क्या.. कहूं! प्रिय!
अस्तित्व विहीनता पर कुछ लाइने आपके आनंद हेतु प्रेषित है। आप पढ़ कर आनन्द लें।
खड़ा हूँ
मैं.. जानता हूं,
मैं.. जानता हूं,
देखता.. तुम्हें, ललचता.. हूँ
क्या.. कहूं! प्रिय!
तुम.. वही, मैं.. वही,
परिसर.. वही
क्या बदलता है, क्षणों.. में
मैं..,
अब..
वह.. नहीं!
मन.. मेरा, रूप.. तेरा,
मधुरता..
लावण्य.. प्रिय!
सब कुछ, वही.. है।
संगम हि, था क्या?
उस.. समय!
किसी
धार.. का,
प्रवाह.. का..
कहां.., लुट गया!
चंचला,
पता ना चला !
खड़ा हूँ!
मैं जानता हूँ
देखता.. तुम्हें, बढ़.. चला हूँ..।
दूसरी किसी राह पर..
पर...!
सत्य
क्या... है?
पूछता हूँ! रूप.. यह?
तेरा... छीजता, जो क्षण अनुक्षण
खिलती कली सा, लरज़ता
कुम्हल पाता,
मुरझ के यह पास आता
टपक जाता, पुष्प सा
जो कल खिला था
डाल पर,
मुझे खींचता
बाध्य.. करता, देखने को
कसमसाता.., सौंदर्य के संभार से,
दूध से प्रिय दही बनता
खटास लेता,
गंध से
दुर्गंध में यह कदम रखता
रूप क्या.. है?
कुछ नहीं, अस्तित्व इसका,
मन.. से मिला.., तो, रूप.. है
अन्यथा यह पुष्प है, कानन परिधि का।
किसने कहा वह..
खिला था.., ना खिला..था।
मन.. ये क्या है?
खींचता.. है
बांधता.. है, एक क्षण में,
दूसरे..
उलीचता.. है,
भाव.. सारे..
जड़मूल से, सब.. छोड़ता है,
संन्यास को यह
पकड़ता है, कौन है ये...
वस्तुतः
है.. ही नहीं
यह... मन.. मेरा।
वस्तुतः है ही नहीं यह मन मेरा।
क्या चाहते हो जानना
तुम सच यहां..
परिस्थितियां.. रूप हैं
परिस्थितियां.. मन तेरा
मित्र मेरे!
है... ही नहीं
यह रूप... तेरा, मन मेरा।
यही तो, यह
समझ यारा अस्तित्व की इस विहीनता।
जय प्रकाश मिश्र
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