सोचता हूं वक़्त को इस बांध दूं!

सोचता हूं!  

वक़्त.. को इस, बांध... दूं!  

शब्द में बुन.. बुन.., इन्हें

चुन चुन.. के, रख.. दूं! 

गुप चुप यूं ही, 

समय की दीवार में,  

अंदर कहीं, अक्षुण्ण... रख दूं! 


हर विकृति से बचा कर

इनको छुपा दूं, 

सहेज.., रख.. दूं, कोई.. पा सके

महक.. इनकी, ऐसे.. यूं ही

काल की करवट के बाद

हर विप्लवों की आंधियों से दूर रख दूं।

महक.. इनकी बिखेर दूं! 

काल के, कपाल पे..

इस काल.. के परछाइयों की 

अमिट रेखा, 

शाश्वती... ही, मैं... बना दूं।


जब.. पढ़ें, कोई.. 

सत्य.. को वह, देख.. ले,

सदियों के बाद, युगांतर में

इस... समय.. के, चाओस.. को,

आदमी के ह्रास.. को, 

मानवों.. के नाश.. को।

चरम.. इस विकास की 

इन.. सीढ़ियों पे पहुंच कर

कैसे... हुआ था, 

क्योंकर.. हुआ था,

वह, पढ़..पढ़ा कर, समझ ले।


वह.. जान पाए,

सदियों पहले, आराम से...

इस.. धरा पर, मानव.. थे कुछ! 

मस्तिष्क.. के प्राणी थे, वे...

पर, निशाचर.. थे,

आदतों.. से, आपसी व्यवहार.. में।

इस बार के, काल.. के, कपाल.. पे

विनाश.. के

कारण... थे, वे..।

कैसे थे वे, क्या सोचते थे? 

स्वार्थ में, 

किस तरह, सब.. मूढ़ वे, 

डूबे.... हुए थे

युगों.. पहले, इक्कीसवीं शताब्दि में

अहंकारी.., 

मूर्ख... सब, खुद ही में

लड़ भिड़ मरे थे

न्यूक्लियर किसी वार में..

मात्र इगो के लिए, मूर्खता में 

संग सब, एक दूसरे के।


सोचता हूं!  

वक़्त.. को इस, बांध... दूं!  

शब्द में बुन.. बुन.., इन्हें

चुन चुन.. के, रख.. दूं।

जय प्रकाश मिश्र



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