टूटती एक सांस अंटकी.. आई सी यू पार्ट- 2.

आई सी यू रेस्पिरेटरी में मुझे भी इधर रुकना पड़ा है, कई दिनों से, वहीं से ये लाइने आप के लिए लिख रहा हूं आप पढ़ें और आनंद लें, कि कैसे अस्थमिक मरीजों की सांस मैने ऊपर नीचे होते यहां देखा। और डाक्टरों को देखा है सेवा करते।

टूटती... सी सांस उसकी, 
ऊपर.. उठी थी,
शेष कितनी 
बची थी! 
मैं
सोचता, जब तक अभी..! 
उसके, पहले..
छातियों में घरघराती..
आवाज करती
निरा... ही, नीचे.. गिरी थी।

पेंडुलम... हो! 
दोलता...
इस.. पार से, उस.. पार कोई
पहुंच कर....
अधिकतम....पर,
कोलैप्स.. होकर, धम्म से 
नीचे... गिरी थी,
सांस.. थी, वो...
खरखराहट रेडियो से
और.. बदतर...  
क्या कहूं..! तरंगों 
की... विक्षुब्ध हो, सांस के
उन हवाओं की
विक्षोभ ले, ले, 
उठ.. रही थी! गिर.. रही थी! 

हिचकोले... खाती, 
गांव के, रस्तों पे.. चलती, 
लारी.. कोई, हो...
कुछ.., इस तरह.. से, 
फ्लेक्चुएशन
उच्चावचन, वह कर रही थी।

कैसे कहूँ!  शुतुरमुर्गी चाल सी
बस एक क्षण में, उखड़ती, 
बहुत ऊपर जा रही
लटकती थी, दूसरे.. में, 
उतने.. ही नीचे!  
कूप की गहराइयों से, 
विंध्याचली *
गिरि-अंतरों के, अंधेरों से निकलती
मुझे लग रही थी।

और.. थोड़ा 
स्पष्ट..  कह.. दूं
तालाब में, बगुला... भगत.. सी
डोलती.., 
बहुत.. धीमे,
पहला.. पग, आराम.. से, 
दूसरा...
आहिस्ता... रखती,
कुछ इस तरह, 
डर.. डर.. के जीती, 
जिंदगी... 
वह... 
जिंदगी से, लड़ रही थी।

क्रमशः आगे
जय प्रकाश मिश्र













 

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