कौन.. 

हैं.. हम..! 

हम.., पूछते हैं मित्र! तुमसे, 

बताओ..? कुछ, अलग.. हट के।

विचार.. हैं, 

यथार्थ... हैं, या और कुछ हैं..

विश्व में इस, जन्म से 

ले मृत्यु के इस 

बीच 

में।


तत्व 

तो बस 

दो... ही, हैं 

इस..., विश्व.. में

पहला 'अभौतिक' आत्मता.., 

विचार.. में, समझ में, इन... प्राणियों के

दूसरी परमाणुता.., 

यथार्थ में 

हर जगह फैली.. हुई, 

हर रूप.. में

एक.. सी 

इस प्रकृति.. में, प्राणियों.. के रूप में।

इंद्रियों में, 

बदलते हर एक कण में, 

हर एक क्षण में।


विचार क्या है? 

समझ क्या है? 

पूछता हूँ, बताओ इन गूढ़ को? 

सरलता में, सहज.. हो, 

बिस्तार से..।

तो लो सुनो,

विचार ही तो "योग" है

जोड़ है,'ज्वाइंट' 

अनोखा 

बस ये समझ लो,

जो जोड़ता है, परमाणु को इस आत्म से।


भौतिक-अभौतिक जोड़ का 

जो तंतु है, 

विचार है वह..

देख कर इस सृष्टि को, 

जगत को

जो... उपजता है तेरे भीतर 

सहज... रे! 

विचार है वो...।

योग का साधन है ये, 

संसार में. 

बंधन है ये, 

ये.., आवरण है, 

आत्मा का सत्य.. है

पर! समझ.. के रूप.. में।


समझ क्या है! 

और समझो,  

विचार के, व्यवहार.. का 

इस.. युगल के, 

बीच में

जीवात्मा और जगत में

जो, सत्य है, 

सामान्यतः स्थिर है वो

वह समझ है, वही बुद्धि है,

एनालिसिस 

इस बुद्धि की विवेक है, इतना ही सब रे! 


इस 

तरह से

अंततः विचार हैं हम.. 

शांत.. हैं जब, अपने भीतर.. 

सोचते.., मनन.. करते, कार्य.. करते

डिसीजन.. जब कोई लेते.., बात.. रखते

पाठ.. करते, स्मृति.. का ध्यान करते, झगड़ते..।


यथार्थ हैं हम, 

इस.. जगत में, दीखते हैं

निज रूप में, निज रंग में, प्रिय वस्तुओं 

की चाहना में, अप्रियों की त्यागना में,

इंद्रियों के साथ मिलकर, 

जगत को जब भोगते! 

भागते डर कर

किसी से

मोह 

में जब अवांछित कुछ कर गुजरते,

यथार्थ से हम सभी मिलते।


संबंध क्या है? 

विचार का, यथार्थ.. से

मुझको बताना, और थोड़ा और, गहरे! 

एक ही हैं, या अलग, इक दूसरे से।

तो लो सुनो एक 

कथानक 

आराम 

से।



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