प्रिय...! पलछिन! पलछिन! छीज रहा हूँ,
लगता... था!
उद्देश्य.. नहीं, अब..
जीवन.. का, कुछ...!
झूले... में,
मैं... झूल.. रहा हूं....
कालावधि.. के,
निरुद्देश्य..
प्रिय...!
हर पल.. हर दिन..।
पलछिन! पलछिन!
छीज रहा हूँ,
भीतर.. अपने...,
गंगा... में
बहती... पाती, सा..
सफर.. बचा जो,
सागर... तक
का...,
उसे.. उठाए
माथे... अपने, घूम.. रहा हूं,
इस जीवन.. में, हर पल.. हर दिन..।
आज हुआ, एहसास..
अलग.. कुछ!
जीवन..
व्यर्थ.. नहीं होता है,
धरती पर इस..!
जोड़ जोड़ना, काम.. बचा है!
गांठ... बांधना, काम बचा... है!
अलग.. हुए,
इस
पीढ़ी.. के
दंपतियों के संबंधों
की... नौका में, जुड़.. खुद!
आ.., चल!
तेरे पास, मैं.. बैठूं!
और, देर थोड़ी... सी,
सुन.. लूं!
एक.. कहानी
मनमानी.. की, नेक्स्ट.. युगल की!
देखूं..., क्या कर सकता हूँ!
ग़म.. में, इनके..
गम.. बन
खुद मैं..
क्या..!
इन सबको..
शेष जिंदगी, चिपका संग में
जोड़..., गांठ... कर सकता.. हूँ।
प्रेम, सत्य..! इस जीवन.. का
संघर्ष.. नहीं, प्रिय!
दिल में इनके
जीवन के
इस
गरल संधि की बेला में
क्या कहीं धान के पौधों सा
रोपण?
मैं...
अपने शब्दों से
पुनः प्राप्त कर सकता हूँ?
हरे हरे ये लहराएं, झूमे
मस्त हवाओ में
बाली.. फूटे!
दाने.. बैठें!
धरा... हंसे, किलकारी से
क्या.. कुछ ऐसा?
मैं... प्रिये! आज कर सकता हूँ!
आ चल! तेरे..., पास मैं बैठूं!
और देर थोड़ी सी,
सुन लूं!
एक कहानी
मनमानी की, एक युगल की!
देखूं क्या कर सकता हूँ!
लगता... था..
उद्देश्य.. नहीं, अब..
जीवन.. का, कुछ...!
झूले... में,
मैं... झूल.. रहा हूं....
कालावधि के, निरुद्देश्य प्रिय...!
जय प्रकाश मिश्र
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