कौन यह कल्लोल करती बीच चौराहे खड़ी है!
मित्रों, तेज छीनी की, सतत.. तीखी चोट को जब कोई पत्थर सब्र से सहता है, तो वह चोट उसे अप्रतिम सौंदर्य पहना सदा के लिए आदरनीय और अमर बना देती है। जीवन भी ऐसे ही है। इसी पर आज कुछ लाइने आपके लिए।
उभरता है,
चित्र... एक्!
मन.. में... मेरे,
झांकता है,
आंगना...
वह, स्मृति... के
चुपके..! चुपके..!
प्रिय, अलग..., हट.. के।
भाव: कुछ दृश्य विस्मयकारी, हट कर होते हैं, मानस में, समय बे-समय स्वतः प्रगट होते हैं।
पास.. आया..,
याद.. आया, चित्र...वह!
ना, ना..., अरे! ना
मूरत.. थी, वह..,
बोलती..,
संवाद.. करती, बुद्धि... संग,
अठखेल.. करती,
संवेदना.., संवेग.. लेती,
अपनेपने... में।
भाव: कुछ स्कल्पचर या आकृतियां गजब होती हैं। पत्थर या संगमरमर, तेज छीनी की चोट, सब्र से सहता है, वह चोट उसे अप्रतिम सौंदर्य पहना, सदा के लिए आदर का पात्र बना देती है। और वह मूक ही, संवेदनाओ को अपने में जोड़ लेता है।
झकझोरती...
पौरुष... को वह!
प्रेम का निनाद, करती...
काल को, ले हाथ में, वह खेलती..
निश्चिंत... प्रिय! थी,
प्रिया.. संग,
कलिल.. हो, कल्लोल... करती
बीच, चौराहे, ...लगी
अभिप्रेत.. थी।
भाव: ऐसी ही एक आकृति पेरिस में एफिल टावर के पास लगी है, जिसमें एक हाथ से फन फैलाए सर्प को और नीचे दहाड़ते शेर को भाले से दबाए एक योद्धा अंक में अपनी प्रिया को पकड़े निश्चिंत, रति में निमग्न, उकेरा गया है।
श्वेत...
पत्थर...!
छीनियों की चोट खाकर!
सब्र से, अटूट रहकर
मनस्वी... के
हाथ.. से,
क्या! बोलता.. है!
आज.. देखा! आंख.. अपने...।
आवाज...को यह
समेटता है,
रूप में,
अमरत्व बन, चुप ही! प्रिये!
भाव: अच्छे जीवट का आदमी या पत्थर जब सुंदर गुरु या कुशल कारीगर के हाथ धैर्य से तराशा जाता है। तो वह चोट उसे अमरत्व ही नहीं आदर भी दिलाती है।
चुप खड़ा,
ललकार.. करता, निनाद.. भरता,
ऐलान.. करता, मौन में भी...
इस.. तरह से... चीखता.. है?
कान... में,
हर किसी के, आज देखा!
बताता हूं...
बीच चौराहे खड़ा वह!
कह रहा था...
युगों...
से
हम...
श्रेष्ठ.. हैं,
बली.. हैं, आनंद.. प्रिय.. हैं,
हर.. हाल में,
सदियों... से प्रिय
तूं....!
देख! मुझको।
तूं.. देख मुझको।
भाव: कालजयी रचनाएं, लोग और मूर्तियां, अपने गौरव से, अपना संदेश, लोगों को चिर काल तक देती हैं। अपनी रहस्य मयी शक्ति से मानव में प्रेम का संदेश हमेशा फैलाती रहती है।
बज्र सम
एक् हाथ... में,
पकड़े.. हुए,
नाग की फनकार को
फुफकारते..
कुटिल..,काल कराल.. से,
उस... नाग को,
निर्भय.. खड़ा वो,
वह...
पैर नीचे...
दबाए... , मृगराज को...
चिग्घाड़ते, विकराल मुख खोले हुए
छटपटाते, शेर को
शूल से अंकुश किए,
अंक में... प्रिय!
प्रिया को वह
साथ ले
आनंद से, नारी प्रणय
रति.., विंध.. हुआ
था।
किस तरह.. !
भाव: वीर के लिए वसुंधरा के भोग हैं। सारे.. भोग, स्वस्थ और चरित्रवान और निडर के लिए हैं। कायरों के लिए जीवन केवल काल की एक गठरी है। जिसे लादे वह जीता है और मरता है।
आनंद.. से,
मुझे... याद.. है,
पैंथींयन... पेरिस में,
थोड़ी दूर पर..
महल के, एक पार्क में
मूर्ति बन! प्रिय खड़ा है वह!
आज तक।
खेलना है, खेल!
यह, संसार रे !
पराक्रम से, शौर्य से,
वीरता से, दक्षता से,
लड़ो तुम...
जीत जाओ,
तुम्हारा..., संसार.. है,
आनंद का ही स्रोत, यह.. संसार है।
डरो मत तुम काल हो,
भय को दबा दो
पैर नीचे,
विजेता का खेल यह संसार है।
भाव: इसलिए अपने में काबिलियत पैदा करें। अपने साहस और पराक्रम से जीवन को खुशहाल बनाएं, परिश्रम और सदयुक्ति से खुशियां पाएं। इसके उदाहरण हर जगह हैं।
प्रेम, ही
संसार... का
सबसे बड़ा.. उपहार है
प्रेम का ही खेल सब संसार है।
हो प्रेम पर कब्जा मेरा,
बस यही तो, दुखसार है, संसार का।
बस यही तो, दुखसार है।
मित्रों, उल्लास, लास, उत्सव, इच्छापूर्ति सब कुछ प्रेम के ही भीतर छुपा है। संसार का उद्धार निर्मल और स्वार्थहीन प्रेम से है जबकि विनाशकारी युद्ध और विप्लव इसी प्रेम के विकृत रूप का परिणाम है। जब हम इस पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं तो नाश और जब इसे मुक्त करते हैं तो यह वरद है।
जय प्रकाश मिश्र
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