन सिहर उठता है, 

रंगो आब बिखर जाती है,

जवां फूल मचल उठते हैं

डाली भी लचक जाती है।

जब तू मस्त! 

आफताब सी मदराती है

न जाने कहां, 

खरगोश सी छिप जाती है ये,

दुनियां..!  

जब तूं प्यार.. से, होठों.. में, 

दब के, मुस्कुराती... है।

मुझे, यादें.. पुरानी आतीं हैं।


लबे.. बरसात, जब, जब 

तूं..., कुछ.. गाती.. है,

अपनी..  गढ़त.. से, 

स्नेहिल.. प्यार... में,

ये बारिश.... कैसी! 

मेरे अंदर 

रसाती, सी... बरस जाती है।

वरना 

लाइनों में क्या है? 

शब्द दो रंगे भी नहीं हैं, 

काले, हैं केवल..! 

औकात इनकी 

बस सीमित यहीं तक..!

रंग तेरा ही है, भरा, प्रिय! 

इनके भीतर,

बिना परों के, उड़ते हैं, परिंदों से बेहतर! 


जय प्रकाश मिश्र

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